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काश…

गुड़िया रानी, बिटिया रानी
पारियों की नगरी से एक दिन
राजकुवर जी आयेंगे, महलों में ले जायेंगे।
मेरी पत्नी मेरी पांच साल की नातिन को सुलाने की कोशिश कर रही थी और मैं परदे की ओट से उसे देख रहा था, जाने क्यों आज पूरी ज़िन्दगी बेमानी सी लग रही थी। मैं वापस कमरे मे आकर आराम कुर्सी पर बैठ गया।
कहते हैं हर आदमी में कुछ खूबियां या यूँ कहिये खामियाँ होती हैं, आज इस सच से मैं नज़र नही फेर सका।
उत्तर प्रदेश के बड़े से गाँव मे राजनाथ चौधरी का परिवार सम्पन्न लोगों में गिना जाता था। लम्बी चौड़ी खेतीबारी थी, उस पर मेरे पिता जी हाई कोर्ट के नामी गिरामी वकील थे, तो समझो पूरे इलाके में बाबा की तूती बोलती थी। पिताजी की आवाज़ इतनी रोबदार थी, वे अगर मां को एक आवाज़ देते तो पूरे घर में सन्नाटा छा जाता था। बेचारे नौकरों की सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती थी। घर में सन्नाटा ही रह्ता था। मैं मात्र दस बरस का था जब मुझे पढ़ने के लिये बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया था। उस दिन यूँ लगा था जैसे ठंडे पेड़ की छाया से निकाल कर जेठ की तपती धूप में खड़ा कर दिया हो।
मेरे होश सम्भालने से लेकर स्कूल जाने के बीच एक छोटा सा बचपन जो घर में गुजरा था, उसका एक अहम हिस्सा मां और मेरी बुआ दादी थीं ।
आज बुआ दादी की बहुत याद आ रही है। बाबा की मुह्बोली बहन , मात्र पंद्र्ह वर्ष की उम्र् में उनकी शादी हो गई थी। एक ऊंचे घराने में सम्बंध हुआ था, वो एक बार अपनी ससुराल गईं थीं, एक साल बाद वो पहली बार मायके आई और फिर कभी वापस नहीं गईं। पहले तो कुछ समझ नहीं आया लेकिन जब कई  महीने बीतने पर किसी ने जब खोज खबर नहीं ली तब बाबा ने संदेशा भेजा, और फिर वही अपने‌-अपने अहंकार का झगड़ा हो गया था। बुआ दादी के ससुराल वालो ने कहलवा भेजा
“ अरे कायदे से विदेशी मोटर कार में भेजें वरना अपनी बहन वहीं रखें!”
यह मांग बाबा के सामने ऐसे पेश हुई की वो उनके अहम् पर चोट कर गई, बस फिर क्या बाबा ने सारे सम्बध तोड़ दिये। इस सब घटनाओं के बीच बुआ दादी से किसी ने कुछ नही पूंछा, सबने मिलकर उनकी ज़िन्दगी का फैसला कर दिया। वो चुपचाप सब देखती रही। बुआ दादी ने खुद को घर के काम, खेत के हिसाब किताब में झोंक दिया। उस जमाने में ज़रूरत भर का पढ़ी लिखीं थीं बुआ दादी।
यूँ तो नरम दिल थीं मगर बेहद कम बोलती थीं। उम्र बढ़ी, शरीर थकने लगा था, बाबा परलोक सिधार गये थे। पिताजी को अपनी वकालत से फुर्सत ना थी, बँटवारा होकर ज्यादा कुछ नहीं बचा था। जाने क्यूं वो पिताजी के सामने नहीं आती थीं। वो उनके बेटे समान थे लेकिन शायद उनके रोबीले स्वभाव ने मां बेटे सा रिश्ता बनने नहीं दिया। मां उनकी जरुरतों का ध्यान रखती थीं। उनका कमरा उनकी सीमारेखा बन गया था, बढ़ती उम्र के साथ ना उस सीमारेखा को उन्होने लांघा ना ही किसी दूसरे ने उनके दिल मे झाँकने की कोशिश की। उंनके कमरे सिर्फ मैं धड़ल्ले से आता जाता था, और वो अपना सारा प्यार दुलार मुझ पर उंड़ेलती थी। मेरे होस्टल जाने के बाद वो बिल्कुल अकेली रह गई थीं।
ज़रुरतों के बल पर बने रिश्ते, शायद उन रिश्तों के अकेलेपन से उनका दम घुटने लगा था। जल्दी ही इस दुनिया को अलविदा कह गईं। इंसान सिर्फ रोटी का नहीं, प्यार और अपनेपन का भूखा होता है। अकेलेपन या तिरस्कार से तो हरा भरा पेड़ भी सूख जाये वो बिचारी तो जीती जागती इंसान थीं।
ये सब बातें मुझे उम्र भर याद रहीं और बुआदादी की याद हमेशा मेरे मन में रहीं ।
समय बीता़ मैं ईलाहाबाद विश्व विद्यालय मे लेक्च्रर बन गया था, पिताजी बहुत कमज़ोर हो गये थे। बुआ दादी के जाने के बाद मां पिताजी की सेवा मे लग गईं। मैंने हमेशा मां को चुपचाप बस अपना फर्ज़ निभाते ही देखा था। पिताजी शरीर से कमज़ोर जरूर थे, मगर कानूनी सलाह मश्वरा दूसरे वकीलों को देते थे। इससे कुछ आमदनी के साथ ही उनको रौब झाड़ने के लिये कुछ लोग मिल जाते थे। फिर मां तो थीं हि उनके गुस्से को बर्दाश्त करने के लिये। कभी कभी मैं भी चिढ़ जाता था, सोचता मैं ऐसा नहीं करुंगा लेकिन मैं गलत था। कुछ आदतें हमारे खून में होती हैं।
मेरी शादी सीमा से हुई, बेहद सौम्य स्वभाव अत्यंत रूपवती, किसी प्रकार की चालाकी या कहिये ज़माने का चलन उसे छूकर नहीं गया था। हौस्टल में रह्ने के कारण एक स्वाभाविक अनुशासन मुझमें था, फिर विश्वविद्यलय में भी अपने कड़े स्वभाव के लिये जाना जाता था। विवाह के बाद शायद कुछ बद्लाव आता मगर सीमा के लिये मेरी इच्छा सर्वोपरि थी, अंजाने मे ही मेरे चारों ओर एक सीमारेखा  खिंच गई जिसे मैं खुद भी पार नहीं करता था। फिर मेरी बेटी ने जन्म लिया।
जिस रोज़ उसका जन्म हुआ नर्स ने उसे मेरी गोद मे दिया, तब ऐसा लगा जैसे कोई नन्ही सी गिलहरी का बच्चा हरे पत्तों में दुबक जाना चाह्ता हो, दिल में पहली बार लगा जैसे कोई बर्फ पिघल रही हो।
ना जाने क्यूं ऐसा लगता था वो बुआदादी का पुनर्जन्म हो, वैसे ही खूबसूरत लेकिन अंतर्मुखी स्वभाव था।
मेरे रोबीले स्वभाव के कारण मुझसे बहुत कम बोलती थी। धीरे धीरे वो बड़ी हु़ई मां, तो दुनिया से जा चुकी थी मगर पिताजी की इच्छा का मान रखने की खातिर मैंने मात्र बीस साल की उम्र मे उसे विदा कर दिया।
कितनी प्यारी गुड़िया सी लग रही थी अपने विवाह के दिन, पिताजी के पुराने दोस्त का पोता था रवि, एक बड़े विज्ञापन कंपनी का मालिक था जिसे कोलकता में वो खुद चलाता था। सौम्या विदा हुई, मैं खामोश रहा, लेकिन आंखों ने साथ न दिया वो चुपचाप बह्ती रहीं। घर में एक खामोशी छा गई। मैं अक्सर उसके कमरे मे चुपके से जाता, उसकी मौजूदगी का अह्सास पाने कि कोशिश होती थी। दिल में एक खालीपन सा था। मुझे लगता मुझमें संवेदनाएं खतम हो गई हैं। लेकिन मैं गलत था, बस ज़िन्दगी भर जताना नहीं आया इसका हमेशा अफसोस रहेगा।
सीमा फोन पर सौम्या का हालचाल लेती और मैं सुन लिया करता था। शहर कि दूरियो दूरियों की वजह से आना जाना ना हो पाता था। एक साल के बाद सौम्या वापस घर आई, कुछ खटका मुझे उसके चेहरे से रौनक गायब थी, आंखें अंदर को धँसीं बेहद कमज़ोर लगी, मैंने पूछा “कैसी हो सौम्या?
बड़ा ही औपचारिक सा सवाल था। आज मुझे उसकी चिंता हो रही थी। सौम्या के होठों पर एक फीकी सी मुस्कान तैर गई ओर वो बोली “मैं ठीक हूँ, बाबा!”
हम दोनों के बीच कभी मुक्त सम्वाद हुए ही नहीं तो भला आज ये कैसे सम्भव होता। उसे अपनी मां से बात करते देखता, जी में आता मैं उसमें शामिल हो जाऊं मगर एक अदृश्य सी दीवार मुझे घेरे रह्ती, तभी सीमा ने बतया वो मां बनने वाली है। सच कहूं मैं खुशी से झूम उठा उस दिन, और खुद से वादा किया इस बच्चे से खूब लाड़ लगाउंगा।
एक दिन अपनी मां से वो कुछ पैसों का जिक्र करते हूए सुना कि शायद रवि को कोई लोन चुकाना था। हफ्ते भर में रवि उसे लेने आ गया। सौम्या रवि के सामने कुछ सहमी सी लगी। जाते हुए मैंने रवि को ताकीद की कि सौम्या का ध्यान रखना वो मां बनने वाली है। सौम्या की चुप्पी मुझे खटकती लेकिन दिमाग मेरे मन को समझा देता “सभी औरतें ऐसे ही होती हैं, मौन रहकर केवल अपने कर्तव्य का निर्वाह करते अपना जीवन जीती हैं”, ये ही मेरी सबसे भूल थी।
कुछ महीने बीते सौम्या का प्रसव काल नज़दीक आ रहा था। सीमा बार-बार कहने लगी की मैं सौम्या को यहां ले आऊं , वो इतने बड़े से परिवार में रहती है, मुझे कुछ ठीक नहीं लगता है। मैं हर बार उसे टाल देता, अरे उसे अपने परिवार में सामंजस्य बैठाने दो, जब बच्चा होगा पूरे रस्म रिवाज़ निभाने वहाँ चलेंगे।
जाने क्यूँ सीमा आशंकाओं से घिरी रहती थी, शायद मांऐं ऐसे ही होती हैं। एक रोज़ सीमा जिद पर अड़ गयी कि उसे सौम्या के पास जाना है। पहली बार उसकी इच्छा को सुन मैंने कोलकता जाने का विचार किया। टिकट लाकर सीमा को दिखाया तो वो बेहद ख़ुश हुई। हम जाने की तैयारी में लग गये। अब मैं जल्दी सौम्या के पास जाना चाहता था।
बिन बताये हम सौम्या की ससुराल पहुंचे तो पता चला वो अस्प्ताल में है। हमारे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मैंने रवि के बारे में पूछा तो पता चला वो शहर के बाहर गया है। कुछ अजीब सा लगा घर की बहू अस्प्ताल में है, किसी को कोई चिंता नहीं थी। सीमा एकदम सन्न खड़ी थी, मुझे देखकर बोली
“मैंने कहा था न मेरी बिटिया को वापस ले आओ, यहां कुछ ठीक नही है।”
हम बदहवास से अस्पताल पहुंचे तो वहाँ एक नर्स ने बताया सौम्या कि आज सुबह एक नौकर के साथ आई थी, तभी एक डॉक्टर गोद में एक बच्चे को लिये आई, और उस नन्ही सी जान को सीमा को थमा दिया, और बेहद तल्ख अंदाज में बोली “आप लोग बेटी की शादी कर पीछा छुड़ा लेते हैं”।
मैं हैरान सा कभी उनको कभी बच्चे को देख रहा था।
वो मुझे घूर कर देखते हुये बोली “आपकी बेटी ने इस बच्ची को जन्म दिया और हमेशा के लिये चली गई इस दुनिया से”!
सफेद तोलिये में सौम्या की बच्ची बेखबर सो रही थी और मुझे सारी दुनिया घूमती नज़र आ रही थी।  मुझे कुछ समझ नही आ रहा था। सौम्या के साथ आया नौकर वहां से जा चुका था।
सीमा बुरी तरह रो रही थी, मैंने भाग कर सौम्या की ससुराल फोन किया लेकिन कोई जवाब नहीं दे रहा था। मैंने रवि को फोन लगाया तो उसका जवाब सुन मेरा दिमाग शून्य हो गया।
रवि बोला ”सौम्या मर गई तो मैं क्या करूँ, उस बच्ची को यहां लाने की कोई ज़रूरत नहीं है और हां बिना किसी हंगामे के वापस लौट जाएँ आपके लिये यही ठीक होगा”।
मैं यंत्रवत बिल जमा कर सौम्या का शव ले जाने का इंत्जाम करने मे लग गया। तभी एक नर्स आई और धीरे से बोली “सौम्या चार दिनों से भर्ती थी पर घर से कोई नही आया था, पिछले नौ महीने में वो घरेलू हिंसा का शिकार हो बुरी हालत में यहां आई थी। जिस रोज से पता चला गर्भ मे लड़की है वो उसका गर्भ गिरा देना चाहते थे। सौम्या केवल अपनी बच्ची को बचाना चाहती थी। वो हमेशा कह्ती  बाबा मुझे बहुत प्यार करते हैं वो मेरी बच्ची को बहुत प्यार करेंगे। उसका पति सही आदमी नहीं है। सौम्या गर्भपात के लिये राज़ी ना थी इसलिये बहुत कुछ बर्दाश्त किया था। उसको बहुत प्रताड़ित किया उन लोगों ने।
हमने सौम्या का अंतिम संस्कार किया और वापस उसी घर में गये। वहाँ जाने क्या हुआ था सब ज़ोर ज़ोर से रो रहे थे। हर व्यक्ति खुद को ज्यादा दुखी दिखाने का प्रयास कर रहा था। मुझे कुछ समझ नही आ रहा था। ये सब शायद जमाने को दिखाने के लिये अभिनय कर रहे थे।
उस रात हम लोगों ने वही रहने का फैसला किया और हम सौम्या के कमरे में ही रुके थे। रात में मेरी आँखों मे नीँद गायब थी, जाने क्या सूझा मैने सौम्या कि अल्मारी खोली तो शादी की अल्बम सामने पड़ी थी, मैं उसे खोलकर देखने लगा।
काश की ज़िन्दगी में भी रिवाइंड का बटन होता, मैं उसके पन्ने पलट रहा था, अपनी शादी पर मेरी सौम्या गुड़िया जैसी लग रही थी। बस यूँ ही पन्नों में अपनी बेटी को तलाशता रहा। सुबह होने को आई थी मैं अलबम अंदर रखने चला तो एक लिफाफा नीचे गिर गया था, उठाया तो कुछ तस्वीरे और सौम्या का खत था। शायद पोस्ट नही कर पाई थी। खत में साफ साफ लिखा था की रवि चरित्र का सही आदमी नही था, कई अनैतिक सम्बंध थे, सौम्या सैं शादी केवल जमीनी सम्पत्ती पाने के लिये की थी। वो सौम्या पर दबाव बना रहा था की मैं खेत वगेरह बेच दू और मेरी बेटी इसके लिये राज़ी नहीं थी।
सुबह बिना कुछ कहे मैं निकल गया, उस घर में मेरा दम घुट रहा था इतना बड़ा धोखा मुझसे सहन नहीं हो रहा था। मैं सीधे पुलिस चौकी गया रवि के खिलाफ रपट लिखाई और कानूनन उस बच्ची को अपने पास रखने की तरकीब जानने वकील के पास गया। मैं खुद को  दोषी मान रहा था, मेरी वजह से मेरी बिटिया इतनी अभिशप्त ज़िन्दगी जीने को मजबूर हुई। बस! अब और नहीं, इस बच्ची को इन लोगों को नहीं सौप सकता था।
ये सब आसान नही होने वाला था, थाने में केवल खानापुरी ही हो सकी थी। रवि की पुलिस की मिलीभगत थी सो ज्यादा उम्मीद नहीं थी। अब तो रवि और उसके घर वाले बच्ची देने को भी तैयार नही थे, कोई राह न दिख रही थी। वकील के सुझाव पर मैं वहां के जिलाधिकारी से मिलने जाने लगा। मेरी भूख प्यास खतम हो गई थी, पूरे पूरे दिन उसी द़फ्तर में बैठा रह्ता था। रिसेप्शन पर बैठी वो औरत मुझे कल पर टाल देती थी। सौम्या की मौत ने मेरे आत्म विश्वास को हिला दिया था। मेरा धैर्य जवाब दे रहा था।
पाँचवें रोज़ जब मैं उस द़फ्तर मे पहुँचा तो उस औरत ने मुझे दो घंटे बाद आने को कहा, मैं बाहर आया कुछ देर रुक कर फिर अंदर गया “इस बार उस औरत ने मुझे ऊपर से नीचे तक घूरा और कहा एक बार में समझ में नहीं आता है? बताया ना अभी इंतज़ार करना पड़ेगा  साह्ब बिजी हैं।“  रिसेप्शन पर बैठी बुढ़िया ने इस बार सचमुच मेरी बेइज्जती की थी।
शायद उस रोज़ मैं आपे से बाहर हो गया था, मैने आव देखा ना ताव सीधा जिला अधिकारी के केबिन में घुस गया, वहां चार लोग बैठे थे वो मुझे अचरज से देख रहे थे। मैं खुद को बेहद लाचार मह्सूस कर रहा था, निराशा और हालात की मजबूरी ने मेरी दशा खराब कर दी थी। मैं हाथ जोड़े रोने लगा था।
ईश्वर को मुझ पर दया आ गई थी। साहब ने तुरंत बाकी लोगों को बाहर भेजा और मुझे बैठने को कहा हाथ में पानी का गिलास थमा बोले  “सर! पह्चाना नही आपने? दस साल पहले आपका विद्यार्थी रहा हूँ। मुझे उस समय साक्षात देवदूत दिखाई दिया। मैंने उनको सारी बात बताई ।
सौम्या का खत सबसे अहम् सुराग था। बस फिर क्या सारा प्रशासन हरकत में आ गया था। घर के नौकर, नर्स की गवाही से रवि और उनका परिवार घिर गया था। सौम्या को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना देने के जुर्म में उन्हें सजा हुई। हम अपनी नन्हीं सी नातिन पीहू को लेकर इलाहाबाद वापस आ गये। ये सारी बातें कभी ना भूलने की हैं लेकिन पीहू को देख दिल पर एक मरह्म सा लग जाता है।
आज शाम पीहू थोड़ा गुस्से में खेल छोड़ कर वापस आई तो मैंने पूछ लिया क्या हुआ आज तो तुम्हारी गुड़िया की शादी थी। नहीं नाना शादी के बाद गुड़िया उसको देना पड़ेगी इसलिये मैं अपनी गुड़िया वापस ले आई।

इतना कहकर पीहू चली गई लेकिन एक काश मेरे दिल में फिर उठा, काश, मैं भी अपनी गुड़िया को समय पर वापस ले आया होता। काश!!!…..

आज पांच साल बाद मुझे उस काश का जवाब मिला मैने सौम्या सदन की नीव रखी है। यहां मेरी सौम्या जैसे कई लडकियां हैं जो समाज के द्वारा सताई गई हैं मै उनकी मदद करने की कोशिश करता हूँ  और कोशिश जारी है………….।
Kiran Shukla
मैं किरण शुक्ला एक गृहणी हूं। मैं नवाबों के शहर लखनऊ की रहनेवाली हूं। थोड़ा बहुत लिखने का शौक पहले से था लेकिन जिंदगी की व्यस्तताओं मे ये शौक ज़रा पीछे छूट सा गया था। कला मंथन मंच की आभारी हूं जिसकी वजह से मैंने नए सिरे से अपने शौक को वक्त देना शुरू किया है। सही मायने मे नवलेखिका हूँ जो शायद आजकल की पीढ़ी के लिए लिखने का प्रयास कर रही हूं। उम्मीद करती पढ़ने वालों की अपेक्षा पर खरी उतरूं।

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