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अधूरे सपने

मैली कुचली साड़ी पहनने, आज फिर नैना पहुंची थी पासपोर्ट ऑफिस में

“जी नटवरलाल जी से मिलना है”

देखिए मैडम मैं इस अनजान शहर में महीनों से पड़ी हुई हूं और अब तो मेरे पैसे भी खत्म हो गये आज तो आप उनसे मिलवा ही दीजिए।

मैं जब भी आती हूं आप यही कह कर मुझे टाल देती हैं कि नटवरलाल जी व्यस्त है आप भी तो औरत है आप खुद ही सोचिए ना,
एक अकेली औरत अपने गांव से दूर अपने लोगों से दूर कैसे यहां अपना जीवन यापन कर रही है। अपनी भूख को मार कर अपनी अस्मत की रक्षा करना इतना आसान नहीं है आप भी जानती होंगी आपने भी तो इस शहर में बरसों गुजारे हैं और आप खुद उम्र दराज है और मेरी उम्र से गुजरी होंगे ।
आप भली-भांति जानती होंगी की जवानी के इस दौर में एक अकेली औरत का मजबूर होना कितना बुरा होता है लोग उसकी मजबूरी को नहीं उसके शरीर को देखते हैं ऐसे में मै कब तक यहां अपने आप को बचाए रख पाऊंगी आप एक बार उनसे मिलवा दीजिए कुछ नहीं तो मेरे पैसे ही दिलवा दीजिए जो ,उन्होंने पासपोर्ट बनवाने के लिए लिया था ।
बाबू जी ने अपनी जमीन बेच कर दिए थे वह पैसे ताकि हम सब की जिंदगी बदल सके।
मैं विदेशों में जाकर काम करूं और ज्यादा पैसे कमा सकूं आखिर यही तो कहा था नटवरलाल जी ने पिता जी से !मैं हाथ जोड़ती हूं मैडम कृपया आप मिलवा दीजिए मुझे नटवरलाल जी से इतना कहते हुए नैना रो ही पड़ी थी उसमें अब और सब्र नहीं थी अपनी मजबूरियों से लड़ने के लिए और हिम्मत भी ना बची थी ।
“उसने इस बार ऊपर से नीचे तक घूरा और कहा, ” एक बार में समझ में क्यों नहीं आता ? बताया ना अभी और इंतज़ार करना पड़ेगा साहब बिजी हैं। बहुत जल्दी में हो तो जाओ। कल आना।”
रिसेप्शन पर बैठी हुई उस खडूस बूढ़ी औरत ने इस बार सचमुच बेइज़्ज़ती की थी।”
पर गरीब की कैसी इज्ज़त और कैसी बेइज्ज़ती नैना एक बार फिर अपनी किस्मत को कोसते हुए और रोते हुए बस्ती की तरफ जाने लगी
मरता क्या न करता, नैना इसी उधेड़बुन में लगी हुई बस्ती में पहुंची। रीटा बार जाने के लिए तैयार हो गई थी।
रीटा गांव की ही एक लड़की थी जो ऐसे ही अपने अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए शहर की तरफ चली आई थी जहां उम्मीदों के बड़े-बड़े ढ़ोल तो बजते हैं पर जैसे ही ढ़ोल के करीब आओ तो उसकी आवाज से कान फटने लगते हैं और कपड़े तार-तार होने लगते हैं मजबूरी की शिकार रीटा भी गांव जाकर जमीदार की गंदी नजरों से बचने के लिए शहर के बार में ही नौकरी कर ली यहां कम से कम इज्जत बची रहती है।
तन रौंदा जाता है पर मन में जैसे ही घरवालों की खुशियां और उनकी मुस्कुराते चेहरे आते हैं सब कुछ पवित्र हो जाता है।
रीता ने भेद भरी मुस्कान भरी और कहा नहीं मिलने वाला तेरा नटवरलाल बहुत दुनिया देखी है मैंने आजा मेरे साथ इससे पहले कि ना तन बचे ना मन।
नैना अपने नाम की तरह ही खूबसूरत आंखों वाली लड़की थी मस्त मेहनती और स्वाभिमानी परिवार में नैना सबसे बड़ी थी।
एक बहन और सबसे छोटा भाई था जब तक पिता की किसानी अच्छे से चलती रही सब अपने छोटे से गृहस्ती में खुश थे गांव के स्कूल में पढ़ते भी थे।
अच्छी फसल की चाहत में नैना के बाबूजी ने महंगे बीज खरीदें और अच्छे से खेत की देखरेख की सोचा था कि इस साल फसल अच्छी होगी तो नैना के हाथ पीले कर देंगे।
पर गरीब की सोच और पांव की मोच दोनों ही असमय ही हो जाते हैं दिखते नहीं है पर दर्द बहुत देते हैं गांव में आए असमय चक्रवात ने सारी फसल को ढांह दिया।
और फसल खराब होने की चिंता ने पिताजी को भी ढांह दिया कहां तो चले थे ज्यादा कमाने, रहा सहा भी गंवा दिया, घर में जो कुछ भी बचा खुचा था उसे बेचकर फसल का कर्ज भरा गया और नौबत यहां तक आ गई कि खाने के भी लाले पड़ गए ऐसे में समझदार नैना को गांव के ही एक चाचा ने गेस्ट हाउस के काम धाम में लगा दिया नैना आने वाले लोगों के लिए खाना बनाती और थोड़ा बहुत हिसाब किताब भी देख लिया करती सभी उसकी बड़ी सराहना करते उसकी सुंदरता और स्वाभिमान उसमें और  चार चांद लगा देते।
पर कहते हैं ना चांद को ग्रहण लग जाता है और चांद में दाग होता है नैना को भी ग्रहण लगने वाला था दाग लगने वाला था इस चांद ,में भी जब गेस्ट हाउस में उसकी मुलाकात नटवरलाल से हुई ।
पहले तो वह अपनी हवस भरी नजरों से नैना को नापत रहा लेकिन उसकी इच्छा पूरी होते ना देख कर उसने नैना को गरीबी से निकलने के बड़े-बड़े सपने दिखाए विदेश जाने का लालच दिया नैना को भी पता था कि विदेश में कमाए गए रुपए की कीमत अपने देश में बड़ी ज्यादा है गेस्ट हाउस में ऐसे कई लोगों से वह मिली थी और उनकी बातें सुन सुन कर उसे यह बात पता चल गई थी।
नटवरलाल नैना पर ही नहीं रुका नैना की देह ना पाकर वह बिलबिला उठा था और जानता था कि गांव में वह कुछ नहीं कर सकता इसलिए उसने एक योजना बनाई और नैना के पिता से भी मिलने पहुंच गया, भागते भूत की लंगोटी भली यह सोचकर जाते-जाते वह नैना के पिता से जमीन का सौदा करा कर पैसे अपने साथ ले गया और कहा कि वह विदेश जाने के सारे कागज बनवा देगा और जल्द ही नैना इतना पैसा कमाएंगी कि वह लोग शान से रह पाएंगे और इससे कहीं ज्यादा जमीन ले पाएंगे।
पिता को भी ज्ञात था कि उनकी अनुपस्थिति में कोई नहीं था जो खेत जोत सके तो यही सही
अधूरे सपनों को पूरे करने की चाह में अपने हाथों से ही अपने घर को बाप, बेटी आग लगा चुके थे।
नटवरलाल ने बातों के ऐसे जाल फैलाए थे कि नैना का पूरा परिवार उस जाल में फंस गया था
जब काफी दिनों बाद तक नटवरलाल की कोई खबर नहीं आई तो नैना को खटका लगा पर फिर भी वह लोग इंतजार करते रहे।
आखिर करते भी क्या, चारा ही क्या था उनके पास गेस्ट हाउस से जो कुछ भी मिलता काम चल रहा था।
आफत तो तब  हुई जब दुनिया में फैलती महामारी ने गांव में भी अपनी दस्तक दे दी और गांव का गेस्ट हाउस बंद हो गया जैसे ही थोड़ी आवाजा ही शुरू हुई अपने पैसे पाने की चाहत में नैना नटवर लाल के बारे में पता करने लगी
वो तो गांव के लोग थे ,जहां विश्वास पर ही सब कुछ होता है कोई पता ठिकाना भी नहीं था उनके पास। नैना ने जैसे तैसे मिन्नते कर कर गेस्ट हाउस से नटवरलाल का पता निकाल लिया
कुछ पैसे उधार लिए बनिया चाचा से उन्होंने ही शहर में रहने वाली रीता का फोन नंबर दिया था
नैना जैसे तैसे शहर तो पहुंच गई पर नटवरलाल जैसे लोगों से मिलना इतना आसान थोड़ी ना होता है वह शहर में बैठा हुआ बाबू और यह मैली कुचली कपड़ों में लिपटी हुई नैना जो अगर कहती की नटवरलाल उसके पैसे लेकर आया है तो सब मजाक बना देते। पर शीशे के केबिन में बैठे हुए नटवरलाल को नैना देख चुकी थी और नैना को भी नटवरलाल पहचान चुका था पर बाहर बैठी रिसेप्शनिस्ट को उसने ऐसा समझाया था कि नैना जब भी आती वह उसे बिठा कर या बेइज्ज़त कर कर वहां से भगा देती।
नटवरलाल इस तैयारी में था कि मजबूरी की आग में जलकर कपड़े अपने आप उतर जाएंगे थोड़ा और तरसाएगा, तो बिन कहे नैना उसकी गोद में आ बैठेगी।
आखिर ऐसे ही तो जाने कई बार उसने अपनी हसरतें पूरी की है ।
अधूरे सपनों को पूरा करने की लालच और मज़बूरी की नदी में यह गरीब लोग कब तक तैर पाएंगे ,एक ना एक दिन उनके सब्र का बांध टूट ही जाएगा।
इधर नैना बस्ती में बैठी सोचती रही क्या करें वह सब के अधूरे सपने पूरी करें या वापस लौट जाए पर वापस लौट कर  करेगी भी तो क्या
गांव में भी तो कोई काम नहीं बचा आखिर क्या कहेगी वह बाबू जी से कैसे देख पाएंग वह अपने भाई बहनों को भूख से छटपटाता।
काफी सोचने के बाद नैना ने भी रीता की तरह ही अपनी इज्जत की कांच को अपने हाथों से ही तोड़ना ठीक समझा इससे पहले की कोई और या समाज के भूखे कुत्ते उसकी मजबूरी का फायदा उठा कर उसको नोचे खसौटे, नैना ने भी अपनी इज्जत की पुड़िया को अपनी साड़ी के आंचल की गांठ में बांधकर रस्सी पर सुरक्षित टांग दिया ।

रीता ने “डांस बार” से मिले हुए चमकीले कपड़े पहन लिए पहले तो उससे इन कपड़ों की चुभन अपनी आत्मा पर महसूस हुई पर जैसे ही उससे इस की रोशन अपने घर वालों के मुस्कुराते चेहरे रोशन दिखने लगे।

 तैयार हो गई वह ,उन अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए जो शायद किरकिरी बन कर उसकी आंख में तो चूभेगे पर बाकी घर वाले चैन की नींद सो पाएंगे।

आपको मेरी कहानी कैसी लगी अपने लाइक और शेयर के द्वारा मुझे जरूर बताएं धन्यवाद

 

 

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कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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Deepali Singh
मन के घावों पर मरहम लगाती है कहानियां जो कही गई ना किसी से वह भी कह जाती हैं कहानियां।

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