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मृगतृष्णा

रिया को चलते – चलते शाम हो गई थी। सूरज के डूब जाने से आसमान थोड़ा नारंगी, थोड़ा गुलाबी हो गया था। वह रुक कर वहीं सड़क के किनारे बैठ कर बड़ी देर तक सूरज को देखती रही। मां को कितना पसंद है डूबते हुए सूरज को देखना। वह अक्सर नानी से कहती  ” सबको उगता हुआ सूरज पसंद आता है और एक मेरी मां है जिसको डूबता हुआ सूरज पसंद है।”  नानी बस मुस्कुरा कर मां को देखती रहती।
कभी – कभी उसे नानी अजीब लगती जाने कितनी अच्छी तरह समझती है मां को, वह सोचती क्या मां भी उसे उतनी ही अच्छी तरह समझती है जितनी अच्छी तरह नानी, मां को। ना जाने क्यों मां को लेकर वह हमेशा संशय में रहती, नानी का मां के लिए प्यार उसे हमेशा मां का खुद के लिए प्यार; के आगे कम लगता। मां रहती भी तो खुद में ही उलझी हुई। ऑफिस का काम, मां के लगाए पौधे और उनका डूबता हुआ सूरज। उसे लगता मां के पास उसके लिए बहुत कम समय है।
मां कभी भी उसके स्कूल के एनुअल फंकशन पर टाइम पर नहीं पहुंचती, हर बार लेट। कितना बुरा लगता उसे जब सारे बच्चों के पैरेंट्स वहां मौजूद रहते, बस मां ही नहीं होती।
“ओह! अंधेरा हो गया।” अचानक जैसे उसकी तंद्रा टूटी। “चलना चाहिए” सोचती वह आगे बढ़ी। बस थोड़ी देर और, और वह अपने गंतव्य पर होगी, सोचती वह मन ही मन बेहद खुश थी। आज ना जाने उसे क्या हो गया था, ना जाने क्यों उसे भी आज यह डूबता हुए सूरज अच्छा लगने लगा था।
दुनिया में उसे छोड़ सबको लगता कि मां जितना परफेक्ट कोई नहीं हो सकता और उसे लगता कि मां बस परफेक्ट मां नहीं है। ऐसा नहीं था कि मां कभी उसके साथ नहीं होती। जब भी उसकी जिंदगी में कुछ इंपॉर्टेंट हो रहा होता, मां उसके साथ ही होती लेकिन फिर भी ना जाने क्यों वह कोई मौका नहीं छोड़ती मां को यह अहसास कराने का कि मां कभी उसके साथ नहीं होती।
अवि तो मां का सबसे बड़ा फैन था, अक्सर कहता “ तुम बहुत खुशकिस्मत हो रिया, तुम्हे इतनी अंडरस्टैंडिंग मां मिली है, जो तुम्हारी हर बात बिना तुम्हारे बताए जान लेती है। उन्होंने सिंगल होते हुए भी तुम्हे इतनी अच्छी तरह संभाला है। शी इज रियली ए स्ट्रॉन्ग वुमन।” और वह हैरान हो जाती कि उसे मां में यह सारी खूबियां क्यों नहीं नज़र आती। अभी कल ही की तो बात है जब उसे सारी सच्चाई पता चली। उसे पता चला कि जिस पिता के अस्तित्व को वह ज़िंदगी भर अपने जीवन में तलाशती रही वह इस दुनिया में हैं लेकिन मां ने उससे यह सच्चाई छुपा कर रखी।
कैसे माफ कर सकती है वह मां को इस बात के लिए और मां ने उसे चुपचाप उसके पिता का एड्रेस भर दे दिया था। मां को क्या लगा कि वह कोई बच्ची है जो बाकी सारे डिटेल्स पता नहीं लगा सकती। वह तो अब हर हाल में पापा से मिल कर रहेगी। उसे नहीं जानना कि उन दोनों के बीच क्या हुआ, उसे तो बस अपने पापा से मिलना है। मन ही मन ढेरों सपने संजोए जब वह अपने पापा के ऑफिस पहुंची तो शाम के सात बज गए थे।
ऑफिस के रिसेप्शन पर कोई खडूस सी बुढ़िया बैठी थी। “क्या है?” उसकी आवाज भी उसकी ही तरह खडूस थी। ” जी मुझे मिस्टर के. नारायण जी से मिलना है।” उसने कहा ” ठीक है। उधर जा कर बैठ जाओ। साहब अभी बिजी है।” बुढ़िया ने सामने पड़े सोफे की तरफ इशारा करते हुए कहा। वह चुपचाप वहां बैठ गई। पूरा घंटा गुजर गया, रिया इंतजार करते – करते थक गई थी। पूरा ऑफिस भी दो बार घूम – घूम कर अच्छी तरह देख लिया था। शिमला से दिल्ली अकेली चली आई थी पापा से मिलने इस उम्मीद में कि पापा उसका नाम सुनते ही दौड़ते चले आएंगे और यहां तो कुछ और ही हो रहा है।
ओह! उसने बताया कहां इस खडूस को कि वह है कौन? वह फिर बुढ़िया के पास गई। “आप एक बार…” अभी रिया अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि उसने इस बार उपर से नीचे तक घूरा और कहा ” एक बार में समझ क्यों नहीं आता? बताया ना अभी और इंतज़ार करना पड़ेगा, साहब बिजी हैं। बहुत जल्दी में हो तो जाओ कल आना।”
रिसेप्शन पर बैठी हुई उस खडूस बूढ़ी औरत ने इस बार सचमुच बेइज्जती की थी।
‘एक बार मुझे मेरे पापा से मिल लेने दो, फिर इस बुढ़िया को नौकरी से ना निकलवाया तो देखना।’ उसने मन ही मन सोचा, तभी स्वयं मिस्टर के. नारायण ही अपने क्लाइंट के साथ बाहर आते दिखाई दिए। रिया ने हाथ जोड़े लेकिन उन्होंने तो मानो उसे देखा ही नहीं। क्लाइंट के जाने के बाद वह वापस अपने केबिन कि तरफ मुड़ गए तो उसी बूढ़ी औरत ने कहा ” सर! ये लड़की काफी देर से आपका इंतजार कर रही है।”
” अंदर भेज दो।” बोल कर वह अपने केबिन में चले गए। रिया ने इस मीटिंग के लिए ना जाने कितनी ही बार अभ्यास किया था लेकिन ना जाने क्यों उनके सामने जाते ही वह कुछ बोल ही नहीं पाई।
“हां बोलो।” उन्होंने प्रश्नवाचक नज़रों से उसे देखा।
“मैं आपकी बेटी हूं।” उसकी जीभ मानो तालू में चिपक गई हो, बड़ी मुश्किल से उसके मुंह से बस इतना ही निकला। धड़कने मानो दुगुनी गति से दौड़ रही थीं।
“क्या बकवास के रही हो लड़की?” वह बुरी तरह चीखे।
” जी मैं सच कह रही हूं, हो सकता है मां ने आपको आपको मेरे बारे में ना बताया हो, मैं; मैं रितिका सहाय की बेटी हूं।” उसने उन्हें विश्वास दिलाने का एक आखिरी प्रयत्न किया।
” ओह! किस होटल में रुकी हो तुम?” उन्होंने कंसर्न दिखया तो उसे तसल्ली हुई।
” जी अभी पहुंची हूं, फिलहाल तो इस बारे में कुछ सोचा नहीं है। ” ठीक है, अब मेरी भी कोई मीटिंग नहीं है, चलो पहले कुछ खा लो, पास ही एक अच्छा रेस्तरां है, वहां चलते हैं।” उन्होंने अपना कोट बाएं हाथ पर रखते हुए कहा। वहां पहुंच कर दोनों टेबल पर बैठे तो रिया काफी देर तक इंतजार करती रही, अब शायद पापा कुछ बोलेंगे।
बहुत देर की चुप्पी के बाद रिया ही बोल उठी ” पापा!” अभी उसने कहा ही था कि नारायण जी ने अपना हाथ उठा कर उसे रोक दिया और बोला “देखो बेटा मैं जो कहने जा रहा हूं उसे बहुत ध्यान से सुनना और समझने की कोशिश करना। मैं तुम्हे किसी धोखे में नहीं रखना चाहता तुम्हारी मां की तरह।”
“मैं और तुम्हारी मां एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे हम दोनों एक दूसरे के साथ बहुत खुश थे। हम जल्द ही शादी करने वाले थे, लेकिन तभी रितिका को पता चला कि वह मां बनने वाली है जब मुझे पता चला कि तुम्हारी मां एक बच्चे को जन्म देने वाली है तो मैंने उसे कहा कि वह अबॉर्शन करा ले। मेरे परिवार वाले बड़े ही पुराने ख़यालो के थे वह एक ऐसी लड़की को कभी स्वीकार नहीं कर सकेंगे जो शादी से पहले मां बनने वाली हो।”
रिया उन्हें घूरती रही।” हां मैं जानता था कि रितिका मेरे ही बच्चे को जन्म देने वाली है, फिर भी मैंने उसे अबॉर्शन कराने के लिए कहा क्योंकि मैं पूरी ज़िंदगी उसका साथ चाहता था लेकिन ना जाने उसे अपने अजन्मे बच्चे से कितनी मुहब्बत हो गई थी कि वह मुझे छोड़ने को तैयार थी लेकिन तुम्हें नहीं, जबकि उसे पता था कि तुम्हारे जन्म के बाद उसे अपनी पूरी जिंदगी अकेले ही काटनी होगी फिर भी उसने तुम्हें चुना और उसकी मां ने उसका साथ दिया। फिर मुझसे कभी ना मिलने का वायदा कर दोनों मां – बेटी कहां गायब हो गई किसी को पता ही ना चला।” उन्होंने अपने आंखों से चश्मा उतार कर हाथ में लेते हुए कहा।

” ओह! तो आप मुझे अपनी जिंदगी में चाहते ही नहीं थे और मैं यही सोचती रही कि मां ने आपको मेरे बारे में कभी कुछ बताया ही नहीं। कितनी बेवकूफ हूं मैं जो अपनी ही मां को कभी नहीं समझ पाई और मृगतृष्णा में भागती रही।” रिया की आंखों से अविरल अश्रुधरा बह रही थी।

” बेटा मुझे समझने की कोशिश करो।” उन्होंने उसका हाथ थामते हुए कहा। ” अब मैं आपको बहुत अच्छी तरह समझ गई हूं। माफ कीजिएगा मैंने आपका बड़ा वक्त जाया किया।” कहती वह उठ खड़ी हुई। ” पर तुम इतनी रात को कहां जाओगी?” उन्होंने घड़ी देखते हुए पूछा।
“उसकी मां अभी जिंदा है।” पीछे से आवाज़ आई। दोनो ने पलट कर देखा, रितिका अपनी बाहें फैलाए अपनी बेटी का इंतजार कर रही थी। रिया दौड़कर उस महफूज़ घेरे में समा गई।

 

Pic Credit : Still from movie Shakuntala Devi

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