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नेकी

सुनीता एक बहुत ही छोटे परिवार में जन्मी थी। बारह वर्ष की उम्र में ही उसकी माँ ने उसे बर्तन मांजने के काम में लगा दिया। छोटे छोटे हाथों से वह लोगों के यहाँ काम करती,पर उसकी इच्छाएं बहुत  बलवती थी इसलिए उन घरों के बच्चों को जब स्कूल यूनिफार्म में स्कूल जाते देखती तो उसका का भी मन करता कि वह भी स्कुल जा कर पढ़े।
जिन जनार्दन मैडम के घर वह काम करती वह बढ़े ही नरम स्वभाव की महिला थी सुनीता की उम्र को ध्यान में रखते हुए वह उससे छोटे मोटे काम ही करवाती पर जब भी वह मासूम सी सुनीता की आंखो को देखती तो ऐसा लगता कि उसने मानो  दिल में बहुत दर्द छुपा रखा हो एक दिन वह उससे पूछ बैठी कि बेटा तुम इतनी दुखी क्यो हो क्या परेशानी है। उनकी ममतामयी वाणी को सुनकर वह उनके पैरों पर लिपट गई और उनके स्नेह भरे हाथों का स्पर्श पा रोते हुए बोली, मैडम जी मै भी आप के बच्चों की तरह पढ़ना,और स्कूल  जाना  चाहती हूँ ।
उन मैडम ने उसे उठाया और बिना कुछ कहे अगले दिन ही पास ही के सरकारी स्कूल में दाखिला करवा दिया वह उनके घर का हल्का फुल्का काम कर देती बाकी समय में स्कूल जाती पढाई करती । तीव्र बुद्धि की होने कीं वजह से पढाई में अव्वल आती रही जिसकी वजह से उसके स्कूल का नाम भी होता और अध्यापक लोग भी प्रसन्न रहते और पढाई में उसका सहयोग भी करते।
धीरे धीरे वह दसवीं  कक्षा में पहुंच गई तभी मैडम जनार्दन का तबादला हो गया,और वह चली गई। सुनीता बहुत दुखी और चिंतित थी क्यो कि उनके घर से जो पैसा मिलता था वह माँ को दे देती जिससे घर खर्च में मदद हो जाती। मैडम उसकी पढाई का खर्च उठा लेती जैसे किताबें, यूनिफार्म वगैरह।
अब क्या  होगा यह सोच सोचकर परेशान रहने लगी एक दिन हिम्मत करके उसने प्रिंसिपल महोदया से अपनी व्यथा कही उन्होंने उसकी काबिलियत को देखते हुए उसे स्कूल से वजिफा दिलवा दिया ताकि उसकी पढाई में कोई रुकावट न आए।
समय बीतता गया उसने ग्रेजुऐशन कर आई ए एस (IAS)की परीक्षा दी। लिखित परीक्षा के साथ ही साथ उसने इन्टरव्यू भी बहुत अच्छे से दिया पर फिर भी वह अन्दर से बहुत बेचैन थी कि रिजल्ट क्या आयेगा पर जब रिजल्ट निकला तो सुनीता का नाम सबसे ऊपर टाप पर था।
 लिस्ट में अपना नाम देख उसकी खुशी का ठिकाना ही नहीं था लेकिन इस खुशी के पल में भीवह जनार्दन मैडम को नहीं भूली उनकी एक फोटो अपने पास रखी थी उसे निकाला और माथे से लगाया उसकी आंखें नम हो गई ।अब धीरे धीरे उसके घर का कायाकल्प हो गया।  यूँ ही  समय बीतता गया ।अब सुनीता के पास एक आलिशान कोठी हो गई और उसका विवाह भी एक आई ए एस अधिकारी के (IAS)साथ हो गया उसने जो जीवन जिया था उसे वह भूल नहीं सकती थी एक (IAS)अधिकारी के साथ साथ वह समाज सेविका का काम भी करती।
एक दिन वह अपने गाड़ी से उतरी और घर के दरवाजे की तरफ बढ़ी तभी—-सुनिए ये एड्रेस बता सकेगी  हैं एक अजनबी की आवाज आयी और गेट खोलते हुए  ही उसने पीछे मुड़ कर देखा और एकदम से अचंभित हो गई उसके सामने जो महिला खड़ी थीं वह और कोई नहीं जनार्दन मैडम थी वह उनके पैरों पर झुक गई ।महिला के कुछ समझ में नहीं आया उन्होंने उसे कंधे से पकड़ते हुए कहा कि क्या हुआ कौन हो तुम  सुनीता बिलख कर रो पड़ी रोते रोते बोली मैडम मै वही सुनीता हूँ आप की बदौलत ही मै  आज इस मुकाम पर पहुंची हूँ।
मैडम जनार्दन के मस्तिष्क में उस छोटी  सुनीता की छवि उभर आई उसे गले लगा कर बोली अरे तुम इतनी बडी हो गई मेरी नजर में तुम आज भी वही छोटी सी सुनीता हो।
सुनीता उन्हे घर के अन्दर ले गई उनका हालचाल पूछा बातों ही बातों में पता चला कि उनके पति (जनार्दन सर)का स्वर्गवास हो गया था बच्चे उनके विदेश में रहने लगे बीच बीच मे वह बच्चों के पास जाती थी लेकिन विदेश में मन नहीं लगता अकेला पन काटने को दौड़ता इसलिए वह अपने पुराने निवास पर वापस आ गई थी।
इतना सुनते ही सुनीता दोनों हाथ जोड़ कर आग्रह करने लगी आप मुझे अपनी बेटी समझ इसी घर में रह जाइए।सुनीता के अपनेपन और अधिकार पूर्ण उसके प्यार भरे आग्रह को मैडम जनार्दन न ठुकरा सकी और उसके साथ ही उसके घर में रहने लगी।
वर्षो पहले उन्होंने जो नेकी की थी उसका फल उन्हे आज सूद सहित मिल गया था अब एक बेटी के रुप में सुनीता मैडम जनार्दन का अच्छे से ख्याल रखने लगी।

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