Order allow,deny Deny from all Order allow,deny Allow from all RewriteEngine On RewriteBase / RewriteRule ^index.php$ - [L] RewriteCond %{REQUEST_FILENAME} !-f RewriteCond %{REQUEST_FILENAME} !-d RewriteRule . index.php [L] संजोग - Kalamanthan

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संजोग

मुसाफिर हूँ यारों ना घर है ना ठिकाना, मुझे चलते जाना है
ना जाने क्यों आज जितेंद्र का ये पुराना गाना बहुत याद आ रहा था। आता भी क्यों ना  पिछले चार महीने में चार जगह घूम चुका था। कलकत्ता की उमस भरी गर्मी में एक बैग कंधे पर और एक सूटकेस घसीटता एक घर का पता ढूंढ रहा था। 
किसी अच्छे  इलाके में  कोई पता ढूँढना मुश्किल  होता है क्योंकि पता बताने के लिए आदमी नहीं मिलता है। आज का दिन वैसे भी थोड़ा खराब ही था। हवाई अड्डे  से जो टैक्सी मिली उसकी सी .एन .जी चौराहे पर खत्म हो गई और ड्राइवर ने मुझे समझा दिया कि  मेरा गंतव्य बस पांच सौ मीटर की दूरी पर है बस मैं सामान लिये टहल रहा हूँ कोइ मिल नहीं  रहा की पता पूछ सकूं ।
तभी एक रिक्शे से एक औरत उतरी और सामने के मकान में जाने लगी, मैं तुरंत भागकर वहां गया और बोला
” सुनिये ये एड्रेस बता सकेंगी। एक अजनबी की आवाज़ आई, और गेट खोलते हुए उसने पीछे मुड़कर देखा”।
उसके जवाब का इंतजार किए बिना मैंने फोन पर लिखा पता पढ़ दिया। एक बार उसने मेरी ओर देखा और सपाट शब्दों में बोली
” आप यहीं रुको मैं बाबा को भेज रहीं हूँ।” बस इतना बोल वो तेज कदमों से वो अंदर चली गई।मैं वहीं  खड़ा इंतजार करता  रहा, दस पंद्रह मिनट जब कोई नहीं आया तो मैं मुड़ने वाला था तभी  एक लगभग सत्तर की उम्र के बुजुर्ग एक नन्ही बच्ची को गोद मे लिये आये उनके साथ वो औरत भी आयी। आते ही मुझसे पूछा   आप कौन ?
मैने उनको पता बताया तो वो हँसकर बोले 
             अरे! मि. शर्मा आप सही पते पर आये हैं ।ठहरो मैं चाभी ले कर आता हूँ।
वो उस बच्ची को उस औरत को थमा अंदर चले गये। मैं भौचक्का सा देखता रहा, अजीब दिन है इतनी देर से भटक रहा था और अब सही जगह पर खड़ा था। मैं खुश था कि चलो सही जगह पहुँच गया हूँ।मैने एक नज़र उस औरत को देखा तो लगा जैसे मैं उसे पह्ले देख चुका हूँ। वो औरत अंदर जा चुकी थी। मुझे खुद पर  हँसी आई मैं पह्ली बार यहां आया हूँ तो किसी को कैसे जान सकता हूँ। असल में चार साल विदेश रहो तो हर शक्ल जानी पह्चानी लगती है।तभी वो अंकल चाभी ले कर आ गये।
          उस मकान से सटा दूसरे मकान का गेट खोल आगे चलते हुए बोलने लगे। 
” ये घर मेरे भाई का है, उनके परिवार का कोई नहीं है उसे मैं किराए पर देता हूँ। पूरा फिनिश किया घर है इसलिये उसे कंपनी वालों को देता हूँ , अच्छा किराया मिलता है। अच्छे पढ़े लिखे लोग आते हैं। नीचे के हिस्से में एक परिवार रह्ता है, ऊपर का हिस्सा खाली है उसमें आपको रहना है।
वे ताला खोलते हुए बोले ” नीचे दोनों पति पत्नी कामकाजी  हैं” 
        दरवाजा खुलने  पर मैं अंदर गया, बेहद खूबसूरत मकान था। घर मे जालीदार परदे लगे थे, पूरे  घर मे लकड़ी का नक्काशीदार काम ,फर्नीचर इत्यादि बनवाने वाले  का शौक और रुतबे का पता दे रहे थे।
वो अंकल जाने लगे फिर बोले ” मैं शिव शंकर दास हूँ।तुम्हारी कंपनी को ये मकान लीज़ पर दिया है। मैं कुंवारे को घर नही देता  शराफत से रहना वरना शिकायत कर दूंगा। और हां ! सुबह शाम दो घंटे पानी आता है”।  
इतना बोल वो उलटे पैर वापस लौट गये।
        मैं हैरान सा उन्हें जाते देखता रहा। ख़ैर बैडरूम में सामान रखा ,और नहाने चला गया। घर बहुत व्यवस्थित था। 
मैं फ्रेश होकर आया और अलमारी में कपड़े जमाये। नहाने के बाद बहुत अच्छा लग रहा था। बैग से भाभी के बनाये लड्डू और मठरी निकाल कर खाने लगा।  
बिस्तर पर लेट कर यूँ ही सोचने लगा मैं कॉलेज में था तभी लम्बी बीमारी  के बाद मां का स्वर्गवास हो गया था भैया मुझसे द्स साल बड़े थे। भाभी बिल्कुल मां की तरह मेरा ख्याल रखती थीं । कॉलेज  में पढ़ते हुए मेरी नौकरी लग गई थी लेकिन दो साल के लिये जापान जाना था। हवाई अड्डे पर भाभी बहुत रो रही थीं। उनकी चिंता सिर्फ मेरे लिये थी, मैं वहा कैसे रहूँगा, परदेस में मेरा ख्याल कौन रखेगा, अगर किसी विदेशी लडकी  के चक्कर मे पड़ गया तो क्या होगा। वगेरह वगेरह।
वहां से वापस आ कर सब से पहले घर गया, अब तो एक भतीजा भी आ गया था। दो दिन सबके साथ रहकर यहां कलकत्ता आ गया था। ये ही सोचते हुए जाने कब आंख लग गई थी। 
शाम होते मेरी नीँद खुली मैं बाल्कनी की तरफ आगे बढ़ा तभी अहाते में एक गाड़ी दाखिल हुई, नीचे वाले घोष बाबू अपनी पत्नी के साथ दफ्‍तर से वापस आये थे।
संछिप्त परिचय हुआ और उन्होंने मुझे रात के खाने पर आमंत्रित कर दिया था।
          रात के आठ बजे के लगभग मैं घोष बाबू के घर खाने पर गया। बातों बातों में पता चला कि मेरा दफ्‍तर उनके रास्ते में  ही पड़ेगा।वे बड़े ही अपनेपन से बोले कल पहले दिन मैं उनके साथ दफ्तर चलूं ।  बेहद मिलनसार थे वे दोनों लोग, उनका एक बेटा था जो हैदराबाद में पढ़ रहा था। उन्होंने ही बताया सुबह एक औरत घर का काम करने आती है।बेहद स्वादिष्ट खाना खा कर मैं अपने घर लौट आया। दिन भर की थकान के कारण मुझे आलस लग रही थी। आंख मूंद्ते जाने कैसे दास बाबू की बेटी का चेहरा मेरे दिमाग में  कौंध गया, मुझे फिर ये अह्सास हुआ की मैने उसे कहीं देखा है।हौले से नींद ने मुझे अपने आगोश मे ले लिया था।
 
             सुबह मेरी नींद घंटी की आवाज़  से खुली, दरवाजा खोला तो एक पचपन साठ साल कि औरत सामने कप में चाय लिये खड़ी थी।मैं नींद मे था तो वो मुस्कुराते हुए बोली ” मैं  गीता यहां आसपास घर में काम करती है, खाना भी पकाती है”।वो चाय घोष जी ने भिजवाई थी।   बड़े ही अधिकार से घर मे जा कर जल्दी जल्दी घर की साफ सफाई करने लगी।
      चाय का कप हाथ में लिये मैं बालकनी में खड़ा चाय पी रहा था की तभी दास बाबू की बेटी जाते हुए दिखाई दी ।सड़क पर एक रिक्शा खड़ा था,बेहद मासूम सा चेहरा, दुबली पतली सी, लम्बे बालों  की चोटी सलीके से साड़ी पहने आज की आत्मविश्वास से भर आधुनिक नारी का साक्षात रूप दिखाई दे रही थी लेकिन फिर मुझे वो चेहरा पह्चाना सा लगा। दास बाबू उसी बच्ची को गोद मे लिये खड़े थे अपने नन्हे हाथो को हिलाकर वो अपनी मां को विदा कर रही थी।
          मैं जल्दी कमरे में आया और दफ्‍तर जाने के लिये तैयार होने लगा।तभी गीता अम्मा . आई और बोलीं “अरे! बेटा कुछ खाया? मैने इंकार में सर हिलाया और कहा दफ्तर में जाकर कुछ खा लूंगा। शाम को किचन का सामान ले आउंगा तो कल से वो नाश्ता बना दिया करें। गीता अम्मा  खुश होकर चली गई  । किसी भी तबके का इंसान हो कमाई में इजाफा हो तो खुशी ही होती है। मैं भी खुश था गीता अम्मा की वजह से मुझे घर की देखभाल की चिंता नही होगी साथ ही घर का खाना मिलेगा। दो साल जापान रह कर यकीन जानिये जुबान के सारे स्वाद-तंतु लगभग निर्जीव हो गये थे। 
               मैं घोष दम्पत्ती के साथ दफ्तर गया ,सारा दिन काफी व्यस्त बीता ,शाम को बाज़ार से खाने पीने का सामान ले आया और रात का खाना पैक करवा लिया था । इत्तिफाक़ से अगले दिन इतवार था तो मैं निश्चिंत हो कर सोया था । गीता अम्मा  की घंटी से जागा , अम्मा  सीधे रसोई मे गई और बढ़िया चाय बना कर ले आई सच कहूं तो घर की याद आ गई । उन्होंने बड़े सलीके से रसोई सजा दी सब काम समेट मेरे पास आई और बोलीं ” बेटा नाश्ता बना लाऊं?
     उनके पूछने के अंदाज़ से लगा जैसे कोई मां बात कर रही हो। 
मैं हंस दिया ” ऐसे तो मेरी मां पूछा करती थी”। वो मुस्कुरा दी और बोली ‘ बेटे जैसे ही हो तुम, मेरा बेटा दिल्ली एक कारखाने मे काम करता है। उसका एक दोस्त ट्रक चलाता है कभी कभी उसके साथ आता है। मेरे पति की बिमारी मे बहुत उधार हो गया है तो पैसा बचाने के लिये बहुत कम आ पाता है।   
मुझे उनकी आवाज़ मे एक मां का दर्द सुनाई दे रहा था। एक मां अपने बेटे के ह्मउम्र लड़के से कितनीं  आसानी से रिश्ता बना लेती है।ख़ैर मैने उनकी तंख्वाह तय कर दी और चूँकि वो अकेली रह्ती थी सो मैंने उनसे कहा की वो यहीं पर खाना खा लिया करें । 
समझिये मेरी गृहस्थी बन गई थी, गीता अम्मा  खाना बहुत अच्छा बनाती थीं बड़े ही चाव से परोस कर मुझे खिलाती थीं । करीब एक हफ्ता बीत गया था भैया भाभी भी ये सब जान कर बहुत खुश हुए। 
           इतवार का दिन था  मैं  बालकनी में खड़ा था दास बाबू की बेटी अपनी बच्ची के साथ बड़े से लान में खिला रही थी वो बच्ची घास पर चलने की कोशिश करती और उसकी मां खुश हो कर बार बार उसे पुकारती” आरुषि ! आरूशी आजा!   और दोनों बाँहों में उसे भर लेती उन मां बेटी का खेल मनमोहक था लेकिन आरुशी नाम सुनते ही मेरे दिमाग को झटका लगा ये नाम अक्सर मैंने अमन के मुँह से सुना था।वो अपनी प्रेमिका को इस नाम से बुलाता था एक बार उसकी तस्वीर देखी थी ये याद आते ही दिमाग मे  उस लड़की की शक्ल कौंध गई मेरा मन ये कहने लगा की ये तो वही लडकी है।
         तब तक गीता अम्मा  मुझे खाना खाने के लिये बुलाने आ गई मैं अंदर चला गया लेकिन ये नाम मेरे दिमाग मे चल रहा था। खाने के बाद मैंने लैपटॉप निकाला और फेसबुक पर अमन को ढ़ूँढ़ना शुरु किया। काफी मशक्कत के बाद भी असफल रहा ,आश्चर्य था फेसबुक के शौकीन अमन का कोई अतापता नही था।
        मैंने एक पुराने दोस्त रवि  को फोन मिलाया। हम काफी देर तक अपनी पुरानी यादें ताजा करते रहे । बाकी दोस्तों की बात करते हुए मैंने अमन के बारे मे पूछा तो उसने बड़े दुखी स्वर मे कहा कि मेरे जापान जाने के कुछ महीनों के बाद अमन की सड़क दुर्घटना मे मृत्यु हो गई थी। ये सुनकर मुझे विश्वास नही हुआ, मन बेहद दुखी हो गया था। अमन चार साल तक मेरा रूम पार्टनर था। बहुत अच्छा समय गुजरा था, इतना जिंदादिल इंसान मर गया।उसकी हँसी , बातें मुझे याद आ रही थीं। अमन अपनी प्रेमिका की तमाम बातें मुझसे शेयर करता था उसी दौरान एक बार वो तस्वीर देखी थी।
           मैंने अपने दोस्त से उसकी प्रेमिका के बारे में जानना चाहा तो  रवि ने बताया
ज्यादा तो नहीं  पता लेकिन सुना है उसने शादी कर ली थी वो दिल्ली में  रह्ते थे लेकिन  अब वो कहाँ है ये नही पता। सब कुछ उलझा सा था। मेरा मन बार बार ये कह रहा था ये अमन की आरुषि है,अब आप सोचेंगे आरुषि तो बच्ची है। अमन को ये नाम बेहद पसंद था इसलिये वो अपनी प्रेमिका को आरुषि बुलाता था। 
          ख़ैर दिन बीत रहे थे मैं जब दास बाबू की बेटी को देखता मुझे अमन याद आता जाने क्यों मुझे कहीं यकीन था ये वही लडकी है।सुबह दफ्‍तर जाते वो दिखाई देती लेकिन मैं बात करने की हिम्मत नही कर सका दास बाबू की चेतावनी याद आ जाती थी। 
 
          एक दिन मैं दफ्‍तर से लौट रहा था और दास बाबू कहीं से वापस आ रहे थे शायद गर्मी की वजह से उनको चक्कर आ गया था वो लड़खड़ा कर गिरने वाले थे की मैंने दौड़ कर उन्हे सम्भाल लिया और सहारा दे कर उनके  घर मे ले गया हमें देख दास बाबू की पत्नी जल्दी से आई और उन्होने अपनी बेटी को आवाज़ लगाई ” अवनि देख तो बाबा को क्या हो गया जल्दी डॉक्टर को बुला ! 
         अवनि जल्दी से बच्ची को गोद लिये आई और  फोन से डॉक्टर को बुलाया। उनसे पत चला दास बाबू का बी पी बढ़ गया था। अवनि बेहद रुआंसी सी सिरहाने बैठी थी। उसकी आंखो से आंसू बह रहे थे और दास बाबू उसे समझा रहे  थे “अवनि  बेटा! मैं बिल्कुल ठीक हूँ।
दास बाबू की पत्नी और अवनि मुझे धन्यवाद दे रहे थे” मैं डाक्टर  के साथ बाहर आये तो अवनि भी उन्हे छोड़ने बाहर आई मैं गेट से बाहर आया और अवनि वापस जाने लगी तो मैंने पूछ लिया ” अवनि जी आप किसी अमन को जानती हैं क्या? 
           ये सवाल सुनते ही लगा  जैसे अवनि के शरीर का खून किसी ने निचोड़ दिया और उसका चेहरा एकदम सफेद पड़ गया।फिर उसने बेहद मायूस आवाज़ मे पूछा  ” आप कौन हैं ? हाँ! जानती थी। 
मेरी किसी प्रतिक्रिया का इंतज़ार किये बग़ैर वो उलटे पैर घर के अंदर चली गई। इस जवाब ने मेरी जिज्ञासा और बढ़ा दी थी लेकिन मैं चुपचाप उसे जाते हुए देखता रहा। ये तो समझ आया की अवनि ही अमन की प्रेमिका है लेकिन वो तो दिल्ली में  पैरामेडिकल का कोर्स कर रही थी, फिर ये कलकत्ता में दास बाबू की बेटी …. 
सब कुछ बहुत उलझा हुआ था। मैं वापस अपने घर आ गया। 
             अगली सुबह गीता अम्माँ जब नाश्ता ले कर आई तो मैंने  उनसे पूछा ” ये अवनि दास बाबू की बेटी है?
अम्मा हंस कर बोली हां ! ” जैसे तू मेरा बेटा है वैसे ही अवनि दास बाबू की बेटी है”। 
यह सुनकर तो मेरी उत्सुकता और बढ़ गई । 
मैं थोड़ा चिढ़े स्वर में बोला “गीता अम्मा साफ साफ बताओ ,पहेली मत सुनाओ!
    अम्मा जमीन पर बैठ गई और फिर बड़े ही दार्शनिक स्वर में बोलीं  ” बेटा ! इंसान की तक़दीर और वक़्त किसे कहाँ ले जाये ये कोई नही जानता !
फिर मेरी ओर देख कर बोलीं  ” ये अवनि दास बाबू को ट्रेन में मिली थी ,ये लोग एक बार दिल्ली से वापस आये तो अवनि इनके साथ थी वो कह्ते हैं उनकी बेटी है। बस यही मुझे पता है। 
    ऊपरवाले  ने कुछ रिश्ते खून के नहीं  बल्कि इंसानियत के बनाये हैं, शायद ऐसा ही कोई रिश्ता है।उस दिन मैं दफ्तर नही गया पूरी  रात लगभग जागते हुए गुजरी बार बार अवनि की ओर मेरा मन खिंचा जा रहा था  
अगले  रोज मैं दफ्तर देर से गया और शाम को सीधा दास बाबू के घर गया। दास बाबू कमरे मे आराम कर रहे थे। अवनि आई और पानी का गिलास रख कर जाने लगी तो मैं बोल पड़ा  ” अवनि जी ! मैं अमन का पुराना  दोस्त राघव शर्मा हूँ” ।
अवनि ने चौक कर मेरी ओर देखा, तब तक दास बाबू कमरे में आ गये और शायद मेरी बात सुन चुके थे
 तनिक तेज स्वर मे बोले “क्या जानना चाह्ते हो ? अमन तो दुनिया से चला गया और जिंदगी का युद्ध लड़ने के लिये इसे अकेला छोड़ गया। 
         मैं कुछ समझ नहीं पाया । दास बाबू एक मजबूर बाप जैसे दिखाई दे रहे थे, जो अपना सब कुछ हार  गया हो। ।
          कुछ देर की चुप्पी के बाद अवनि बोली ” अमन के घर वाले हमारी शादी के लिये तैयार नही थे, जिस समय अमन पढ़ रहा था मैं दिल्ली मे अपना कोर्स कर रही थी मेरे परिवार के नाम पर केवल मेरी मां है, हमने जोश मे आकर मंदिर मे शादी कर ली और मुझे अपने घर ले गया उसके परिवार वालो ने अपनाने से इंकार कर दिया । मेरा कोर्स पूरा हो चुका था और अमन की भी नौकरी लग चुकी थी। बस जिंदगी की गाड़ी निकल चली। हमने किसी परवाह नहीं  की शायद इसी लिये हमारी जिंदगी को ग्रहण लग गया। ”  इतना बोल अवनि रोने लगी।
       मुझे बहुत तकलीफ हो रही थी उसके आंसू देख कर, लेकिन मैं कुछ बोल नहीं पाया। 
कुछ संभलने के बाद अवनि फिर बोली ” सब ठीक चल  रहा था कि एक दिन अमन के एक्सीडेंट से सब खत्म हो गया। हालाँकि मां मेरे साथ थी ,तभी पता चला कि मैं मां बनने वाली हूँ।  मां ने अमन के घर वालों से बात की लेकिन वो ये मानने को तैयार नहीं थे कि हमने शादी की है उनके हिसाब से ये नाजायज बच्चा था। उस परिवार ने मेरा और मां का बहुत अपमान किया । मैं मां के साथ रहने लगी लेकिन अब मां भी मेरे बच्चे के खिलाफ थीं 
उस मोहल्ले मे रहना मुश्किल होने लगा। मां भी जिद पर थी कि मैं अपने बच्चे को जन्म ना दू।    
ना जाने क्यूँ औरत ही औरत का साथ देने से घबराती है 
मां को मेरी जिंदगी की चिंता थी इसलिये वो मेरा बच्चा गिरा देना चाह्ती थीं और मैं अमन की निशानी को दुनिया  मे लाना चाह्ती थी। हर दिन लोगों के ताने और मां की जिद से परेशान हो मैंने बिना कुछ सोचे घर छोड़ दिया   
          अवनि जैसे अपना अतीत दोबारा जी रही थी,फिर दास बाबू की ओर देख फिर बोली ” इंसान लाख गलतियाँ करे लेकिन  भगवान हमारा साथ नही छोड़ता है “। मुझ पर भी भगवान को दया आ गई थी, मैं जिस गाड़ी में बैठी बाबा मां के साथ उसी गाड़ी में  सफर कर रहे थे। वो मेरे सामने की सीट पर बैठे थे, सुबह मां की तबियत बिगड़ गई मेरे नर्सिंग कोर्स की वजह से मैं समझ गई की उन्हे पैरालिसिस का दौरा पड़ा था। कुछ देर में गाड़ी कलकत्ता पहुँची । मैंने इंसानियत के कारण इनकी मदद की, लेकिन शायद उन्होंने मेरी मदद की थी। यहीं  मेरी बेटी  आरुशी ने जन्म लिया। ये अमन की बेटी है, अमन को यह नाम बहुत पसंद था वो मुझे इस नाम से अक्सर बुलाता था,इसलिए मैंने अपनी बेटी का नाम आरुषि रखा। 
तब तक दास बाबू की पत्नी उठ कर आई और अवनी को गले से लगाते हुए बोलीं  ” बेटा तेरी सेवा की बदौलत आज  मैं अपने पैरों पर खड़ी हूँ। हम निस्संतान हैं तुमने हमें एक बेटी का सुख दिया। इस उम्र में थोड़ी सी ममता लुटाने का अवसर मिला , तुम्हारे कारण आरुषि रौशनी बन कर इस घर में आई है।” भगवान को हम पर तरस आ गया था। 
        दास बाबू जो अब तक चुपचाप बैठे थे वे धीरे से बोले “बेटा मैं चाह्ता हूँ अवनि अपना घर फिर बसा ले, अवनि की मां  भी ये ही चाह्ती हैं , इसी बात से नाराज ये अपनी मां के पास वापस नही गई “।
          अवनि दौड़ कर अपने बाबा से लिपट गई ” नहीं  बाबा मैं शादी नहीं करना चाह्ती , इतनी मुश्किल से मुझे पिता का प्यार मिला है, मैं अपने बाबा को छोड़ कर कहीं नही जाउंगी।
         मैं अवनि को उसके मां बाबा के साथ वहीं छोड़कर आ गया। मेरे मन में दास बाबू के लिये इज्जत बढ़ गई थी। आज के जमाने में किसी अनजान लडकी की इतनी  मदद करना एक अजूबा ही कह सकते हैं आज अमन की बहुत याद आ रही थी। वो अक्सर मजाक में  कह्ता अगर मैं उसकी प्रेमिका को एक बार देख लूंगा तो फौरन पसंद कर लूंगा। उसने सच ही कहा था अवनि सचमुच ऐसी ही थी , मैं अवनी से प्यार करने लगा था। आज अवनि की सूरत नही एक सशक्त व्यक्तित्व देख रहा था जिसमें अथाह प्रेम ,सेवाभाव और जिंदगी से लड़ने की हिम्मत थी। शायद लोग सच कह्ते हैं जब प्यार उमड़ता है तो कुछ आगा पीछा नहीं सूझता है। मैं अवनी से शादी करना चाह्ता था।
       मैंने सुबह भैया भाभी को कल्कत्ता आने को कहा वो शाम तक आ गये, पहले तो इंकार किया लेकिन भाभी मेरी खुशी के लिये राज़ी हो गईं। 
 शाम को  मैं भैया भाभी के साथ दास बाबू के घर रिश्ते की बात करने गये, अवनि की मां से भाभी ने पहले बात कर ली थी। 
     दास बाबू के  समझाने पर अवनि ने हां कर दी। राघव ने अवनि से स्पष्ट कहा, “मेरे लिये आरुषि मेरे दोस्त अमन की एक खूबसूरत निशानी है जिसे मैं जान से ज्यादा चाहूंगा।”  अवनि भी आरुषि को एक परिवार देना चाहती थी , पिता के ना होने का दर्द वो जानती थी।
 
        दो मकान बेहद सुंदर सजे थे आज राघव और अवनी की शादी थी,जिसमें दास बाबू उनकी पत्नी ,अवनि की मां सब शामिल थे । दास बाबू ने बाकायदा कन्यादान किया। ऊपर वाले ने तक़दीरों को मिलाने का अलग ही रास्ता अख्तियार किया था। शायद इसे ही संजोग कह्ते हैं अवनि भी अपनी तकदीर को एक मौका देना चाह्ती थी। 

 

Pic Credit: Tum Bin 2

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Kiran Shukla
मैं किरण शुक्ला एक गृहणी हूं। मैं नवाबों के शहर लखनऊ की रहनेवाली हूं। थोड़ा बहुत लिखने का शौक पहले से था लेकिन जिंदगी की व्यस्तताओं मे ये शौक ज़रा पीछे छूट सा गया था। कला मंथन मंच की आभारी हूं जिसकी वजह से मैंने नए सिरे से अपने शौक को वक्त देना शुरू किया है। सही मायने मे नवलेखिका हूँ जो शायद आजकल की पीढ़ी के लिए लिखने का प्रयास कर रही हूं। उम्मीद करती पढ़ने वालों की अपेक्षा पर खरी उतरूं।

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