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रिश्तों की परतें खोलता – Criminal Justice

जब साल जाने की गिने चुने घंटे बचे हैं मध्यरात्रि के कुछ उस पार एहसास हो रहा की हिंदुस्तान का एक तबका या कहें की हमारे समाज के तमाम परतों में से कोई एक परत शायद कुछ और परिपक्व होने की तरफ बढ़ा है।
अब इससे पहले इस ख्याल को आप हमारा हैलुसिनेशन माने असल मुद्दे से पहले कुछ बात।
साल 2020 .
इसके जाने की दुआएं मांगते नहीं थक रहे थे और बस कुछ घंटे और फिर हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो जायेगा। इस वक़्त हमने क्या सीखा इस पर कुछ नहीं कहूंगी क्योंकि सीखना सीखाना हर व्यक्ति की व्यक्तिगत सोच और समझ का नतीजा है।
तो जहाँ करीब आने वाले परिवार “The family that cooks together, sits together, plays together take famfies together, stays together!” करते नज़र आये वही कई घरों में औरतों बुज़ुर्गो और बच्चो पर डोमेस्टिक वायलेंस के आंकड़े भी बढे ,हालाँकि ऐसी चीज़ें न तो प्राइम टाइम का मुद्दा बनती है न ही कभी उस पर कोई बहस होती है।
(famfie – family selfie साल जाते जाते हमरी भी मौलिक कोशिश )
शायद आम आदमियों की ज़िन्दगी की आम सी बात है ये।
आम तौर पर हाथ उठा देना ,चिल्ला देना , गालियाँ दे देना या किसी और तरह से अपनी प्रभुत्ता दिखाना हमारे समाज का हिस्सा रहा है। और युगो से चली आ रही परम्परा अनुसार ये प्रभु हमेशा मर्द ही रहे। (न मेरा कोई जाती मतभेद नहीं है और बराबरी की मांगपत्र सा कुछ है भी नहीं इस लेख में। )
जिस समाज का हम हिस्सा हैं वहाँ सभी रिश्ते अमूमन कुछ लेनदेन पर टिके हैं। पढ़ने सुनने में कुछ बुरा और संवेदनहीन लग सकता है किन्तु सच यही है की तमाम ताने बाने प्रेम सौहार्द इज़्ज़त ,एक दूसरे की देखभाल से बीने गए होते हैं और इनमे से सबसे नाजुक और प्रकृति के बिलकुल करीब होता है है नारी और पुरुष का संबंध।
इस प्रेम में सब कुछ होने के बाद और साथ शारीरिक संबंधो की परत इस समाज व् दुनिया को आदि काल से आज तक ले कर आयी है। यही वो एक मात्र संबंध है जो बाकि सबकी धुरी है और यही एक मात्र है जो शायद कागज़ पर खत्म भी हो जाता है।
इसकी जड़ में बसने वाला प्रेम मानो तो स्वयं शिव और शक्ति का रूप है और न मानो तो समाज की सबसे घिनौनी तस्वीर की वजह।इतना पढ़ने के बाद ये मत सोचिये की मैं अपनी राह से इतर हो गयी बल्कि अब मुद्दे की बात – यही आज साल की आखिरी रात कुछ ऐसा देखा जिससे लगा की हिंदुस्तान का कोई एक छोटा सा हिस्सा परिपक़्वता में एक कदम आगे हो गया है।
Criminal Justice ये रिव्यु नहीं है। पंकज त्रिपाठी जी की गर्दन और उनकी डायलॉग डिलीवरी पर हम जैसे नौसिखिये बोलने की हैसियत नहीं रखते लेकिन पहली बार “martial rape ” और “unsolicited sex “जैसे नाज़ुक और मसालेदार होने की पूरी क्षमता रखने वाली कहानी को इतनी संवेदनशीलता से दर्शाया गया।

एक औरत जो डोमेस्टिक एब्यूज का शिकार होती है वो उस उबलते पानी के मेंढक की तरह होती है जो पानी के बढ़ते तापमान के साथ खुद को एडजस्ट करना सीखती है।

ये बात हम मात्र नील निशान ढूंढने वाला चश्मा पहने लोग समझ नहीं पाते। आसपास सुघड़ गृहणी से लेकर कॉर्पोरेट में काम करने वाली औरतें कोई भी हो सकता है इसका शिकार।
गैस लाइटिंग यानि की किसी के आत्म विश्वास और वजूद को रोज़ के तानो से कतरा कतरा मारते रहना। उसे उसके अस्तित्व से दूर कर ये मानने पर मजबूर करदेना की वो सबसे कमज़ोर व् कमतर है। इस पर आधारित मज़ाक “सेक्सिस्ट जोक्स “,हमारे आम दिनों का हिस्सा हैं। औरत को हर पलड़े पर तौलने का अधिकार कब कहाँ किस संविधान के अंतर्गत बँटा है ये अभी तक ज्ञात नहीं हुआ है।
मज़े की बात ये की इन सबमे सिर्फ पुरुष ही पुरुष का साथ नहीं देते बल्कि औरतें खुद भी होती हैं आगे। शायद 5000 साल की “प्रोग्रामिंग ” और दिमागी “कंडीशनिंग ऐसी है की जानते बूझते भी हम औरत पर सवाल खड़ा कर ही देते हैं।

भारतीय समाज टुकड़ों में बँटा है और ये टुकड़े जाति धर्म और धन सम्पत्ति के आधार पर नहीं बल्कि परिपक्वता के आधार पर बँटे है। ऐसी परिपक्वता जो सही और गलत के भेद को समझे ,जो कला और भोंडी अभिव्यक्ति का अंतर् समझे।

कला के नाम पर सीरियल, फिल्मे या वेब सीरीज़ जो भी बनते है वह वर्ग विशेष के लिए है। कहा न एक हिंदुस्तान में कई परतों वाला हिंदुस्तान जीता है। तो आज भी हिंदुस्तान में जहाँ नागिन और सास बहू के सीरियल और कॉलेज के लड़के लड़की और उनकी मोहब्बत के किस्सों पर फिल्मे बनती हैं और वेब की दुनिया “अनसेंसर्ड अभिव्यक्ति “का माध्यम बन हिंसा और यौनिकता पर ज़ोर दिए है वहाँ एक क्राइम थ्रिलर , डोमेस्टिक एब्यूज पर देखना यकीनन मेरे लिए इस साल का “high point ” है।
हालिया हुए साहित्यिक उत्सव में एक लेखिका ने एक वाक्य कहा जो शायद गले के नीचे न उतरे किन्तु फिर भी साझा कर रही हूँ “बिना प्रेम के शादी ,किसी तय ग्राहक के साथ जीने जैसा ही होता है।”
इस एक वाक्य में आपको बहुत कुछ समझ आएगा और समाज अचानक खोखला लगेगा।
बदकिस्मती से हिंदुस्तानी समाज को चलाने में औरत के त्याग करने की ट्रेनिंग ही सबसे बड़ी भूमिका निभाती है।
एक डायलॉग है “Most of the women who suffer domestic violence do not speak up about it or against it for one simple reason – SHAME”
औरत को मारा जाये तो भी बेइज़्ज़त औरत
आदमी का अफेयर चले तो बेइज़्ज़त औरत
औरत की शादी में मुश्किलें हो तो बेइज़्ज़त औरत
औरत का बलात्कार हो तब भी बेइज़्ज़त औरत
और आदमी ?? पुरुषो को उनके हिस्से की सारी इज़्ज़त देते हुए भी ये बताना चाहूंगी की बहुत बड़ा तबका समझता है की “martial rape is not a crime as per our law and even extra martial affair is not a crime!!” वकील के किरदार में आशीष विद्यार्थी आपको पितृसत्ता की सोच का पूरा निचोड़ अपने कुछ ही डायलॉग में दे देंगे।
इसे कितने पुरुष देखेंगे और समझेंगे नहीं जानती लेकिन अगर देखने के बाद ये लेख पढ़े तो मेरे कहने पर इस नज़र से फिर देखिएगा।
कलाकारों की बात करें तो यूँ लगता है की वो दिन दूर नहीं जब पर्दे पर पर्दा गिर जायेगा और OTT का बोलबाला होगा क्योंकि धुरंधर कलाकारों की भरमार है जिन्हे फिल्म वाले सब्ज़ी में छिडकी धनिया की मानिंद प्रयोग में लाते है जब की वो खुद में थ्री कोर्स मील है। पंकज त्रिपाठी जी स्क्रीन को पूरी तरह कब्ज़े में करने की ताकत रखते हैं और ऐसे में अनुप्रिया गोयनका ,कीर्ति कुलहरि और शिल्पा शुक्ला अपने अपने रोल में बेहद सशक्त है। गांव से आयी “रत्ना फ्रॉम पटना ” की इंसानी रिश्तों की समझ बेहतरीन है और माधव मिश्रा वाकई “वोक ” किरदार हैं।
इन सबमे मीता वशिष्ठ और दीप्ति नवल जी का किरदार और अदाकारी किसी नदी की धार सी तरल है और वो एक सीन जहाँ दीप्ति जीअपने बेटे के असल चहरे से वाकिफ होती हैं और मीता यानि की वकील मंदिरा माथुर उनके स्वीकृति के क्षणों में उनके साथ होती हैं आपको भीतर तक कचोटता है की कैसे रिश्ते आपको घिनौनी सच्चाई को न देख पाने को मजबूर करते हैं।

आखिर में कल्याणी मुले का किरदार आखिरी दृश्य में एक वाक्य में बदलाव की हवा समेटे।

हिंदुस्तान का एक हिस्सा sexual crime और martial rape को संजीदगी से पर्दे पर उतारने की कुवत रखता है ये एक अच्छा संकेत है की हवा बदल रही यही। कला की भी और शायद समाज की भी।

 

 

Pic Credit – Criminal Justice picture from internet.

nirjhra
Leading the editorial team with a vision of bringing quality content and varied thoughts on different aspects of Society, Art and Life in general. Nirjhra is a Parent Coach, Social Entrepreneur and Writer who feels, words are mightier than the sword but if needed, pick up that as well.

1 COMMENT

  1. बहुत बढ़िया समीक्षा की है आपने । ये वेबसेरीज़ मैंने आधी देखी है । marital rape सदियों से चला आ रहा है जिसे हमेशा नज़रंदाज़ किया गया ।

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