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एक तरफा इश्क

कल ही तो पूरा परिवार खुशी- खुशी रचना की डिलीवरी कराने अस्पताल गए थे और आज बेटी को जन्म देते ही रचना चल बसी। परिवार में मातम का माहौल छा गया। घर पहुंचते ही पूरे मोहल्ले में हाहाकार मच गया।” इतनी कम उम्र में दुनिया छोड़ गई। हाय राम! अब इस दुधमुंही बच्ची का क्या होगा?” एक मुंह से सभी लोग कह रहे थे।
आकाश सुन्न पड़ चुका था। बच्ची लागातार रोते जा रही थी। अशोक जी पोती को गोद में लिए चुप कराने की कोशिश कर रहे थे तभी आशा ने उनकी गोद से बच्ची को ले लिया और उसे पाउडर का दुध बोतल से पिलाने लगी। हाल ही में उसकी भाभी को भी बेटा हुआ था और मां को दूध ना होने की वजह से डाॅक्टर ने उसे पाउडर वाला दूध पिलाने की सलाह दी थी। बच्ची की क्षुधा मिटते ही वो आशा की गोद में सो गई। आशा उसे सीने से लगाकर रो पड़ी।
आकाश का छोटा सा परिवार था। आकाश, रचना और अशोक जी, उसकी मां कुछ साल पहले ही चल बसी थी। तभी पड़ोसी और बचपन का दोस्त अरूण बोला, “चलो आकाश भाभी को ले चले”‘ इतना कहकर चार कंधों पर रचना की अर्थी चल निकली। राम नाम सत्य का स्वर गूंज उठा। हृदयविदारक दृश्य था। ऐसा कोई न था जिसके आंखों से अश्रु धारा ना बही हो। आकाश तो हाड़ – मांस का पुतला बन गया था। अरूण उसे अपने साथ पकड़कर ले जा रहा था।
इधर आशा ने बच्ची को अपने घर सुला रखा था। कुछ दिन बीते तो धीरे-धीरे स्थिति सामान्य होने लगी। बच्ची के देखरेख में सब अपना दुःख भूल गए और बच्ची के पालन-पोषण की चिंता में लग गए थे। अब आकाश के ऑफिस से भी बुलावा आने लगा। आखिर कब तक वो अंशी के इर्द-गिर्द रहता। रचना ने पहले ही कह दिया था, “देखो आकाश, अगर लड़की हुई तो उसका नाम अंशी और लड़का हुआ तो उसका नाम अंश रखेंगे।”
” ऐसा क्यों?,” आकाश ने पूछा था।
” क्योंकि वे हमारे अंश ही होंगे,” इतना कहकर रचना शरमा गई थी।
अब आकाश को अंशी की चिंता सताने लगी अगर वो ऑफिस जाने लगेगा फिर पापा, अंशी को अकेले कैसे संभालेंगे! अभी तक तो वो घर में था तो आशा और वो मिलकर बच्ची को संभाल रहे थे। अब कैसे होगा? तभी आशा, अंशी को लेकर आई।
“क्या हुआ आकाश, किस चिंता में डूबे हो?”
“आशा, सोमवार से मुझे ऑफिस जाना पड़ेगा। मैं यही सोच रहा था कि मेरे ऑफिस जाने के बाद अंशी और पापा का ध्यान कौन रखेगा! मैं जबतक घर में था तुम्हारी मदद से अंशी को संभाल ले रहा था लेकिन अब… कैसे मैनेज होगा!”
“तुम चिंता मत करो आकाश मैं हूं ना! मैं, चाचा जी और अंशी का ध्यान रख लूंगी। आकाश, तुम्हें पता है? चाची, मुझे अपनी बेटी की तरह मानती थी। आशा के इतना कहते ही आकाश अतीत में चला गया।  आकाश ने जिस काॅलेज में दाखिला लिया था। आशा ने भी उसी काॅलेज में दाखिला लिया और ये खुशखबरी सुनाने वो मां के पास आ गई थी। “चाची मेरा भी दाखिला उसी काॅलेज में हो गया, जहां आकाश का दाखिला हुआ है।” चहकते हुए आशा बोली।
“ये तो बहुत अच्छी बात है। तू आकाश का वहां ख्याल रखना।”
“क्या अच्छी बात है मां? जब देखो मेरे आगे – पीछे घूमते रहती है। स्कूल में तो पीछा करती ही थी अब काॅलेज में भी करेगी।”, आकाश ने गुस्सा होते हुए कहा।
“मैं तुम्हारा पीछा, सात जन्मों तक नहीं छोड़ुंगी। समझे, ” आकाश को छेड़ते हुए आशा ने कहा।
“तुम लोगों की नोंक-झोंक देखकर मैं तो सोचती हूं, तुम्हारा लग्न कर दूं। हमेशा लड़ते-झगड़ते रहते हो।”
चाची की इस बात पर आशा शरमा जाती और धीरे-धीरे चाची की ये बात आशा ने दिल में बैठा लिया। आकाश को दिलोजान से चाहने लगी। सोते – जागते उसके ही सपने देखा करती। जितनी आशा आकाश से जुड़ने लगी आकाश उससे दूर जाने लगा। काॅलेज में साथ पढ़ने वाली और क्लास की टाॅपर रचना को दिल दे बैठा।
इधर चाची को भी लगने लगा कि अगर वो दीया लेकर भी आशा जैसी बहू ढूंढेगी तो उन्हें कहीं नहीं मिलेगी। आकाश की मां ने मन ही मन ठान लिया कि वो आशा को ही अपने घर की बहू बनाएंगी। सही वक्त आने पर वो आशा के परिवार से रिश्ते की बात करेंगी।
आशा, आकाश को इतना प्यार करती थी कि आकाश का उसे डांटना भी उसे प्यार ही लगता था। कुछ दिनों से चाची की तबीयत थोड़ी नासाज रह रही थी। बुखार जाने का नाम ही नहीं ले रहा था। दवा लेती तो ठीक हो जाती फिर कुछ दिन बाद बुखार चढ़ जाता। इन दिनों आशा चाची की सेवा में लगी रहती थी। उसने सारा घर संभाल लिया था। अशोक जी और आकाश का पूरा खयाल रखती और काॅलेज जाना तो जैसे भूल ही गई थी। हालांकि उसकी मां कितना कहती कि तू काॅलेज जा, मैं गोमती बहन का ख्याल रख लूंगी, लेकिन आशा अपनी मां की एक न सुनती और कहती, आकाश मुझे पढ़ा देगा।
दिन ब दिन गोमती चाची का स्वास्थ गिर रहा था गोमती जी के स्वास्थ को लेकर अशोक जी ने आकाश को एक अच्छे वैद्य का पता दिया और बोला उन्हें बुला ला।
आकाश पता लेकर चल पड़ा कुछ दूर पर एक लड़की खड़ी थी, उसे टोकते हुए कहा,
“सुनिए ये एड्रेस बता सकेंगी। एक अजनबी की आवाज आई और गेट खोलते हुए ही उसने पीछे मुडकर देखा तो आकाश था।”
“अरे आकाश तुम यहां?”, चौंकते हुए रचना ने पूछा।
“रचना तुम… तुम यहीं रहती हो?,” आकाश ने कहा।
“नहीं.. ये जो एड्रेस पूछ रहे हो ना ! वहां रहती हूं। ये मेरे घर का ही पता है।”, रचना ने हंसते हुए कहा।
रचना, अशोक को अपने घर ले गई। वहां अशोक ने वैद्य जी को सारी बातें बताई और अपने साथ ले गया।
गोमती जी की जाँच कर, वैद्य जी ने कहा कि इन्हें राजक्ष्यमा ( टीबी) का रोग लग गया है। कुछ दिनों बाद, अंततः वो आशा को अपनी बहू बनाने का सपना दिल में दबाए चल बसी।
आशा बहुत दिनों बाद  जब काॅलेज पहुंची तो सबके मुंह पर एक ही नाम था, आकाश और रचना। उसे पता चलते देर न लगी कि आकाश उसके पीठ पीछे रचना के साथ इश्क लड़ा रहा था। जितने सपने उसने आकाश के लिए सजा रखें थे सब चकनाचूर हो गए।
काॅलेज से घर आते समय उसने सोच लिया कि वो आकाश को अपने दिल की बात बताएगी और गोमती चाची की आखिरी ख्वाहिश भी बताकर रहेगी। वो ऐसे आकाश को अपने से जुदा नहीं कर सकती।
घर आने के कुछ देर बाद आकाश के घर गई तो अशोक जी से मालूम हुआ कि आकाश अभी तक घर नहीं आया। बेटी तुम और आकाश तो साथ ही घर आते थे। तूने उससे लड़ाई कर ली क्या, जो वो तेरे साथ नहीं आया?
“नहीं चाचा, कोई लड़ाई नहीं की”। तभी आकाश वहां पहुंचा और आशा को देखते ही बोला पड़ा, “मेरा पीछा कब छोड़ोगी?”
“मुझे तुमसे कुछ बात करनी है आकाश,” आशा ने गंभीर होते हुए कहा।
“क्या बात है? मेरी बात पर तुम चिढ़ी नहीं, छिपकली”
तुम लोगों का झगड़ा तुम ही जानो, कहकर अशोक जी वहां से चले गए।
“बोल क्या, कहना है?”
“तुम्हें पता है मैं तुमसे कितना प्यार करती हूं?”
“हां.. हां पता है कि तू मुझे प्यार नहीं इरीटेट करती है,” आकाश ने छेड़ते हुए कहा।
आकाश अब भी मजाक के मूड में था।
“आकाश मैं मजाक के मूड में नहीं हूं। मैं तुमसे सच्चा प्यार करती हूं और तुम भी तो मुझसे प्यार करते हो, यहां तक के चाची भी .. अभी आशा आगे कुछ कहती आकाश जोरों से हंसने लगा।
” मैं… मैंने तुझसे कभी प्यार नहीं किया। तूने मुझे गलत समझ लिया। मैंने एक अच्छे दोस्त के नाते तेरा ख्याल रखा और आजतक तेरी हर बात मानी है। चाची… क्या? मां की मजाक में कही बातों को तूने सीरीयस ले लिया क्या?
“आशा, तू सिर्फ मेरी अच्छी दोस्त हैं और कुछ नहीं। मैं तुझे कई दिनों से कुछ बताना चाहता था। आज तेरी गलतफहमी दूर कर देता हूं कि मैं तुझसे नहीं, मैं रचना से प्यार करता हूं और उसी से शादी करूंगा।”
आशा जिसे मानने को तैयार न थी, जो बात उसके लिए सिर्फ सुनी सुनाई थी वो आकाश ने कहकर हकीकत में तब्दील कर दी।
“चलो गलती मेरी थी जो मैंने तुमसे प्यार किया वो भी सच्चा लेकिन मैं तुम्हारे राह में रोड़े नहीं अटकाऊंगी। सच्चा प्यार किया है, एक तरफा ही सही। इसे ताउम्र निभाऊंगी।”
पढ़ाई खत्म होते ही आकाश की नौकरी लग गई और रचना से उसने विवाह कर लिया। इधर आशा के लिए कितने लड़के देखें गए लेकिन वो शादी से साफ इंकार कर देती। उसके घर में भी सबको पता था कि वो आकाश को चाहती है लेकिन आकाश के मन का हाल जानकर किसी ने उस पर दबाव नहीं दिया। अब उन दोनों के पारिवारिक रिश्ते भी पहले जैसे नहीं रह गए थे।
अभी शादी को दो ही साल हुए तो रचना की मां बनने की खबर आ गई थी। गिले – शिकवे भूलकर आशा कि मां रचना का ख्याल रखने लगी थी। प्रेग्नेंसी में कांप्लीकेसन के वजह से ही रचना अस्वस्थ रहने लगी थी। आठवें महीने में हाई बीपी हो गया था उसे इसलिए ऑपरेशन करते हुए ही चल बसी।
“आकाश… आकाश, क्या सोचने लगे?”, आशा ने उसे झकझोरते हुए कहा।
“मुझे तुमसे कुछ कहना है!”
“हां बोलो?”
“क्या तुम अंशी की मां बनोगी?”
आशा की आंखों से झरझर आंसू गिरने लगे। वर्षो से दबा गुब्बार फूट पड़ा। देर से ही सही लेकिन आकाश को उसका प्यार नजर आया। उसने मूक हामी भर दी।
“मुझे माफ़ कर दो आशा, मैंने तुम्हारे प्यार को कभी नहीं समझ। यहां भी तुम मुझसे, बड़ी बन गई। मेरे प्यार में स्वार्थ छुपा है ये जानते हुए भी तुम मुझसे शादी करने के लिए तैयार हो गई।”
“बस अब कुछ मत कहो, “गले लगते हुए आशा ने कहा।
अंशी, अपनी मां और पापा को देखकर खिलखिला रही थी।

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