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चंदा के रथ पर सवार, परियों का राजकुमार

राजस्थान के छोटे से कस्बें राजसमंद के ‘इरिगेशन डिपार्टमेंट’ में ‘जूनियर इंजीनियर’ के पद पर काम करते थे मोहन बाबू। छोटा सा सुखी परिवार था उनका।वे स्वंय, उनकी पत्नी मायावती और उनकी इकलौती प्यारी बेटी मोहिनी। मोहिनी में तो मानों जान बसा करती थी दोनों पति-पत्नी की ।
सुंदर,तीखे नैन-नक्श, सुबह की धूप के जैसा खिला-खिला मखमली रंग और कमर तक लहराती काली,रेशमी,लम्बी ज़ुल्फ़े। मोहिनी का मनमोहक रूप-रंग देख कर तो कोई भी पहली नज़र में ही उसकी सुंदरता का कायल हो जाता था।रूपमती होने के साथ-साथ मोहिनी गुणों की भी खान थी।साक्षात सरस्वती का स्वरूप थी मोहिनी।
उसे बागबानी का बड़ा शौक था। अपने छोटे से घर मे उसने एक छोटी सी खूबसूरत बगिया सजाई थी।अपनी बगिया के पेड़-पौधों का वो दिलों जान से खयाल रखा करती थी। ये सुंदर पेड़-पौधे उसके सुख-दुःख के संगी-साथी थे। सुबह-शाम इन पौधों से बतियाना मोहिनी को बड़ा अच्छा लगता था।
उसे खाना बनाने का भी बड़ा शौक था। उसके बनाये व्यंजन खाकर तो सभी उंगलियाँ चाटते रह जाते थे। मोहिनी देखने मे जितनी सुंदर थी,उससे भी ज्यादा मनमोहक और खूबसूरत उसकी सुरीली आवाज थी। उसके गीतों की मधुर धुन को सुनकर कोई भी मंत्रमुग्ध होकर अपनी राह भूल जाए एसी कशिश थी। संगीत मे एम.ए.करने के पश्चात,घर के पास ही एक निजी स्कूल मे संगीत की अध्यापिका के पद पर काम करती थी मोहिनी ।
एसा लगता था बनाने वाले ने बड़ी फुर्सत मे गढ़ा था मोहिनी जैसी गुणवान रूपमती को। मगर वो कहते है ना,उपरवाले ने चाँद मे दाग लगा दिये ताकि, उसे किसी की नज़र ना लग जाए। बस उसी तरह किस्मत ने मोहिनी को भी एक कमी दे दी थी। बचपन में एक एक्सीडेंट की वजह से उसे, अपना एक पैर खोना पड़ गया था। हालांकि, महीनों की शारीरिक पीड़ा और जद्दोजहद के बाद ,ऑपरेशन के द्वारा मोहिनी को कृत्रिम पैर लगा दिया गया था। मगर फिर भी एक पैर का ना होना,उसके जीवन के लिए अभिशाप सा बन गया था
बस इसी एक कमी की वजह से अब तक मोहिनी का रिश्ता तय नहीं हो पा रहा था। मोहन बाबू और मायावती जी दोनों को अब दिन-रात अपनी बेटी के विवाह की चिंता खाये जा रही थी। इस बरस पूरे सत्ताईस पार हो गई थी मोहिनी। मगर उसके अनेकानेक गुणों पर उसकी ये एक कमी भारी पड़ गई थी।
जहाँ कही भी उसके रिश्ते की बात चलती, उसकी इस कमी के कारण हमेशा बात बिगड़ जाती। कभी-कभी नाते रिश्तेदार, भूले-भटके उस पर तरस खाकर बड़ी उम्र के दुहाजू व्यक्ति या कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ लोगों के बेमैल रिश्ते लेकर आ जाया करते थे। तब मोहन बाबू का मन और भी ज़्यादा दुःखी हो जाता था। उनकी प्यारी बेटी उन पर कोई बोझ नहीं थी कि वे उसे किसी भी बेमैल रिश्तें मे बाँधकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ ले।
मोहन बाबू , मायावती जी से दिन-रात बस,अब अपनी बेटी मोहिनी के विवाह की बाते किया करते। वे कहते,”आखिरकार हम कब तक मोहिनी के साथ रह पाएंगे। कभी ना कभी तो उसे किसी के साथ की जरूरत पड़ेगी। तब वो अकेली कैसे रह पाएगी।” अपनी गुणवती बेटी के एकाकीपन के बारे में सोचकर मोहन बाबू खुद को तकदीर के सामने बहुत बेबस पाते थे।
वक्त इसी तरह अपनी रफ्तार से चले जा रहा था। अपने रिटायरमेंट के बाद इकलौती बेटी के इस दुःख से जूझते मोहन बाबू ने अब आखिर खाट पकड़ ली थी। अब घर की सभी ज़िम्मेदारी मोहिनी के कंधों पर आ गई थी।
मोहिनी हँसते-मुस्कुराते अपनी सारी ज़िम्मेदारियाँ बहुत अच्छी तरह से खुशी-खुशी निभा रही थी। वो हमेशा अपने माता-पिता से कहती कि ,”वे इस तरह उसकी चिंता में घुलना छोड़ दे। आज यदि उसका विवाह हो गया होता, तो इस घर को और माता-पिता को कौन संभालता। इसलिये भगवान जो भी करता है,अच्छे के लिए ही करता है।” मगर उसकी ये सारी बातें सुनकर मोहन बाबू और भी अधिक दुःखी हो जाते।
रविवार का दिन था। रोज़ की तरह सुबह-सुबह मोहिनी अपने ही विचारों में एक मीठा सा गीत गुनगुनाती हुई अपनी बगिया में पेड़-पौधों को पानी दे रही थी। उसकी सुरीली मीठी आवाज़ सर्दियों की धूप मे उस माहौल को और भी ज़्यादा खूबसूरत और खिला-खिला बना रही थी।
पौधों को पानी देकर वो अपने घर के अंदर जाने को आँगन के दरवाज़े की तरफ मुड़ी ही थी कि तभी, किसी की आहट सुनकर चौक गई।
“सुनिए ये एड्रेस बता सकेंगी। एक अजनबी की आवाज़ आयी और गेट खोलते हुए ही उसने पीछे मुड़ कर देखा।”
उसके सामने एक लम्बे कद का,सौम्य,कृष्णवर्ण, आकर्षक सा युवक हाथ मे एक बड़ा सा सूटकेस लिये खड़ा था। धीरे-धीरे चल कर मोहिनी गेट के करीब आई , फिर उसने उस अजनबी के हाथ से कागज़ लेकर उस पर लिखे पते को देखते हुए कहा, ” बस यहाँ सामने के ये 2 घर छोड़ कर वो तीसरा घर।”
“बहुत-बहुत धन्यवाद !” कहकर वो अजनबी जाने को मुड़ा ही था, कि अचानक से कुछ याद करते हुए रूक कर बोला, ” आप बहुत सुंदर गाती हैं,आपकी आवाज़ मे एक अजीब सी कशिश है, किसी भी राह चलते को अपना रास्ता भुला सकती है आपके गीतों की खनक।”
एक अजनबी के मुँह से अपनी इतनी तारीफ सुनकर मोहिनी “जी धन्यवाद” कहकर वहाँ से जल्दी से अंदर चली आई।
अगले दिन सुबह जब वो स्कूल जा रही थी, तो फिर उसी अजनबी से रास्ते में मुलाकात हो गई। उसने देखते ही मोहिनी को पहचान लिया। औपचारिक सी “हाय-हैलों” के बाद उसने बताया, कि उसका नाम नितिन है। हाल ही मे उसकी नियुक्ति ‘इरिगेशन डिपार्टमेंट’ मे ‘असिसटेंट इंजीनियर’ के पद पर हुई है। सामने का मकान उसने रहने के लिए किराए पर लिया है। यह सुनते ही मोहिनी ने मुस्कुरा कर कहा ,”उसके पिताजी भी कुछ समय पूर्व ही ‘इरिगेशन डिपार्टमेंट’ मे काम करते हुए रिटायर हो गए हैं।”
उसने बातों ही बातों में उस अजनबी को औपचारिकतावश शाम मे अपने घर पर आने का निमंत्रण दे डाला।
शाम को बेल बजते ही जब मोहिनी ने दरवाज़ा खोला तो, अपने सामने नितिन को खड़ा देख एकदम से चौंक गई और बोल पड़ी, “आप”। नितिन ने मुस्कुराकर कहा,”ओह! इसका मतलब आपने ऐसे ही औपचारिकता वश मुझे घर आने का निमंत्रण दे डाला था,और मैं ढीठ की तरह सचमुच में आपके घर आ पहुँचा।” उसकी इतनी सादगी से कही इस बात पर मोहिनी भी मुस्कुरा पड़ी।
वो नितिन को सीधे अपने पिताजी के कमरे में लेकर आ गई। माँ और पिताजी से उसका परिचय करा कर वो अंदर किचन मे चाय-नाश्तें का प्रबंद्ध करने चली आई। मोहिनी के पिताजी के ही डिपार्टमेंट मे काम करने की वजह से वो बातों ही बातों में पिताजी से काफी घुल मिल गया।
मोहिनी तब तक चाय के साथ गरमा-गरम पकोड़े भी तल कर ले आई। पकौड़े खाते-खाते नितिन ने कहा ,” मोहिनी जी आपकी सिंगिंग के साथ-साथ अब मैं आप की पाककला का भी मुरीद हो गया।आपके हाथों मे सचमुच में जादू है।” ये सुनते ही मोहिनी मुस्कुरा कर बोल उठी ,” आपको झूठी तारीफ करने की बहुत आदत है।”
यूँ ही बातें करते-करते रात के खाने का भी वक्त हो गया। पिताजी की ज़िद की वजह से नितिन को रात का खाना खाने के लिये भी रूकना पड़ा। खाने के बीच में बार-बार नितिन का मोहिनी की तारीफें करना, मोहिनी के मन में एक अलग ही अहसास जगा रहा था। मगर एक ही पल मे घबरा कर मोहिनी ने अपने सभी अहसासों पर पूर्णविराम लगा दिया।
उस रोज़ नितिन के चले जाने के बाद मोहिनी को नींद ही नहीं आ पा रही थी। मगर वो ऐसा कोई भी ख़्वाब नहीं देखना चाहती थी , जिसके टूटने पर उसको सिर्फ दर्द ही दर्द मिले।
अब तो अक्सर ही नितिन उनके घर आने-जाने लगा। कहीं ना कहीं मोहिनी की तरह ही उसके माता-पिता को भी मन ही मन नितिन पसंद आ गया था। मगर उनकी मन की बात जानते ही मोहिनी ने अपने माता पिता को अपने आत्मसम्मान का वास्ता देकर कहा,”वे नितिन से ऐसी कोई भी बात ना करे, जिसकी वजह से उसे एक बहुत अच्छा दोस्त भी खो देना पड़े।”
अगले दिन नितिन फिर उनके घर आया था । उसे देखकर लगता था, वो कुछ कहना चाहता है, मगर फिर चुप हो जाता था। आखिरकार पिताजी ने पूछ ही लिया, “किसी दुविधा मे लग रहे हो बेटा, अगर कुछ परेशानी है, तो हम से बेहिचक बाँट सकते हो।”
यह सुनते ही नितिन ने हिम्मत करके एक साँस मे बोल दिया,” दरअसल मैं आपकी बेटी मोहिनी को बहुत ज्यादा पसंद करने लगा हूँ और मैं आपसे उसका हाथ माँगना चाहता हूँ।” ये सुनते ही मोहिनी की आँखों मे बरसो से जमी बर्फ पिघल कर अश्रुधारा के रूप में बह निकली।
मोहन बाबू की भी आवाज़ ये सुनकर एकदम से उनके गले में ही अटक कर रह गई। बड़े जतन से खुद को सँभालते हुए उन्होंने कहा,” नितिन बेटा, ये तो तुमने हमारे दिल की बात कह दी। मगर मैं भी तुमसे कुछ छुपाना नहीं चाहता हूँ।दरअसल एक एक्सीडेंट में मोहिनी को हमेशा के लिए अपना एक पैर खोना पड़ा। उसकी जगह उसको एक कृत्रिम पैर लगा दिया गया। बस इसी वजह से अब तक हमारी गुणवती बेटी का विवाह नहीं हो पाया है, मगर हमारी बेटी साक्षात लक्ष्मी और सरस्वती का रूप है। हमे पूरा विश्वास हैं वह जिस घर जाएगी उसे स्वर्ग बना देगी।”
ये सुनकर नितिन ने हाथ जोड़कर कहा ,”आप बिल्कुल सही कह रहे है। मोहिनी सचमुच गुणों की खान है, और वो जिस भी घर जाएगी उस घर को स्वर्ग बना देगी। मुझे उसके इतने सारे गुणों के आगे उसकी छोटी सी कमी कोई कमी नहीं लगती है।
मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है। कुछ वर्षों पूर्व ही मैंने अपने माता पिता को एक एक्सीडेंट में खो दिया था। यहाँ आते ही मोहिनी को देखकर और उसकी मधुर आवाज सुनकर पहली ही मुलाकात मे मैं उसे पसंद करने लगा था। मुझे उसके एक्सीडेंट के बारे में हमारे मकान मालिक से पता चला।
” अब आप बताइए मुझ जैसे अनाथ से अपनी गुणवती बेटी की शादी करने से आपको कोई एतराज तो नहीं है, बस, आपसे एक वादा करना चाहता हूँ कि मैं उसे हमेशा खुश रखूँगा।”
मोहन बाबू और मायावती ने खुशी-खुशी नितिन को अपने गले से लगा लिया।मोहिनी भी वही खड़ी मुस्कुराते हुए नितिन को एकटक निहारे जा रही थी। नितिन ने अपने घुटने पर बैठकर मोहिनी का हाथ हाथों में लेते हुए पूछा,”तुम्हें तो इस रिश्ते से कोई एतराज नहीं ना मोहिनी ?” मोहिनी ने शर्माते हुए अपने दोनों हाथों से अपने चेहरे को ढक दिया। मायावती जी ने रसोई से मिठाई लाकर सभी का मुँह मीठा करवाया।
मोहन बाबू ने अपनी बिटिया के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा ,” मुझे यकीन था भगवान के घर देर है अंधेर नहीं। आखिरकार आज हमारी बिटिया के लिए भी चंदा के रथ पर सवार परियों का राजकुमार आ ही पहुँचा।”
sakina s
मैं सकीना। मुझे कविताएँ और कहानियाँ पढ़ने का शौक है। कथा-लेखन मेरे विचारों की अभिव्यक्ति का पसंदीदा माध्यम है

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