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दोस्ती

कभी चाय की प्यालियों से छलकती है दोस्ती
कभी कांफी की खुशबू बन जाती है
लस्सी की गिलासों में चीनी बन घुलती है
बारिश में भीगी महक सी‌ हमसे लिपट जाती हैं।
कभी पकौड़े की थाली बन आती है
कभी चाट का चटकारा बन जाती है,
कालेज की सीढ़ियों पर बैठ वो सुस्ताती है,
हां वो दोस्ती है जो बात बात में मुस्कुराती है।
कभी नोट्स के पन्नों में छुप जाती है,
कभी प्रेक्टिकल फाइल में पेंसिल संग उलझती है,
हां वो दोस्ती ही है जो साथ साथ चलती है
कापी किताबें छूट भी जाए
वो साथ निभाती है।

 

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