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याद जब घर की आती है , तो आंखें भर ही आती है

याद जब घर की आती है , तो आंखें भर ही आती है
उनके मकतूब बैचैनी , ना जाने क्यों सताती है!
अब मेरी आखों को सपने भी , छिपाने नहीं आते
जब इनसे अब्र बरसते है , तो गमो की बाढ़ आती है!!!१!!
याद जब घर की आती है , तो आंखें भर ही आती है!
ये शिकम की बेजुबानी ही,यू घर से दूर लाती है
अपने शौहरा के खोने का , ना जाने क्यों डर सताती है!!
अब इस ज़ख्मी परिंदे का , हाल ना पूछो तुम
की अब जब सास आती है , तो तेरी याद आती है!!२!!
याद जब घर की आती है , तो आंखें भर ही आती है!
मेरे अहबाब की आखे,ना जाने क्यों सताती है
ना कुछ कह रहीं है , और अब ना कुछ वो कहना चाहती है!
अब उनकी चाह को लेकर ,कब तक भरे बाज़ार में घूमे,
ना वो दिल लेना चाहती है , ना वो दिल देना चाहतीं है!!३!!
याद जब उन की आती है , तो पलके भर ही आती है!
मकतूब Means खत, letter
अब्र Means बादल
शिकम Means उदर
शौहरा Means शौक
     

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं।

                                                                                                      

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