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जश्न

पाखि अपने माता पिता की एक मात्र संतान थी।शहर मे उसके पिता जाने माने रेडीमेड कपड़ों के व्यापारी थे। “पाखि गारमेंट्स” के शोरुम शहर के सभी चौराहों पर दिखाई देते थे।

         किसी जमाने में शम्भुनाथ जी की कपड़ों की छोटी सी दुकान थी लेकिन पाखि के जन्म के साथ जैसे उनके घर साक्षात लक्ष्मी का जन्म हुआ था। मां बाप की गोद में जब पाखि आई तो जैसे उनकी दुनियाँ महक गई।
पाखि के कदम ऐसे शुभ थे कि उनका व्यापार दिन दूना रात चौगुना बढ़ने लगा था। उसी व्यापार की तरह पाखि का सौंदर्य भी पूनम के चाँद की तरह बढ़ता गाया था।
        ईश्वर ने पाखि को अपने दोनों हाथों से दुनिया भर की नेमतों से नवाजा था। खूबसूरत दूधिया रंग ऐसा, जैसे दूध में  किसी ने ज़रा सा केसर घोल दिया हो। काले लहराते लंबे बाल, तराशा हुआ बदन , जिसे देख सिनेमा की नायिका भी शर्मा जाये। बड़ी बड़ी कजरारी आंखे, नुकीली नाक, पतले गुलाबी होँठ, अनार से दहकते गालो पर गिरती काली लटें देखने वाले को जैसे सम्मोहित कर लेती थीं।
ईश्वर ने जैसे सूरत दीं वैसे ही सीरत भी दी थी। पढ़ने लिखने में हमेशा आगे रह्ने वाली पाखि को थियेटर का बहुत शौक था।
           कालेज के वार्शिकोत्सव में नाटक ” लैला मजनूं ” होने वाला था। अभी उसके पात्र तय किये जा रहे थे, लेकिन लैला की भूमिका करने वाली पाखि नही जानती थीं की ये नाटक उसकी जिंदगी बदल देगा । पाखि ने अब तक सारे किरदारो से मुलाकात कर ली थी मगर अभी तक ” मियाँ मजनूं ” से उसकी मुलाकात नहीं हुई थी।  रिहर्सल हाल में आज सभी लोग आ गये थे, हर पात्र अपनी पंक्तियां याद करने में लगा था।पाखि ने अपने प्रोफेसर से पूछा
“सर! ये मजनूं साहब कब तशरीफ़ लायेंगे”?
“अरे! ये दीपक कहाँ रह गया है, कोई बुलाओ उसे “।
तभी पाखि ने देखा सामने से कोई आ रहा है और फिर पाखि उसे देखती रह गई, उसे लगा जैसे जो उपन्यास आज तक वो पढ़ती आई थीं उसका नायक आज उसके सामने खड़ा है
           ऊंचा लंबा कद, रोमन मूर्तियों के समान गोरा बलिष्ट शरीर,आधुनिक शैली मे कटे घने बाल, काली गहरी आंखें उसके चेहरे पर एक खूबसूरत मुस्कुराहट खेल रही थी, आज तक पाखि ने उसे कभी कालेज में नही देखा था। सबसे बड़ी बात उसके आते ही जैसे वहाँ एक हलचल मच गई थी, सबसे मिलते हुए वो वहीं पाखि और सर के पास आकर खड़ा हुआ।
 सर ने दोनों का परिचय करवाया “पाखि! तुम पूछ रही थी की मजनूं कौन हैं? ये हैं हमारे मजनूं।
और दीपक ये हैं हमारे नाटक कीं लैला !,
दीपक ने गहरी निगाह पाखि पर डाली और बोला ” आपका मजनूं बनकर हम तो धन्य हो गये”। और खिलखिला कर हंस दिया। दीपक की जगह शायद कोई और होता तो पाखि ने एक थप्पड़ रसीद कर दिया होता लेकिन आज पाखि जैसे दीपक के व्यक्तित्व के सम्मोहन मे गिरफ्तार हो चुकी थी,आज उसने शरमा कर नज़रे झुका लीं।
कह्ते हैं इश्क़ का तीर कब किसे घायल कर दे कोई नही जानता, आज पाखि अपना दिल हार गई थी।
उधर शायद दीपक भी पाखि के सुंदर रूप जाल मे गिरफ्तार हो गाया था, सब से बातें करते हुए वो चोर नजरों से पाखि को देख लेता और अक्सर उन दोनों की नज़रें आपस मे टकरा जाती थी। दोनो एक दूसरे से अंजान थे लेकिन शायद इश्क़ ने दोनो अपनी गिरफ्त मे ले लिया था।
दीपक कालेज मे गणित से पोस्ट ग्रेजुयेशन की पढाई कर रहा था ,उसका विभाग विश्व विद्यालय के दूसरे सिरे पर था इसलिये शायद कभी उसकी पाखि से मुलाकात नही हुई थी, पाखि ईग्लिश मे आनर्स कोर्स कर रही थी। एक ही विश्व विद्यालय मे पढ़ने  के बावजूद दोनों की मुलाकात नही हुई थी।
नाटक कीं रिहर्सल दोनों को रोज मिलने का मौका दे रही थी जैसे जैसे नाटक की तैयारी आगे बढ़ रही थी वैसे वैसे पाखि और दीपक का इश्क़ परवान चढ़ रहा था। धीरे धीरे ही सही लेकिन पाखि दीपक के रंग मे रंगती जा रही थी।

कह्ते है मीरा ने श्याम को कभी देखा नही था लेकिन उन्होने श्याम को अपना पति परमेश्वर मान लिया था। पाखि तो दीपक के साथ घंटों बीता रही थी, जैसे जैसे दिन बीत रहे थे पाखि ने ख्वाबों में दीपक के साथ अपनी जिंदगी के सपने देखना शुरु कर दिया था।

सब कुछ तो पाखि को बेहद अच्छा लगता लेकिन दीपक का बेबाकी से सभी से मिलना पाखी को बिल्कुल पसंद नही था। अन्य किरदारो मे दीपक बहुत लोकप्रिय था, उसकी महिला मित्रों की लिस्ट लम्बी होती जा रही थी जो पाखि को खटकती थी। दीपक बातचीत के दौरान साधारण शिष्टाचार की सीमारेखा पार कर देता था और ये बात पाखि को नागवार  गुजरती थीं कई बार वो उसे टोक देती थी दीपक अक्सर ये कह कर हंसी मे बात को उड़ा देता
पाखि! जिंदगी चार दिनों की इसलिये जी भर के जियो। दीपक के ये शब्द पाखि के कानों मैं जेसे शहद घोल देते थे।
विश्व विद्यालय के वार्शिकोत्सव के नाटक ने पुरे शहर मे धूम मचा दी थी। नाटक के ख़त्म होने पर हाल देर तक तालियों साए गूंजता रहा, बधाई देने वालो की भीड़ ने पाखि और दीपक को घेर लिया । पाखि तो जैसे सपनों की दुनिया मे उड़ रही थी। पाखि के पिता शहर की जानी मानी हस्ती थे  पाखि ने दीपक को उनसे मिलवाया।
पह्ली मुलाकात मे दीपक अपने व्यक्तित्व की गहरी छाप छोड़ने में माहिर था, शम्भुनाथ जी भी उससे मिल कर बहुत खुश हुए। पाखि के आँखों की गहरी चमक उसकी मां से ना छुप सकी।
किसी ने सही कहा है “जो मां बच्चे को नौ महीने अपनी कोख मे पालती है, वो अपनी औलाद के पैरो की आहट ही नही उसके दिल की हलचल भी भाँप लेती हैं।
             पाखि अपने माता पिता  के साथ घर लौट आई मगर दिल मे गजब की बैचेनी थी, पिछले तीन महीनों से रिहर्सल के बहाने दीपक से रोज़ मुलाकात होती मगर अब तो सब खतम , ये सोच पाखि का दिल बैठा जा रहा था।दीपक के स्वभाव के बारे मे सोच उसे लगता कहीं वो पाखि के साथ यूँ समय तो नही गुजार रहा था।
रात तो किसी तरह गुजरी लेकिन सुबह होते ही पाखि कालेज गयी मगर सारा दिन बीत जाने पर भी दीपक से मुलाकात न हो सकी। इसी तरह एक हफ्ता बीत गया,पाखि की हालत तो जल बिन मछली जैसी हो गई थी।
           एक रोज़ उसे दीपक सामने से आता दिखाई दिया ,वो तो दौड़ कर दीपक के गले लग जाना चाहती थी लेकिन नारी सुलभ लज्जा के कारण ऐसा ना कर सकी,धीरे से वहा जा मुस्कुराते हुए बोली ” ये क्या दीपक नाटक ख़त्म हुआ तो क्या हमारी दोस्ती भी खतम हो गई”?
दीपक भोली सी  सूरत बनाते हुए बोला ” पाखि मैं नही जानता था तुम शम्भुनाथ जी की बेटी हो, हम ठहरे मिडिल क्लास के लोग  तुमसे दोस्ती करने की हैसियत नही मेरी! तुम्हारे उंचे अमीर घर मे मेरी उपस्थिति मखमल में टाट के पैबंद जैसा लगेगी। अभी तो मुझे नौकरी ढूँढनी है।
ये सुनते  तो पाखि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई , उसके सपनों की दुनिया तो जैसे चकनाचूर हो गई,।
बस एक पल बीता पाखि ने सारी मर्यादा तोड़ कालेज के मैदान मे सारे विद्यार्थियों के सामने ज़ोर से कहा
” दीपक मैं तुमसे शादी करना चाहती हूँ!
ये सुनकर दीपक चौक गया और बाकी लोगों को तो जैसे सांप सूघ गया , एक सन्नाटा छा गया।
पाखि मुस्कुराते हुए बोली ” अगर तुम मेरी दुनिया मे नही आ सकते तो क्या हुआ मैं सबं कुछ छोड़कर तुम्हारी दुनिया मे आ जाउंगी , लेकिन तुम्हारे बिना मैं जिंदा नही रह सकती!” मैं पिताजी को हमारी शादी की बात करने भेज रही हूँ।
सब कुछ एक फिल्म की तरह था दीपक ने सबके सामने पाखि को गले से लगा लिया था।
पाखि दीपक के साथ बाईक पर बैठी और सीधे घर की तरफ चल पड़ी, आज तो जैसे सारी दुनिया उसकी बाहों मे सिमट गई थी। पिछली सीट पर बैठ आंखे मुंदे वो सपनों के सातवें आसमान मे उड रही थी।
घर जाते ही उसने दीपक को अपने पिता के सामने खड़ा कर दिया और बोली ” पापा आज मैंने अपना जीवन साथी चुन लिया है, मैं दीपक से शादी करना चाह्ती हूँ।”
पाखि माता पिता सकते मे आ गये लेकिन उन्हे पाखि की समझदारी और पसंद पर भरोसा था। रजामंदी तो दी लेकिन इस शर्त पर की शादी से पहले दीपक को एक अदद अच्छी नौकरी करनी होगी। समय गुजरा और दीपक को आयकर विभाग मे नौकरी मिल गयी।
शम्भुनाथ जी को अब दीपक की काबिलियत पर किसी प्रकार का संशय ना था । अब दीपक और पाखि  की शादी की तैयारियाँ जोर शोर से होने लगी। शादी की रस्मों में दीपक के परिवार के बहुत कम लोग शामिल थे लेकिन शम्भुनाथ जी ने लगभग सारे शहर को बुलावा भेजा था।
पाखि का घर आज फूलों से सजा किसी बागीचे सा लग रहा था।घर के एक सिरे पर हल्वाइयो की फौज खाना बनाने लगी थी, चारो तरफ मिठाई और अन्य देसी विदेशी वयंजनो की खुश्बू फैली थी, धीरे धीरे शाम हुई तो हवेली रोशनी से नहा उठी, ऐसा लगता था मानो आसमान के सारे सितारे ज़मीन पर उनकी शादी मे शामिल हो गये हों।
बडी़ ही शान ओ शौकत से दीपक बारात के साथ आया,दूल्हा बने दीपक का व्यक्तित्व तो जैसे गजब लग रहा था , और वरमाला लिये पाखि लाल जोड़ेमें स्वर्ग से उतरी अप्सरा लग रही थी।
तारो की छाव में दीपक और पाखि विवाह के बंधन मे बंध गये। मंच पर उन दोनो की जोडी को देख हर कोई तारीफ के पुल बांध रहा था।
तभी पाखि को अपने बचपन का दोस्त रवि आता दिखाई दिया, रवि के पिता शम्भुनाथ जी के मुनीम थे और रवि मात्र दस बरस का था जब एक दुर्घटना में वे चल बसे , रवि की पढ़ाई लिखाई सब शम्भुनाथ जी करवाई थी। आज रवि सरकारी अस्पताल मे डॉक्टर था, उसे देखते  ही पाखि ने उसे आवाज़ दी ” अरे रवि ! तुम कब आये?
रवि ने आगे बढ़ कर उन दोनो को बधाई दी और बोला ” अरे मे कल शाम ही आ गया था मां की तबियत ठीक नही थी तो वह नही आई है मैं अंकल की मदद करने आया था।यहाँ के इंतज़ाम देखने मे लग गया ,तुमसे मिलने का मौका नही मिल सका। तुम दोनो को ढेरों शुभकामनाये , तुम दोनो की जोड़ी सलामत रहे। फिर दीपक की ओर देख कर बोला “दीपक जी पाखि मेरे बचपन की दोस्त है उसे हमेशा ख़ुश रखियेगा”|
रवि को देखते हुए दीपक बोला,”रवि मैं शायद आपको पहले देख चुका हूँ कहां मुझे याद नही आ रहा”। फिर  रवि ने दीपक से हाथ मिलाया और मंच से उतर गया।
रवि के जाते ही दीपक ने बड़े ही व्यंग्यात्मक लह्जे मे बोला ” पाखि ये तुम्हारा बचपन का यार लगता है , दुखी हो गया बेचारा, बडी़ गहरी  दोस्ती थी शायद!
 पाखि को ये बात बेहद बुरी लगी लेकिन मौके की नज़ाकत समझ वो चुप रह गई।

धीरे धीरे सारी रस्में खत्म हुईं  तो भारी मन और आंखो मे आँसू लिये पाखी अपने बबूल का घर छोड़ दीपक के घर विदा हो गयी। शम्भुनाथ जी का घर आज बिल्कुल सूना हो गया था आज उनके मन को तस्सली थी बेटी को मनचाहा जीवंनसाथी मिल गया है ,अब वो हमेशा खुश रहेगी।

दीपक के घर वर वधू का शानदार स्वागत हुआ, लेकिन शायद नव वधू का नही बल्की वधू के साथ आई लक्ष्मी या यों  कहें धन संपति का ज्यादा स्वागत किया गया परिवार जन पाखि के बजाय फ्रिज टेलीविज़न कपड़े जेवर को सम्भाल रहे थे। यहाँ कोई उसके रूप रंग की नही उसके जड़ाऊ ज़ेवर और मह्गे कपड़ों की तारीफ कर रहा था।
हद्द तो तब हुई जब दीपक की बहन के इसरार करने पर उसकी सास ने पाखि की मां का जड़ाऊ हार बहू के गले से उतार अपनी बेटी को दे दिया। संकोच वश पाखि कुछ ना बोल सकी।
खैर दिन बीता रात ढलतें पाखि को सजा कर कमरे में पहुचा दीया , सजी हुई सुहाग की सेज पाखि के मन मे एक उमंग जगा रही थी और वो बेसब्री से दीपक का इंतजार करने लगी थी ।
           लगभग आधी रात बीतने के बाद, दीपक तनिक नशे मे कमरे मे दाखिल हुआ , उसके मुह से शराब की गंध आ रही थी पाखि चौक गई उसे दीपक के ऐसे किसी ऐब की जानकारी नही थी। पाखि के पूछने पर दीपक अपनी मस्ती मे बोला ” अरे यार पाखि हमारी शादी का जश्न था सो दोस्तो  पिलाये बिना नही मानें, अर्रे यार आज हमारी सुहाग रात है भला आज कोई पति से सवाल जवाब करता है।
 पाखी को ये सब बहुत अजीब लग रहा था मगर इश्क़ के अंधे को सच्चाई नही दिखती।
पाखि ने सपने मे भी नही सोचा था उसकी सुहाग रात ऐसे होगी, दीपक ने उससे प्यार नही उसके सपनों को तार तार कर दिया था। अगले दिन पाखि और दीपक सिंगापुर अपने हनीमून पर चले गये , वो पंद्र्ह दिन पाखि की ज़िन्दगी के बेहद खूबसूरत दिन थे, खूब सैर सपाटा,किया, पाखि अपने मनपसंद साथी के साथ सपनों की दुनिया मे घूम रही थी। वे दिन पलक झपकते बीत गये।
 वे दोनों वापस आये, दीपक दफ्तर जाने लगा लेकिन घर के लोग पाखि से औपचारिक बातें करते, अक्सर दबी आवाज़ मे किसी के ज्यादा बीमार होने की बात सुनाई देती मगर पूछने पर कोई बात नही बताता था।
एक रोज़ उसने दीपक की अलमारी खोली तो वहा किसी अस्पताल की फाईल रखी थी ज्यों उसने देखना चाहा तभी दीपक आ गया और चिल्ला कर बोला ” पाखि…. तुम मेरी जासूसी कर रही हो ?
पाखि सकपका कर दूर हट गई और धीमी आवाज़ मे बोली ” दीपक हम पति पत्नी है हमारे बीच कैसा परदा”?
दीपक ने फिर ऊची आवाज़ में ही बोला “तुम अपने काम से मतलब रखो, हर बात जानना ज़रूरी नही। इतना बोल वो एक ब्रिफ्केस में वो पैसों की गड्डियाँ रखने लगा तो पाखी से नही रहा गया वो बोल पड़ी ” दीपक इतने पैसे  का क्या करोगे?
ये सवाल सुनते ही दीपक जैसे आपे से बाहर हो गया और गुस्से से चीखते हुए बोला ” क्यो अपने बाप के घर कभी पैसे नही देखे क्या? मुझे भी कमाना आता है। तेरे बाप के पैसे नही हैं जो उसका हिसाब तुझको दू!”
इतना बोल दीपक पाखि को हैरान छोड़ ते़जी से बाहर चला गया। पाखि धम्म से बिस्तर पर गिर गई , उनकी आवाज़ सुन दीपक की मां वहां आ गयी और कुछ जानने की बजाय पाखि को भला बुरा सुनाने लगी कि वो उनके बेटे को गुलाम बनाना चाहती है। उसके पिता दीपक को घर जमाई बनाना चाह्ते हैं। इतना पैसा हैं फिर भी क्या दिया वगेरह वगेरह, जाने क्या क्या बड़बड़ाती वहां से चली गई।

ये सब देख पाखि का सर घूमने लगा तभी उसे अल्मारी के पास एक लिफाफा दिखाई दिया उसने जब उसे खोला तो जैसे वो थर थर कापने लगी, एक पल उसने खुद को संभाला और अपने पिता के घर चली गई।

शाम को दीपक आया तो पता चला पाखि ने सबको एक जश्न में एक होटल मैं बुलाया है। दीपक का पूरा परिवार तैयार होकर वहा गया पाखि अपने पिता के साथ थी। दीपक ने पाखि को सबके सामने गले से लगा लिया और बोला सुबह के लिये माफ कर दो फिर कभी ऐसा नही होगा , उसके माथे पर चुम्बन अंकित करते हुए बोला मेरी पाखि मुझे इतना प्यार करती है कि वो मुझे ज़रूर माफ कर देगी। पाखि मै कहा तुम सबको पार्टी मे ले चलो मैं कुछ देर मे आती हूँ । दीपक मुस्कुराता हुआ सबके साथ अंदर पार्टी मे गया और पाखि एक रुम मे चली गई।
 बाहर नये साल का जश्न पूरे शबाब पर था और भीतर पाखि एक कमरे में बैठी खुद को समेट रहीं थी।
साल भर पहले हुए ” लैला मजनूं”  नाटक ने उसकी ज़िंद्गी बदल गई थी आज फिर एक बार पूरी तरह बदलने वाली थी। दीपक ने दो बार होटल के कर्मचारी को पाखि को बुलाने भेजा था । कुछ समय के बाद पाखि पार्टी में गई उसने देखा दीपक मुस्कुराता हुआ अपने चिर परिचत  अंदाज़ मे दूसरी लड़कियों से घिरा डांस कर रहा था, पाखि ने अचानक संगीत रुकवा दिया।
दीपक जल्दी साए पाखि के नज़दीक आया और बोला ” पाखि डार्लिंग! अब आयेगा पार्टी का मजा!
“सही कहा!  तुमने अब पार्टी और नाटक दोनों का पूरा मजा आयेगा।” पाखि ने कहा तो दीपक ज़रा चौक गया।
पाखि ने पूरे आत्मविश्वास से किसी रुबी को आवाज़ दी एक दुबली सी बीमार लडकी डॉक्टर रवि के साथ ,सामने आई तो दीपक भौचक्का रह गया।
पाखि ने बोलना शुरु किया सज्जनों ये हैं मिसेज दीपक जो दो साल से अस्पताल में कैंसर का इलाज करवा रही हैं। दो साल पहले इनकी शादी हुई एक बेटी की मां हैं, दीपक ने रूबी की सारी जायदाद अपने नाम कर छोड़ दिया। फिर मैं इनके प्यार के जाल में फँस गयी , आप सब जानते हैं हमारी शादी  हुई और मेरी जानकारी के बिना मेरे सुख की दुहाई दे इनके पिता ने पापा के बिजनेस में पार्टनर बनाने की शर्त रख दी थी ,जिसे मेरे पिता ने मान लिया था।
दीपक के पैरों तले ज़मीन खिसक गई थी वो पाखि के नज़दीक आया और कुछ बोलना चाहा था की पाखि ने एक ज़ोरदार थप्पड़ उसके गाल पर रसीद कर दिया ” चुप अगर एक लफ्ज़ बोला तो जान से मार दूँगी, इतना बड़ा धोखा? इसके  बाद पुलिस  को आवाज़ दी ” इंसपेक्टर इनको परिवार के साथ पोलिस स्टेशन ले चलिये ।
दीपक जलती हुई निगाहों से रुबी को देख रहा था, उसके हाथ शादी के सर्टिफ़िकेट और चंद तस्वीरे थी। पाखि आगे बढ़ी और बोली ” रुबी तुम परेशान मत होना तुम्हारा इलाज करवाना मेरी ज़िम्मेदारी है और भगवान ना करे तुम्हे कुछ हो गया तो  तुम्हारी बेटी को एक माँ बनकर पालुंगी” । वहाँ खड़े सब लोग हैरान थे सबको उसी हाल मे छोड़ पाखि अपने पिता और रुबी के साथ पोलिस स्टेशन की ओर चल पड़ी दीपक और उसके परिवार के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी कि रिपोर्ट दर्ज करवाने।
नया साल आज तीन ज़िन्दगियों के लिये नई उम्मीद ले कर आया था

 

Pic credit –Kabhi Alvida Na Kehna

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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Kiran Shukla
मैं किरण शुक्ला एक गृहणी हूं। मैं नवाबों के शहर लखनऊ की रहनेवाली हूं। थोड़ा बहुत लिखने का शौक पहले से था लेकिन जिंदगी की व्यस्तताओं मे ये शौक ज़रा पीछे छूट सा गया था। कला मंथन मंच की आभारी हूं जिसकी वजह से मैंने नए सिरे से अपने शौक को वक्त देना शुरू किया है। सही मायने मे नवलेखिका हूँ जो शायद आजकल की पीढ़ी के लिए लिखने का प्रयास कर रही हूं। उम्मीद करती पढ़ने वालों की अपेक्षा पर खरी उतरूं।

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