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बाहर नये साल का जश्न पूरे शबाब पर था और भीतर,, मेरे अंतर्मन में स्मृतियों की आतिशबाज़ी शुरू हो गयी!!
कल ही की तो बात लगती है। मैंने पहली बार नए साल पार्टी में विहान को अपनी सहेली रीना के साथ देखा था,वो उसका चचेरा भाई है और नया नया गाँव से शहर आया था!
हल्के आसमानी रंग की कमीज और काले रंग की पतलून में अपने गेहुंए रंग के साथ देहाती लग ही रहा था। रीना ने मुँह बनाते हुए उसे सभी से मिलवा तो दिया मगर फिर अपने शहरी दोस्तों के साथ व्यस्त हो गयी!
मैं रीना की दोस्त थी स्कूल से साथ पढ़ती और पडोसी भी थी इसलिए उस न्यू ईयर पार्टी में शामिल हुई थी मगर मैं जरा शांत स्वभाव की हूँ,,और रीना खुले मिज़ाज़ और चुलबुली सी लड़की!…
उधर रीना अपने दोस्तों के साथ एन्जॉय कर रही थी उधर मैं विहान को देख रही थी,जो अनजान की तरह कॉफी का कप लिए एक कोने में चुप खड़ा था,,मैं उठ कर उसके पास गयी और बोली…
“विहान! यहाँ अकेले क्यों खडे हो, जाओ DJ पर डांस वाँस करो.. नए साल की पार्टी है..
विहान –नहीं नहीं आरती जी, मुझे ऐसा शौक नहीं,,
“अच्छा जी,, तो फिर क्या शौक है आपके,, हम भी सुनें”
तभी रीना पीछे से आ कर बोलती हूँ,”इस पगलू को किताबें, कविताएं ओर कहानियाँ ऐसे शौक है,, बिल्कुल बोरिंग है ये,, मेट्रो के समय में भी कोयले का इंजन”
हा हा हा.. सभी हंसने लगे..
तब मैं बोल पड़ी,”तो क्या हुआ अगर विहान को किताबों से प्रेम है,भूलो मत किताबें इंसान की सच्ची साथी और पथप्रदर्शक होती है। ”
“अरे 12बज गए”,
Happy New Year!!!… का शोर मच गया मेरी बात को छोड़ सब new year के लिए मस्त हो गये…
अगले दिन सुबह विहान अपने गाँव लौट गया,, उसके बाद ना हम मिले ना मैंने ही रीना से उसके बारे में पूछा,,,आज 6साल बाद 31दिसम्बर की शाम टी वी पर न्यूज़ में देखा उसे एक राष्ट्रीय कविता कार्यक्रम में,उसे सम्मान सहित मंच पर बुलाया गया।
संचालक — मैं आमंत्रित करती हूँ मंच पर युवा कवि विहान दास को,के वो आये और अपनी कविता से हमें भाव विभोर करे…
विहान ने अपनी कविता से पहले दो पंक्तियाँ पढ़ी……

“तुम्हे छू कर ही आते है मेरी कविताओं में शब्द..
वरना क्यों पन्ने पन्ने पर तुम्हारी खुशबु बसी होती…””

और सभा करतल ध्वनि से गूंज उठी! अपनी कविता को समाप्त कर विहान ने कहा,”मैं आज शायद यहाँ मंच पर नहीं होता यदि 6साल पहले एक अजनबी दोस्त ने मेरे लिखने के शौक और कला का सम्मान ना किया होता,,, कहते है हर मर्द की सफलता के पीछे एक औरत होती है,, और अधिकतर उस औरत को प्रेमिका, माँ,, बहन इन रिश्तों से जोड़ा जाता है… मेरी कामयाबी के पीछे जो रमणी है उस से मेरा किसी नाम का रिश्ता नहीं है..मगर उनके उस क्षण भर के साथ ने मुझे हिम्मत दी यहाँ तक पहुंचने में…मैं उनका आभारी हूँ,, उनको नमन करता हूँ वो जहाँ हो मेरा नमस्कार स्वीकार करे,धन्यवाद!!!”
और जाने क्यों मेरी आँखों के कोर गीले हो उठे और अंतर्मन भावविभोर हो गया…
कुछ राब्ते अनकहे होते है,
नाम नहीं मगर करीब होते है..
संबंधो से बढ़ कर होती नरमी,
एहसास से जो जुड़े होते है…

 

 

 

 

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