Email: support@kalamanthan.in, editor@kalamanthan.in

Home Social issues गांधी जी के विचार आज के दौर में कितने सार्थक

गांधी जी के विचार आज के दौर में कितने सार्थक

बेशक गाँधी जी के कई बिंदुओं से असहमत हुआ जा सकता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह विचारधाराएं महत्वपूर्ण नहीं हैं।

गाँधी जी और उनके विचार आज के दौर में कितने प्रासंगिक!

गाँधी जी और उनके विचार, आज के दौर में कितने प्रासंगिक हैं? यह प्रश्न पिछले कुछ वर्षों से बार-बार और तीव्रता से उठाने का प्रयास हो रहा है। क्या सच में आज गाँधी जी और उनके विचारों की प्रासंगिकता पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ गई है अथवा यह एक भृम है। वस्तुतः यह प्रश्न एक ऐसा महत्वपूर्ण बिंदु है जिस पर निष्पक्ष रूप से विचार करना बहुत आवश्यक है।

दरअसल महात्मा गाँधी से जुड़ी सभी विचारधाराएं, चाहे वह हिंसा हो,भेदभाव हो,श्रमदान हो या फिर स्वच्छता हो। ये सभी विचार गाँधीजी के साथ अस्तित्व में नहीं आए थे, ये विचार तो उनसे पूर्व भी विद्यमान थे और भविष्य में भी इन्हें हर युग में अनुभव किया जाता रहेगा। गाँधीजी ने तो इन विचारों को केवल अपने तात्कालिक ज्ञान और ऊर्जा से जीवंत किया था। इन्हें जन-जन के बीच फैलाकर इसे एक आंदोलन बनाया था।

वस्तुतः उनका जीवन एक बहती नदी की तरह था जिसमें कई धाराएं विद्यमान थी। उन्होंने अपने जीवन में घटी हर घटना पर अपने विचारों को, अपने दर्शन को यथासंभव प्रकट करने का प्रयास किया था।

देखने वाली बात यह है कि आख़िर आज क्यों फिर से इन विचारों की आवश्यकता और गाँधीवाद की प्रासंगिकता महसूस होने लगी है, इसके लिए हमें सहज ही कुछ बातों पर गौर करना होगा।

दरअसल जैसे-जैसे विश्व में हिंसा,धार्मिक भेदभाव,आर्थिक मंदी,नैतिक पतन और भूख-बेरोजगारी जैसी समस्याओं का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे ऐसी किसी विचारधारा की जरूरत को आत्मसात करने की आवश्यकता भी शिद्दत से महसूस की जाने लगी है, जिससे इन पर पार पाया जा सके। लिहाज़ा ऐसी परिस्थिति में इसी ‘महात्मा’ का नाम सर्वप्रथम मन में आता है क्योंकि गाँधीजी ही वह शख्स थे, जिन्होंने इन समस्याओं को मुखरता से सामने रखा।

उन्होंने देश की आज़ादी के संघर्ष के साथ स्वच्छता,हिंसा,छुआछूत उन्मूलन, हिंदू-मुस्लिम एकता,चरखा-खादी को बढ़ावा और ग्राम स्वराज जैसे मुद्दों पर खुलकर लोगों को जागृत करने का प्रयास किया। इन्हीं में से कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे यह हैं जिन पर सहज ही मनन किया जा सकता है।

अहिंसा – यदि हम विश्व परिदृश्य में हिंसा की बात करें तो वर्तमान में विश्व मे ‘अहिंसा’ की जरूरत एक महवपूर्ण अवधारणा है। गाँधी जी अहिंसक पुजारी होने के नाते भली-भांति समझ चुके थे कि हिंसा की बात चाहे किसी भी स्तर पर क्यों न की जाए लेकिन सच यही है कि हिंसा किसी भी समस्या का स्थाई समाधान नहीं है। और इसका यथा संभव उन्मूलन अहिंसा से ही किया जा सकता है। वह स्वयं इसके लिए मद्भागवत गीता से प्रेरणा लेते थे। गीता में श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए संदेश, ‘कर्म किए जा, फल की चिंता मत कर’ को मूल मंत्र मानते हुए गाँधी जी ने इसे मानव जीवन में उतारने की पैरवी की थी। और वस्तुतः आज भी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इसी व्याख्या की प्रासंगिकता महसूस की जा रही है, जहाँ प्राप्त करने की लालसा से कहीं अधिक कर्म करने की प्रमुखता हो।
धार्मिक_विभेद – धार्मिक विचारधारा का विरोध और कट्टरपंथी वर्तमान भयावह रूप धारण कर चुकी है। ऐसे में सर्वधर्म समभाव की जीती जागती तस्वीर समझे जाने वाले गाँधी जी की प्रेरणा एक आदर्श बन सकती है, यदि इसे पूर्णतयः ईमानदारी से अमल में लाया जाए। प्रेम और धार्मिक सद्भाव उनके दर्शन की बहुमूल्‍य पूंजी थी। दरअसल गाँधी जी ने विभिन्न धर्मों,सम्प्रदायों का अध्ययन किया था और उन्हीं के आधार पर धर्म और कर्म की स्थापना करने की प्रेरणा दी थी जिसके सिद्धांतों की वर्तमान में बहुत अधिक जरूरत है समाज में शांति और सर्वधर्म भाव की स्थापना के लिए।
स्वच्छता – स्वच्छता का बिंदु एक ऐसा प्रश्न है जो बरसों गुजरने के बाद (शिक्षा की अत्याधिक व्यापकता के बाद भी) भी जस का तस है। इसका एक उदाहरण बरसों पहले सार्वजनिक स्वच्छता के प्रति शहर के लोगों के बेरुखी भरे रवैये पर गाँधीजी का यह टिप्पणी देखी जा सकती है… “यह सोच सुविधाजनक नहीं है कि लोग भारतीय बम्बई की सड़को पर निरन्तर इस खौफ के साये में चलते हैं कि बहुमंजिली इमारतों के बाशिन्दे उन पर थूक सकते हैं।” जिसकी वास्तविक स्थिति के पक्ष में अभी भी बहुत अधिक सुधार नहीं कहा जा सकता।
खुले में शौच करने की ‘असभ्यता’ में जरूर कुछ अंतर आ गया है लेकिन पूरी तरह से समाप्त प्रायः है, ऐसा लगता नहीं है।
स्वच्छता के इन मुद्दों पर गांधी-विचारधारा की प्रसांगिकता ग़ौरतलब ही नहीं बहुत अहम है, जिसका एक सशक्त प्रभाव वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस दिशा में किये गए कार्यों में स्प्ष्ट नजर आता है।
सत्य_की_विचारधारा – ये एक कटु सत्य ही है कि ‘सत्य वचन’ प्राचीन मानव के जीवन का एक अनमोल पक्ष होता था लेकिन वर्तमान में स्थिति ठीक इसके विपरीत है। ऐसी स्थिति में, सत्य के प्रयोग करने वाले ‘महात्मा’ को कैसे भूला जा सकता है? सत्य के इस अन्वेषक ने जीवन को सत्य को बहुत करीब से देखा था शायद इसलिए उन्होंने सत्य की ईश्वर के साथ बराबरी की थी। गाँधीजी का मानना था कि सत्य बोलना और आंतरिक स्वच्छता (मन की साफ-सफाई) ईश्वर की अनुभूति के ही साधन हैं। अतः उनके इस विचार की प्रासंगिकता वर्तमान में सहज ही और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
श्रमदान – आज का दौर एक अति आधुनिक विज्ञान का दौर है। इस दौर के अनिगिनित लाभों से इतर एक बहुत बड़ी हानि भी है, वह है बेरोजगारी।
वर्तमान में बेरोजगारी के बढ़ते आकंड़े सहज ही गाँधी जी के विचारों की प्रासंगिकता को याद दिलाते हैं। आधुनिकवाद की इस व्यवस्था को गाँधी जी शैतानी व्यवस्था का नाम देते थे। वे सभी को बेसिक शिक्षा के साथ श्रमदान करने व कराने के पक्षधर थे। और वर्तमान में तो श्रमदान की परिकल्पना ही लगभग समाप्त हो चुकी है। उनकी विचाधारा में लघु उद्योगों को प्रमुखता देने और श्रमदान को निर्धनता के उन्मूलन का मुख्य शस्त्र मानने की बात कही गई थी। इस विचारधारा का एक सशक्त उदाहरण वर्तमान में वह सभी क्षेत्र हैं, जहां भी लघु उद्योगोंऔर श्रमदान को प्रमुखता दी जा रही है, और वे भली भांति विकसित हो रहें है। उल्लेखनीय है कि ऐसे क्षेत्रों के वासी सहज ही अपनी दो वक्त क़ी रोटी का प्रबंध कर पाने में सक्षम है और प्रगति पथ की ओर अग्रसर हैं।
वस्तुतः सच तो यह है कि ये जरूरी नहीं कि गाँधी-विचारधारा को मानने के लिए किसी को टोपी-धोती पहनने की ज़रूरत है या ब्रह्मचर्य और राम-भजन गाने की जरूरत है।
जरूरत है सिर्फ इन विचारधाराओं के मूल में जाकर इन्हें आत्मसात करने की। बेशक गाँधी जी के कई बिंदुओं से असहमत हुआ जा सकता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह विचारधाराएं महत्वपूर्ण नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर ‘सत्याग्रह’ जैसे विरोध के तरीक़े उनके जीवन में ही बहुत प्रभावी नहीं रह गए थे, लेकिन इसके बावजूद इन्हें एक अहिंसक संघर्ष के तौर पर एक सशक्त कड़ी माना जा सकता है। अंततः सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि ये विचारधाराएं गाँधी जी ने नहीं बनाई। उन्होंने केवल इन्हें फिर से चलन में लाकर अपनाने के लिए प्रेरित किया है।

ये व्यक्ति की अपनी मानसिकता है कि वह इसके लिए गाँधी जी को श्रेय देना चाहे या न देना चाहे, लेकिन महत्वपूर्ण यही है कि वह इन विचारधाराओं को जीवन में अपनाने का प्रयास अवश्य करे।

 

 

Read more by the Author

Pic Credit Google

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

हमें फोलो करे Facebook

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

कवि महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘ निराला’

  वर दे, वीणावादिनी , वर दे! प्रिय स्वतंत्र- रव अमृत-मंत्र तव भारत में भर दे! काट अंध- उर के बंधन स्तर बहा जननी ज्योतिर्मय निर्झर कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर, जगमग...

बांझाकरी की प्रेमिल कविता

ये लेख कलामंथन समूह की लेखिका प्रियंका गहलोत द्वारा लिखित है। आज के दौर में पत्राचार का सिलसिला थम चुका है। कलामंथन ने दिया...

मेरे प्रिय रेडियो

मेरे प्रिय रेडियो, तेज हवाओं ने खिड़की के पल्ले को आपस में टकराने पर मजबूर कर दिया है। मैं भी बिस्तर से उठ कर अलसाई...

आशिक-ए-वतन

ये लेख कलामंथन समूह की लेखिका रागिनी प्रीत द्वारा लिखित है। आज के दौर में पत्राचार का सिलसिला थम चुका है। कलामंथन ने दिया...

Recent Comments