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वो साँवली सी लड़की

“अरे सामाजिक संरचना ही ऐसी है कि लड़कियों को न चाहते हुए भी बातें बर्दाश्त करनी पड़ती है क्योंकि समाज भी तो लड़कियों को ही दोष देता है कुछ भी अनहोनी घटना घटती है तब…”

घर्र घर्र की आवाज के साथ एक ऑटो गली के मुहाने पर रूकी| उसमें से एक साधारण नैन नक्श, रंग साँवला, आँखों पर मोटा चश्मा, लम्बी बालों वाली एक लड़की उतरी, उसका नाम सपना था, उसके पिता दिगम्बर लाल थे जो पोस्ट आफिस में सरकारी कर्मचारी थे| दो साल पहले पिता की आकस्मिक मौत ने मध्यमवर्गीय परिवार की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी थी |
सपना के घर में माँ, एक भाई और दादी थी|भाई नाबालिग था और घर में कमाने वाला कोई नहीं था फिर माँ ने काफी भाग दौड़ कर पिता के जगह की नौकरी सपना को दिलाई| सपना को अनुकम्पा पर नौकरी मिल गयी| सपना अपने घर की तरफ बढ़ रही थी, सांझ धीरे धीरे गहरा रही थी मौसम में एक अजीब सी उदासी छाई थी पंछी भी अपने घोंसले की तरफ रूख कर चुके थे|
वहीं कोने पर एक पान की गुमटी थी जहाँ लड़कों का जमावड़ा लगा ही रहता था, जो हर आती जाती लड़की को छेड़ने का एक भी मौका नहीं चूकते थे,
ओए जानेमन किधर जा रही हो,
चली आना तू पान के दुकान पे 3:30 बजे……
ऐसे गाने सपना के कान को भेदते पर उन्हें वह पूरी तरह उपेक्षित कर देती क्योंकि माँ ने कह रखा था कि सड़क पर ऐसे ही आवारा कुत्ते घूमते रहते हैं किसी के मुँह मत लगना,आत्मविश्वासी होते हुए भी सपना को माँ की बात याद आ जाती| और इसी कारण सपना तेज कदम बढ़ाती आगे बढ़ती पर उसे लगता वो उतना पीछे जा रही है पैर तो जैसे जड़वत हो गये थे|

तभी उसके कानों में आवाज आई… ये काली काली सूरत तू रू रू… ये काले मोटे बाल… ये मोटे मोटे चश्में ये सहमी सहमी चाल….. देखा जो तुझे जानम हुआ है बुरा हाल……

हा हा हा की ठहाके ने रही सही कसर भी पूरी कर दी,सभी जोर जोर से बेशर्मी से हँसने लगे| सपना का जी कसैला हो गया और आँखों में आँसू आ गए जो चश्मे की ओट में छिप गया था| चुपचाप वो तेज कदम बढ़ाते घर की ओर बढ़ गयी| घर के निकट थोड़ी खाली जगह थी जहाँ मोहल्ले भर की औरतें रोज बैठती और जो पूरे मोहल्ले की बातें बतियाती ,चाहे अपने घर में आफत आई हो दूसरे घरों की पूरी खबर रखतीं और खूब मजे लेती| इन सभी औरतों का घर के काम निपटा कर यह एक बढ़िया टाईमपास था|
तभी लीला चाची की नजर सपना पर पड़ी सपना को आते देख आपस में खुसफुसाहट शुरू हो गयी, देखो तो ये कलूटी, कैसे ठुमकती हुई आ रही है, पता नहीं आज आफिस से इतनी जल्दी कैसे आ गयी और दिन तो 6 बजे से पहले नहीं आती थी| तभी बगल वाली ने ताना मारा क्या पता आफिस के बहाने कहाँ……. और सब दबी जुबान में खी खी करने लगे| जमना चाची जो पूरे मोहल्ले की रेडियो थी सब घर की खबर रखतीं थी कि किसके घर कौन सी रोटी पकती है और प्रसारण यहीं बैठकी में होता था,

“सपना की माँ को जाने का सूझा जवान बेटी को नौकरी दिला दी ये नहीं कि शादी कर दें”

“अरे जमना चाची कौन इस कलूटी से शादी करेगा कहती हुई बेला ने चुटकी ली| “

“जमना सपना को देख कर शक्कर मिश्रित बोली में कहने के लिए क….लू…. टी बोलते बोलते रूक गयी,ओह कलूटी नहीं ….मन ही मन बुदबुदाई फिर याद आया अरे हाँ इसका नाम तो सपना ओह,  इसका ये नाम सपना याद ही नहीं रहता है ,

“ओ सपना बेटी आज इतनी जल्दी आ गयी कोई परेशानी है क्या ??”

“नहीं चाची कोई परेशानी नहीं है”,कहती हुई सपना घर के भीतर चली गयी |

 

माँ ने सपना से कहा,”बेटी जल्दी हाथ मुंह धोकर आ जाओ, तुम्हारे लिए कड़क चाय बनाती हूँ| सपना और माँ चाय पीने लगे और इधर उधर की बातें होने लगी,..
” पता है सपना, आज मैं बैंक गयी थी, वो खाता में कुछ गड़बड़ हो गया था पर ये धीरज के चलते सारे काम आज ही हो गये वरना पता नहीं आज हो भी पाता या नहीं विमला ने चाय की एक घूँट पीते हुए कहा”|
“ओहो अच्छा”, कहते हुए सपना ने सिर हिलाया|
धीरज जगदीश जी का लड़का था और यहीं मोहल्ले में रहता था बैंक में अभी अभी नौकरी लगी थी| सपना और धीरज बचपन से साथ में खेलते कूदते बड़े हुए थे| धीरज बड़ा ही होनहार लड़का था|
छुट्टी का दिन था, सपना धूप में बैठी अनेकों सवालों से उलझी हुई थी और जवाब भी मिलने का नाम नहीं ले रहे थे…

क्यों कमला चाची रोज घर में पिटती है पति से फिर भी चुप रहती है क्योंकि कमला चाची कहीं जा नहीं सकती,,,

क्यों लड़कियों के घर से निकलते ही लड़कों की नजरें उन्हें घूरती घूरती रहती है,कोई बस में धक्का दे देता है ,कोई चिकोटी काट लेता है जैसे लड़कियां संपत्ति हो और उनपर पुरूषों का अधिकार हो जब तब उनके ऊपर हाथ साफ कर लें|

तभी माँ आ गयी सपना से इन्हीं सब बातों पर चर्चा होने लगी… “विमला ने कहा, “अरे सामाजिक संरचना ही ऐसी है कि लड़कियों को न चाहते हुए भी बातें बर्दाश्त करनी पड़ती है क्योंकि समाज भी तो लड़कियों को ही दोष देता है कुछ भी अनहोनी घटना घटती है तब…”
“खैर छोड़ो इन बातों को… देख तेरा बायोडाटा बन गया है और ध्यान से देख लो रंग- गोरा नहीं लिखा है जैसा तू चाहती थी कि रंग साँवला ही लिखा है, और यही बायोडाटा लड़के वाले को भिजवाया था |”
“हाँ माँ तो क्या गलत है, रंग वाला कॉलम सबसे ऊपर रहता है भले कितनी भी शिक्षित हो और पढ़ाई लिखाई वाला कॉलम नीचे, क्या गोरा होना इतना जरूरी है?? समाज की नजर में मैं बदसूरत हूँ क्योंकि मैं गोरी नहीं हूँ क्या सुदंरता का पैमाना रंग होना चाहिए क्या सीरत की इस दुनिया में कोई कीमत नहीं?”
 माँ के पास सपना के बातों का कोई जवाब नहीं होता |
माँ ने कहना शुरू किया,”चँद्रेश जी का फोन आया था और तुमको उनलोगों ने बहु के रूप में पसंद कर लिया है तो ना नुकुर मत करना, देखो अच्छे लोग भी हैं इस दुनिया में जो सूरत नहीं सीरत देखते हैं”
तभी धीरज आ गया विमला बोली “आओ बेटा बैठो और सपना की शादी की सारी बात बताई,
“तो कर ले न शादी चश्मीश”,धीरज ने सपना को चिढ़ाते हुए कहा|”

सपना चिढ़कर बोली,”घोंसले जा न तू ही कर पहले शादी”

“घोंसला बोलोगी “!

“चश्मीश बोलोगे”!

दोनों की दोस्ती अक्सर झगड़े में तब्दील हो जाती| और माँ दोनों के बीच बचाव में लग जाती|

एक दिन चँद्रेश जी सपरिवार सपना को देखने आए फिर बातचीत के बाद प्रदीप और सपना की शादी तय हो गयी जो महज एक औपचारिकता थी उन्होंने तो पहले ही मन बना लिया था, सरकारी नौकरी वाली बहु मिल रही थी और क्या चाहिए |
एक दिन, प्रदीप ने सपना को मिलने बुलाया, सपना बिल्कुल भी मिलना नहीं चाहती थी पर शादी करनी है तो उस लिहाज से लड़के वालों की सभी माँगें जायज हो जाती है| अनमने मन से सपना नियत समय पर रेस्टोरेंट पहुँच गयी, नीली रंग की कुर्ती, कानों में बूंदे, खुले बाल सपना बहुत प्यारी लग रही थी, प्रदीप देखते ही कुर्सी से उठ खड़ा हुआ, वाह इतनी बुरी भी नहीं है मन ही मन प्रदीप ने कहा..
प्रदीप – हाय सपना, अच्छी लग रही हो कहते हुए उसके बैठने के लिए कुर्सी खींच दी| प्रदीप सपना से बातें करने लगा|
बातें करते करते प्रदीप गलत ढंग से सपना को छूने लगा… सपना क्रोध से तमतमा कर उठ खड़ी हो गयी और चिल्लाते हुए कहा पागगगगगलललल हो गये हो क्या???? “अरे एक दो महीनों में तो हमारी शादी होने वाली है क्या फर्क पड़ता है शर्म की सारी हदें पार करते हुए प्रदीप ने कहा” |
सपना गुस्से से निकल गयी वहाँ से| घर पहुँच कर कमरे में बंद होकर घंटो रोती रही |
अचानक किसी काम से धीरज आ गया, और सपना के बारे में विमला से पूछने लगा, “अरे पता नहीं बेटा क्या बात है जब से आई है अपने कमरे में बंद है मीना भी अभी अभी आई है,दोनों साथ ही हैं|”
धीरज जल्दी से कमरे के पास पहुंचा और दरवाजा खोलने को बोला, मीना ने दरवाजा खोला फिर मीना ने ही धीरज को सारी बातें बताई| धीरज गुस्से में आ गया पर अपने आपको संयत करते हुए बोला,”सपना परेशान मत हो कल हम पुलिस स्टेशन चलेंगे फिर प्रदीप के खिलाफ रपट लिखवा देंगे यौन हमला के खिलाफ|”
अगले दिन सपना प्रदीप और धीरज पुलिस स्टेशन गये और पुलिस को सारी बातें बताई….
पुलिस बेशर्म की तरह राक्षसी हँसी के साथ कहा मतलब तुम्हारे साथ यौन उत्पीड़न हुआ हम्मममम “हई लो मतलब स्कीन टू स्कीन टच होबे नहीं किया अभी ‘बम्बई हाईकोर्ट का फैसला’ नहीं सुना क्या, यौन उत्पीड़न तब तक नहीं माना जाएगा जबतक स्कीन टू स्कीन टच न हो” हाथे न रखा है खाली…. धीरज के आँखों में खून उतर आया मन कर रहा था कि बत्तीसी तोड़ कर उसके हाथ में दे दे पर…..
पुलिस ने कहा जाओ तुमलोग यहाँ से अभी सुप्रीम कोर्ट का स्टे लगा है और वैसे भी यहाँ ऐसे बहुत से केस आते हैं पर ये मेरी अनुभवी आँखें तुरंत पहचान लेती है कौन केस असली है और कौन नकली… दिमाग का दही मत करो|
सपना प्रदीप और मीना तीनों कसमसा कर रह गये और वापस लौटने लगे|पार्श्व संगीत की कहीं से ध्वनि सुनाई दे रही थी,
“ये अँधा कानून है ये अँधा कानून है
जाने कहाँ दगा दे दे जाने किसे सजा दे दे”….
फिर ये लोग सपना के घर पहुँचे तो देखा प्रदीप अपने माँ पापा के साथ आया हुआ है | प्रदीप को पूरा यकीन था सपना चुपचाप सब बर्दाश्त कर लेगी और शादी के बाद इसको मजाक चखाना है सब सोच रखा था| “आओ सपना ये लोग शादी की तारीख तय करने आए हैं सारी बातों से बेखबर विमला ने सपना से कहा” प्रदीप सपना को देखकर कुटीलता से मुस्कुरा रहा था|
सपना मुठ्ठी बाँधी हुई थी और चेहरे पर गुस्सा था फिर आवेग में बोलना शुरू किया “मुझे ये शादी नहीं करनी”| वहाँ मौजूद सभी लोग अवाक् रह गये| क्या हुआ बेटी विमला ने आश्चर्य से पूछा, फिर सपना ने एक एक कर सारी बातें बताई| विमला के पैरों तले जमीन खिसक गयी|
“प्रदीप की माँ ने कहा ऐसा नहीं हो सकता तुम्हीं मेरे बेटे को फँसाना चाहती हो… तुम कोई हूर की परी नहीं हो जो कोई भी तुम जैसी कलूटी को पसंद कर ले वो तो हमलोग अच्छे लोग हैं…… कहते कहते बात गले में अटक गयी और बात आधी ही रह गयी तब तक सपना बोल उठी,”हाँ हाँ कितने अच्छे लोग हैं वो तो दिखता ही है , मेरी नौकरी की वजह से हाँ कहा था न आपलोगों ने मुझे सब मालूम है आपके बेटे ने सारी पोल खोल दी है |कहते हुए सपना गुस्से से काँपने लगी| “
प्रदीप ने कहा,” ये सब सरासर झूठ है मैंने तो बस हाथ पकड़ा …मुझे फँसाया जा रहा है|”
सपना(प्रदीप से) – ” यदि आपके पास खुद को सच बताने की हिम्मत नहीं है तो निश्चित रूप से आप अपने बारे में दूसरे किसी को भी सच नहीं बता सकते”
सच्चाई पर पर्दा डालने की कोशिश न करें और आपलोग चले जाएँ यहाँ से| विमला  सपना का हौसला बन, उन्हें मना करते हुए जाने कह दिया| माँ के गले लग सपना फूट फूट कर रोने लगी और विमला बेटी का संबल उसे सीने से लगा लिया| सपना मन में दृढ़ निश्चय कर चुकी थी प्रदीप को सजा दिलाने का| और धीरज जो हर मुश्किल समय में सपना के साथ खड़ा रहता था जो आज भी सपना के साथ बगल में ही खड़ा था और मन ही मन सोच लिया था अब सपना किसी तरह की तकलीफ नहीं झेलेगी मैं इस दोस्ती को अपना नाम दूँगा|” मेरी सपना”… ..
“मेरी” सोचते हुए धीरज के दिल में जैसे एक मीठी चुभन हुई…… |||||

 

 

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