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महक….!

“अरे वाह! मनोरमा आज तो तुम्हारी रसोई में बहुत समय बाद ऐसी खुशबू आई।बेटे की पसंद का खाना बनाया जा रहा है।” नवीन जी ने धर्मपत्नी को छेड़ते हुए कहा।

मनोरमा जी मुस्कुरा दीं,”इतने समय बाद घर आ रहा है जी।एक समय था जब हर चीज उसके पसंद की बनाई जाती थी एक ये समय है जब हम दो रह गए हैं तो दो वक्त का खाना भी अकेलेपन की बलि चढ़ चुका है।बस जी रहे हैं इसलिए खा रहे हैं।”

“छोड़ो,कैसी बातें करती हो मनोरमा।अब आ रहा है ना अपनी सारी शिकायतें गिले-शिकवे उसे गले लगा,दूर कर लेना।सुनो चने छौंक रही हो हींग थोड़ी ज्यादा डाल देना एक दो लौंग भी और लाल मिर्च कम डालना,”नवीन जी निर्देश दिए जा रहे थे।

“आज आप रहने दो जी।रोज आप ही के हिसाब का खाना बनता है उबला हुआ।आज मैं सारे मसाले खुलकर डालूँगी। याद नहीं बेटा कितना गुस्सा हो जाता था कहता,”यार मम्मा   मैं बीमार थोड़ी हूंँ रोज कम मिर्च-मसालों का उबला खाना खिलाती हो,कैसा मरीजों वाला दिखता है और हींग वो तो कतई नहीं।”शीशी को रसोई से हटा कहता ,”दाल में फिर हींग!ओहो मम्मा कितनी बदबू आ रही है!”
“हींग-वींग सब ठीक है मनोरमा लेकिन तुम्हें मिर्च-मसलों से दिक्कत है भूल मत जाना।सब्जी मात्रा में थोड़ी ही लेना कहीं बेटे के आने की खुशी में….।”पलट कर बोले,”और हाँ तुम उसे कितना याद करती हो उसे ये जरूर बताना।”
“रहने दो जी,मैंने आपसे कब कहा मैं उसे याद करती हूँ।”
मन में सोचने लगी जो दिलो-दिमाग में छाया होउसे याद नहीं किया जाता और चुपके से उसने अपने आँसू पौंछ लिए।
नवीन जी हँस बोले,”ये आज के बच्चे हैं मनोरमा!तुम तो हकीकत खुद से ही छुपाती आई हो।एक बात हमेशा याद रखना यदि आपके पास खुद को सच बताने की हिम्मत नहीं,तो निश्चित रूप से आप अपने बारे में दूसरे किसी को भी सच नहीं बता सकते।आजकल मन की भावनाएँ कोई नहीं पढ़ना जानताकभी-कभी जताना भी बहुत अहम होता है।”
“हांँ-हांँ कैसी बातें करते हो,बच्ची नहीं हूंँ अब मैं….”और मनोरमा जी सालों बाद आने वाले अपने बेटे के लिए खाना बनाने में जुट गई।थोड़ी-थोड़ी देर में समय देखती रहतीं और पतिदेव उत्सुकता देख उन्हें चिढ़ाते रहे।असल में तो इंतजार वो भी उतना ही कर रहे थे पर अपनी भावनाओं को मनोरमा जी की आड़ में छुपाना चाहते थे।

चाय बना साथ बैठी तो पुरानी यादें ताजा करने लगी,’मेरी रसोई में हींग देख कैसा चिढ़ जाता था।नानी के घर जाता तो हींग डली सब्जी स्वाद से खा कहता,”हींग में बदबू आती है लेकिन नानी की साड़ी में हींग की महक आती है।

यहाँ आता तो स्टेटमेंट चेंज कर कहता,”पता नहीं क्यों मम्मा,आपकी रसोई में और साड़ी दोनों में हींग की बदबू आती है।”नानी उसकी इस बेइंतहा मोहब्बत पर किए गए व्यंग पर हंँस पड़ती।मनोरमा जी जानती थी उसका इशारा कि उसे हींग बिल्कुल पसंद नहीं पर वह नानी का दिल नहीं दुखाना चाहता इसलिए ऐसा बोलता है।’
अब मनोरमा जी का समय काटे नहीं कट रहा था।उम्र भी अधिक हो चली थी और आदत भी छूट गई थी इसलिए अब लंबे समय तक रसोई में काम करना भी कठिन हो गया था।सोचा दवाई खा,थोड़ा आराम कर लेती हूंँ।आने के बाद तो इतनी गप्पें मारेगा की खुद के लिए समय ही नहीं मिलेगा।सोचते-सोचते दोनों को नींद आ गई।
टिंग-टोंग,टिंग-टोंग
“दादा-दादी…”,बच्चे ने जोर-जोर से आवाज लगाई।

उठ सबसे पहले आईने में अपनी शक्ल देख बाल ठीक किए। मन में आया यह सब क्या है अपने ही बच्चे से फॉर्मेलिटी।खुशी के आंँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।सोच रही थी  जब वह मुझे देख गले लगाएगा तो सारी थकान मिनटों में दूर हो जाएगी।फटाफट उठ बाहर जा दरवाजा खोला तो बच्चों ने पांँव छुए और सामान अंदर ला,सोफे पर बैठ गए।मनोरमा जी का गले लगने का पहला अरमान वहीं चकनाचूर हो गया।

वार्तालाप का दौर चालू हुआ तो लग रहा था जैसे किसी मेहमान से बातें कर रहे हों।बीच-बीच में पोता शरारत करता तो अनुज अंग्रेजी में बोल उसे डाँटता जाता।मन में सोचने लगी कितना बदल गया है,सिर पर एक बाल नहीं।शर्म नहीं आई इसे पिता के होते हुए सब बाल हटवा दिए।नहीं ये मेरा बेटा तो नहीं….।
थोड़ी देर में मनोरमा जी चाय बना लाई।बच्चे के लिए सॉफ्ट ड्रिंक,हेल्थ-ड्रिंक सब साथ आई थी।दादा-दादी के मनुहार की उसे कोई जरूरत न थी।औपचारिक बातों के बाद नवीन जी ने बच्चों को कमरे तक छोड़ा और जल्दी खाना खा,आराम करने की सलाह दी।बहू फटाफट हाथ-पाँव धो सूट पहन बाहर आ गई।उसका कहना था सब साथ बैठ कर खा लेते हैं पर मांँ का दिल….बेटे की पसंद से वाकिफ थी सोच रही थी अब कहेगा वाह मांँ क्या खाना बनाया है।आज भी गरमा-गरम रोटियां आपने तो बचपन याद दिला दिया।
मांँ ने सबको बैठा सबकी थाली में गरम-गरम रोटियां परोसी और फूली रोटी बेटे की थाली में रखी,बिल्कुल वैसी-जैसी वो बचपन में पसंद किया करता था।बहू ने तुरंत थाली में से फूली हुई रोटी हटा दूसरी प्लेट में रख दी और पहले की बनी रोटी अनुज के प्लेट में….बोली,”मम्मा, अनुज अब इतनी गरम रोटी खाना पसंद नहीं करते।कहते हैं पहले बना के रख लिया करो।”

यह उनके मातृत्व को एक और झटका था।मांँ ने बात को अपनी ही दिशा में गति देते हुए कहा,”सब्जी कैसी लगी बेटा….।”बहू कम मिर्च खाती है।सब्जी खा नाक से पानी निकलता रहा, सुण-सुण लगातार करती रही।समझ आ रहा था की उसे कैसी लगी होगी।

बड़ी उम्मीद से उन्होंने अनुज की तरफ देखा।वह बोला,”मांँ आज भी उतने ही मसाले खाती हो।उम्र के हिसाब से मिर्च-मसाले कम कर देने चाहिए।नहीं….नहीं! चने और नहीं लुँगा रात में पचाने में दिक्कत होती है।आपने शायद सब्जी में हींग भी नहीं डाली है,हींग से खाने का स्वाद तो बढ़ता ही है साथ ही सेहत पर भी सीधा असर करती है।हींग डले खाने का अपना अलग ही स्वाद है।अनुज की बातें सुन मनोरमा जी निरुत्तर थीं।अब आगे बचा भी क्या था।
पतिदेव से रहा न गया बोले,”सारे दिन से लगी है तुम्हारे पसंद का खाना बनाने में।उसे पता नहीं था कि तुम्हारी पसंद बदल चुकी है।”
अनुज ने बड़ी ही औपचारिकता में कहा,”सॉरी मांँ,अगर आपको बुरा लगा हो तो।”
रसोई समेट फटाफट फ्री होने का सोचा।सोच रही थी,अब बेटा देर रात तक जगा खूब बातें करेगा।जाकर देखा तो अनुज सोने जा चुका था।अब हर दिन अनुज की एक नई पसंद सामने आती।
पंद्रह दिन रहने आया है।आज स्वाति के पीहर जाना है।देखते ही देखते 10-12 दिन तो रिश्तेदारी निभाते-निभाते ही निकल गए।लग रहा था जैसे कोई मेहमान आया और अब जाने वाला है।आज दोनों पति-पत्नी किसी कॉकटेल-पार्टी में गए हैं।पोता घर ही था।
आज खुलकर उसने अपना प्यार दादा-दादी पर लुटाया।दादी ने उसको,उसके पापा के बचपन के खूब किस्से सुनाए और पोते ने भी पापा के बताए सारे किस्से,”दादी आप सुपर-वुमैन थी ना पापा को सारी परेशानियों से बचा लेती थीं। पापा कहते हैं,’मांँ ऐसी ही होती है जब भी कोई परेशानी आती है तो उसे मिनटों में सलटा देती है।”मन को थोड़ा सुकून मिला लगा कि बचपन का अनुज साथ बैठा है।
दो दिन कहांँ बीते गए कुछ पता ही नहीं चला।अनुज आया भी और चला भी गया।लग ही नहीं रहा था कि कोई अपना आया  था।माँ के हाथ का डला आचार जो कि अनुज का पसंदीदा हुआ करता था वह भी पड़ोसियों की भेंट चढ़ गया।
साल-दो साल बाद नवीन जी बहुत बीमार पड़े,उम्र व बीमारी दोनों ही उन पर हावी हो गई।स्थिती ज्यादा बिगड़ने पर बेटे को बुलवाया गया।वो भी अनुज को देखना चाहते थे।बेटा उनकी बीमारी सुनकर भी किन्ही कारणों से पहुंँच न पाया।उनकी सांसे ऐसी अटकी हुई थी जैसे बस बेटे का इंतजार कर रही हो पर अनुज नहीं आया।नवीन जी की हालत ज्यादा खराब थी अब उनके पास ज्यादा समय नहीं बचा था।उन्हें तड़पता देख मनोरमा जी अंदर ही अंदर टूट जाती कुछ नहीं कर सकने की पीड़ा उन्हें अंदर तक हिला देती।लंबे इंतजार के बाद वे इस दुनिया को छोड़ चले गए।उनके जाने के बाद मनोरमा जी बिल्कुल शांत हो गई।अनुज क्रिया-कर्म से पहले वहाँ पहुंँचा और बारह दिन वहीं रहा।
आज मांँ से विदा ले वापिस जा रहा है पर मांँ ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई।वो समझ रहा था कितनी नफरत कर रही होगी माँ उससे।अनुज ने अपने घर जा वापिस मांँ के पास आने का फैसला लिया।यहाँ अकेलेपन और गम ने मनोरमा जी को इस कदर तोड़ दिया था की वह बिल्कुल मौन हो गई थीं।

अनुज की आने की खुशी,साथ बैठ खाने का उत्साह,खूब तड़के वाली हींग डली दाल,सब भावनाएं खत्म हो चुकी थीं।अब वो ना बोलती थीं और ना ही कुछ कहतीं।बिल्कुल बुत बनी रहतीं।लोग कहते उन्हें गहरा धक्का लगा है।

बहू ने वापस आ घर अच्छे से संभाल लिया था।हांँ,बहुत सी चीजें जरूर अपने हिसाब से कर ली थीं पर मनोरमा जी को अब इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता।पोता हमेशा दादी के इर्द-गिर्द घूमता रहता और अनुज…..सारा काम सलटा सोने से पहले मांँ को नींद की गोली देता और उनके पास बैठ रोज डायरी का एक पन्ना लिखा करता और वह डायरी अपनी मांँ के पास रख चला जाता।जानता था,मांँ मन की आंँखों से अब
सब पढ़ना जानती है।
एक दिन स्वाति ने कहा,”उन्हें नींद की दवाई क्यों देते हो? उनकी हेल्थ पर असर होगा।”
जवाब में अनुज मुस्कुरा दिया,बोला,”मांँ का बुत बनना मेरे कर्मों की सजा है।जब उन्हें सबसे ज्यादा मेरी जरूरत थी मैं उनसे दूर था।”
स्वाति बीच में ही बोली,”पर आप मजबूर थे।”इतने में शैतानी करता बेटा वहांँ आ गया,समझाने पर जब ना माना तो स्वाति ने उसे एक थप्पड़ लगा दिया तो पिता से बोला,”पापा आपकी मम्मा भी ऐसी थी,क्या वो भी आपको कभी मारती थी।”
बच्चे की बात सुन नम आंँखों से अनुज कमरे से बाहर चला गया और अपने काम में लग गया।थोड़ी देर बाद जाकर देखा तो स्वाति और बेटा सो गए थे।दरवाजा बंद कर मांँ के कमरे की ओर चल दिया।जानता था, मांँ उसका इंतजार कर रही होगी,पलक भी नहीं झपकाएगी जब तक उसे ना देख लेगी। आज डायरी का एक पन्ना लिखा,’एक थी माँ’ कैसे माँ उसकी गलती पर उसे प्यार से समझाती थी,पिताजी थप्पड़ लगाते तो उसके लिए लड़ जाती थीं।सब लिख और मांँ को दवाई दे, डायरी मांँ के पास छोड़,वहांँ से चला गया।

अगले दिन मेड नहीं आई तो स्वाति मांँ का कमरा साफ कर रही थी।जब मांँ की दवाई का डब्बा संभालने लगी, देखा तो नींद की गोली कहीं नहीं थी।जिस डिब्बे में से अनुज माँ को दवाई देते है उसमें विटामिन,कैल्शियम की गोलियाँ भरी हैं। उसे बहुत आश्चर्य हुआ,क्या अनुज मांँ को रोज यही एक गोली देते हैं और ये गोली खा माँ ऐसे सो जाती है,जैसे नींद की गोली खाई है।वह कुछ समझ नहीं पाई।उसने अनुज को कहा

अनुज हँसा और बोला,”माँ सब जानती है।उसे मेरी एक झलक और अपनी जिंदगी में मेरा वजूद बस इन सब से मतलब है। उन्हें तसल्ली होती है कि मैं उनके साथ में हूँ।अपने हाथों से उनके लिए कुछ कर रहा हूंँ और इतना सब देख उस गोली को ले वो तसल्ली की नींद सो लेती है।”

देखते ही देखते समय बीतता गया और साल भर हो गया। अनुज हर वो काम करता जो माँ को खुशी देता था।सभी लोग कहते और डॉक्टर भी कि उन्हें कोई गंभीर सदमा लगा है।अचानक मिली खुशी या गम से ही दूर हो सकता है।आज उस घर में वही हींग के तड़के वाली दाल बनती है हर वह चीज उसी हिसाब से होती है जो मांँ चाहती थीं।
आज पापा की बरसी है।सभी धार्मिक-अनुष्ठान किए गए। आज मांँ की आंँखों से एक आंँसू भी गिरते हुए दिखा जिसे देख अनुज बोला,”मैं जानता हूंँ माँ तुम मुझसे बहुत नाराज हो।जितना तुम आज पापा को मिस कर रही हो उतना ही मैं कर रहा हूंँ।यह भी जानता हूंँ तुम्हें मुझसे बहुत उम्मीद थी। पापा की बीमारी पर बार-बार बुलाने पर भी जब मैं न आ पाया तो तुम अकेले रह गई थीं।तुमने मुझे मन ही मन कितना कोसा होगा ना माँ।”
बहुत मजबूर था मैं कभी तुम्हें बताना तो नहीं चाहता था पर आज बता कर अपना मन हल्का करना चाहता हूँ।मेरे इंडिया आने से पहले मुझे पता चला कि मुझे प्रोस्टेट कैंसर है।पापा की बीमारी का बता जब तुमने मुझे आने को कहा उन दिनों में लास्ट थेरेपी लेकर आया था और इस स्थिती में नहीं था कि तुम्हारा सामना कर पाता।जीवन के दो साल मैंने बहुत कष्ट में काटे।यहांँ आ तुमसे बेरुखा व्यवहार करने की वजह भी यही थी की कुछ हो गया तो तुम लोग टूट ना जाओ।अपने से नफरत करवाना चाहता था”
बेटे की तकलीफ का सुन,मांँ की आंँखों से आंँसू गिरते रहे। जिन्हें देख अनुज बोला,”माँ तुम लोगों से अपनी तकलीफ छुपा,मैंने जीवन की सबसे बड़ी गलती की है।मैं यह भूल गया था कि मांँ-बाप अपने बच्चों के कष्ट में रात भर जागकर उतनी तकलीफ महसूस नहीं करते जितनी की उनके बेरुखे व्यवहार से करते हैं।”
आज भी तुम्हें मेरी तकलीफ सुनकर इतना दर्द हो रहा है।मुझे माफ़ कर दो माँ।जानता हूँ मैं आज तुम यही सोच रही हो कि काश ये बात पापा को भी पता होती।मैं अपनी तरफ से अच्छे से अच्छा करने का प्रयास कर रहा था सोचा था ठीक हो जाऊंँगा तो तुम्हें सब बताऊंँगा अपने बेरुखे व्यवहार की वजह बताऊंँगा।मौजूदा हालात से लड़ने की ताकत नहीं थी मुझमें! कहते हैं ना माँआपके पास खुद को सच बताने की हिम्मत नहीं,तो निश्चित रूप से आप अपने बारे में दूसरे किसी को भी सच नहीं बता सकते बस यही स्थिती मेरी थी।पापा ने मेरे आने जा इंतजार नहीं किया!मुझे सच बताने का मौका ही नहीं दिया।”
अनुज की तकलीफ का सोच मांँ की आंँखों से आंँसू बहते रहे। आज सालों बाद वह माँ के गले लग खूब रोया।मांँ के भी चेहरे के भाव ऐसे थे जैसे सारे दुख पर मरहम लग गई हो, जैसे कहना चाह रही हो,”मैं कैसी माँ हूँ जो अपने बेटे की तकलीफ भी नहीं समझ पाई।”

अनुज मांँ से माफी मांँगता रहा,”मांँ मुझे माफ कर दो पता नहीं क्यों मैं इतना बड़ा हो गया कि तुम्हारी ममता और पिता का त्याग सब भूल गया।अपनी जिम्मेदारी निभाने में आपके प्रति अपना कर्तव्य भूल गया।भूल गया कि मैं चाहे कितना भी बड़ा हो जाऊंँ,कितना भी आप लोगों से दूर चला जाऊंँ,कितना भी बड़ा ओहदा पा लूँ, मांँ-बाप का कर्ज कभी नहीं चुका सकता।मैंने ये बात हमेशा याद रखी कि ममता के बदले उनके साथ बिताए अनमोल लम्हे ही तो है जो हम माँ-बाप को वापिस दे सकते हैं।”

आज अपने परिवार को साथ देख मनोरमा जी खुश थीं।अनुज ने पूरी तरह से अपने आपको मांँ की सेवा में समर्पित कर दिया।स्वाति ने भी उसका भरपूर साथ दिया।आज घर में वही हींग की महक वाली दाल बनती है जो पापा खूब पसंद किया करते थे और उनका पोता यानि छोटा अनुज भी करता है।
हर घर की एक महक होती है।आप लोगों ने भी अपने घर में हींग की सोंधी-सोंधी महक अपने खाने से ज्यादा घर में महसूस की होगी।हींग की अच्छी व बुरी महक की तरह हमारे मन में भी सकारात्मक व नकारात्मक विचार होते हैं। कभी-कभी अपने विचारों से हट हमें सामने वाले की मन:स्थिति को भी समझना चाहिए।व्यवहार बदलने का मतलब हर बार यही नहीं कि सामने वाला गलत ही हो,हो सकता है परिस्थितिवश या किन्हीं कारणों से इंसान का सामने वाले से व्यवहार बदल गया हो।जिस तरह से हींग की महक में से जब किसी को गंदी महक आए तो उसे डालना बंद  कर दिया जाता है उसी तरह नकारात्मक विचारों को भी रोकने का रास्ता सोचना चाहिए तो हींग की सकारात्मक महक बरकरार रहती है।

 

 

 

Pic Credit Movie Jane tu Ya Jane Na

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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