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वागदत्ता का सातवां फेरा

ये कहानी है तन्वी की… मेरी सखी जिसे प्यार से हम सब तनु कहते थे। किशोरावस्था से नए नए यौवन की दहलीज़ में हमने कदम रखा था। उस उम्र की दोस्ती का अंदाज़ ही कुछ अलग होता है। न बाल सुलभ शरारतें रह जाती है न ही स्त्रियोचित परिपक्वता विकसित हुई रहती है।

एक दिन मैंने मजाक में ही तनु से पूछा था,’ अच्छा तन्वी, एक बात बताओ, क्या कोई ऐसा है जो तुझे कुछ अलग ही पसंद हो?’
मुझे लगा था तनु अपने स्वभाव के अनुसार बात को हंसी में उड़ा देगी पर तनु का चेहरा एकदम गंभीर और लाल हो गया। अंतस्तल की गहराई से आवाज़ आई , ‘ हां वसुधा, पर इस बात को कभी मजाक में मत लेना । ‘ हमेशा हंसने बोलने वाली तनु की गंभीरता देख मैं भी अवाक सी हो गई।अगले दिन फिर बहुत पूछने पर तनु ने बताया, ‘ सुनो वसुधा, जबसे मैंने खुद को जाना , उससे पहले से उसे जानती हूं। जबसे लड़का और लड़की की विपरीत प्रकृति को समझा, उससे पहले से उसे जानती हूं। वह सबसे अलग है। अच्छा बुरा तो कुछ सोचा ही नहीं, बस जो है बस वही है।’

मै उसे देखे जा रही थी। मुझे आज वह कोई और ही तनु लग रही थी। उसने आगे कहना जारी रखा, ‘ उसका नाम देवांश है पर मैं उसे देव कहती हूं , जानती हो क्यों? क्योंकि देव का एक अर्थ होता है “आत्मा” और तनु का अर्थ है “शरीर” तो बस इतना समझ लो तनु शरीर है और देव उसकी आत्मा। आत्मा के बिना शरीर निरर्थक है।’ इतना कह वह किसी अज्ञात लोक में खो गई।

समय अपनी निर्बाध गति से बहता रहा। तनु के मन में प्यार की तरंगे हिलोरें ले रही थीं, परन्तु वह अपने मन की बात देवांश से कह न सकी थी। इस बीच मैं तनु के घर वालों की लाड़ली बन गई थी और तनु मेरे परिवार की दुलारी। तनु के घर पर अक्सर देवांश से भी मेरी मुलाकात हो जाती थी, बगल में ही उसका घर था। तनु के घर में उसका घर के बड़े बेटे जैसा सम्मान था। अंकल का उसपर विशेष स्नेह और विश्वास था।
एक दिन मैंने तनु से कहा, ‘अब समय आ गया है कि तुम अपने मन की बात देवांश से और अपने घर वालों से कह दो।
“यदि तुम्हारे पास खुद को सच बताने की हिम्मत नहीं है, तो निश्चित रूप से तुम अपने बारे में दूसरे किसी को भी सच नहीं बता सकती।” फिर जल्दी है एक दिन किस्मत ने ये मौका दे दिया उसे।
सब लोग कहीं गए थे और तनु घर में अकेली थी। हमेशा की तरह अकेले होते ही वह देवांश के खयालों में खोई हुई थी। सामने नोटबुक के पन्ने हवा में फड़फड़ा रहे थे। उसे जाने क्या सूझी वह नोटबुक के एक पन्ने पर अपनी छवि बनाने की कोशिश करने लगी। साथ ही उसके एक हाथ को अपने हाथ में लिए उसके बालों को सहलाते, उसकी आंखों में डूब जाने को आतुर देव की छवि बनाई। नीचे छोटा सा देव+तनु लिखा। तभी दरवाज़े पर दस्तक सुन नोटबुक मोड़कर रख दी और दरवाज़ा खोला। सामने देव खड़ा था।
उसे प्रत्यक्ष खड़ा देख कुछ घबराहट के भाव के साथ तनु ने उसे अंदर बुलाया। देव ने पूछा, ‘ क्या हुआ तनु, तुम घबराई हुई क्यों लग रही हो ‘ ‘कुछ नहीं ‘ कहकर अपनी घबराहट छुपाने के लिए चाय बनाने के बहाने किचेन में चली गई।
मुड़ी हुई नोटबुक के पन्ने अब भी हवा से फड़फड़ा रहे थे। देव ने उसे बंद करके रखने के लिए उठाया, तभी लड़की और लड़के की छवि,साथ ही देव+तनु पर निगाह पड़ गई। तनु की घबराहट का कारण भी अब समझ गया। सब समझते ही उसका रोम रोम खिल उठा और दिल का हर तार झंकृत हो उठा। यही सब वह भी तो कहना चाहता था पर कह न सका था। उसने नोटबुक बंद करके रख दी।
तब तक तनु चाय लेकर अा गई। उसके हाथ से चाय की ट्रे लेकर एक ओर रखकर देवांश तनु के एकदम पास जाकर नोटबुक में बनी छवि के अनुसार ही एक हाथ से उसका हाथ पकड़ दूसरे हाथ से उसके बालों को सहलाता हुआ, उसके सांसों की गर्माहट को महसूस करते हुए उसके दिल की धड़कन को सुनने लगा। उसकी आंखों में डूबते हुए बोला,’ तनु, तुम भी हमेशा से मेरी आत्मा में रची बसी हो। बस कह नहीं पाया। सॉरी तनु, मैंने तुम्हारी नोटबुक देख ली अभी, परन्तु अच्छा ही हुआ। वरना न तुम कह पाती न मै, बस सोचते ही रहते।’
तनु अपलक देखे जा रही थी देव को। भावातिरेक में उसकी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। अब उसे अपने सारे सपने पूरे होते दिखाई देने लगे जो वो बचपन से देखती आ रही थी ।अचानक उसने ठंडी होती चाय को देखा और मुस्कुराकर चाय गरम करने चली गई।
युवा मन की उड़ान को पंख लग गए थे। दोनों स्वछंद परिंदों के समान उड़ान भरने लगे। एक सुंदर भविष्य के सपने देखते, कभी गंगा जी की लहरियों के साथ अपने मन की लहरियां मिलाते।
अब फाइनल परीक्षाएं शुरू होने वाली थीं इसलिए हम सबने तय किया कि अब एकाग्रचित्त होकर परीक्षा की तैयारी करेंगे।
ग्रेजुएशन की फाइनल परीक्षा हो चुकी थी। मै अपने घर में बैठी थी। तभी तनु के भाई पार्थ ने आकर मुझे तनु का एक पत्र दिया, ‘ वसुधा, मैं बहुत परेशान हूं। हो सके तो तुम पार्थ के साथ ही घर आ जाओ। मैं मां को बताकर तुरंत चल पड़ी पार्थ के साथ। तनु के कमरे में पहुंची तो आंखों में आंसू भरे व्याकुल तनु मुझसे लिपट गई।
उसने बताया कि घर में उसके ब्याह की बात हो रही है। ‘ में क्या करूं वसुधा? तुम तो जानती हो मै देव के सिवा किसी को अपने जीवन में स्वीकार नहीं कर पाऊंगी।’
मैंने उसे सांत्वना देकर कहा, ‘ परेशान मत हो तनु, देवांश से मिलकर हम लोग कुछ करते हैं।’
फिर उसका मन बदलने के लिए मैं आंटी से इजाजत लेकर उसे दशाश्वमेध घाट पर कुछ देर घुमाने ले आई। यहां हम दोनों अक्सर आकर घंटों बैठा करते थे और अब तो कभी कभी देवांश भी हमारे साथ होता था। एक अद्भुत शांति मिलती थी गंगा जी के तट पर आकर।
गंगा की लहरों को देखते हुए तनु कह रही थी,’ गंगा जी की लहरें गवाह हैं, मैं अपने जीवन की कल्पना भी उसके बिना नहीं कर सकती। देव मुझे मिल जाएगा न।’ मै उसे आश्वस्त करते हुए कह उठी, ‘ जेहिकर जेहिपर सत्य सनेहू,सो तेहि मिले ना कछु संदेहू।’ यह सुन उसके सूखते होंठों पर एक मंद स्मित खेल उठी।
तभी विश्वनाथ बाबा का प्रताप कहें या गंगा जी की कृपा, देवांश सामने ही दिखा, जो मुस्कुराते हुए हमारी और ही अा रहा था। आकर वह तनु की बगल में बैठ गया और उसके मुख पर विषाद मिश्रित मुस्कान देख मुझसे पूछा, ‘ क्या बात है वसुधा? क्यों रुला रही हो मेरी तनु को?’
‘ मै तो इसके व्याकुल मन को राहत दिलाने यहां लाई हूं।अब तुम्ही इसे सम्हालो।’ इसके बाद मैंने देवांश को तनु के घर में होने वाली ब्याह की बातें बता दी। सुनकर देवांश भी कुछ गंभीर हो गया फिर मुस्कुराकर तनु का हाथ अपने हाथ में लेकर बोला,’ चिंता ना करो तनु। हम दोनों को आज ही अपने अपने घर में बात करनी होगी फिर सब ठीक हो जाएगा।’ फिर मुझसे बोला,’ वसुधा, तुम कल फिर तनु को लेकर आना। मै यहीं मिलूंगा सारी बातें करके।’
अगले दिन जब मैं तनु के घर पहुंची तो वो निशक्त सी पड़ी थी। आंखों से अविरल बहती जल धारा बिस्तर को भिगा रही थी। चलने को तैयार नहीं थी फिर भी जबरदस्ती करके मै उसे वहीं ले आयी जहां देवांश पहले से हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। वहां उसका मुखमंडल भी अपने दीप्तमान तेज को विलीन कर मलिन सा हो रहा था। दोनों बस निस्तेज आंखों से एक दूसरे को देख रहे थे। मैंने दोनों को बोलने के लिए कुरेदा तो पता चला, ‘अंकल यानी तनु के पिता जी बहुत नाराज़ हैं कि जिसपर अपने घर के बेटे जैसा भरोसा किया, उसने उनका विश्वास तोड़ दिया।’ ऐसी ही कुछ प्रतिक्रिया देवांश के मां बाप की थी,’ हमारी जाति बिरादरी में लड़कियों की कमी है क्या? हम तुम्हे ऐसा करने की इजाज़त हरगिज़ नहीं दे सकते।’
कुछ घर के संस्कार और कुछ मां बाप की बात का विरोध न कर पाने की विवशता ने दोनों की जिह्वा को जकड़ दिया था। परन्तु घर में तनु ने किसी से भी विवाह ना करने की बात दृढ़ता से कह दी थी।
एक सप्ताह बाद तनु के पिता जी ने देवांश को बुलवाकर, घर परिवार की इज्जत का हवाला देकर उसे ही तनु को ब्याह के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी सौंप दी। इस विकट धर्मसंकट की स्थिति से उबरने का कोई रास्ता न देख देवांश ने अंकल के सम्मान हेतु अपनी तन मन में रची बसी तनु को किसी अन्य को सौंपने का निश्चय कर लिया। अपने प्रेम विह्वल मन को संयत करने का भरसक प्रयत्न करते हुए तनु के कमरे में आकर देवांश ने देखा कि तनु चुपचाप दीवार की ओर देखे जा रही थी और आंसू खुद ब खुद बहते जा रहे थे।
उसके पास जाकर उसके आंसुओं को पोंछते हुए धीरे से कहा,’ तनु, आज मै एक याचक बनकर तुमसे कुछ मांगने आया हूं, दे सकोगी?’ तनु ने देव के हाथ पर हाथ रख दिया,’ ऐसी क्या चीज़ हो सकती है दुनिया में जो तुम्हारी तनु के पास अगर होगी तो वह तुम्हे न दे सकेगी?’ कहकर तो देखो।
देवांश ने अपने मन पर पत्थर रखकर वज्राघात सम शब्द छोड़े,’ तुम अंकल के बताए लड़के से ब्याह कर लो।’ जैसे हजारों झंझावात एकसाथ अा गए हों।

तनु ने कांपकर देवांश को देखा,’ ये क्या मांग लिया देव? मै तो तुम्हारी वाग़दत्ता हूं। मन क्रम वचन से मेरी आत्मा ने अपने आपको तुम्हे सौंप दिया है। अब ये तुम्हारी धरोहर किसी अन्य को देने का मुझे क्या अधिकार है?’

देवांश अपलक तनु को देखता रहा फिर अश्रोतिरेक से धूमिल होती अपनी आंखों को पोंछ बस इतना ही बोला, ‘ मेरी तनु, मैंने भी बचपन से सिर्फ तुम्हे ही चाहा है। तुम हमेशा एक मीठी याद बनकर मेरे अंतर्तम की गहराइयों में स्थापित रहोगी। फिर भी मुझे तुम्हे किसी को सौंपना ही होगा। बोलो तनु, क्या तुम याचक को निराश करोगी?’
मैं मन और आत्मा से हमेशा से तुम्हारी वागदत्ता हूं और रहूंगी, इस निरर्थक शरीर को तुम जिसे चाहो सौंप दो।’
देव जानता था कि बचपन से ही तन्वी के लिए उसके मुंह से निकले हर शब्द का मान रखना सांस लेने से भी ज्यादा जरूरी था, इसी विश्वास के सहारे उसने तनु के पिता से कहा, ‘विवाह की तैयारियां कर लीजिए अंकल। तनु अब इनकार नहीं करेगी।’
कालांतर में हम तीनो का ही दुनियावी रीति से विवाह हो गया। तनु ने देवांश को दिए वचन के अनुसार अपने हर कर्तव्य का पालन पूरी निष्ठा से किया। उसका पति भी बहुत सौम्य, गंभीर व्यक्तित्व का स्वामी और उसकी हर बात का हर पल खयाल रखने वाला था। देवांश की यादों की मूर्ति बनाकर उसने उसे कहीं अंतस्तल की गहराइयों में दबा दिया था, जिसे कभी अपनी कर्तव्य निष्ठा में बाधक नहीं बनने दिया। परन्तु विधना के लेख बड़े विचित्र होते हैं। काल के
निर्मम थपेड़े ने विवाह के तीन वर्ष बाद ही उसके पति को अपना ग्रास बना लिया।
पार्थ ने मुझे सूचना दी इस दुर्घटना की, साथ ही यह भी बताया कि दीदी की हालात ठीक नहीं। हमने बहुत चाहा कि वह हमारे साथ बनारस अा जाएं पर वो तैयार नहीं हुईं। देवांश भैया की बात मानती हैं पर वे भी आजकल जयपुर में हैं अपनी नौकरी के सिलसिले में। मै दिल्ली से आगरा उसके घर पहुंची । वह निष्प्राण सी पड़ी थी। उसकी हालत देख मै उसके इनकार करने के बावजूद जबरदस्ती उसे अपने साथ दिल्ली ले आई। उसकी स्थिति बदतर ही होती जा रही थी। न हंसना न रोना , जैसे कोई घुन उसके शरीर को खाए जा रहा था।
उसकी हालत देख मैंने उसके मना करने के बावजूद देवांश को जयपुर से लाने अपने पति को भेज दिया। पार्थ से पहले ही मैंने उसका पता मांग लिया था। देवांश को रास्ते में ही मेरे पति ने सब बाते बता दी थीं। घर आकर देवांश अपने मन में असीम वेदना लिए तनु के पास गया। उसे देखते ही तनु के मन का सारा आवेग अश्रुधार बन ऐसे बहने लगा। जैसे सारे सागर मिलकर मन की लगी को बुझाने बह निकले हों, ‘ देखो देव, तुमने जैसा कहा था मैंने वैसा ही किया, पूरी ईमानदारी से अपना हर फ़र्ज़ निभाने की कोशिश की। परन्तु मन से तुम्हे न निकाल पाने का पाप मैंने अनजाने ही किया है। शायद उसी की सजा मुझे मिली है।”
जिस तनु को दुख न हो , इसलिए वह बचपन से ही जानबूझ कर हर खेल में हार जाता था ,उसे इस अवस्था में देखकर वह आक्रांत पीड़ा से भर उठा। उसके आंसू पोंछ , कंधे पर हाथ रख बस इतना ही बोल पाया,’ धीरज रखो तनु, काश इस अनहोनी कों घटित होने से मै रोक पाता, पर अब तुम्हे अपने आपको सम्हालना ही होगा।’ फिर मुझसे बोला, ‘मैं आता रहूंगा बीच बीच में। तुम प्लीज इसका ध्यान रखना ।’
इसके बाद देवांश चला गया। न चाहते हुए भी जाना ही था उसे। हम सब अपने अपने फ़र्ज़ और कर्तव्यों के बंधन में जकड़े नियति के अनुसार कर्म करने को विवश हैं। तनु की हालत दिनोदिन और बिगड़ रही थी। जीने के कोई लक्षण उसमें नहीं दिख रहे थे। डॉक्टर को दिखाया तो हर जांच करने के बाद उन्होंने कहा,’ इनकी हर रिपोर्ट नॉर्मल है। बस जीने की इच्छा जगाना होगा , और कोई इलाज नहीं है।’ मै रो पड़ी थी। अब मै किस दिलासे पर उसमे जीने की इच्छा जागृत करूं?
इस बीच देवांश भी आता रहा। वह भी बहुत समझाता और फिर दिल में दुखों का बोझ और आंखों में आंसू लिए चला जाता।अब तनु एक कंकाल मात्र रह गई थी। मै मूढ़ सी बेबस होकर उसे धीरे धीरे काल की ओर जाते देखने के सिवा कुछ नहीं कर पा रही थी।
एक दिन सुबह जब मै उसके पास गई तो प्यार से उसका माथा सहलाकर पूछा,’ क्या सोचती रहती हो तनु? मै कुछ नहीं कर पा रही हूं तुम्हारे लिए।’
तनु की आंखों की कोर से आंसू बहने लगे। मेरा हाथ पकड़ कर बोली,’ तुम ज़रूर पिछले जन्म में मेरी सगी बहन रही होगी। तुम्हारा कर्ज मै कैसे उतार पाऊंगी वसुधा?’
मैंने उसे गले लगा लिया,’ बस तुम ठीक हो जाओ।’
“ये बात मेरे वश में होती तो मै ज़रूर करती।अच्छा सुनो – तुमने बहुत कुछ किया है मेरे लिए, बस एक काम और कर देना। मै तुम्हे कुछ बताने जा रही हूं, शायद इसके बाद ज़िन्दगी मौका न दे मुझे।” मैंने उसके मुंह पर हाथ रख दिया,’ ऐसी अशुभ बातें मत करो तनु, मुझसे सहन नहीं होता ‘
‘अच्छा नहीं करूंगी। अब सुन लो। तुम तो जानती हो मै देव की वागदत्ता हूं। ब्याह तो हुआ नहीं । पर जैसे मन ही मन उसकी वागदत्ता बनी थी वैसे ही ब्याहता भी बनने का प्रयास किया था और सफल भी होने वाली हूं। छै फेरे तो हो चुके है पर अब लगता है सांसें साथ नहीं देंगी सातवें फेरे के लिए।” इतना कहते कहते तनु की सांस फूलने लगी। कुछ पल रुककर उसने फिर कहना प्रारंभ किया,’ तुम सोच रही होगी तनु जाते जाते पगला गई है, पर यह सच है। तो सातवां फेरा तुम्हे मेरे जाने के बाद करवाना है। ये एक उपकार और करवा देना मेरी बहन।’
‘ क्या कह रही हो तनु, अच्छा बताओ मुझे क्या करना है? पहले बताओ, छः फेरे तुम्हारे मन ने कब और कैसे लिए?’
‘ तो सुनो, पहला फेरा तो तभी हो गया था जब 5 वर्ष की अवस्था में पहली बार उसे देखा था। उस अबोध उम्र में भी वह मन को भा गया था।
दूसरा फेरा तब हुआ जब बचपन के खेल में वह मेरा पार्टनर बनता था। खेल में ही उसे साथी पा मै खुश हो जाती थी।
तीसरा फेरा हुआ था जब मेरे साथ खेलते हुए मुझे खुश देखने के लिए जीती हुई बाजी हार जाता था।
फ्रॉक छोड़कर पहली बार सूट पहने देख उसने स्नेह से कहा था,’ सूट में भी कितनी सुंदर लगती हो तनु, बस तभी ले लिया था चौथा फेरा।
पांचवा फेरा तब लिया जब कॉलेज की फेयरवेल पार्टी में साड़ी पहनकर हल्का मेकअप किए जाते समय रास्ते में वह मिल गया था और उसकी वह नेह भरी मोहक दृष्टि दिल में उतर गई थी।
जिस दिन हम दोनों ने दिल खोलकर अपने असीम प्रेम को एक दूसरे के सामने प्रकट किया था, बस तभी हो गया था छठा फेरा।
उसके बाद नियति कुछ और खेल कर बैठी जिसने जीवन धारा ही बदल दी। एक ही फेरा रह गया है वसुधा। उसकी जिम्मेदारी मैं तुम पर छोड़ रही हूं। सुना है मृत्यु के बाद कुछ देर आत्मा आस पास ही रहती है। मेरे जाने के बाद देव को तुरंत बुलवा कर उससे मुझे मुखाग्नि दिलवा देना। बस हो जाएगा मेरा सातवां फेरा। इस जन्म में ब्याह की रस्में पूरी करने में कुछ ज्यादा ही लंबा समय लग गया पर ब्याह तो संपन्न माना जाएगा न सात फेरों के बाद। साथ रहने की साध मैं अगले जनम में पूरी कर लूंगी। अपने देव के लिए इतना इंतज़ार तो कर ही सकती हूं न। बोलो वसुधा वो मुझे मिल जाएगा न अगले जन्म में।’
इतना बोलने के कारण वह हांफने लगी थी। माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा अाई थीं । उसका सिर अपनी गोद में रखकर मै उसके बाल सहलाने लगी। उसे पानी पिला कर उसे कुछ संयत किया फिर कहा,’ हां हां तनु, ज़रूर मिलेगा, भगवान हर बार इतना क्रूर अन्याय नहीं कर सकेंगे तुम्हारे साथ।’
यह सुन एक मंद स्मित आ गई उसके होठों पर, ‘मुझसे वादा करो वसुधा।’
वह मेरी ओर बहुत आस से देखे जा रही थी। मैंने उसके दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर रोते हुए कहा,’ हां तनु , मै सब करूंगी पर मै ये सब सह नहीं पा रही हूं।’
इसके तीसरे दिन ही तनु इस निष्ठुर संसार से विदा लेकर चिरनिद्रा में सो गई। उसकी इच्छानुसार देव को बुलवाकर सब बातें बताई और उससे मुखाग्नि दिलवाकर उसकी अंतिम इच्छा पूरी की। जाने से पहले देव मेरे पास आया। तनु के जाने से पसरा सन्नाटा हम दोनों को असह्य हो रहा था। देवांश मेरा हाथ पकड़ कर रो पड़ा, तनु क्या सचमुच हमे छोड़कर चली गई है वसुधा?’
‘ हां देवांश , उसने एक काल्पनिक दुनिया बना ली थी और वहीं उसका यथार्थ बन गई थी ‘
‘ नहीं वसुधा अगर भगवान है और हम दोनों ने सच्चे मन से एक दूसरे को चाहा है तो तनु की तपस्या व्यर्थ नहीं जाएगी। इन सात फेरों के बंधन का फल हमे अगले जन्म में ज़रूर मिलेगा।’
‘ आमीन’
हम दोनों को एकसाथ यह एहसास हुआ कि तनु पास ही खड़ी मुस्कुरा रही है।

 

 

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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