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कीमत

 डा. चित्रा लगभग बीस बाइस सालों के बाद भारत लौटी थीं। जब वे यहां साए गई थी तब आँखों में हजारों सतरंगी सपने थे। अमेरिका मे वाशिंगटन के कैंसर इंस्टीट्यूट में वे चयनित हुई थीं। जाते समय ऐसा लगता जैसे सारा जहान उनके कदमों तले हो। साल दर साल वे सफलता के तमाम पायदान चढ़ती गईं, मगर कह्ते हैं
मेरो मन अनंत कहां सुख पावे
जैसे उड़ी जहाज को पंछी, पुनि जहाज पर आवे।
इतने साल विदेशी धरती को अपनी कर्मभूमि बना मानव मात्र की सेवा करती रहीं लेकिन ज़िन्दगी के चंद धागे जिन्हे वे तोड़ कर गई थी उनके सिरों में समय के साथ ऐठन आ गई थी और अब उनकी ऐठन  चुभने लगी थी।
आज सुबह ही दिल्ली के नामी अस्पताल में  कार्यभार संभाला था, उनकी असिस्टेंट उनके इंटर्नस की फाईल रख कर गई थी । वो उस नन्ही तस्वीरों वाली फाइल को पलटने लगी। तभी एक नाम  पर नज़र अटक गई। 
खुशबू माथुर \ श्रीकांत माथुर 
 हरिद्वार
 एक भोली सी सूरत की लडकी,चित्रा  की निगाह जैसे थम गई। वो प्यारा सा चेहरा उसके अतीत के गलियारे मे खींच ले गया।
करीब पच्चीस साल पहले मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद हरिद्वार के छोटे से सरकारी अस्पताल मे काम करती थी। अपनी मां के साथ जिस मकान में  वे दोनों रहते थे वही पर पड़ोस में श्रीकांत अपनी बहन के परिवार के साथ रहते थे। श्रीकांत एक साधारण सी शक्ल सूरत लेकिन बेहद सुलझे सौम्य व्यक्तित्व के मालिक थे। कस्टम विभाग में अफसर के पद पर नौकरी करते थे।
 चित्रा आगे चल कर कैंसर विशेषज्ञ बनना चाहती थी दिन रात अपने इम्तिहान की तैयारी मे लगी रहती।  मां और श्रीकांत के परिवार मे घनिष्ठता बढ़ रही थी, चित्रा खुश थी कि मां का अकेलापन खत्म हो गया था। श्रीकांत कभी कभार घर भी आते लेकिन चित्रा से केवल औपचारिक बात होती थी।
 चित्रा श्रीकांत के शरीफ सौम्य व्यवहार से प्रभावित थी।
मां धीरे धीरे श्रीकांत से बहुत घुलमिल गई थी, वे चित्रा की शादी कर अपनी जिम्मेदारी पूरी करना चाह्ती थी। चित्रा के ख्वाब अलग थे,लेकिन मां के बार बार कहने पर वो श्रीकांत से इस सिलसिले मे मिलने के लिये तैयार हुई। 
ये उम्र का तकाज़ा था या शायद मां की बातो का असर चित्रा श्रीकांत के सादगी भरे विचारो से यूँ कहिये उसकी भोली सी मुस्कान के आकर्षण मे बंध गई थी। उसके मन मे भी प्रेम का बीज अंकुरित हो गया था।
 हमारे यहाँ हर लड़की के मन मे ये बात बैठा दी जाती है कि स्त्री एक नाज़ुक सी बेल के समान होती है जिसे  पुरुष नामक वृक्ष कि छत्र छाया चाहिये।
मां के बार बार जोर देने पर चित्रा श्रीकांत से विवाह करने को राज़ी हो गई , श्रीकांत उसके सपनो के बारे
में जानता था उसने वादा किया था चित्रा का साथ देगा। अपने मन को मार चित्रा ने एक सादे  से समारोह मे श्रीकांत से विवाह कर लिया। 
श्रीकांत के माता पिता बचपन मे गुजर गये थे तो मां के सानिध्य में जैसे उसका बचपन लौट आया था मां को भी शायद एक पुत्र की लालसा रही होगी तो मां अपनी सारी ममता श्रीकांत पर लुटा कर तृप्त हो रही थी।
गृहस्थी की गाड़ी चल रही थी ,चूंकि श्रीकांत मां और चित्रा साथ थे तो मां पहले की तरह घर के कामकाज देखती थीं
 चित्रा के पास समय भी नही होता और अगर होता भी तो वो तटस्थ भाव से घर में रहती और जीजान से अपने सपने को पूरा करने में लगी रहती थी।मां कभी कभी उसे दुनियादारी समझाने की  कोशिश करती लेकिन श्रीकांत हँस कर बात टाल जाते कभी कोई शिकायत नहीं करते, तो कुल मिला कर सब अच्छा चल रहा था। 
इसी बीच चित्रा गर्भवती हो गई, उसे तो अपने सारे सपने तहस नहस होते दिखाई दिये, मन ही मन उसने तय कर लिया था वो गर्भपात करवा देगी लेकिन ये बात जैसे ही उसने मां और श्रीकांत को बताई घर मे एक तूफान सा आ गया, चित्रा ने सपने में भी नही सोचा था कि श्रीकांत जितना शांत और सुलझा हुआ व्यक्ति इस बात पर इतना नाराज़ हो जायेगा। मां की नज़रों में चित्रा दुनिया का सबसे बड़ा पाप करने जा रही है।
चित्रा की सारी कोशिशों के बावजूद गर्भपात के लिये कोई राज़ी ना हुआ। मन मे तमाम उहापोह लिये चित्रा के गर्भकाल के दिन बीतने लगे। मां और श्रीकांत उसकी पूरी देखभाल कर रहे थे लेकिन चित्रा के मन मे एक विरक्ती सी समा रही थी।

मां और श्रीकांत जितनी बेसब्री से बच्चे के आने का इंतज़ार कर रहे थे चित्रा अपने मन में हरिद्वार से दूर जाने की सोच रही थी। उसने चुपचाप अपना तबादला दिल्ली करवा दिया था।

समय बीता चित्रा ने एक फूल सी बच्ची को जन्म दिया। उस दिन तो श्रीकांत की खुशी देखते बनती थी, पूरे अस्पताल में मिठाई बांटी गई घर पर चित्रा और बच्ची का शानदार स्वागत हुआ। 

चित्रा ने भर निगाह बच्चे को देखा तक नही, खुद डॉक्टर होते हुए उसने बच्ची को  स्तनपान नहीं कराया बच्ची डिब्बे के दूध पर पलने लगी। चित्रा निर्विकार भाव से सब कुछ देखती । मां कै तो जैसे पैर ज़मीन पर ना पड़ते थे।

बच्चे के आने की खुशी में शायद किसी को चित्रा के दिल का हाल या उसके सपनो की याद नहीं आई।
करीब एक महीने बाद श्रीकांत ने शानदार दावत दी, देर रात जब दावत खत्म हुई तो सबने देखा चित्रा बिल्कुल साधारण से कपड़ों में सूटकेस लिये खड़ी थी, सभी आश्चर्य से देख रहे थे।
श्रीकांत ने पूछा ” कहां जा रही हो?
चित्रा ने शांत स्वर में जवाब दिया ” मेरा तबादला दिल्ली हो गया है, वहीं  जा रही हूँ।
इतना सुनते ही मां गुस्से मे फट पड़ीं ” दिमाग खराब हो गया है इस लडकी का , ख़ुद अपनी गृहस्थी में आग लगा रही है, चित्रा तेरी इस बेवकूफी मे मैं तैरा साथ नही दूंगी|” अपनी जिद में एक बच्चे से उसकी मां को छींन रही हो।” और भी न जाने क्या क्या मां बोलती रही। श्रीकांत तो जैसे सन्न हो गये थे ।
आज चित्रा ने सबकी बात अनसुनी कर दी, घर की दहलीज लांघ अपने सपनों को पूरा करने दिल्ली चली गई।
उस दिन के बाद चित्रा ने पीछे मुड़ कर नही देखा।दो साल दिल्ली , फिर आगे पढ़ने अमेरिका चली गई। सबको ये लगता था बच्चे का प्यार चित्रा को वापस ले आएगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।  चित्रा क़े अमेरिका जाने की खबर श्रीकांत को एक चिट्ठी से पता चली।
कहते हैं सपने यूं ही  नही साकार होते , बहुत मेहनत करनी पड़ती है, एक कीमत चुकानी पड़ती है लेकिन चित्रा के सपनों की कीमत मां ,श्रीकांत और एक दुधमुंही बच्ची को चुकानी पड़ी थी।
तभी किसी ने आवाज दी,

“मैम मै आई कम ईन?

चित्रा जैसे नींद से जागी, सामने वही लड़की खुशबू खड़ी थी। वही खु़शबू  जिसकी फाईल देखते हुए वो अतीत मे खो गई थी। खुशबू जिसके चेहरे पर वही भोलापन था, उसमें श्रीकांत की झलक साफ दिखाई दे रही थी।

खुश्बू बहुत परेशान दिख रही थी, जब तक चित्रा कुछ बोलती ,

 “मैम! मेरी नानी की तबियत बहुत खराब है, मुझे तुरंत हरिद्वार जाना है।”

चित्रा एकदम से धरातल पर आ गई और तुरंत बोली  “और परसों से तुम्हारी ट्रेनिंग का क्या होगा?”

“मेम मुझे लीव चाहिये! मेरे लिये मेरी टर्निंग, मेरे सपनों  से ज्यादा अहमियत मेरे रिश्तों की है।”

इतना बोल उसने अपनी अर्जी टेबल पर रखी और  उलटे कदम वापस चली गई।

 

चित्रा एकटक आश्चर्य से उसी दिशा मे देखती रह गई। चित्रा को जैसे किसी ने धरातल पर गिरा दिया था।
कुछ पल में उसने होश सम्भाला और चपरासी को बुलवाया और आदेश दिया खुशबू माथुर को दोबारा बुला कर लाये।
चपरासी आदेश बजाने दौड़ गया। कुछ ही देर में कन्धे पर एक बैग टांगे ,चेहरे पर परेशानी और आंखों मे सवाल लिये खुशबू चित्रा के सामने खड़ी थी।
“मेम आपने मुझे बुलाया, प्लीज़ मुझे जाने दिजिये अगर दो बजे की बस निकल गई तो हरिद्वार के लिये कल सुबह गाड़ी मिलेगी। किसी भी हालत मे मुझे आज जाना होगा।”
चित्रा का मन आज एक अनजाने से दर्द से तड़प गया , एक नितांत अंजाना सा दर्द बिल्कुल अपरिचित सा….

आज शायद पहली बार एक औरत एक मां होने का अहसास हुआ, याद आया दुनिया में उसकी मां  है और कभी वो भी मां बनी थी और उसने एक बच्ची को जन्म दिया था।

आधुनिक प्रतिस्पर्धा के इस दौर मे अपने बलबूते पर इतनी सफलता हासिल करने वाली चित्रा खुशबू से निगाह नहीं मिला पा रही थी।
किसी ने सच ही कहा है यदि आपके पास खुद को सच बताने की हिम्मत नहीं है तो निश्चित रूप से आप अपने बारे में किसी दूसरे को सच नहीं बता सकते हैं।
चित्रा का अतीत जीता जागता उसके सामने खड़ा  था। अपने दिल की बेचैनी छुपाते हुए चित्रा बोली
” परेशान मत हो,मुझे भी आज हरिद्वार किसी काम  से जाना है, तुम मेरे साथ चलो मैं तुमको छोड़ दूंगी !” 
ये आखिरी शब्द कहते हुए चित्रा के दिल में कुछ दरक गया। ज़िंद्गी भर वो सब कुछ छोड़ती ही तो आई है….
मां  पति घर गृहस्थी परिवार हरिद्वार और फिर अपनी बच्ची को छोड़ दिया।माना अपने सपनों को पा लिया लेकिन एक बच्चे से उसकी मां को छीन लेना …
आज अचानक चित्रा को वो सब अहम् लगने लगा, अपनी सफलता बौनी लगने लगीं ।
कुछ देर बाद चित्रा और खुशबू की गाड़ी दिल्ली हरिद्वार हाईवे पर सरपट दौड़ रही थी। उसके चेहरे को हवाये छू रही थी साथ ही हरिद्वार की ढेरों यादें जिन्हे चित्रा किसी पोटली में बांध कहीं रखकर भूल गई थी अचानक कतरा कतरा बिखर गई थी उसके साथ साथ मानो चित्रा भी बिखर रही थी। 
कुछ देर तक तो खुशबू अपने पापा और नानी की बातें करती रही, फिर बाहर देखते देखते जाने कब वो चित्रा के कंधे पर सर रख कर सो गई।
आज अपनी बच्ची के शरीर की गंध, उसका कोमल स्पर्श चित्रा के दिल में अजब सी हलचल मचा रहा था। आज उसको वो दिन याद आ गया  गर्भावस्था के समय जब पहली बार अल्ट्रासाउंड हुआ था तो स्क्रीन पर अजन्मे बच्चे की काली सफेद तस्वीर और धडकन सुनकर श्रीकांत एक बच्चे की तरह उल्लसित हो गये थे और वो निर्विकार भाव से छत की ओर देख रही थी।
गुलाबी कम्बल में लिपटी हुई नन्ही सी जिस बच्ची को अनदेखा कर चित्रा ने घर छोड़ा था आज वो बच्ची बगल में सारी बातों से अनजान बैठी थी। 
आज जाने क्यों पहली बार चित्रा का मन हुआ, उसे अपनी बाहों के घेरे समेट ले ,तभी गाड़ी को झटका लगा और खुशबू जाग गई।
सॉरी मैम ! मुझे जगा दिया होता!
ये कहकर वो थोड़ा दूर सरक कर बैठ गई। वे दोनों अपने आप में सिमटे खिड़की के बाहर देख रहे थे। बस एक अंतर था खुशबू आने वाले समय को सोचकर चिंता में थी, और चित्रा अपने अतीत के साये, वर्तमान के पहले अहसास और निकट भविष्य में आने वाले तूफान के बारे में सोच रही थी।
 गाड़ी शहर में दाखिल हो गई थी,और खुशबू के बताये रास्ते पर चल रही थी। बहुत कुछ बदल गया था।
 शहर मे आधुनिकता का असर यहां के बाज़ार , लोगों के पह्नावे, सड़क किनारे लगे खाने पीने के स्टाल में दिखाई दे रहा था।जहां पहले समोसे और कचोरी की दुकाने होती थी आज बर्गर और मोमो बिकने लगे थे।
छोटी बड़ी धर्मशालाओं की जगह होटल बन गये थे।बाज़ार मे बड़े बड़े शोरुम और माल दिख रहे थे।
जो नहीं बदला था वो थी गंगा की कलकल करती अविरल धारा, जिसमें सब कुछ समाहित हो जाता है। गंगा को भारत मे यूँ ही नही मां का दर्ज़ा मिला है, वो अपनी गति से चलते हुए सबको समभाव से निर्मल करने क प्रयास करती है। ये सोचते हुए जाने कैसे बहुत दिनों के बाद श्रीकांत का चेहरा उसकी नजरों के सामने आ गया।

चित्रा के मन में अचानक ये सवाल उठा  क्या श्रीकांत आज भी वैसे ही सरल होंगे? उसे याद आया उसकी ज़िद बचकानी इच्छाओं को हँस कर मान जाते, कभी उसे मायूस देख बिना कुछ बोले बस गले लगा लेते।  क्या आज भी??

तभी गाड़ी एक झटके से घर के आगे रुक गई खुशबू जल्दी से उतरी और बोली ” थैंक यू मैम ! आप को कहाँ जाना है आप थोड़ी देर रुक कर मेरे पापा से मिलेगीं तो वो बहुत खुश होंगें। प्लीज आइए ना!
चित्रा गाड़ी से उतरी और बोली “तुम अंदर जाओ मैं आती हूँ।”
खुशबू बच्चों की तरह भागती हुई घर के अंदर गई, उसके बोलने और हँसने की आवाज़ बाहर आ रही थी।
चित्रा ने चारों ओर नज़र दौड़ाई यहाँ तो कुछ भी नही बद्ला था । दीवारों का रंग आज भी उसका पसंदीदा कथ्थई है, क्यारी मे गुलाब महक रहे है,और तो और उसके हाथों के लगाये पारिजात के दो पेड़ आज पूर्ण  वयस्क हो गये हैं।
गेट के आसपास सफेद नारंगी फूल बिखरे हुए थे। आज बरसों के बाद वो चांदनी से बिखरे हुए फूल उनकी सुगंध उसकी रूह को सुकून दे रहे थे।
तभी बिजली चली गई।चित्रा आगे बढ़ते बढ़ते वही रुक गई, मानो पैर वहीं जम गये हों।
घर के बरामदे मे एक पुरुष का साया दिखाई दिया वे श्रीकांत थे जो  शायद उससे मिलने बाहर आ रहे थे।तभी खुश्बू की चहकती हुई आवाज़ आई ” पापा आप रुको मैं टॉर्च लेकर आ रही हूँ !
जब तक चित्रा कुछ सोच पाती खुशबू टॉर्च लेकर उसके पास आ गई।
“आइये मैम ! यहाँ रौशनी कभी भी चली जाती है!”
चित्रा टॉर्च की रौशनी मे आगे बढ़ी ज्यों घर मे कदम रखा बिजली आ गई। चित्रा को लगा जैसे कई आंखें उसे देख रही हों , सामने श्रीकांत खड़े थे, उम्र के साथ शरीर थोड़ा भर गया था,बालों मे सफेदी आ गई थी लेकिन चेहरे पर वही सौम्य्ता थी चित्रा को एकबारगी सामने देख उनके मुंह से निकला “हां बेटा रौशनी लौट आई है!”
चित्रा जो सफलता के ऊंचे पायदान पर खड़ी थीं आज खुद को एक अपराधी सा महसूस कर रही थी।
खुशबू उसे हाथ पकड़ कर नानी के पास ले गई , चित्रा ने देखा मां का शरीर बिल्कुल जर्जर  हो गया था।चित्रा बिस्तर पर बैठ गई और उनका हाथ थाम लिया मां ने उसे ध्यान से देखा और खुद से लिपटा लिया और फिर दोनो बिलख बिलख कर रोने लगीं ।
श्रीकांत चुपचाप देख रहे थे और ख़ुशबू कीं आँखों मे ढेरों सवाल आ गये ।
कुछ देर रोने के बाद मां ने चित्रा को झिड़कते हुए खुद से दूर किया और बोलीं “अच्छा हुआ तू आ गई,अब मैं चैन से मर  सकूंगी ।तू तो बिना अपना पता बताये चली गई लेकिन तेरी अमानत हमने सम्भाल कर रखी है और मेरे बेटे श्रीकांत ने मुझे सम्भाल कर रखा है।”
चित्रा के पास आज मां को जवाब देने के लिये शब्द नहीं थे।श्रीकांत के इशारे पर खुशबू चाय लेकर आ गई। कमरे में एक सन्नाटा सा छा गया। सभी अपने अपने सवालों जवाबों में उलझे चाय पी रहे थे। मां ने चाय का कप रखा और लेट गईं । उनके चेहरे पर एक संतोष था। चित्रा खामोशी से उनका हाथ थामे बैठी थी। तभी खुशबू तनिक ज़ोर से बोली कोई मुझे बतायगा “ये सब क्या है?” मां ने तनिक मुस्कुराते हुए कहा “मां बेटी बरसों के बाद मिल रहे हैं।” 
श्रीकांत ख़ुशबू को साथ लेकर बाहर चले गये और चित्रा के कानों मे धीमी धीमी बातचीत करने की आवाज़ आ रही थी। वो खामोशी से मां का हाथ थामे बैठी रही। घंटों बीत गये,बाहर सुबह होने के लक्षण दिखाई देने लगे थे।
चित्रा को महसूस हुआ जैसे मां  के हाथ एकदम बर्फ से ठंडे हो गये हैं, मां तो जाने कब अपनी अनंत यात्रा की ओर निकल गई थी। 
बाहर सुरज  निकल आया था  सारा अंधेरा छंट गया था। श्रीकांत ने मां के क्रियाकर्म का इंतजाम किया। कुछ पास पड़ोसी अपना दुख व्यक्त करने आये लेकिन चित्रा को वहां देख उनकी आंखो मे कई सवाल दिखने लगे।
वही दुनियाभर के सवाल ये कौन है? क्या रिश्ता है? आदि आदि! 
खुशबू ने बिल्कुल मौन साध लिया था। उसकी आंखे निर्विकार भाव से शून्य में देख रही थी।
 श्रीकांत ने पूरा अतीत उसके सामने खोलकर रख दिया था। खुशबू सारा दिन खामोश अपने कमरे में बैठी रही। मां का क्रियाकर्म  कर श्रीकांत शाम तक लौटे।चित्रा ने उठकर चाय बनाई एक कप श्रीकांत को थमा कर खुद की चाय हाथ में लेकर बगीचे मे चली आई।  शाम का धुंधलका छाने लगा था।पारिजात के पेड़ से फूल गिरने लगे थे उन फूलों की खुशबू हवा में घुलने लगी थी।
तभी खुशबू ने पीछे से आवाज़ दी ” मां आप तो अपनी मां से मिलकर संतुष्ट हो गई लेकिन मैं ….?
खुशबू पनियाई आँखों से चित्रा की ओर देख रही थी ” मां ! तुम्हारे सपनों की कीमत मैंने चुकाई है, क्या अब भी कुछ  किश्ते बाकी हैं ?
 चित्रा ने कप ज़मीन पर रखा और अपनी दोनों बाँहे पसार दीं, खुश्बू दौड़ कर एक नन्ही बच्ची के जैसे चित्रा से लिपट  गई  उन दोनों की आँखों से गंगा जमुना बह रही थी, जिसमें सारा अतीत बह गया था।  शायद दोनों एक अनूठे प्रेम के सागर में डूब गये थे। बरामदे मे खड़े श्रीकांत बरसों के बाद मां बेटी का मिलन देख रहे थे। आज उनकी आंखें भी नम थी।   
Pic Credit Still from Movie Tribhanga 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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Kiran Shukla
मैं किरण शुक्ला एक गृहणी हूं। मैं नवाबों के शहर लखनऊ की रहनेवाली हूं। थोड़ा बहुत लिखने का शौक पहले से था लेकिन जिंदगी की व्यस्तताओं मे ये शौक ज़रा पीछे छूट सा गया था। कला मंथन मंच की आभारी हूं जिसकी वजह से मैंने नए सिरे से अपने शौक को वक्त देना शुरू किया है। सही मायने मे नवलेखिका हूँ जो शायद आजकल की पीढ़ी के लिए लिखने का प्रयास कर रही हूं। उम्मीद करती पढ़ने वालों की अपेक्षा पर खरी उतरूं।

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