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खुद को एक मौका तो दो |

चेहरे पे लाल बिंदी दोनों भौंवों के बीच लगाते हुए, नारायणी की पलकें कापने लगीं, आईना अनजाना सा लगने लगा, सवाल करने लगा।ये साज सिंगार किसके लिए ? कहीं शाश्वत जी के लिए तो नहीं ? दिमाग तो ठीक है नारायणी ? ये कैसे बातें सोच रही हो तुम ?

नारायणी ने झटपट खुद को ही डांट पीला दी और पर्स उठा कर, जल्दी से कॉलेज के लिए निकल गयी।
रिक्शे में फिर वही अंतर्द्वंद चालू हो गया, दिल और दिमाग आपस में उलझ पड़े और नारायणी इस शोर से बचने के लिए, हैडफ़ोन पे रेडियो सुनने लगी।
दरअसल, नारायणी और शाश्वत दोनों ही हिन्दू कॉलेज में हिस्ट्री के प्रोफेसर थे और ज़ाहिर है, एक ही फैकल्टी के होने के कारण, अक्सर समय साथ बिताया करते थे। उनकी बातें अक्सर पढाई और शोध से आगे नहीं बढ़ती थीं और यही कारण था की नारायणी इस परस्पर प्रभाव में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती थी।
व्यक्तिगत बातें भी होते थी पर मर्यादित और ना के बराबर, कुल मिलाकर दोनों ही नीरस और अंतर्मुखी थे और यही बात उनके रिश्ते को हवा दे रहा था। नारायणी को भनक तक नहीं लगी पर शाश्वत जी ने कहीं ना कहीं उन मोटे काले चश्मों के पीछे छुपे प्यार को पहचान लिया था, उन आँखों की मस्तियों को महसूस करने लगे थे।
“तो क्या आपके पति आपके साथ नहीं रहते ?” एक दिन शाश्वत जी ने हिम्मत करके पूछ लिया।
“नहीं”, थोड़ा हिचक कर नारायणी ने जवाब दिया, फिर थोड़ा ठहर कर बोली , “मैं एक डिवोर्सी हूँ, मैंने अपने पति को छोड़ दिया है, उनका व्यवहार मेरे और मेरी बेटी के प्रति ठीक नहीं था।”
शाश्वत जी नारायणी की आँखों को मूक निहारने लगे, तो वो फट से नज़रें चुराते हुए, पीछे हट गयी। रात भर नारायणी को अपने ही कही बातों ने सोने ना दिया।
क्या ज़रूरत थी इतने विस्तार से बताने की ? कोई पूछ रहा था क्या ? कुछ भी और बोल देती , बड़ी आयी हरिश्चंद्र की रिश्तेदार, नारायणी खुद पे ही भन्नाती रही।
अपनी बेटी की तस्वीर को सीने से लगाए , ना जाने उसकी कब आँख लग गयी। उसकी बेटी जया हॉस्टल में पढ़ती थी और छुट्टियों में घर आती थी। बस नारायणी अकेली ही तो थी यहाँ, अपनी यादों और ग़मों को दिल में समेटे, अपनी हिस्ट्री की तरह ही अतीत बन गयी थी वो, जमी हुयी। हमेशा किताब में नाक घुसाए हुए, अपने आप को तो जैसे उसने भुला ही दिया था।

अब लगता था जैसे पतझड़ में वसंत ऋतू आने वाली थी, आसमान में बादलों के पीछे से एक चेहरा झाँक रहा था। नारायणी आजकल मुस्कुराने लगी थी, शाश्वत जी से मिलने की राह देखती और अगर वो ना आएं, तो खुद ही उनके पास चली जाती थी, किसी भी बहाने से।

”अरे, वो चैप्टर तो मेरे स्टूडेंट्स को समझ ही नहीं आया, वो लोग एक्स्ट्रा क्लासेज मांग रहे हैं , आप कैसे समझाते हैं शाश्वत जी, मुझे भी बताएं।” नारायणी इच्छुक स्वर में अपने बाल सवारते हुए बोली, उसकी चूड़ी ने भी छनक कर हामी भरी।
“ आज आप बहुत अच्छी लग रही हैं, ऐसे ही मुस्कुराते रहिये। ये पीला रंग आप पर कितना फबता है।” शाश्वत जी ने उस दिन बोल ही दिया। नारायणी तो शर्म से लाल हो गयी, उसके होश ही उड़ गए , उसे समझ ही नहीं आया की वो क्या बोले।
अवाक सी वो, नज़रें झुकाये खड़ी सी ही रह गयी। कहीं न कहीं शाश्वत जी भी समझ ही गये थे, नारायणी का हाल-ए -दिल। आग दोनों तरफ लगी थी और चिंगारियां सर्राटे से उड़ रही थी।
आज कौन से रंग की साड़ी पहनूं ? कांटेक्ट लेंस लगाऊं क्या ?
अब नारायणी अपनी छवि के प्रति सजग हो गयी थी, और ज़रा सलीके से तैयार होने लगी थी।
“ हेलो नारायणी, आज शाम को आप क्या कर रही हैं ?” शाश्वत जी ने मन बनाकर पूछ लिया।
उनके दिल में नारायणी के लिए एक विशेष स्थान बनने लगा था और वो उसको ये बात बताना चाहते थे।
” आज तो मेरे कुछ स्टूडेंट्स घर पे टूशन के लिए आ रहे हैं, सॉरी आज नहीं, फिर कभी चलते हैं ।” नारायणी बोल कर आगे बढ़ गयी पर ये बात उसके मन से गई नहीं।
ये क्या किया तुमने नारायणी ? वो असमंजस में पड़ गयी। हाफ डे लेकर घर चली गयी और अगले दिन की भी लीव डाल दी। घर का आइना देख वो सोचने लगी, आखिर क्या चाहती हूँ मैं ? रात भर पंखे के डैनो को मंडराते देखती रही और खुद से उदास होती गयी।

शाश्वत जी का ख्याल उसके मन में रच बस गया था, फिर ये इंकार क्यों ? अगर मन में इच्छाएं हैं तो ज़बान पे ना क्यों ? कहीं वो मुझे प्रेम तो नहीं करने लगें हैं? और फिर मैं तो एक डिवोर्सी हूँ, एक बेटी की माँ हूँ।मैं कैसे ?
समाज का क्या ? माता पिता क्या बोलेंगे ? और फिर शाश्वत जी जैसे सज्जन पुरुष के लिए लड़कियों की कमी है क्या ? और फिर मैं इतनी भी खूबसूरत नहीं की कोई दीवाना हो जाए ? न न , ये सब सिर्फ मेरे मन की उपज है, ये सिर्फ फिल्मों में होता है।

नारायणी ने रात के तीसरे पहर में आखिर खुद को समझा ही लिया और नींद के आगोश में समा गयी।
आज उसने कॉलेज जाते समय तय किया की शाश्वत जी को नज़र अंदाज़ करेगी और अपने कामों में मसरूफ रहेगी, पर हुआ इसका विपरीत। पहुंचते ही शाश्वत जी सामने ही खड़े थे , “आप कल क्यों नहीं आईं, मुझे चिंता हो गयी थी। हिस्ट्री स्नातक की क्लास ,राजस्थान जा रही है एक ट्रिप के लिए , आप नहीं आईं थी, मैंने आपका भी नाम लिखवा दिया।” शाश्वत जी मनचले अंदाज़ में बोले।
नारायणी दंग रह गयी और सहजता से बोली,“ मेरा क्यों?, मुझे इतना मन नहीं है, वैसे भी शनिवार इतवार मैं कुछ पढ़ने का सोच रही थी। ”
उसका मन झूठ बोलने के लिए उसे कचोट रहा था।“अब तो आपको आना ही पड़ेगा नारायणी, दिए गए नाम वापस नहीं लिए जा सकते”। शाश्वत जी मुस्कुराते हुए बोले।
नारायणी दुविधा में पड़ गयी, जैसे कोई संकट की स्तिथि हो , क्या अगर शाश्वत जी ने कुछ और पूछ लिया?, क्या अगर कोई प्रस्ताव रख दिया ?
नारायणी एक अंतर्द्वंद में घिरती जा रही थी और सही में जिसका उसे डर था वही हुआ , नारायणी सही भाँपि थी। ट्रिप के दूसरे ही दिन,शाश्वत जी ने नारायणी के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया
“नारायणी, मैं आपको पिछले २ वर्षों से जानता हूँ , आप मेरे लिए सच्चाई, खूबसूरती और प्रेम की मूरत हैं । मैं आपके लिए जो महसूस करता हूँ, वो किसी और के लिए मैंने कभी किया ही नहीं। ”
नारायणी खुद को रोक नहीं पायी और उनको बीच में ही रोकते हुए बोली “ आप मेरे बारे में कुछ नहीं जानते शाश्वत जी, मेरी एक बेटी है , मेरा अतीत बहुत गहरा है। आप ये सब बातें मेरे लिए मत बोलिये “
नारायणी अपने आसुओं को रोकते हुए, वहां से चली गयी।
वो कहते हैं न “यदि आपके पास खुद को सच बताने की हिम्मत नहीं है, तो निश्चित रूप से आप अपने बारे में दूसरे किसी को भी सच नहीं बता सकते।”
नारायणी को खुद को सच बताने को हिम्मत नहीं हो रही थी, के प्यार करना कोई गुनाह नहीं और उसका दिल टूट कर शाश्वत जी को चाहता था। पर आज उसने स्वयं को कटघरे में रखकर सवाल करने शुरू किये।

क्यों तुम क़ुबूल नहीं सकती इस रिश्ते को ? क्या समाज एक डिवोर्सी औरत को फिर से सम्मान के साथ नहीं अपनाएगा? क्या एक अकेली माँ को किसी पुरुष से प्यार का अधिकार नहीं ?

क्या इस पृतसत्ता वाले समाज और ठेकेदारों की दोहरी मानसिकता का वो डट कर मुकाबला कर पायेगी ? क्या वो शाश्वत जी जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति की पत्नी बन, उनके परिवार को इज़्ज़त दे पायेगी?
सवालों के बौछार ने जैसे नारायणी को भिगो दिया पर पता नहीं कहाँ से , आज उसमे हिम्मत आ गयी थी , “नारी तू नारायणी” की तरह एक बिजली कौंध रही थी उसमें। वो अब सच बोलना चाहती थी और निडर बनकर, स्वाबलंबी बनकर और अपराजिता रूप में हर चुनौती, हर आपत्ति को गले लगाना चाहती थी।
वो समझ गयी थी, की ज़िन्दगी उसे दुबारा मौका दे रही है और वो हर तरफ से योग्य है। उसे प्यार करने का, अपना अधिकार चुनने का और फिर से सतरंगी जीवन जीने का सम्पूर्ण अधिकार है और शाश्वत जी उसके जीवन में मसीहा बन कर आये हैं। आज की रात क़यामत की रात थी और नारायणी को एक पुनर्जन्म मिला था।
उसने सुबह होते ही , शाश्वत जी का प्रस्ताव मानने का निर्णय ले लिया था। साथ ही ये भी सोच लिया था, को वो उनसे कुछ ना छुपाएगी और अपना पूरा अतीत और विगत रिश्ते की सच्चाई भी बताएगी।
ये रात उसके जीवन को सबसे लम्बी रात थी और वो बेताबी से भोर की प्रतीक्षा करने लगी।
सुबह होते ही नारायणी सबसे पहले, शाश्वत जी के कमरे में जा पहुँची। उसके आत्मविश्वास की आभा नूर बन के चेहरे पर चमक रही थी ,वो पहली बार बेधड़क, शाश्वत जी से नज़रें मिलाकर बात कर रही थी।
” शाश्वत जी, आपका प्रस्ताव स्वीकारने से पहले, मैं आपको अपने पहले रिश्ते की सच्चाई से अवगत कराना चाहती हूँ “ नारायणी सृदृढ़ होकर बोली।

“ मुझे कुछ नहीं जानना है नारायणी, मुझे तुमसे सच्चा प्यार है , और ये किसी स्पष्टीकरण का मोहताज नहीं। मेरा प्यार इतना कमज़ोर नहीं, जो तुम्हारे अतीत के साये से घबरा जाए। मैंने तुमसे प्यार किया है नारायणी और तुमसे शादी करना चाहता हूँ , अगर तुम्हारा जवाब ना है, तबभी मैँ तुमसे प्यार करता रहूंगा। तुम बिना हिचकिचाहट बोलो, क्या तुम मेरी जीवनसंगिनी बनोगी ?”

शाश्वत जी के रोम रोम से नारायणी के लिए प्रेम उजागर हो रहा था ,“और ये मत समझना, की मैंने तुमपर तरस खाकर ये निर्णय लिया है, ये फैसला मैंने बहुत सोच विचार के बाद लिया है। यदि तुम्हारे जैसी स्त्री मेरी जीवनसाथी बनेगी, तो इसे मैं अपनी खुशनसीबी समझूंगा” वो अंत में बोले और नारायणी के समीप आ गए।

नारायणी की अश्रुधारा रुकती ही नहीं थी, शाश्वत जी ने करीब आकर उसको गले से लगा लिया और नारायणी स्वयं को छुड़ाने की कोशिश किये बिना, उनके सीने से लग गयी।
आज प्रथम दिवस उसने स्वयं को आगे रख कर, अपनी भावनाओं को प्राथमिकता देकर सच बोला था और सम्मान के साथ जीवन पथ पर अग्रसर होने का फैसला किया था।

 

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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