Email: support@kalamanthan.in, editor@kalamanthan.in

मर्दानगी का मोंह

गोरे रंग की काली -काली व बड़ी- बड़ी आंखों वाली कविता एक साधारण भारतीय नारी थी। वैसे ही सीधे साधे गेहुए रंग के कन्हैया के साथ उसका विवाह कुछ वर्षों पूर्व बड़े धूमधाम से हुआ था। दोनों ही गृहस्थ जीवन की गाड़ी बड़े प्यार से आगे खींचते जा रहे थे।

पर हमारा समाज और यहां के लोग किसी की जिंदगी की परेशानियों से ज्यादा उनके सुकून से परेशान रहते हैं। कविता और कन्हैया की जिंदगी में किसी बात की कोई परेशानी नहीं थी बस कमी थी तो एक बच्चे की।
कन्हैया से तो कोई कुछ ना कहता पर कविता से गांव घर की औरतें हर वक्त यह पूछती रहती कि, कब खुशखबरी दे रही हो? कब मिठाई खिला रही हो ?
कविता मुस्कुरा कर रह जाती। कोई उत्तर नहीं होता था उसके पास। यूं ही कुछ वर्ष और बीत गए।
अब कहने पूछने का दौर निकल चुका था ।अब तो लोग उसे सलाह देने लगे थे ।इस माता के मंदिर जाओ ,यह व्रत करो वह पूजा करो। कविता के मन में भी लालसा जाग जाती ! वह भी अपनी तरफ से किसी भी पूजा व्रत को छोड़ना नहीं चाहती थी ।वह हर वो काम करती कि शायद इस बार उसकी गोद हरी हो जाए! इस बार उसकी मन्नत पूरी हो जाए और इसी उम्मीद में कुछ दिन और बीत गए।
अब लोगों ने ताना देना शुरू कर दिया था। यहां तक की सुबह-सुबह  अगर उसका चेहरा कोई देख लेता तो भगवान से दुआ करता कि आज उसका दिन अच्छा जाए। लोगों ने तो उसे बांझ नाम दिया था । लोग कहने लगे थे कि ,बांझ का चेहरा देख लो तो पूरे दिन पानी भी नसीब नहीं होता है।

दांपत्य जीवन की भी कितनी अजीब कहानी है! यूँ तो पति पत्नी इस गाड़ी के दो पहिए होते हैं किन्तु जब ऐसा कुछ होता है या संतान सुख की प्राप्ति नहीं होती है, सारा दोस्त पत्नी के सिर मढ़ दिया जाता है ।

यही नहीं समाज में उसे बांझ और ना जाने कितने बुरे बुरे नामों से बुलाया जाता है जबकि ,वहीं पति को कोई कुछ नहीं कहता !कोई सोचता भी नहीं की कमी उसमें भी तो हो सकती है ।समाज काफी बदल चुका है और बदल रहा है पर गलती ,अगर हो जाए तो आज भी दोषी पत्नी को ही माना जाता है!
कविता भी बस कुछ भी करके अपने माथे से इस कलंक को धोना चाहती थी ।उसने समझा-बुझाकर कन्हैया को डॉक्टरी जांच के लिए राजी किया । कन्हैया यह मानने को तैयार ही नहीं था की ,कमी उसमें भी हो सकती है! और तो और इस बात के लिए उसने इतना हल्ला मचाया, कि तिमिलाहट में उसने कविता पर हाथ तक उठा दिया ।यह कहते हुए की “तुम्हें मेरी मर्दानगी पर शक है ,गांव वाले क्या कहेंगे क्या इज्जत रह जाएगी मेरी”???
पर कविता की ज़िद के आगे उसकी एक ना चली। आखिर कह -सुनकर वह राजी हो ही गया। कविता और उसकी सारी डॉक्टरी जांच की गई। हाल फिलहाल में सब कुछ ठीक ही रहा बस एक अंतिम रिपोर्ट आनी बाकी थी ।
कविता और कन्हैया दोनों की सांसे रुकी हुई थी। कविता जहां यह मन्नत कर रही थी,कि कोई कमी ना निकले। वही कन्हैया इस बात के लिए परेशान था कि कहीं कमी उसमें ना निकल आए!
अंतिम रिपोर्ट के बाद डॉक्टरों ने दोनों को बुलाया और कहा कि बाकी सब कुछ तो ठीक है पर कन्हैया की शुक्राणु कमजोर है। कुछ दवा इलाज और दवाई सुई के द्वारा उसे भी ठीक किया जा सकता है साथ ही उन्हें संतान का सुख भी मिल जाएगा।
डॉक्टरों की बात सुनकर दोनों थोड़े दुखी हो गए पर कविता को इस बात की खुशी थी कि उम्मीद की एक किरण अभी बाकी है।कविता को लेकर कन्हैया घर पहुंचा और इन बातों का जिक्र किसी से ना करें कविता को हिदायत भी दी । कविता को कुछ समझ में नहीं आया चूँकि उसे कन्हैया को इलाज के लिए राजी भी तो करना था इसलिए उसने हामी भर दी ।

कुछ दिन बीत गए अस्पताल से डॉक्टरों का फोन आने लगा पर कन्हैया तो जाने को तैयार ही नहीं था। उसे बेऔलाद रहना मंजूर था पर अपनी मर्दानगी पर किसी भी किस्म का प्रश्न उसे नामंजूर था।

उसके मन से उसकी मर्दानगी का मोह जा ही नहीं रहा था!
चाहे इसके लिए उसे कविता को कितने भी दुख देने पड़े, वह तैयार था।अब कविता के सब्र का बांध टूट चुका था। रोज़ रोज़ के ताने उसका इम्तिहान लेते थे। एक दिन इसी झुंझलाहट में उसने कन्हैया से कहा,” या तो मुझे बच्चा दे दो या फिर सभी के सामने आकर यह स्वीकार कर लो कि दोष तुममें है”।
कन्हैया के अनमने भाव से बैठा रहा। परेशान हो कविता ने चिल्लाते हुए कन्हैया से कहा,”यदि आपके पास खुद को सच बताने की हिम्मत नहीं है तो निश्चित रूप से आप अपने बारे में दूसरे किसी को भी सच नहीं बता सकते!”
इतना बड़ा बात सुनकर कन्हैया अपने आप पर काबू न रख पाया। उसने पास रखा रॉड उठाया और कविता को मारने लगा। उसे होश ही नहीं रहा कि उसने कविता को मारते मारते अधमरा कर दिया है। उसे होश तो तब आया जब बगल की चाची कविता की चीखें सुनकर दरवाजे को जोर जोर से पीट रही थी।
घबराए से कन्हैया ने दरवाजा खोला। चाची भागकर कविता के पास गई। कविता के पूरे शरीर पर चोट के निशान थे। जगह-जगह से खून का रिसाव हो रहा था । अधमरी पड़ी कविता को चाची ने गोद में उठाया और कन्हैया को जल्दी से डॉक्टर को बुलाने के लिए कहा।पड़ोस के रहने वाले डॉक्टर को कन्हैया ले आया दवा इलाज हुआ और कुछ ज्यादा पैसे देकर मार पिटाई की इस बात को दबा दिया गया।
वही लोगों में ये कानाफूसी तेज हो गई की ,अब बच्चा नहीं दे पाएगी तो ऐसी पत्नी पर गुस्सा अनायास आ ही जाएगा। वह तो कन्हैया जैसा इंसान है जो इतने दिनों से कविता के नखरे उठा रहा है दूसरा कोई होता तो दूजा ब्याह रचा लेता।
लोगों कि इन बातों को सुनता हुआ कन्हैया इस बात से खुश था कि कोई उस पर या उसकी मर्दानगी पर सवाल नहीं उठा रहा। उसके अंदर जरा भी पश्चाताप ना था। सच्चाई को छुपाने का या फिर कविता को अधमरा करने का कोई मलाल न था। उसकी आंखों पर झूठी मर्दानगी का जो पर्दा पड़ा था वह उसे कुछ और देखने ही नहीं दे रहा था।

इधर अपनी सांसों को थामती हुई कविता सोच रही थी कि क्या करें। क्या वह कन्हैया को छोड़ दे? लेकिन इस समाज को कैसे यकीन दिलाएगी की दोष उसमें नहीं है?

कौन मानेगा उसकी बात और उस डॉक्टरी प्रमाण को?

क्या वह कन्हैया को छोड़ किसी और का हाथ थाम ले?

उफ़्फ!!! क्या पता जो अगला मिलेगा उसके अंदर कोई कमी ना होगी या वह और कितना जानवर होगा ?

यही सब सोचते हुए कविता की आँखे बंद हो गयी ।

समाज में अपने लिए सुरक्षा और सम्मान बचाए रखने के लिए कविता ने चुपचाप से कन्हैया की कमी को अपने सिर ले लिया पर उसे आत्म संतोष था कि वह बांझ नहीं है।

प्यारे दोस्तों कैसी लगी आपको समाज के इस भयानक सच पर रचित मेरी कहानी? अपने लाइक और कमेंट के द्वारा मुझे जरूर बताएं मुझे पढ़ने के लिए धन्यवाद आपकी दीपाली✍️

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

हमें फोलो करे Facebook

Deepali Singh
मन के घावों पर मरहम लगाती है कहानियां जो कही गई ना किसी से वह भी कह जाती हैं कहानियां।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

अम्मा का इंतकाल

बालपन में घटित एक दुःखद घटनकाल की सुखद अनुभूतियाँ, ये मेरे बालपन का संस्मरण है,जब मासूमियत दिल पे हावी होती है और ज़ुबाँ पे...

अनुराधा

रात का अंधेरा और गहरा होता जा रहा था साथ ही मेरे भीतर की जदोजहद भी गहरी होती जा रही थी | बीते कुछ...

आज़ादी की क़ीमत

  रानी के पड़ोसी दूसरे शहर शिफ्ट हो रहे थे, जाते हुए उन्होंने अपना तोता रानी को दे दिया। पहले रानी को यह ज़िम्मेदारी कुछ...

मेरा अपना भी अस्तित्व हैं

“सुबह पांच बजे के करीब नींद खुली, फ़िल्टर कॉफ़ी माइक्रो कर जब बालकनी में आई, अद्भुत नज़ारा था..सामने वाले पार्क से आता कलरव आस...

Recent Comments

Manimala Chatterjee on गुलाब
Manisha on गुलाब
Rajesh Kumar on गुलाब