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ज़ंजीर

फेयरी लाईट्स के झालर से चाँद अचंभित था, पृथ्वी पर तारों की महफिल का सजना उसे भरमाने लगा। तारे के एक टुकड़े को तेज़ी से पृथ्वी की ओर भागते देख बेसब्र चाँद ने पूछ लिया…”बावले! किधर भागे जा रहा है?” तारे ने मुड़ कर कहा….”तुम्हें नहीं पता! एक चाँद वहाँ ज़मीन पर उतरा है। सबसे अनूठा, सबसे अलग! उसीकी पेशानी चूमने जा रहा हूँ।” कहता हुआ वह शांय्य् से पृथ्वी की ओर बढ़ गया।

मानव और प्रभा अपने लाडले को देख गदगद हो रहे थे। उछलती-कूदती रश्मि बार-बार पालने के पास आकर अपने भाई को निहारती और अपने खुशी को दुगुना करती।
“भई वाह! ईश्वर की विशेष कृपा है तुम्हारे परिवार पर। हम दो हमारे दो, हैप्पी फैमिली की तस्वीर पूरी हो गई।” एक मेहमान ने बधाई देते हुए कहा।
“सब ईश्वर की मेहरबानी है। अब बस इतनी कृपा और रखें कि हम उनकी दी हुई जिम्मेदारी को कुशलता से निभा पाएं।” कहते हुए मानव ने प्रभा की ओर देख उसका हाथ थाम लिया।
“जरूर-जरूर…. आप अपने बच्चों को निश्चित ही एक सुखद भविष्य देंगे, लेकिन पहले यह तो बताइए हम इस राजकुमार को किस नाम से जानने वाले हैं?” एक मित्र की बात पर पार्टी में समवेत स्वर गूँजा कि अब नामकरण के रोमांच से पटाक्षेप हो ही जाना चाहिए।
अनायास मानव को लगा किसी ने उसके कान में कुछ फुसफुसाया, उसके मुख से आवाज़ निकली…. “ज्योति…”
“ज्योति..? भाई! रश्मि के भाई का नामकरण कराना है, बहन का नहीं।” किसी मेहमान की आवाज आई और सभी ठठा कर हँसने लगे।

मानव थोड़ा लजा गया। अगल-बगल देखा फिर सामने आसमान पर नजर गई, एक टूटता तारा दमकते हुए गुजर रहा था। शुभ संकेत को देख मानव ने कहा… “दीपक…दीपक नाम होगा हमारे बेटे का। जो सब ओर रौशनी फैलाएगा।”

दीपक एक खुशहाल परिवेश में पलने लगा। माँ-पापा और बड़ी दीदी… लाड-प्यार की बरसात में आठ वर्ष बीत गए। एकदिन अचानक दीपक माथे पर दुपट्टा लपेटे, होठों पर लाली और माथे पर बिंदी लगाए सबके सामने आया तो सब अचरज से भर गए, फिर ज़ोरदार ठहाकों से माहौल सहज और हल्का हो गया। मानव ने प्यार से उसे गोद में उठाया और दुपट्टा हटाते हुए समझाया “ये सब श्रृंगार मम्मा और दीदी केलिए हैं। हम तो मर्द हैं रफ एंड टफ! हम पर ये सब नहीं जंचता।”
आकर्षण तो आकर्षण होता है। हम किसी के आकर्षण की दिशा तय नहीं कर सकते। चकोर चाँद के आकर्षण में उम्र गँवाता है, चाँद सितारों के आकर्षण से इतराता है। और वह तारे का टुकड़ा, वह तो दीपक से आकर्षित हुआ उसके ही इर्द-गिर्द मंडरा रहा था।
ईश्वर प्रत्येक मनुष्य के भीतर कुछ नारीत्व का भाव समाहित करता है। जो इस भाव को समझ लेता है, वह दया, करुणा और प्रेम से स्वयं को परिपूर्ण कर पाता है, और जो इस भाव को कुचल कर आगे बढ़ता है वह क्रूरता की हदों में प्रवेश करते हुए खुद को रोक नहीं पाता।
दीपक के मन का नारीत्व भाव प्रगाढ़ हो कर सामने आने लगा था। श्रृंगार और स्त्रियों के पहनावे के प्रति उसका आकर्षण दिन-ब-दिन उसके माता-पिता को खटने लगा। उन्हें अपनी बेटी से बहुत प्यार था, लेकिन अपने बेटे के भीतर छिपी “बेटी” उन्हें कतई मंजूर नहीं थी।

किंतु बंधन तो सिर्फ देह का होता है, मन तो सदैव उन्मुक्त है। बंधन जितना कसता है, मन उतनी ही ऊँची उड़ान भरता है।

दिनचर्या के नाम पर ऐसा व्यूह तैयार किया गया जिससे दीपक की अव्यावहारिक आकांक्षायें झाँक भी न सके।सब उसके भीतर के नारीत्व को जितना कुचलना चाहते थे, वह भाव उतना ही गहड़ाने लगा। इतनी सख़्ती के बीच वह कब स्कूल में कथक के टीचर का चहेता बन गया, उसे भी नहीं पता। रियाज़ का तनिक भी समय नहीं था, लेकिन उसकी तल्लीनता उसे निपुण करती गई।
देखते-देखते दीपक सोलह वर्ष का हो गया। आज स्कूल के वार्षिकोत्सव में मानव-प्रभा भी दीपक की प्रतिभा देखने को उत्सुक थे। थोड़ी देर में दीपक स्टेज पर आया और उसे देख कर दोनों स्तब्ध रह गए। पाँव में घुँघरू, उँगलियों में लाली, बड़ी नज़ाकत के साथ उसने कथक नृत्य प्रस्तुत किया। पूरा हॉल तालियों से गूँजने लगा, उधर मानव-प्रभा के मन में अलग ही शोर शुरू हो गया।
कार्यक्रम के समापन पर दीपक अपनी डांस टीचर के साथ उनके पास आकर इस उम्मीद में उनसे लिपट गया कि उसे आज भरपूर शाबाशी मिलेगी, तब उनकी तंद्रा टूटी।
“आपका बच्चा बहुत प्रतिभावान है। मैंने वर्षों बाद किसी बच्चे को इतनी सुंदर मुद्राएं करते देखा है। सच ये आप सबका नाम रौशन करेगा।” अपने शिष्य के कौशल का गौरव टीचर के आँखों में साफ़ दिख रहा था।
“मैडम, बच्चे तो गीली मिट्टी के जैसे होते हैं ना! चाहे जैसा आकार दे दीजिए। हमने अपने बच्चों के सपनों पर कभी अकुंश नहीं लगाया, लेकिन उन्हें गलत राह पर जाते नहीं देख सकता। मेरा बेटा कुछ भी बन सकता है, डाँस में भी बॉलीवुड, हिप-हॉप जैसे डाँस फार्म हैं उसकेलिय। लेकिन कथक….!!” कहते हुए मानव का गला गुस्से और ग्लानि से भर आया।
“सर! आपको तो अपने बेटे पर गर्व होना चाहिए। बहुत कम लड़के शास्त्रीय नृत्यों में रुचि लेते हैं और उसमें इतनी कुशलता ला पाते हैं। दीपक अनोखा है।”
“हम बहुत साधारण लोग हैं। हमें अनोखा नहीं बनाना अपने बच्चे को। आपने दीपक को इतनी अच्छी तरह से कथक सिखाया, इसकेलिय धन्यवाद। लेकिन प्लीज़ मैम! अब और मत सिखाइए।” मानव का मन उसे कोस रहा था कि कैसे वह अपने बेटे को पथ भ्रमित होते नहीं देख पाया। उसे अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि हवाएं अपने गुजरने की राह बना ही लेती है।
कुछ वक्त तक दीपक को समझाना सबको भाता था, लेकिन अब उसका न समझना अखड़ने लगा। पहले डाँट पड़ती थी, लेकिन आज अवमानना की यह उफान मानव के बर्दाश्त की सीमा को ध्वस्त कर गई। आज पहली बार उसने दीपक पर हाथ उठाया। दीपक समझ नहीं पा रहा था कि उसके जिस कुशलता पर पूरा हॉल तालियों से गूँज गया, टीचर ने जिस कुशलता की इतनी सराहना की, उसकी वही कुशलता उसके अपने परिवार वालों को नाकामयाबी क्यों लग रही है? उसे क्यों जबरन रफ एंड टफ बनाया जा रहा है जबकि उसे सहज और कोमल बनना है। मानव का प्रत्येक थप्पड़ दीपक के अंतः द्वंद को गहराने लगा।
“और कितना मारोगे?” प्रभा ने बेटे को अपनी ओर खींच सीने से लगा लिया। माँ का बस चले तो पूरी दुनिया का उसूल अपने संतान केलिए बदल दे। लेकिन इस सबसे बड़ा है समाज। व्यक्ति इसीके हाथों की कठपुतली है।
“कितना समझा चुके हैं तुम्हें कि तुम्हारे शौक एकदम गलत हैं। तुम लड़के हो, लड़की नहीं। पहले सजना-सँवारना और अब…! स्टेज पर घुँघरू बाँध कर आ गए!! अपना अच्छा-बुरा अब कब समझोगे? तुम जिसे सहज समझते हो, समाज केलिए वह सबसे असहज स्थिति है। आज जिन्होंने तुम्हारे लिए तालियां बजाई है, कल उन्हीं के ताने फाँस बन कर तुम्हारी साँस कसेंगे।” माँ की ममता अपने बेटे को समाज के आघातों से बचाने केलिए तत्पर थी, बेटा समाज की जंग लगी सोच की सलाखों से भिड़ जाने को आमादा था।

“हम वो सब क्यों नहीं कर सकते हैं, जिसे हमारा दिल करना चाहे!”

“मैं नहीं जानता क्यों, लेकिन मुझे भी आपके और दीदी की तरह श्रृंगार पसंद है। मैं पढ़ाई स्पोर्ट्स सब तो कर रहा हूँ ना माँ! लेकिन मेरी रुचि कथक है, मैं इसी क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहता हूँ। आपने ही बताया है कि लड़के और लड़की में कोई भेद नहीं, दोनों के अधिकार भी सामान हैं।”
दीपक की बातें प्रभा को उसके भविष्य को लेकर भयभीत कर रही थी।
पास खड़ा मानव बेटे को सामाजिक कायदों के विरुद्ध जाते देख अधीर हो गया। हस्तक्षेप करते हुए दो टूक शब्दों में कहा “हाँ, अधिकार समान हैं, लेकिन जीवन एकदम अलग। दीपू लड़कियों की तरह व्यवहार करने वाले लड़कों को समाज गलत नजरों से देखता है। तुम बस ठिठोली का कारण बन कर रह जाओगे। कौन से माता-पिता अपने बच्चों का अहित चाहेंगे? अब तक हमने तुम्हारी बेवकूफियों को सबकी नजरों से छिपाया है, फिर भी तुम्हारे हाव-भाव पर फब्तियाँ कसी जाती हैं। अब सारी नादानियाँ बंद, आम लड़कों की तरह रहोगे तुम। कथक और साज-श्रृंगार से दूर केवल पढ़ाई और स्पोर्ट्स पर ध्यान दोगे।”

मैं तुम्हें कथक करने की इजाजत नहीं दे सकता….बिल्कुल नहीं!” कहते हुए मानव ने दीपक के हाथों से घुँघरू की पट्टी छीन कर फेंक दी।

दीपक देर रात छत पर बैठा रहा। काफी देर बाद वही तारे का टुकड़ा फिर हौले से आसमान में चमका जैसे दीपक के माथे पर हाथ फेर कर उसे हौसला देना चाहता हो। “मैं भी आज टूट गया। सितारा बनना चाहता था, लेकिन अधूरा रह गया। मेरे सपने नीचे ड्राइंग रूम में बिखरे परे हैं, उन्हें समेटने की इजाजत नहीं है मुझे। तुम तो टूटने के बाद भी कितनों की दुआ पूरी कर उनकी किस्मत चमकाते हो, मैं…. मैं नहीं चमक पाऊंगा अब कभी” दीपक फूट-फूट कर रोने लगा।
“दीपू तू तो बच्चों की तरह रोने लग पड़ा।” बहन रश्मि ने उसे पीछे से बाजू में जकड़ा और उसे पुचकारती हुई बोली “ओ मेरा बाबू! मेरा भाई ऐसे हार नहीं सकता।”
“अब भी कोई उम्मीद बची है क्या दीदी! मुझे कोई नहीं समझता।” दीपक सिसक रहा था।
“इस टूटे तारे को देखा ना तुमने, इसने टूटने के बाद भी चमकना नहीं छोड़ा। फिर तुम क्यों अंधेरे में गुम होने की बात करते हो। माँ-पापा की चिंता वाजिब है। समाज किसी भी बदलाव को सहजता से नहीं अपनाता। ताने तो सुनने पड़ेंगे बॉस! लेकिन जिस दिन तुम्हारी चमक मेरे और तुम्हारे अलावे दुनिया के बाकी लोगों ने देखा, तभी सारे बदलाव सकारात्मक हो जाएंगे।” रश्मि के शब्द दीपक की पीड़ा कम कर रहे थे।
“मैं पापा से बात करूंगी कि तुम्हें भी मेरे साथ दिल्ली भेज दें। वहाँ तुम्हे अच्छे गुरु भी मिलेंगे और कोई बंदिश भी नहीं होगी। बस एक वादा चाहूंगी पढ़ाई के साथ कोई समझौता नहीं।”
दीपक ने दिल्ली आकर पढ़ाई करते हुए अपने हुनर को भी शिद्दत से तराशा। नृत्य में उसका प्रदर्शन सबका ध्यान खींचने लगा। लेकिन जिसमें निखरने का माद्दा होता है, किस्मत उसे उतना ही अधिक तपाती है। शीघ्र ही दीपक का सामना जीवन की नई चुनौती से होने वाला था। अखबार और इंटरनेट के ज़रिए दीपक के नृत्य की ख़बर उसके माता-पिता तक गई तो उनका स्वाभिमान चकनाचूर होकर बिखर गया।
क्रोधावेश में मानव ने बिना विचारे बेटे को वापस घर न आने की सज़ा मुकर्रर कर दी। एक बार फिर दीपक भयाक्रांत था। आसमान में भी घना बादल छाया हुआ है, हिम्मत की एक अनजानी डोर जो संयोग से ही सही, लेकिन तारे के रूप में उसे अपने करीब मिलती थी, वह भी छूटती नज़र आने लगी। दीदी के जॉब का पहला असाइनमेंट है, वह भी बैंगलुरू गई है। डर लगता है आज रात की अँधेरी गुफा में दीपक कहीं गुम न हो जाए।
परन्तु दीपक ने तो यही सीखा था कि टूट कर भी चमकना नहीं छोड़ना है। इसलिए निराशा के बादल को हटा कर उसने अपने आप से कहा “नहीं मैं अब पीछे नहीं हटूंगा, ये सिर्फ मेरा संघर्ष नहीं है। यदि मैं खुद को साबित कर पाया तो कितनों केलिए जीने की सही दिशा चुनना सरल हो जाएगा। तब शायद माँ-पापा भी मुझे फिर से मेरे वास्तविक रूप में अपना ले। यदि साबित नहीं कर पाया तो अपने अस्तित्व को बदल कर मैं माँ-पापा और खुद अपने आप की आँखों में कब तक धूल झोंकता रहूँगा? समाज का डर माँ-पापा को मुझसे दूर खींच रहा है, लेकिन मैं जानता हूँ उनका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ है।” दीपक ने अपने मन में संकल्प किया तभी आकाश के बादलों को चीड़ते हुए तारे का टुकड़ा चमका, दीपक का मनोबल बढ़ाने से उसे कोई कैसे रोक सकता है। दीपक समझ गया उसकी दिशा सही है।
वक्त की रफ़्तार के साथ दीपक का व्यक्तित्व नारीत्व के रस व रंगों से परिपूर्ण हो कर निखरता रहा। समाज उसे देख कर जो विशेष टिप्पणियाँ देता था, दीपक उसे अपने कानों के रास्ते ही विदा कर देता। वह जानता था एक भी फ़ब्ती दिल तक गई तो वह ऐसी गहरी खाई में समा जाएगा, जिससे निकलना नामुमकिन है। उसके दिल तक जाती थी तो बस उसके कला को मिलने वाला प्रोत्साहन, जिसकी ऊर्जा उसे लगातार लक्ष्य की ओर अग्रसर कर रही थी।
धीरे-धीरे कथक नृत्य में दीपक एक जाना-माना नाम बनता गया। निरंतर कई सारे पुरस्कार और सम्मान मिलते रहे। दीपक अपने प्रत्येक इंटरव्यू में अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता और बड़ी बहन को देता। आज लगभग तीन दशक बाद दीपक को कथक में विशेष योगदान केलिए पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। समारोह में वृद्ध हो चुके मानव और प्रभा भी उपस्थित थे।
“स्टेज पर स्त्रियों की तरह प्रदर्शन या परिवार की इज्जत, तय करो तुम्हें क्या चाहिए..!” वर्षों बाद आज मानव के अपरिपक्व निष्ठुर शब्द उसी के कान भेद रहे थे। “दीपक ने मेरे रूढ़ियों की जंजीरें न तोड़ी होती तो आज उसको मिले सम्मान से हम गौरव न पा रहे होते। आकाश छूने केलिए कुंठा की जंजीर तोड़नी पड़ती है, चुनौतियों का पहाड़ लाँघना ही होता है। मानव गर्व से बुदबुदा रहा था।

सभास्थल के बाहर इंटरव्यू देते हुए दीपक ने कहा “यह केवल मेरी कला का सम्मान नहीं, बल्कि मेरे भीतर छिपी उस स्त्री का भी सम्मान है जो मुझे निरंतर संघर्ष के राह पर अटल रहने को उकसाती रही।”

“आज मैं आप सबके सामने कहता हूँ की एक पुरुष होते हुए भी मुझे स्वयं को एक स्त्री के भाव-भंगिमा के करीब पाना भाता है। कुदरत ने तो हमें इंसान बनाया है ना! फिर हम क्यों इंसानों के अधिकार, उनके जीने के तरीके और उनके आचरण को निर्धारित करने का अवैध स्कूल चलाने में लगे हैं। बच्चों को सच्चा और अच्छा इंसान कैसे बनाना है, यह शिक्षा दीजिए ना! ना कि यह की पुरुष और स्त्री के जीने का तरीका कैसे भिन्न रखा जाय। हम सब भगवान की कृतियाँ हैं, भगवान तो नहीं!”

“उसने हमें जैसा बनाया उसी रूप में स्वीकार करने से परहेज क्यों? उसने विविधता का कुछ रंग बिखेरा है तो उसकी मर्जी को सलाम करें। और बात रही कथक की तो कोई भी कला किसी खास लिंग के आधिपत्य का मोहताज नहीं।

“आँखे बंद कर अपने दिल को टटोलिये, दिल किस कला की ओर भागता है, उस राह पर तल्लीनता से चल दीजिए। आपका हुनर आपके भीतर के कलाकार को लगातार आवाज़ दे रहा है, जरूरत है उस आवाज़ को सही समय पर सुन लेने का। तारे का एक टुकड़ा आपकी हसरत को पूरा करने केलिए निरंतर आपके साथ है। बस जरूरत है अपने वास्तविक सच को समाज को बताने से पहले उसे स्वयं को बताने का।
ब्रिटिश लेखिका वर्जीनिया वूल्फ ने कहा था “यदि आपके पास खुद को सच बताने की हिम्मत नहीं है, तो निश्चित रूप से आप अपने बारे में दूसरे किसी को भी सच नहीं बता सकते।” आज मैं भी आपसे दावे के साथ कहता हूँ जो आपने अपने सच को सम्मान दिया तो दुनिया भी आपको सम्मान दे कर रहेगी।”
सूरज की रौशनी में भले कोई देख नहीं पा रहा था, लेकिन तारे का वह टुकड़ा लगातार चमक कर इतरा रहा था। उसका दीपक जगमगा जो रहा था।

 

 

 

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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11 COMMENTS

  1. बहुत अच्छी कहानी। समाज में सार्थक बदलाव के लिए प्रेरक।

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