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ऑफिशियल गर्लफ्रेंड

एमबीए की क्लास नंबर 12 के सामने से निकलते हुए अमर के पाँव कुछ ठिठक गए। अंदर झाँका, प्रोफेसर सुदेश पढ़ा रहे थे। कमरा छात्र-छात्राओं से खचाखच भरा था। इतनी भीड़ में भी अमर की दृष्टि ने प्रिया को खोज लिया। अपने लक्ष्य को देखते ही अमर को अनायास हँसी आ गयी, पर अगले ही पल उसने अत्यंत सफाई से अपने होंठ स्थिर मुद्रा में भींच लिए। प्रिया भी अमर को देख रही थी, पर उसका यूं मुस्कुराहट दबा जाना उस को रास न आया। प्रिया ने अपनी नज़रें फेर लीं। कुछ क्षण वहीं रुककर अमर आगे बढ़ गया।
मोहब्बत के मायने सबके लिए अलग हैं। कौन कब किसकी और कैसी मोहब्बत में पड़ जाये इसका पता खुद मोहब्बत को भी नहीं होता – यह बात जितनी सच है उतना ही सच यह भी है कि मोहब्बत को दिल की गहराइयों में छुपाकर रखना दिल में मरोड़ उत्पन्न करता है।
6 फुट लंबा और बलिष्ठ अमर बहुत आकर्षक था पर उसकी शर्माने की आदत शराफत की जगह कमजोरी बनती जा रही थी। प्रिया को कई बार वो कॉफी पिलाने कैंटीन ले गया था, फिल्में भी साथ देखीं थीं, खाली समय में कॉलेज में वो दोनों साथ-साथ ही रहते, यहाँ तक कि प्रिया अपने हर काम में अमर की उपस्थिती पसंद करती। फिर भी अमर आज तक प्रिया से अपने दिल की बात नहीं कह पाया था।
उसके द्वारा ढूँढे गए प्रिया के घर जाने के बहाने भी पानी की तरह पारदर्शी होते, जिनके उस पार छुपा अमर का प्रेम प्रिया आसानी से पढ़ लेती। कभी वह प्रिया के घर किसी मित्र का फोन नंबर लेने आ जाता तो प्रिया टोकती, “व्हाट्सएप पर टैक्स्ट कर देते, मैं बता देती।” कभी ये पूछने आ पहुँचता कि मेरा लाल स्कार्फ तो नहीं रह गया तुम्हारे पास, तो प्रिया हँसती, “अपने गले में भी ढूंढ लेते, पहना तो हुआ है तुमने!” इन सभी हरकतों में उसके सुर्ख लाल हो आए गाल सारी कहानी बयान कर देते।
अमर अपने कॉलेज की बास्केट बॉल टीम का कैप्टेन था। प्रिया घंटों बैठकर उसका मैच, यहाँ तक कि अभ्यास भी
देखा करती। काश, प्रिया के पिता जीवित होते तो वो अमर से साफ-साफ बात कर, उसके माता-पिता से मिल आते। अपनी बेटी के दिल का हाल माँ जानती थीं लेकिन प्रिया के कहने पर चुप थीं। प्रिया के लिए अमर जैसा सभ्य, सुशील और होनहार वर उसकी माँ को चिराग लेकर ढूँढने से भी नहीं मिलेगा। उन्होने स्वयं दोनों को एकांत देकर मन की बात कहने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी। कभी बाज़ार जाने के बहाने तो कभी पड़ोसन के घर किसी काम से, किन्तु जब वह लौटतीं तब भी अमर संकोची मुस्कुराहट ओढ़े सोफ़े के कोने से चिपका होता।

प्रिया जानती थी कि अमर उससे प्यार करता है, और वो भी अमर को बेतहाशा चाहती थी। पर कहे कौन? अमर झिझकता था, और प्रिया का मानना था कि पुरुष के पीछे भागने से वह स्त्री का आदर नहीं करता।

कॉलेज के कई लड़के प्रिया से फ्रेंडशिप करने को आतुर रहते थे। उसके सौन्दर्य और व्यक्तित्व ने उसे शमा और चाहनेवालों को परवाना बना छोड़ा था। इन परवानों में अव्वल नंबर था रमन जो स्केटिंग में हर प्रतियोगी को मात देता था। रमन को कोई हिचकिचाहट नहीं होती थी प्रिया से ये कहने में कि वो उसे चाहता है। फिर भी वो प्रिया का विश्वास नहीं जीत पाया था जिसका कारण उसकी अपनी बेवकूफी थी।
प्रिया ने उसे कॉलेज की दो अन्य लड़कियों को यही बात कहते स्वयं सुना था। प्रिया को रमन की ये हरकत सख्त नापसंद थी। हांलाकी दोनों एक ही स्कूल से एमबीए कॉलेज तक साथ आए थे। वो यकीनन अब तक रमन को दुत्कार चुकी होती यदि अमर इतना संकोची न होता। रमन ही तो प्रिया का एकमात्र बहाना था अमर को जलाने का, ताकि वह प्रिया के हाथ से निकल जाने के डर से कदम आगे बढ़ाए।
कॉलेज का अंतिम सेमेस्टर था। प्लेसमेंट कंपनियाँ आकर लगभग सभी को जॉब ऑफर दे चुकी थीं। किस्मत से अमर और प्रिया को एक ही कंपनी में जॉब मिल गया जिससे अमर जितना प्रसन्न हुआ, प्रिय ने उतनी गर्मजोशी नहीं दर्शाई। हांलाकी दोनों ने जॉब ऑफर स्वीकार कर लिए थे लेकिन प्रिया अब और इंतज़ार नहीं करना चाहती थी। कम से कम अमर उसे प्रपोज़ कर गर्लफ्रेंड का दर्जा तो दे। अब वह यूँ ही अंधेरे में आगे का समय खर्च नहीं करना चाह रही थी।

उसके मन को विश्वास था कि अमर के दिल के पट उसी के लिए खुलते हैं किन्तु जो बात ‘ऑफिशियल गर्लफ्रेंड’ बनने में होगी, वो दिल की परतों में छुपे प्यार का अनुमान लगाने में कब तक रहती भला!

परीक्षाएँ समाप्त हो चुकी थीं। सबके बिछुड़ने का समय आ गया था। प्रिया उदास ज़रूर रहती पर अपनी बात पर अडिग थी कि प्रस्ताव की पहल अमर को ही करनी होगी। फिर एक शाम अचानक प्रिया को कुरियर से गुलाबी रंग का लिफाफा मिला। उसे खोला तो अंदर एक पत्र था –
          मेरी प्यारी प्रिया, तुम हो मेरी न्यारी प्रिया
          तुम्हें चाहते हैं सभी पर तुम हो सिर्फ मेरी
          यदि मैं शरमाऊँ, लजाऊँ,
         अपने दिल की बात तुमसे कह न पाऊँ
          फिर भी तुम्हारे दिल में चला आऊँ
          तो तुम भी मेरे दिल का हाल जान लेना
          मेरा साथी बन मेरा जीवन संवार देना ।I
प्रिया ने धीरे से पत्र माँ के हवाले कर दिया। माँ से भी ध्यान से पढ़ा, फिर बोलीं, “अमर या रमन?”
“अभी पता चल जाएगा”, कहते हुए प्रिया अपने कमरे की ओर धड़धड़ाती भागी और हाथ में ढेर से रंगीन लिफाफे ले आई। वे सभी त्यौहारों पर दिये ग्रीटिंग कार्ड थे। “चलो माँ, हम लिखावट मिलाते हैं”, और प्रिया ने सभी कार्ड मेज़ पर बिखरा दिये।
“हो न हो, ये पत्र अमर ने ही लिखा है”, माँ ने निष्कर्ष निकाला, “देखो न, शब्दों के बीच की दूरी… और ‘त’ लिखने का ढंग… और फिर ‘ल’ भी तो वही है।“ माँ ने बाहें पसार दीं और प्रिया उनमें समा गयी। प्रिया की आँखों में खुशी के आँसू थे और माँ तो बस अपनी बेटी कि खुशी पर फूली न समा रही थीं। उनकी इच्छा पूरी हो गयी थी।
अगली शाम जब अमर घर आया तो माँ ने खुशी से उसे प्रिया के कमरे तक छोड़ा और खुद रसोई में चली गईं। कमरे के दरवाजे पर खड़ा अमर बिस्तर पर पसरी प्रिया को निहारने लगा, “कितनी सुंदरता समाई है प्रिया में…”, वो सोच ही रहा था कि प्रिया उसकी ओर दौड़ पड़ी। अमर के गले में अपनी बाहों के हार पहनाकर चहकती हुई कहने लगी, “मुझे तुम्हारा प्रस्ताव तहेदिल से स्वीकार है।“
अमर हतप्रभ-सा खड़ा स्थिति को समझने में स्वयं को असमर्थ पा रहा था। वो अमर जो बास्केटबॉल में अच्छे-अच्छों के पसीने छुड़ा देता था, इस समय स्वयं पसीनोपसीन हो रहा था। अपनी बाहों के घेरे से उसे निकालते हुए प्रिया बोली, “ठहरो, मैं माँ से कॉफी बनाने को कहकर आती हूँ।“
स्वयं को संयत करते हुए अमर की नज़र मेज़ पर पड़े गुलाबी पत्र पर पड़ी। उठाकर उसने पढ़ा, और फिर उसी मुद्रा में वापिस रख दिया। अमर शर्मीला हो सकता था, अत्यधिक शांत हो सकता था, और प्रिया के मामले में ज़रा ढीला भी हो सकता था, पर अपने लिए “शरमाऊँ”, “लजाऊँ” जैसे भाव वह कतई नहीं लिख सकता था। अमर ने चाहा कि रमन का सिर तोड़ दे, नाक फोड़ दे। मगर अगले ही पल उसके मन ने रमन का धन्यवाद किया जिसके कारण उसे ये सुनहरा अवसर मिला।
दोनों ने नौकरी जॉइन कर ली। उनके बीच की सकुचाहट भी अब हवा हो चुकी थी। दोनों अपने आनेवाले जीवन के सपने बुनते और प्यार की लहरों में डूबा-तैरा करते। पर अमर का मन अक्सर ग्लानि से भर उठता। क्या होगा जब कभी प्रिया को पता चलेगा कि वो पत्र अमर ने उसे लिखा ही नहीं था? क्या होगा अगर कभी रमन ने आकर तकाजा कर दिया कि वो गुलाबी प्रेमपत्र उसका था?
कॉलेज की रीयूनियन पार्टी में रमन और प्रिया का एक बार फिर आमन-सामना हुआ। अमर की साँस गले में ही अटकी हुई थी। कहीं बात न खुल जाए… वो प्रिया और रमन को एक पल को भी अकेले नहीं छोडना चाहता था। पर जब प्रोफेसर सुदेश ने उसे किसी काम से बुलाया तो उसे जाना ही पड़ा।
अकेला मौका पा रमन ने प्रिया ने पूछा, “वो उस दिन जो तुमने अपने ही घर कुरियर भेजा था… गुलाबी लिफाफे में आँटी के लिए थैंक्यू-लेटर, कैसा लगा वो आँटी को?”
“वो… बहुत खुश हुईं वो! पर याद है न कि ये हम दोनों के बीच एक सूपर-सीक्रेट है”, अपने होंठों पर उंगली रखते हुए प्रिया ने कहा और हँसने लगी।

 

 

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