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छह गज का प्रेम

ये लेख कलामंथन समूह की लेखिका मीतू वर्मा द्वारा लिखित है। आज के दौर में पत्राचार का सिलसिला थम चुका है। कलामंथन ने दिया प्रेमपत्र लिखने का न्योता और हमे मिले कुछ खूबसूरत पत्र। मीतू जी का प्रेम पत्र “छह गज का प्रेम ” ज़रूर पढ़िए !
मेरी प्यारी गुलाबो
मधुर याद
           तुमसे मेरे इश्क की शुरुआत बचपन से हुई जब पहली बार माँ की अलमारी में तुम्हें हैंगर पर लटके देखा। माँ की गुलाबी रंग की बनारसी सिल्क साड़ी में असली चाँदी के बूटे, पल्लू पूरा भरा हुआ, चौड़ा बॉर्डर,इतनी मुलायम और चमकदार की आँखें चौधियाँ जाए! सब साड़ियों से बिल्कुल अलहदा, नजर तुम पर से हटने को तैयार ही नहीं थी, पहली नजर में ही तुम मुझे भा गई, अब माँ जब भी अलमारी खोलती मैं भागकर तुम्हें निहारने आ जाती। वैसे भी मां की अलमारी मेरे लिए हमेशा से कौतूहल का विषय था। बस तभी से हमारा पहला प्यार शुरू हो गया माँ की खूबसूरत गुलाबी साड़ी से यानि तुमसे!
           वह दिन मेरे लिए बहुत खास होता जिस दिन माँ तुम्हें धूप दिखाने के लिए छत पर निकालती उस पूरे दिन मैं भी तुम्हारे साथ धूप में बिताती, कहीं कोई तुम्हें छू न दे और तुम मैली न हो जाओ इसका पूरा ध्यान रखती, जब तक तुम दोबारा अलमारी में और अलमारी की चाबी माँ की कमर में लटक नहीं जाती मैं बराबर तुम्हारे साथ बनी रहती ।
मेरी इन हरकतों से घर में हर कोई मुझे छेड़ता रहता । माँ की गाहे बगाहे दी जाने वाली झिड़की ” तेरी शादी में तुझे दे दूँगी ससुराल लेकर जाना रोज निहारती रहना “मुझे बहुत प्रिय थी, क्योंकि इसमें तुम्हारी, माँ के प्यार और ससुराल की जो बात होती ।
              याद है तुम्हें मैं प्यार से गुलाबो कहती थी । और भैया स्नेह से हम दोनों को जान – प्रान कहते थे क्योंकि तुम मेरी जान थी और मेरे प्राण तुम में अटके रहते थे । समय के साथ साथ हमारा इश्क़ भी परवान चढ़ता गया। मैं निखरती उम्र के गुलाबी दौर से गुजर रही थी और तुम्हारी बढ़ती उम्र के साथ तुम अभी भी वैसी ही थी खूबसूरत, चमकीली,जैसे आसमान के सितारे नीचे आ कर तुम में समा गए हैं।
फिर वो दिन भी आ गया जब पहली बार हमने तुम्हें अपने तन पर डाला था । बारहवीं की फेयरवेल में,माँ ने पाचसों साड़ियाँ निकाल दी पर मेरा दिल तो तुम पर ही अटका था । वो कहते हैं ना किसी बच्चे को  उसका मनचाहा खिलौना मिल जाए तो वो कैसे खुशी से पागल हो जाता है वैसे ही मेरा भी हाल था । उस दिन मेरे पैर ज़मीन पर ही नहीं थे ।
मैं फूली न समाती थी। बार बार तुम्हें अपने तन पर लपेट कर कभी सीधा पल्ला कभी उल्टा तो कभी साइड में लटका कर अपने को आईने में निहारती। फिर वो दिन भी आ पंहुचा जब मैं तुम्हें पहन इतराती हुई स्कूल जा रही थी। सबकी निगाहें मुझ पर ही अटकी थी वैसे मैं लग भी रही थी बला की खूबसूरत और मैं अपने आप को जूही चावला से कम नहीं समझ रही थी । समझती भी क्यूँ ना मैं अपनी मुहब्बत को जो लपेटे हुए थी
        फिर माँ नहीं रही और कुछ सालों बाद मैं भी ससुराल आ गई साथ में माँ के प्यार के रूप में तुम्हें भी बक्से में संग ले आई। वैसे तो मैं जब भी साड़ी पहनती हमेशा लोगों की तारीफ मिलती पर तुम्हें पहन कर मिली तारीफ के आगे सब छोटी थी ।उम्र की साँझ बेला में अब तक मेरी अलमारी में हजारों सड़ियाँ आई और गई पर तुम्हारे जैसा खूबसूरत रूप किसी के पास नहीं था। तुम अब भी वहीं हो मेरे दिल में, तुम्हारी जगह सुरक्षित है,वैसे ही जैसे पहले प्यार के गुलाब को लोग संजों कर रखते हैं
             आज भी जब तुम्हें तन पर डालती हूँ तो एक अद्भुत सुकून का अहसास होता है । तुम्हारे कोमल स्पर्श को मैं आज भी महसूस करके फिर से वहीं बचपन में पहुँच जाती हूँ ।
गुलाबो तुमको आज भी हम बेइंतहा मुहब्बत करते हैं । मेरी माँ की धरोहर उनकी प्यारी निशानी,तुम को आजीवन यूँ ही संजो कर रखेंगे
           

                                                                                                      तुम्हारी प्रेमिका  
                                                                                                     तुम्हारी संरक्षिका                                                                                                                  मीतू 

 

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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