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ताज की मोहब्बत

 

ये लेख कलामंथन समूह की लेखिका किरण शुक्ला द्वारा लिखित है। आज के दौर में पत्राचार का सिलसिला थम चुका है। कलामंथन ने दिया प्रेमपत्र लिखने का न्योता और हमे मिले कुछ खूबसूरत पत्र। किरण शुक्ला का प्रेम पत्र “ताज की मोहब्बत ” ज़रूर पढ़िए !

 

प्रिय ताज,
कैसे हो?
अच्छे तो हो न!
आज आलमारी साफ करते हुए एलबम हाथ लग गई। उन यादों की एलबम को पलटते हुए तुम्हारा ख्याल आ गया। वो दिन बरबस ही मेरी आंखों के सामने तैर गया जब मैं और तुम पहली बार रुबरु हुए थे।
याद है, तुम्हे वो जून की गर्म दुपहरी, जब आकाश में चमकते सूरज की तपिश से सबकुछ मानों जल रहा था और मैं ठगी सी नज़रें तुम पर टिकाए नंगे पांव चलकर तुम्हारे नज़दीक आई थी।
देखने वालों को ज़रूर लगा होगा “कोई दीवानी अपने महबूब से मिलने जा रही है।”
सच कहूं “तुम सिर्फ मेरी मुहब्बत हो! खुदा की बनाई इस कायनात में जहां वक्त के साथ रंग रुप मौसम हालात बदलते रहते हैं तुम छाती ठोंककर समय की हर ललकार का सामना करते सीना ताने खड़े हो।

हां, वक्त की धूल ने तुम पर असर दिखाया लेकिन तुम तो ठहरे तुम, हर बार किसी नए रुप में मुझे चौंका देते हो।उस जेठ की तपती दुपहरी में जब तुम्हें पहली बार देखा तो लगा जैसे कोई रूहानी इश्क तस्वीर सा मेरे रुबरु खड़ा है।

तुम्हारे छूकर गुज़रने वाली हवाएं जब मेरे बदन को छूकर निकलीं तो लगा चांदनी मुझे नहलाकर अपनी भीनी खुशबू बिखेर रही हो, उन अहसासों के निशान अब भी मेरे दामन को महकाते हैं।
दुनिया के लोग जाने क्यूं तुम्हे पत्थर कहते हैं। कोई तुम्हरे मुहब्बत की निशानी कहता है तो कुछ नामुराद अपनी महबूबा की खूबसूरती को तुम्हारी मिसाल देते हैं। ये सब मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता है।
तुम्हे पत्थर कहने वालों के दिल पत्थर हैं, वो भला क्या समझेंगे तुम्हारी धड़कनों, तुम्हारी मुहब्बत के तरानों और अफसानों को।
क्यों सच कहा ना मैंने ताज! मेरी बात से तुम इत्तेफाक़ रखोगे “मुहब्बत जिस्म में नहीं हमारी रूह में बसती है और रुह खुदा की तरह बेदाग और पाक होती है।
अरे! तुम्हारी रुह मुहब्बत से लबरेज़ है भला ऐसी कोई और मिसाल कहां है।
क्या करूं तुम हो ही ऐसे आंखों से दिल में उतर जाते हो और मैं चाहूं भी तो तुम्हें भूला नहीं पाती। जानते हो बचपन में तुम्हारी तस्वीर इतिहास की किताबों में देख तुमसे मिलने के ख्वाब देखा करती थी।
कहते हैं मुहब्बत की उम्र ज्यों ज्यों बढ़ती है पुरानी शराब की तरह उसकी खुमारी भी बढ़ती जाती है। मुझे तो बचपन में तुमसे मुहब्बत हो गई थी।
ख्वाब में ढ़ेरों तस्वीरें बनाई थी लेकिन पहली बार तुम्हें देखते ही दिल हार बैठी थी। बस ठगी सी एकटक
तुम्हारे देखती रह गई।
उम्र के साथ मेरा तुमसे इश्क बढ़ता जा रहा है। उस रोज़ यमुना किनारे तुम्हारा अक्स दरिया के पानी में नहीं बल्कि मेरे दिल में जज़्ब हो गया है। दरिया का पानी तुम्हारे अक्स को समेटने की कोशिश करता है लेकिन नाकामयाब रहता है।
रही बात मेरे दिल की तो तुम्हारा तसव्वुर भी मुझे बेचैन कर देता है ,बस जी करता है दौड़कर तुम तक चली आऊं और तुम्हारे साये से लिपट जाऊं।
इक ख्वाब सा आंखों में बस गए
इक खुशबू सा जिस्म में बस गए
इक उम्र काफी नहीं मुहब्बत के लिए
हमसाया बन मेरी रुह से लिपट गए।
जाने कितनी बातें तुमसे कहनी थी, बस यूं ही भूल जाती हूं। अपनी बेलौस मुहब्बत की खातिर तुम्हारी याद में ये खत लिख रही हूं। खतों से जी नहीं मानता जल्द तुमसे मिलना चाहती हूं। इंतज़ार में!
                                                                                                                      किरण।

 

 

 

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