Email: support@kalamanthan.in, editor@kalamanthan.in

Home Blog Contest बांझाकरी की प्रेमिल कविता

बांझाकरी की प्रेमिल कविता

ये लेख कलामंथन समूह की लेखिका प्रियंका गहलोत द्वारा लिखित है। आज के दौर में पत्राचार का सिलसिला थम चुका है। कलामंथन ने दिया प्रेमपत्र लिखने का न्योता और हमे मिले कुछ खूबसूरत पत्र। प्रियंका जी का प्रेम पत्र “बांझाकरी की प्रेमिल कविता ” ज़रूर पढ़िए !

सिक्किम,गंगटोक
737101,
10फ़रवरी 2021
प्रिय सिक्किम!!
मधुर स्मृति!
तुम्हे याद है हमारी पहली पहल मुलाक़ात, सन 2015, अप्रैल माह में हम पहली बार रु-ब-रु हुए थे | न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन पर अल सवेरे उगते सूरज के साथ मैंने ट्रेन से उतर कर एक लम्बी उबासी भरी, और अपने पति व बेटी के साथ अपना भारी सूटकेस लिए स्टेशन से बाहर चल पड़ी, फिर जल्दी से एक कार बुक कर हम तुमसे मिलने को निकल पड़े|
कुछ ही किलोमीटर चले थे के तुम्हारे लुभावने पहाड़ और बल खाती “तीस्ता ” नदी ने हमारा स्वागत किया, उसके बाद कदम दर कदम खूबसूरत नज़ारों को देख आँखे जाने कौनसे आकर्षण के वशीभूत हो गयी | एक तरफ पहाड़ों की दीवार और  दूसरी तरफ तीस्ता नदी का मोहक कलकल करता जल मेरे सफर की सारी थकान हरता गया और कार की खिड़की से आकर चेहरे को छूती ठंडी एवं स्वच्छ हवा को महसूस करते जाने कब मेरी आँख लग गयी |
अचानक! कार के ब्रेक लग कर रुकने से ज़ब मेरी तंद्रा टूटी तब मैं कुछ पल के लिए अचंभित रह गयी, क्यूंकि जो नज़ारा मेरे सामने था उसे मैं लाख कोशिश करूँ तो भी शब्दों में नहीं लिख सकती |

वो बादलों से सजा स्वर्ग लगा मुझे, उफ्फ!! ये कैसी कसक मेरे दिल को हो रही उस पल को स्मरण करते ही…. मुझे लगा मैं किसी नई दुनिया में आ गयी हूँ,हर तरफ बादल यूँ टंगे हुए थे मानो  वो उड़ते देवदूत है और इस अनूठे हरित उपवन में टहल रहे है |

रस्ते भर तुम्हारे सौंदर्यमकरन्द का रसपान करती मदहोश होती रही, और आखिर तुम्हारे ह्रदय अर्थात् तुम्हारी राजधानी”गंगटोक” के जाने किस जादुई स्पर्श को महसूस किया मैंने,, जो तुमसे इश्क़ कर बैठी | वो कहते है ना इश्क़ पहली नज़र में हो जाता है जो मुझे हो गया तुमसे,तुम्हारे बादलों वाले दिल (गंगटोक )से |
तीन दिन दो रात ये गिनतियाँ भले छोटी हो मगर इन गिनती के लम्हों में तुम्हारे साथ मैंने मानो एक पूरा काल्पनिक जीवन अपने वास्तविक जीवन में अनुभव किया और जिया भी |
हनुमान टोंक पर कोहरे के साये ज़ब मुझे छूते हुए गुजरते तो पहले प्यार की पहली सिरहन सी तन मन में हो जाती | और वो “बांझाकरी” झरने पर मैंने उस अविरल जल की कलकल से तुम्हारी प्रेमिल कविता को सुना जो जाने कब से उसे निरंतर गुनगुना रहा है, मैंने सुना था कि नेपाली किंवदंती में बांझाकरी अध्यात्मिक ऊर्जा से पूर्ण कोई व्यक्ति है जो आज भी तुम्हारी गुफाओं व जंगलों में आत्माओं की पूजा करता है!

बान का अर्थ है “जंगल” और झाकरी का अर्थ “महरम लगाने वाला ” होता है | ये अर्थ मुझे सार्थक लगा क्यूंकि मैंने अपने मन पर बांझाकरी के अद्भुत रूप को किसी अनुलेप सा महसूस किया जो मेरी आत्मा को छू कर तृप्ति से भर रहा था |

रात्रि में स्वच्छ गगन पर अधूरा चाँद अपनी मद्धिम प्रकाश से यूँ प्रतीत हो रहा था मानो रात के एक आले (दीवार पर बना ताक )पर किसी ने दीपक रख छोड़ा हो और तुम्हारे ह्रदय (गंगटोक ) की शांत पड़ी सड़के किसी विरहिणी के उलझें केशों सी प्रतीत हो रही थीं|
दिन के मुकाबले रात का अनुभव और भी अलौकिक था ज़ब मैं कुछ कदम उन खाली सड़क पर टहलने लगी जहां दिन भर टैक्सी , कार दौड़ते रहे है,, किसी अबोध बच्चे के जैसे तुम दिन भर खेल कर रात में सोये रहते हो|
ऐसे तमाम एहसास और तुमसे मिले स्नेह के साथ मैं लौट तो आयी मगर मेरा ह्रदय तुम्हारे पास ही छूट गया, आज भी मैं ज़ब सकून के पल चाहती हूँ तब सबसे पहला स्मरण तुम्हारा होता है, मैं फिर से आउंगी तुमसे मिलने,, तुमसे प्रेम जो मेरे ह्रदयतल पर नन्ही क्यारी सा उपज गया है उसे अपनी कल्पनाओं के नीर से सींचती रहती हूँ…फिर मिलने की उम्मीद की किरणों से उस प्रेम क्यारी को पोषित करती हूँ,, दूर हो कर भी इस तरह प्रेम निभाती हूँ |
मेरी शुभकामनायें तुम्हे, तुम हमेशा यूँ ही सरल, निश्छल स्नेह से परिपूर्ण रहना ताकि ज़ब भी मैं आऊं तुम्हे पहले प्यार सा प्राप्त कर पाऊं |अब  मजबूरी के अल्पविराम के साथ कलम और अपने ह्रदय में उठती संवेदनाओं के उफान पर विराम लगाती हूँ | जल्दी ही हम फिर मिलेंगे इस उम्मीद के साथ तुम्हे मेरा बहुत स्नेह|
                                            तुम्हारी दर्शनाभिलाषी,
                                     प्रियंका गहलौत (प्रिया कुमार )
                                         मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

हमें फोलो करे Facebook

Make your Profile Today

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

अप्रैल माह – कहानी लेखन प्रतियोगिता

क्या लेखन आपकी कल्पना की अभूतपूर्व उड़ान है ? क्या कहानियां एवं कथा साहित्य आपकी रूचि है ? क्या दूसरों की लिखी कहानियों को पढ़ आपको...

इतना शोर इतनी हाय

कल्पना में सत्यता का शब्द पिरोए हम-तुम रोएं, गांव की हो, आंचल ढंकती नहीं क्यों तुम सुहागन हों, चूड़ियां खनकती नहीं ‌क्यों, कामकाजी हो, हर वक्त चलती नहीं...

गुलाब

  रेड लाईट देखते ही पीयूष ने गाड़ी रोकी। आगे-पीछे कुछ और गाडियांँ खड़ी थी। वह रेड लाईट की ओर देख रहा था....उफ्फ! पूरे मिनट...

आधुनिक युग की मीरा – महादेवी वर्मा

रंगोत्सव पर जन्मी,आजीवन श्वेताम्बरा, "छायावाद की सरस्वती " - कवयित्री महादेवी वर्मा बीन भी हूँ मैं, तुम्हारी रागिनी भी हूँ, नींद भी मेरी अचल, निस्पंद कण-कण...

Recent Comments

Manisha on गुलाब
Rajesh Kumar on गुलाब
KUMAR PRITESH on गुलाब