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कवि महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘ निराला’

 

वर दे, वीणावादिनी , वर दे!
प्रिय स्वतंत्र- रव अमृत-मंत्र तव
भारत में भर दे!
काट अंध- उर के बंधन स्तर
बहा जननी ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर,
जगमग जग कर दे!
नव-गति, नव-लय, ताल -छंद नव
नवल कंठ , नव जलद- मंद्र-रव
नव नभ के नव विहग- वृंद को
 नव पर, नव स्वर दे,
 वर दे, वीणावादिनी, वर दे!

भारत -वर्ष के किसी भी हिंदी साहित्य सभा, कवि सम्मेलन तथा शिक्षा केंद्र के सांस्कृतिक अनुष्ठान महाकवि निरालाजी द्वारा लिखित इस ‘सरस्वती वंदना’के बिना सम्पूर्ण नहीं होते ।
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला’ छायावाद के चार मुख्य कवियों में से एक हैं, जिन्हें छायावाद का ‘महेश’ कहा जाता है। औघड़, अक्खड़, बेपरवाह, बेतरतीब जीवन के झंझावातों को आँकता हुआ आत्मा की अस्मिता का उजाला ।ऐसे थे महाप्राण निराला।

“बाल झबरे, दृष्टि पैनी, फटी लूंगी, नग्न तन”
किन्तु अन्तर्दीप्त था,आकाश सा उन्मुक्त मन”
मूलतः उत्तरप्रदेश के उन्नाव जिले की गढ़कोला नामक गाँव के निवासी निराला जी का जन्म 21 फरवरी 1896  में वसंत-पंचमी के दिन बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल राज्य के एस्टेट में हुआ था। पिता श्री रामसहाय त्रिपाठी एस्टेट में कर्मचारी थे।रविवार को जन्म होने के कारण सूर्य उपासिका माता ने इनका नाम सूर्य कुमार रखा था, जिसे निरालाजी ने खुद बदलकर सूर्यकांत कर लिया था।
शिक्षा: हाई स्कूल तक की पढ़ाई हिंदी, संस्कृत और बांग्ला भाषा के माध्यम से हुई।
निराला’ जी ने तीन साल के उम्र में माँ और युवावस्था के पहले ही पिता को खो चुके थे। 15 वर्ष के आयु में उनका विवाह मनोरमा देवी के साथ हुआ। 1918 में प्रथम विश्व युद्ध के बाद फैली महामारी में निराला के भाई, भाभी, काका रामलाल और पत्नी चल बसे। अंत में पुत्री , सरोज , की मृत्यु ने निराला को भीतर से झकझोर दिया। पत्नी की प्रेरणा से निरालाजी की संगीत और हिंदी साहित्य में रुचि पैदा हुई, पहले वे बांग्ला भाषा में लिखते थे। रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद की विचारधारा ने निरालाजी पर विशेष प्रभाव डाला। निरालाजी की पहली कविता ‘जन्मभूमि’, मासिक पत्रिका ‘प्रभा’ में प्रकाशित हुई। पहली कविता संग्रह ‘अनामिका’ तथा पहला निबंध,’ बंग भाषा का उच्चारण’ है ।
1918 से 1922 तक महिषादल राज्य की सेवा, उसके बाद स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य,कोलकाता के रामकृष्ण आश्रम में रहकर 1922-23 के दौरान “समन्वय’ ” पत्रिका का सम्पादन,1923 के अगस्त में “मतवाला” पत्रिका के संपादक मंडली में, सम्भवतः इसी समय उन्होंने अपना उपनाम ‘निराला’ चुना। फिर लखनऊ में ‘गंगा पुस्तक कार्यालय’ से निकलने वाली मासिक पत्रिका “सुधा” से 1935 तक संबद्ध रहे। स्वतंत्र लेखन के दौरान कहानियाँ, उपन्यास, निबंध भी लिखे, पर उनकी ख्याति विशेष रूप से कविता के कारण ही है।
निरालाजी हिंदी में मुक्त छंद के प्रवर्तक माने गये हैं। निरालाजी की पहली कविता ‘
जूही की कली ‘(1916) मुक्त छंद में लिखी होने के कारण तत्कालीन ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक कवि महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा अस्वीकृत हुई थी ! मुक्त छंद को समकालीन साहित्य समाज में ‘रबड़ छंद या केचुए छंद’ कहा जाता था। निरालाजी ने लिखा था
  तब लौटी रचना ले के उदास,
  ताकता रहता मैं महाकाश!
1921 में, ‘सुधा’ पत्रिका में ‘जूही की कली’ प्रकाशित हुई । निरालाजी की समस्त रचनाओं का संग्रह ‘निराला ग्रंथावली’ के रूप में 8 खंडों में प्रकाशित किया गया।
निरालाजी की कविताओं में जीवन का यथार्थ चित्रण जैसे मानव की पीड़ा, परतंत्रताओं के प्रति तीव्र आक्रोश,
अन्याय तथा विषम जीवन परिस्थितियों के प्रति संघर्ष की गूंज सुनाई देती है, उदाहरण,’ वो तोड़़ती पत्थर’ कविता । इलाहाबाद के पथ पर श्रमवाला को पत्थर तोड़ते हुए देखकर निरालाजी के अंदर जो टूटता है वह पत्थर से भी भारी है, वह इलाहाबाद जहाँ की गंगा मुक्ति की गीत सुनाती है, जहाँ के स्वराज आनंद भवन, स्वतंत्रता संग्राम का केंद्र रहा हो, वहाँ नारी की यह दशा ? निरालाजी के मन को व्यथित किया था,
वह तोड़ती पत्थर;
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर-
वह तोड़ती पत्थर।
कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बंधा यौवन,
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार:-
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।
चढ़ रही थी धूप;
गर्मियों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप;
उठी झुलसाती हुई लू
रुई ज्यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगीं छा गई,
प्रायः हुई दुपहर :-
वह तोड़ती पत्थर।
देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार;
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।
एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा-
“मैं तोड़ती पत्थर।”
इस पानी की धार जैसी कविता में साम्राज्यवाद और पूँजीवाद का पत्थर टूट रहा है, ऐसा प्रतीत होता है।निरालाजी की उपर्युक्त कविता के प्रकाशन के बाद कवि भगवती जी ने कहा, “इधर हाल ही के दिनों में उनकी विचित्रता सीमा तोड़ने पर आमादा हो गई, अगर उल-झुलुल बातें लिखना, उनकी प्रचार\ करना, लोगों की सुरुचि पर प्रहार करना, अगर जनमत या लोकमत की भद्दता पर हँसी उड़ाना ही उत्कृष्ट कला है तो हम स्वीकार करते हैं कि
निरालाजी का इस युग के सर्वश्रेष्ठ कवि और कलाकार होने का जो दावा वो अक्सर किया करते हैं, मौके- बे मौके, उचित-अनुचित ढंग से, वह सोलह आना ठीक है। “

निरालाजी छायावाद तथा हिंदी के स्वच्छंदतावादी कविताके प्रमुख आधार स्तंभ तथा नवगीत के उद्भावक और प्रवर्तक थे! निरालाजी ने जब हिंदी की चेतना और कविता को पारंपरिक छंद से बाहर निकाला, तब हिंदी के अन्य
साहित्यकारों के साथ उनकी बनी नहीं।

महाप्राण निराला और कमनीय कल्पना के कवि सुमित्रानंदन पंत के बीच विरोध था, पर उनकी गलत मृत्यु संवाद का खबर सुनकर निरालाजी मौन हो गए थे। मुँहबोली बहन महादेवी जी के समझाने के बाद भी रातभर भटकते रहे और फिर लिखा,
मैं अकेला देखता हूँ,
आ रही मेरी दिवस की सांध्यवेला,
 पके आधे बाल मेरे,
 हुए निष्प्रभ गाल मेरे,
चाल मेरी मंद होती आ रही,
हट रहा मेला जानता हूँ,
नदी -झरना जो मुझे ये पार
करने कर चूका हूँ,
हँस रहा हूँ यह देख,
कोई न भेला, मैं अकेला।
निरालाजी को हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति में इतना ज्ञान और आस्था था कि वे एक बार महात्मा
गाँधी द्वारा हिंदी भाषा पर की गई टिप्पणियों की विरोध करने सीधे गाँधीजी से जा मिले। पंजाबी के कालजयी कवि शिव अटालवी ने एक गीत में लिखा निरालाजी ने हिंदी भाषा की अस्मिता के लिए जितना संघर्ष किया,
जितना विख्यात व्यक्तित्वों से लड़ाई की, उतना किसी ने नहीं किया।
निरालाजी का काव्यसंसार बहुत व्यापक है, वे ओज़ और जागरण के कवि हैं। वे आत्मशक्ति और जीजिविषा के
कवि हैं जो हार नहीं मानते हैं। देश को स्वाभिमान याद दिलाने के लिए तथा राष्ट्रीय पुनर्जागरण की अलख जगाने वाला गीत ‘ जागो फिर एक बार’ लिखा।

जागो फिर एक बार !

समर में अमर कर प्राण,

गान गाये महासिन्धु-से

सिन्धु-नद-तीरवासी !

सैन्धव तुरंगों पर

चतुरंग चमू संग;

‘‘सवा-सवा लाख पर

एक को चढ़ाऊँगा,

गोविन्द सिंह निज

नाम जब कहाऊँगा।’’

किसने सुनाया यह

वीर-जन-मोहन अति

दुर्जय संग्राम-राग,

फाग का खेला रण

बारहों महीनों में ?

शेरों की माँद में,

आया है आज स्यार-

जागो फिर एक बार !

निरालाजी ने अपनी ‘भिक्षुक’ कविता में बोलचाल की भाषा का सृजनात्मक प्रयोग किया है। निराशा के क्षणों में भक्ति की मौलिक कल्पना कर शक्ति का साधन जुटाते है। उनके काव्य दार्शनिक विचारधारा, भावसौंदर्य, गंभीर चिंतन की अमूल्य निधि है। उनकी गीतों में प्रतीकात्मकता ,संक्षिप्तता और संगीतात्मकता की प्रमुखता है।निरालाजी के काव्य में कहीं विराट की रहस्यात्मक संकेत है तो कहीं सामान्यजन के उत्पीड़न के चित्र हैं, तो कहीं गीत माधुरी ।
निरालाजी ने जीवन से, दर्शन से, इतिहास और पुराण हर जगह से शब्द लेकर भाषा क़ो पुष्ट किया है। भाव के अनुरूप भाषा का सृजन प्रवाह उनकी भाषा की एक अपनी विशिष्टता है। रूपकों की छटा और अनुप्रास का प्रबंधन निराला’ में निराला है। निराला कै चित्रों में उनका भावबोध ही नहीं, उनका चिंतन का आवेश उनकी कविताओं में दार्शनिक गहराई दे जाता है। जैसे :
  वो आता, वो आता,
दो टूक कलेजे को करता,
पछताता  पथ पर आता,
पेट पीठ दोनों मिलकर एक
पल रहा लकुटिया टेक
मुट्ठी भर दाने को, भूख मिटाने को,
मुँहफटी पुरानी झोली का फैलाता,
दो टूक कलेजे को करता,
पछताता,पथ पर आता!
विशेष स्थितियों ,चरित्रों, और दृश्यों को देखते हुए उनके मर्मों को पहचानना और उन्हें ही चित्र का विषय
बनाना, निराला के यथार्थवाद की महान विशेषता है, तथा निराला के व्यक्तित्व को गहन बना देता है ! निरालाजी का  श्रृंगार रस की कविता में भी अद्भुत चित्र कल्प है!
बाँधो ना नाव इस ठाँव, बंधु,
पूछेगा सारा गाँव, बंधु,
यह घाट वही जिसपर हँसकर
वह कभी नहाती थी धँसकर
आँखें रह जाती थी फँसकर,
कंपते ये दोनों पाँव बंधु,
बाँधो ना नाव बंधु!
आलोचकों का कहना है कि निरालाजी के तीन काव्य कृति उनकी उत्कृटता बताती है,’सरस्वती वंदना’, ‘सरोज
स्मृति’, और ‘राम की शक्तिपूजा’ । राम की व्यथा और तपस्या जैसे निराला के जीवन की व्यथा का
दर्शन है!
रवि हुआ अस्त
ज्योति के पत्र पर लिखा
अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय समर।
आज का तीक्ष्ण शरविधृतक्षिप्रकर, वेगप्रखर,
शतशेल सम्वरणशील, नील नभगर्जित स्वर,
“साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!”
कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।
ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित।
हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वरवन्दन कर।

“होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन।”
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।

निरालाजी ने हिंदी भाषा को अपने नए प्रयोग के माध्यम से विश्वभाषा के मार्ग पर जाने का पथ प्रशस्त किया, छाया वाद के अन्य प्रमुख कवि ने निरालाजी को हिंदी साहित्य मै ‘ईश्वर का देन’ कहा है! निरालाजी किसी भी लाचार व्यक्ति को भूखे और वस्त्रहीन नहीं देख सकते थे और अपनी आमदनी के पैसे अनाथो में वितरण कर खुद गरीबी का कष्ट पाते रहे,
धिक जीवन जो सहता ही आया विरोध
धिक साधन जिस के लिए सदा ही किया शोध!
निरालाजी और संत कबीर में बहुत साम्य है, कबीर पहले संत फिर कवि और निरालाजी पहले कवि और फिर कविता से संतता प्रापत हुए! अपने जीवन में निरालाजी मृत्यु का करीबी से साक्षात्कार किया, पुत्री सरोज की मृत्यु के बाद लिखी गई ‘सरोज स्मृति’ हिंदी साहित्य के पहला शोकगीत है,उनके जीवन का अधूरा बालपन, अव्यक्त हँसना, गाना, रोना आदि संवेदना का निर्यास इसमें है,
धन्ये मैं पिता निरर्थक था,
कुछ भी तेरे हित न कर सका
जान तो अर्थागमोपाय, पर रहा
सदा संकुचित काय, लखकर अनर्थ
आर्थिक पथ पर
धरता रहा मैं स्वार्थ समर,
शुचिते पहना कर चीनाशुंक,
रख सका ना तुझे अत : दधिमुख,
क्षीण का न छीना कभी अन्न,
मैं लख न सका वे दृग विपन्न,
अपने आँसुओं अत: विंबित, देखे
हैं अपने ही मुखचित
सोच है नत हो बार बार, यह
हिंदी का स्नेहोपहार,
यह नहीं हार मेरी भास्वर, यह
रत्नहार लोकोत्तर वर
अन्यथा जहाँ है भाव
शुद्ध:,साहित्य कला कौशल प्रबुद्ध:
हैं दिये हुए मेरा प्रमाण,
कुछ वहाँ प्राप्ति का समाधान,
पार्श्व में अन्यश्व कुशल
हस्त, गद्य में पद्य में सभाभ्यस्त,
देखे वे हँसते हुए प्रवर, जो
रहे देखते सदा समर,
एक साथ जब शत घात घूर्ण, आते
थे मुझ पर तुले तूर्ण!
देखता रहा मैं खड़ा अपल
वह शरक्षेप का रण कौशल,
व्यक्त हो चुका चीत्कारोत्कल
क्रुद्ध युद्ध का रुद्ध- कंठ फल!
पत्नी और परिवार जनों के मृत्यु के बाद (1918) निरालाजी महिषादल छोड़कर अवध, लखनऊ होते हुए ईलाहावाद के दारागंज में रहने लगे थे, वहीं महादेवी वर्मा उनको राखी बाँधी, सुमित्रा नंदन पंत उनके दोस्त बने! उसी गली में रहकर हिंदी साहित्य के अनंत स्वर्णिम आकाश पर अपने अमिट हस्ताक्षर किए!
15,अक्टूबर,1961 गरीबी और बीमारी को झेलते हूए उनका देहांत हो गया! लेकिन निरालाजी के यशस्वी कविताओं का अंत नही हो सकता !
निरालाजी की रचनाएँ :
1.प्रमुख कहानी संग्रह :लिलि,
सकुल की बीवी, चतुरी चमार,देवी, सखी, श्रीमती गलानंद देवी।
2.प्रमुख नाटक; शकुन्तला अनुदित।
3. उपन्यास: अप्सरा (1931) ,अलका(1933), प्रभावती (1936) , निरुपमा (1936), कुल्ली भाट(1938-39) ,
बिल्लेसुर बकरिहा(1942)
4. काव्यसंग्रह:अनामिका (1923) ,
परिमल (1930) गीतिका(1936), तुलसीदास(1939) कुकुरमुत्ता (1942)  अणिमा (1943), बेला (1946) नए पत्ते (1946), अर्चना (1950), आराधना (1953)गीतकुंज (1954) , सांध्य काकली, अपरा ,राम की शक्ति पूजा(लंबी कविता) ,दो शरण, राग विराग ,द्वितीय अनामिका
5.प्रमुख कविताएँ: भिक्षुक, विधवा, बादल राग, वह तोड़ती पत्थर, संध्या सुंदरी, गर्म पकौड़ा, आदि

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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