Email: support@kalamanthan.in, editor@kalamanthan.in

Home Blogs आधी किताब की पूरी विवेचना - सोशल मिडिया में साहित्य

आधी किताब की पूरी विवेचना – सोशल मिडिया में साहित्य

 

इंस्टेंट के नाम पर हमे इंस्टेंट खाना , इंस्टेंट मनोरंजन , इंस्टेंट फेम और इंस्टेंट नेम सब चहिये। और अक्सर इंस्टैंट का चक्रव्यूह हमे कुछ हानिकारक अंजाम तक लाता है। इंस्टेंट खाना नुकसानदायक है सब जानते हैं। इंस्टेंट मनोरंजन के नाम पर १ मिनट की वीडियो से ले कर क्या कुछ नहीं परोसा जा रहा इससे भी हम अछूते नहीं

 

आज जब सोशल मिडिया और OTT पर कानून की बात हो रही है और हम फॉरवर्ड मेसेजस पर लगाम लगाने की बात कर रहे है साहित्य एक बार फिर सभी के ध्यान से दूर है। हिंदुस्तानी साहित्य हीरे पन्ने मणि माणिक्य मोतियों से भरा हुआ है। किन्तु इस खज़ाने को आज के पाठको की अज्ञानता और सोशल मिडिया की मनमानी ने बिखेर दिया है। सोशल मिडिया पर नए पढ़ने वालों को भ्रमित करते ऐसे तमाम पोस्ट है जो उन्हें साहित्य के सागर में गहरे उतरने से रोकते है।

व्हाट्सप्प पर फॉरवर्ड होती कविताएँ मुक्तक छंद किसी के भी नाम के साथ पोस्ट कर देने की छूट से यूँ फिसल रहे है मानो मुठ्ठी से रेत।

साहित्य के प्रति उदासीनता और अनभिज्ञता से सोशल मिडिया पर घूमती कवितायेँ इस नाम से उस नाम होती है। साथी साहित्य को समझने का दम भरते लोग “इंटेलेक्टुअल ” बनने की जल्दबाज़ी में होते है। आधी किताब पढ़ पूरी विवेचना करने वाले बहुत मिलेंगे आपको। साहित्य , और समाज के उत्थान के लिए कार्य “इमेज बिल्डिंग ” का रहे है इसे कहने में कोई संकोच नहीं। सोशल मिडिया पर साहित्य के नाम पर किस तरह का खिलवाड़ होता है इसके बाबत हालिया एक पोस्ट लिखी थी। किन्तु यहां बात मात्र “प्लैगरीज़म “, अर्थात कॉपी पेस्ट की नहीं बल्कि साहित्य के प्रति हमारी उदासीनता की भी है।

दोहरा अन्याय

अब देखा जाये तो सोशल मिडिया को , दुनिया समेट कर हमारी मुठ्ठी में करने का श्रेय जाता है। हम पुरानी किताबें , देशी विदेशी , नए पुराने कवियों को अपने किंडल और गूगल पर पढ़ लेते हैं लेकिन यही गूगल यह नहीं समझ पाता की अमुक कविता अमुक कवी ने लिखी है या यह किसी और कलम के उद्गार है और यहीं वो मात खा जाता है।

हालाँकि यहाँ टेक्नोलॉजी नहीं, हम हारते है क्योंकि हम अपनी भाषा, अपने कवियों, अपनी धरोहर को पढ़ना , गुनना -धुनना छोड़ कर मात्र गूगल की कही हर बात को सच मान लेते हैं।

इंस्टेंट के नाम पर हमे इंस्टेंट खाना , इंस्टेंट मनोरंजन , इंस्टेंट फेम और इंस्टेंट नेम सब चहिये। और अक्सर इंस्टैंट का चक्रव्यूह हमे कुछ हानिकारक अंजाम तक लाता है। इंस्टेंट खाना नुकसानदायक है सब जानते हैं। इंस्टेंट मनोरंजन के नाम पर १ मिनट की वीडियो से ले कर क्या कुछ नहीं परोसा जा रहा इससे भी हम अछूते नहीं और इंस्टेंट नेम व् फेम का ज़िक्र नहीं करूंगी।
गत कुछ वर्षो में ये सबसे खतरनाक बीमारी के रूप में उभरा है। कोरोना वायरस का इलाज ढूँढ लिया गया किन्तु “वायरल ” वायरस का इलाज शायद न मिले।
बहरहाल मुद्दा यह है की इस फॉरवर्ड री -फोरवर्ड में घूमती कविताओं से न सिर्फ नए कवी जो कुछ सुंदर कविता लिखने में सफल होते है उनसे उनका नाम छिन जाता है बल्कि इन नई बनी कविताओं को महान कवियों का नाम दे कर हम उन हस्तियों को भी अपमानित कर रहें है।
मसलन यह कविता आपने भी शायद व्हाट्सप्प पर पढ़ी होगी ‘महाश्वेता देवी ” अथवा “महादेवी वर्मा’ जी के नाम से। कविता कुछ इस प्रकार है –
आ गए तुम?
द्वार खुला है, अंदर आओ..!

पर तनिक ठहरो..
ड्योढी पर पड़े पायदान पर,
अपना अहं झाड़ आना..!

मधुमालती लिपटी है मुंडेर से,
अपनी नाराज़गी वहीँ उड़ेल आना..

तुलसी के क्यारे में,
मन की चटकन चढ़ा आना..!

अपनी व्यस्ततायें,बाहर खूंटी पर ही टांग आना..!

जूतों संग, हर नकारात्मकता उतार आना..!

बाहर किलोलते बच्चों से,
थोड़ी शरारत माँग लाना..!

वो गुलाब के गमले में,
मुस्कान लगी है..
तोड़ कर पहन आना..!

लाओ, अपनी उलझनें मुझे थमा दो..
तुम्हारी थकान पर, मनुहारों का पँखा झुला दूँ..!

देखो, शाम बिछाई है मैंने,

सूरज क्षितिज पर बाँधा है,

लाली छिड़की है नभ पर..!

प्रेम और विश्वास की मद्धम आंच पर,चाय चढ़ाई है,

घूँट घूँट पीना..!
सुनो, इतना मुश्किल भी नहीं हैं जीना…

यह कविता न तो महाश्वेता देवी की है न ही महादेवी वर्मा की। जिन्होंने इन कवियों को पढ़ा है वो जानेंगे की जहां महादेवी वर्मा, हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक मानी जाती थी वहीँ महाश्वेता देवी जिन्होंने प्रमुखतः बांग्ला साहित्य में काम किया और 100 से अधिक नावेल और कहानी संग्रह लिखे ,दोनों की ही भाषा शैली उपरोक्त कविता में नहीं है ।

लेकिन इंस्टेंट संवेदना भी हमारे ही युग की मांग है।

इस कविता में प्रेम है , विछोह है और आज की आपा धापी वाले जीवन से कुछ पल को छुटकारा है ऐसे में इसे पढ़ने और इस “इंस्टेंट फीलगुड ” की संवेदना को ,आगे यूँ ही फरवर्ड कर देने में हम इतनी जल्दी करते है की इस कविता के लेखक लेखिका उसकी शैली इत्यादि पर ध्यान नहीं जाता।
यह बात शायद बहुत से पाठको को कुछ खास न लगे लेकिन लिखने वाले अगर इसे समझेंगे तो एहसास होगा की यह अन्याय तीन तरफा है।

एक हम इन महान हस्तियों की कलम को भूल कर अपनी अनभिज्ञता , से इन्हे जाने अनजाने अपमानित कर रहे हैं।
दूसरे इस कविता की असल लेखिका भोपाल की निधि को भी नज़रअंदाज़ कर रहे है और आखिर में हम अपने गौरवशाली साहित्य को अनभिज्ञता के अँधेरे में लुप्त कर रहें हैं

OTT के नियम कैसे होंगे और उनका क्या असर होगा यह नहीं कह सकती किन्तु कुछ भी, किसी के नाम से फॉरवर्ड करें से पहले हमारी नैतिक और साहित्यिक ज़िम्मेदारी है की “इंस्टेंट ” के असर से साहित्य को क्लांत न होने दें।
किसी उभरते हुए कवि की कलम के लिए उसकी वो एक कविता कितना मायने रखती है जिसे आप कभी गुलज़ार , अमृता प्रीतम अथवा प्रेमचंद के नाम से आगे आगे कर देते है, यह मात्र एक कवि ह्रदय ही समझ सकेगा ।

लेख खत्म करते हुए एक कविता और साझा करती हूँ2018 में जिसे मायके से लौटी एक कच्ची पक्की कलम ने लिखा था और यूँ ही व्हाट्सप्प पर शेयर किया और ४ दिनों के अंदर वह कविता बेटियों के दिलो से होती हुई बाबुल की आंखे नम करती हुई दिल्ली से इलाहाबाद ,रायपुर से लंदन तक पहुंची और वापस उसी लेखिका के पास पहुंची ,लेकिन बिना उसके नाम के। अमृता प्रीतम और फिर गुलज़ार साहब के नाम से। कवियत्री न तो इस पर खुश हो सकती थी की उसकी कलम ने महान हस्तियों की स्याही का रंग लिया है, न ही इस पर की उसका नाम हो रहा है। क्योंकि यहां नाम भी नहीं था और पाठक मात्र “इंस्टेंट संवेदना ” में खुश था। उसे इन साहित्य के अग्रजों की कलम का भान नहीं था।

यहां न सिर्फ कवियत्री का नाम छिन गया बल्कि ह्रदय से निकले कुछ उद्गारों को अमृता जी की कलम का बता उनके नाम के साथ भी ज़्यादत्ती हुई। हालाँकि कुछ कर नहीं सकते क्योंकि यह www की दुनिया बहुत वृहद है और इसके सिरे को पकड़ना बेहद मुश्किल।

बहरहाल आप कविता पढ़िए और अपने आपको अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी के साथ साहित्यिक ज़िम्मेदारी भी याद दिलाते रहिये। साहित्य हमारा है , साझा है। केवल लेखक का नहीं पाठक का भी हिस्सा है इस धरोहर में, और उसे संजोने में ।

रिश्ते पुराने होते हैं

पर मायका पुराना नही होता
जब भी जाओ …..कलश भर कर पानी का
नजर उतारी जाती है
अलाय बलायें टल जाये
यह दुआयें मांगी जाती हैं
यहां वहां बचपन के कतरे बिखरे होते है
कही हंसी कही खुशी कही आंसू सिमटे होते हैं
बचपन की गीलासी ….कटोरी ….
खाने का स्वाद बडा देते हैं
अलबम की तस्वीरें
कई किस्से याद दिला देते हैं
गर्मी की  छुट्टियों   के प्यारे से खेल
सर्दियों की मुंगफली और गजक का मेल
माँ के हाथ की कासुन्दी ,
और दही में डूबते.. रूई के फाहे से बड़े!!
जरा सा और खा लो …
वो मीठी सी मनुहार ,और कहना
जा कर पडोस की चाची से मिल लो ,
वर्ना फिर बीतेगा इक और साल
अचार पापड बड़ीया ….मेवे के लड्डू
पसंद की साडियां और ढ़ेर सा समान….
सामान कितना भी समेटू
कुछ ना कुछ छूट जाता है
सब ध्यान से रख लेना
हीदायत पापा की ….कैसे कहूं सामान तो नही
पर दिल का एक हिस्सा   यहीं  छूट जाता है
आते वक्त  माँ आँचल मेवे से भर देती हैं
खुश रहना कह कर अपने आँचल मे भर लेती है ….
आ जाती हूं मुस्करा कर मैं भी
कुछ ना कुछ छोड कर अपना
रिश्ते पुराने होते हैं
जाने क्योँ मायका पुराना  नहीं  होता
उस देहरी को छोडना हर बार ….
आसान   नहीं  होता..
  “निर्झरा”
साहित्य हमारी आँखों के सामने बनता हुआ इतिहास है। इसमें सत्यता हम सिर्फ साहित्यप्रेम के लिए नहीं किन्तु आगे आनी वाली पीढ़ी की खातिर भी रखनी है ताकि वो आज को कल भी देख सके।

 

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

हमें फोलो करे Facebook

nirjhra
Leading the editorial team with a vision of bringing quality content and varied thoughts on different aspects of Society, Art and Life in general. Nirjhra is a Parent Coach, Social Entrepreneur and Writer who feels, words are mightier than the sword but if needed, pick up that as well.

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

अप्रैल माह – कहानी लेखन प्रतियोगिता

क्या लेखन आपकी कल्पना की अभूतपूर्व उड़ान है ? क्या कहानियां एवं कथा साहित्य आपकी रूचि है ? क्या दूसरों की लिखी कहानियों को पढ़ आपको...

इतना शोर इतनी हाय

कल्पना में सत्यता का शब्द पिरोए हम-तुम रोएं, गांव की हो, आंचल ढंकती नहीं क्यों तुम सुहागन हों, चूड़ियां खनकती नहीं ‌क्यों, कामकाजी हो, हर वक्त चलती नहीं...

गुलाब

  रेड लाईट देखते ही पीयूष ने गाड़ी रोकी। आगे-पीछे कुछ और गाडियांँ खड़ी थी। वह रेड लाईट की ओर देख रहा था....उफ्फ! पूरे मिनट...

आधुनिक युग की मीरा – महादेवी वर्मा

रंगोत्सव पर जन्मी,आजीवन श्वेताम्बरा, "छायावाद की सरस्वती " - कवयित्री महादेवी वर्मा बीन भी हूँ मैं, तुम्हारी रागिनी भी हूँ, नींद भी मेरी अचल, निस्पंद कण-कण...

Recent Comments

Manisha on गुलाब
Rajesh Kumar on गुलाब
KUMAR PRITESH on गुलाब