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रूढ़ियों को तोड़ती बेटियाँ

 

वो जिसे मेरा दामन कहते हो ना
उसके आगे मेरा पूरा आसमान है।
चूड़ी, पाजेब के आगे
पूरा मेरा जहान है।
वो लम्हें कैसे गिनाऊँ यारों
मेरा जीवन ही मेरा अभिमान है।

वह पल जब मुझे स्त्री होने पर सर्वाधिक गर्व की अनुभूति हुई…. इस सवाल का जवाब खोजती हूंँ तो सोचती हूंँ पल लिखूँ, दिन लिखूँ या पूरा जीवन लिखूँ! चलिए शुरू करती हूंँ एक वाक्य से….. “मैं और मेरी तीन बहनें”, जब भी यह कहती हूंँ या सोचती हूंँ तो मेरा दिल उत्सव में डूब जाता है। मेरे जीवन में अपनी बहनों के साथ से अनमोल शायद कुछ और नहीं। लेकिन जब भी मैं यह किसी और से कहती हूंँ कि “मैं और मेरी तीन बहनें”… तब सामने वाले की आंँखे मेरे लिए करुणा और व्यथा से भर जाती है।

सिर्फ चार बहनें….! कोई भाई नहीं!! ओह….!!!

कुदरत भी ना किसी के साथ कितना अन्याय करता है। लेकिन ऐसी व्यथा से भरी हुई नजरों की खिंचाई करने में मुझे तब भी आनंद आता था और अब भी मज़ा आता है। जाने लोग यह क्यों नहीं समझ पाते कि स्त्री होने का अर्थ दया, दुःख और बेचारगी नहीं है, बल्कि स्त्री होना स्वयं में एक गर्व एक सम्मान है।
मेरे पिता क्रांतिकारी विचाराधारा के थे। वह आडंबर और मिथ के खिलाफ खड़े लोकनायक जयप्रकाश के कुछ महान सेनानियों में से थे। मांँ सामान्य घरेलू महिला हैं, लेकिन विचारों से बहुत संपन्न और सशक्त। उनकी यही खूबी उन्हें सामान्य होते हुए भी उच्च और सम्मानित बना देती है। शायद इसलिए बेटी होने के जो खास क़ायदे और दायरे होते हैं ना, वह हमारे इर्द-गिर्द बने ही नहीं। बेटी होते हुए हमारी स्वतंत्रता और बेटों के बराबर या कई बार उससे अधिक मिला अधिकार और सम्मान आस-पास के लोगों के लिए अचरज का विषय बना रहा।

अनुशासन था, लेकिन प्रतिबंध नहीं, मार्गदर्शन मिला लेकिन दायरा कभी नहीं खींचा गया। सच कहूंँ तो मेरा जीवन एक नहीं अनेक ऐसे पलों से भरा-पुरा है जिनपर मुझे स्त्री होने के नाते ता-उम्र गर्व रहेगा।

सबसे पहले तो मुझे गर्व है मेरी उस शिक्षा उस सोच और उस परवरिश पर जिसके कारण मैं हमेशा असमानता के ख़िलाफ खुल कर आवाज़ उठा पाती हूंँ, और किसी के दबाव में अपना मत नहीं बदलती। स्त्री होने के नाते जो सशक्तता मेरे माता-पिता ने मुझमें विकसित की है वह मैं अपनी बेटी को भी धरोहर में देना चाहूंँगी। साथ ही मेरा प्रयास है की वह सशक्तता समाज की प्रत्येक बेटी में हो। जीवन के सफर में आगे बढ़ते हुए मैं उस दिन को याद करती हूंँ, जब मैंने अपनी पहली नौकरी शुरू की थी। पहले दिन पापा मुझे दफ्तर छोड़ने गए थे। जब मैं ऑफिस के गेट के भीतर जा रही थी, मैंने पलट कर पीछे देखा पापा के चेहरे पर सुंदर सी मुस्कान थी पलकें कुछ गीली।

अपनी लाडली को अपने पैरों पर खड़ा होते देख हर एक माता-पिता ऐसे ही गर्व से भर जाते होंगे। उन्हें देख मेरा गला भी रूंध सा गया और हृदय फक्र से खिल उठा। मुझे याद है मेरी नौकरी करने पर भी समाज के कुछ कुपोषित मानसिकता के लोगों ने कहना शुरू किया था “हमारे यहांँ बेटियों की कमाई खाने का रिवाज़ नहीं है। पढ़ा-लिखा कर शादी कर दें, फिर ससुराल में कमाए और अपने घर को संपन्न करें”।

तब मेरी मांँ ने जो कहा वह हम सबके स्वाभिमान को चार चांँद लगा देता है “यदि बेटों को मांँ-बाप की सेवा का अधिकार है तो बेटियों को क्यों नहीं? यह घर भी जीवन भर मेरी बेटियों का है। अपने पैरों पर खड़ी होकर मेरी बेटियांँ अपने जीवन को अपने इक्षानुसार आकर दे सकेंगी इसमें कुछ गलत नहीं है।”

इस गौरवशाली क्षण को मैं कभी भूल नहीं सकती। अपनी पहली तनख़्वाह अपने मम्मी-पापा को सौंपते हुए मैं अपना गर्व उनके पलकों पर भी चमकता देख रही थी।
घर में भले हमें बेटी होने का कोई ख़ामियाज़ा न झेलना पड़ा और न कभी उसकी अनुभूति हुई। लेकिन घर के बाहर समाज के ताने और घर में बेटा न होने के कारण जो हीन भाव हमें लगातार परोसा जाता रहा, हम बहनों ने उसे कभी भी अपने अंतः को नहीं छूने दिया, बल्कि हम ताने देने वालों का मुंहतोड़ जवाब देते हुए कहते “हमें खुशी है कि हम चार बहनें ही हैं, यह घर आजीवन हमारा घर ही रहेगा कभी मायके में तब्दील नहीं होगा।”
और ऐसा हम इसलिए कर पाए क्योंकि हमारे माता-पिता ने हमें कभी यह आभास ही नहीं होने दिया की उनके जीवन में किसी कुल दीपक की कमी है, या हम चार बेटियांँ उनके जीवन को पूर्ण नहीं कर पाती। उनके अंतः का संतोष और हमारी छोटी-छोटी उपलब्धियों पर उनकी गर्व से चमकती आंँखे ही हमें विचारों से संपन्न और मन से सबल करती रही।
वह समाज जहांँ आज भी बेटों के बिना जीवन व्यर्थ माना जाता है और बेटियों को पराया धन ही समझा जाता है, वहांँ ऐसे अभिभावक को पाना मेरे कई जन्मों का पुण्य ही है जो बेटा और बेटी के परवरिश के लिए दो अलग-अलग कायदे नहीं गढ़ते। मैं जब भी उनके विषय में सोचती हूंँ मैं अभिमान से भर जाती हूंँ और उनके लिए सम्मान बढ़ता ही जाता है। उनकी संतान होना मेरे जीवन का सबसे गौरवपूर्ण एहसास है।
जिस घर में बेटा न हो, वह समाज में चर्चा का विषय स्वतः बन जाता है। समाज का स्वभाव है की उसे अपने से अधिक औरों के स्थिति की चिंता बनी रहती है। हमारे परिवार के लिए भी समाज और रिश्तेदारों की एक चिंता निरंतर बनी रही कि हमारे विवाहोपरांत हमारे माता-पिता की जिम्मेदारी कौन उठाएगा? सब सहम जाते थे की कहीं उनके देख-भाल का दायित्व उनके बेटों पर न आ जाए। लेकिन आज जब वह सब देखते हैं की हमारे अभिभावक उनसे कहीं अधिक संतुष्ट और सुखमय हैं तो उनके मुख से शाबाशी सुन मन पुलकित हो जाता है।
जब मेरे माता-पिता से कोई कहता है कि “हमारे बेटों से लायक आपकी बेटियांँ हैं, काश कि सब घर में ऐसी ही बेटियांँ हो” तब उनका गर्व से तना माथा देख हम भी अभिभूत हो जाते हैं। क्या यह गर्व कम है की मैंने उन कायदों को तोड़ा जिनके अनुसार शादी-शुदा बेटी अपने ही घर में मेहमान बन जाती हैं या माता-पिता की सेवा की जिम्मेदारी मात्र बेटों की होती है। जिनके बदौलत मेरा वजूद है, उनके लिए अपने अंतिम स्वाँस तक अपना दायित्व निभाना मेरा धर्म है। मुझे गर्व है कि सामाजिक फब्तियों के डर से मैं अपने धर्म से नहीं चूकी। मुझे इस चेतना से पूर्ण करने का श्रेय भी मेरे अभिभावक को ही जाता है जिसके कारण मैं सही और गलत का चुनाव कर पाती हूँ।
व्यक्ति के जीवन में समाज ने विवाह को भी अनिवार्य घोषित किया गया है। हालाँकि अब हालात कहीं कहीं कुछ उन्नत हो रही है और विवाह बाध्यता नहीं बल्कि इच्छा बन रही है। लेकिन मिडिल क्लास परिवार में बेटी का विवाह तो पिता की कमर तोड़ने का कारण ही होता है। और फिर जैसा की हम सब जानते हैं बिहार दहेज़ के लिए कुख्यात है। मेरे पिता नेक और ईमानदार व्यक्ति थे। उन्होंने न केवल लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में उनका अनुसरण किया बल्कि आजीवन उनके आदर्शों को जिया।
ईमानदारी और निष्ठा उनके जीवन का उद्देश्य रहा इसलिए घर की आर्थिक स्थिति कभी लाख रूपये भी लुटाने लायक नहीं बनी। ऐसे में समाज की एक और चिंता “बिना दहेज़ इनके बेटियों की शादी होगी कैसे?” शुभचिंतकों ने अधेड़ और बेरोजगार लड़कों की कतार लगा दी जिनकी मांँग नौकरीपेशा और सही उम्र के लड़कों से कुछ एक-दो लाख कम थी। लेकिन मेरे मांँ-पापा ने हिम्मत नही हारी। हम बहनों ने भी अपना संकल्प सुनाया “हमें बिकाऊ लड़का कतई नहीं चाहिए। स्वाभिमानी और नेक दिल व्यक्ति ही रत्नेश और मंजू के घर का दामाद बनेगा।”

“हमें आजीवन कुंवारी रहना मंज़ूर है, लेकिन दहेज़ के लिए बिकता दूल्हा हमें नहीं चाहिए।”

बड़ी बहन होने के नाते इस संकल्प के आग़ाज़ की जिमेदारी मेरी थी। आज हम बहनें गर्व से कहती हैं कि हमारी शादी में एक कौड़ी की भी लेन-देन नहीं हुई। समाज हमारी शादी को उदाहरण स्वरूप पेश करता है। हमारा यह गर्व हमें दहेज़ की ख़िलाफत करने की और बुलंदी देता है। मुझे याद है सोशल मीडिया पर ही किसी पोस्ट पर मेरा दहेज़ के विरोध में लिखने पर एक महाशय बुरी तरह से जिरह करने लगे थे।
अंत में उन्होंने मुझसे पूछा “लिखना और बोलना आसान है, लेकिन आपने अपनी शादी में कितना दहेज़ दिया और अपने बच्चों की शादी में क्या कोई लेन-देन नहीं करेंगी?” तब मैंने स्वाभिमान के साथ कहा था “मैं और मेरी बहनों की शादी में एक कौड़ी की भी लेन-देन नहीं हुई है। हमने सही मायने में एक आदर्श विवाह किया है। जहांँ तक बात मेरे बच्चों की है तो मेरी एक बिटिया है। और मैं आज ही यह दावा कर सकती हूंँ कि उसके विवाह में भी दहेज़ की कोई जगह नहीं होगी।”
मेरे ज़वाब से वह महानुभाव संतुष्ट हुए और मुझे सम्मान देते हुए उन्होंने वाद को विराम दिया। कहते हैं ना की प्रत्येक सुधार की शुरुआत स्वयं से और क्रांति की शुरुआत घर से होनी चाहिए, तभी लोग आपकी बात को सुनते और स्वीकारते हैं। एक पुरातन कुप्रथा का अंत अपने परिवार में कर पाने का गौरव मुझे निरंतर पुलकित करता है।
मैं जब भी अपने लेखन पर सराहना पाती हूँ तो मुझे अपने पापा की बहुत याद आती है। मुझे कलम पकड़ना मेरे पापा ने ही सिखाया। शुरुआत में मैं उनसे अपने लेख वगैरह उन्हीं से लिखवाया करती थी। फिर अचानक पापा ने लिखने से मना कर दिया और कहा “तुम स्वयं लिखो। जो जरूरी सुधार होगा वो मैं करा दूंँगा।” सच कहूंँ तो शुरू के एक-दो बार तो बहुत बुरा लगा था कि पापा इतनी भी मदद नहीं कर रहे हैं। लेकिन आज जब भी अपने लेखन पर कुछ वाहवाही पाती हूंँ तो पापा ही याद आते हैं।
पापा ने स्वावलंबन का वह पाठ नहीं पढ़ाया होता तो मैं आज कुछ भी न लिख पाती। पिछले वर्ष पापा चले गए। एक काव्य गोष्ठी में मुझसे मेरे लिखने की प्रेरणा श्रोत के विषय में पूछा गया। मैं पापा के विषय में बताते हुए गर्व से भरी जा रही थी। और यही सोच रही थी काश कहीं से वो मुझे देख रहे हों। अपने पिता के अंतिम यात्रा में हम चारों बहनें उन्हें अपने कंँधे पर उठाए थीं। मुझे पता है पापा विकुंठ से हमें देख कर फूले नहीं समा रहे होंगे। क्योंकि समाज जिन अधिकारों को बेटों के जिम्मे ही बांँधे हुए है, उनकी बेटियों ने उस रूढ़ी को दरकिनार कर दिया।
बड़ी बेटी होने के नाते उन्हें मुखाग्नि मैंने ही दी। वो अपने बेटियों को जो सम्मान और अभिमान दे कर गए, उनकी बेटियों ने उसे बरकरार रखने में कोई कोताही नहीं की। उनकी अंत्यिष्टि उन्हीं के क्रांतिकारी विचारों से प्रेरित हो कर आडंबर और कर्मकांडों से मुक्त करते हुए मुझे सर्वाधिक गर्व की अनुभूति हुई।

समाज में रूढ़ियां सदैव एक स्त्री के इर्द-गिर्द ही घूमती है, इन्हें फांँदने केलिए लगाई गई हर छलांँग उनके लिए गर्व और अभिमान से भरी होती है।

मातृत्व का गौरव तो प्रत्येक स्त्री के जीवन में सर्वोच्च होता है। मैंने भी एक नए जीवन को जन्म देकर यह खुशी पाई। लेकिन इस गर्व को पाने का सफर थोड़ा लम्बा है। जिस दिन मैं अपनी बेटी को सशक्त, सफल, सुदृढ़, आत्मविश्वास से समृद्ध, नेक व ईमानदार नागरिक के रूप में देखूंँगी तब मेरा अभिमान हिमालय सा ऊंँचा हो जाएगा।
अभी हाल ही में 18 फरवरी 2021 को मेरी छोटी बहन की शादी हुई। मेरी बहन का निर्णय था की उसकी शादी में कन्यादान का ढ़कोसला नहीं होगा। उसका समर्थन करते हुए हमने उसकी शादी उसके जागरूक विचारों के साथ की। एक स्तंभ की तरह मैंने भी अपनी बहन के क्रांतिकारी निर्णय को मजबूती देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सदियों के कुरीति को स्वाहा कर हो रही इस शादी में शामिल होना वाकई गर्व को बढ़ाने वाला एहसास रहा।

एक स्त्री जब ठान लेती है तो हर बंधन हर कुप्रथा हर दीवार को तोड़ देती है।हिम्मत ही स्त्री जीवन का सच्चा गर्व है।

 

 

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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5 COMMENTS

  1. Di Best one. Aapki family jaisi maine kisi ki family nhi dekhi. Bhagwan aIse mom dad har ladki ko de.
    Betiyaan aapke mom dad k ghar hi paida honi chahiye, Jahan itni acchi soch ho samaj se upar uth k. asli women empowerment ka example hai aapki family

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