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नारी – संयम और शक्ति

 

कभी कभी ईश्वर कुछ लोगों को तराश कर फ़ुर्सत में बनाते हैं परंतु हाथों की लकीरों में सुख-चैन लिखना भूल जाते हैं। एक ऐसी युवती को मैं जानती हूँ जो बेहद खूबसरत थी परंतु बहुत मुश्किलों से जूझ रही थी।

मैं अपने घर में काम करने वाली लड़की शहनाज़ की बात कर रही हूँ। 30 बरस पहले जब मैं गोआ आई तो मैंने उसे घर की सफ़ाई, बर्तन और कपड़े धोने के लिए रखा। 27-28 साल की शहनाज़ भोली-भाली छरहरे सुडौल बदन की युवती थी – चाँद सा सुंदर मुखड़ा, तीखा नाक नक़्शा, बड़ी बड़ी कजरारी आँखें, गुलाब की पंखुड़ी जैसे होंठ, मलाई जैसी गोरी-चिट्टी चिकनी त्वचा – ऐसा लगता था कि सुंदरता का दूसरा नाम शहनाज़ था।
शहनाज़ हैदराबाद की रहने वाली थी। मायके में माता पिता और चार भाई थे। पिता की किराने की दुकान थी इसलिए बचपना बहुत आराम से बीता। खाने पीने की कोई कमी न थी। चार भाइयों की अकेली बहन होने की वजह से बहुत लाड़ दुलार मिला। एक दिन दूर के रिश्ते की खाला ने उसकी माँ से अपने बेटे साजिद के लिए शहनाज़ का हाथ माँगा। उसने बताया कि साजिद किसी बड़ी कम्पनी में मैनेजर के पद पर गोआ में नियुक्त है।  बात पक्की हो गई और निकाह हो गया। विदा हो कर आँखों में सपने सजाए शहनाज़ ससुराल पहुँची।
आस पड़ोस की औरतें और रिश्तेदार लगातार उसकी तारीफ़ों के पुल बाँध रहे थे। हँसी मज़ाक़ में किसी ने ये भी कह दिया “वाह रे ख़ुदा! तूने हूर के पल्ले लंगूर बाँध दिया।” कुछ दिन ससुराल में रह कर शहनाज़ अपने पति सास-ससुर के साथ गोआ आ पहुँची।
घर के नाम पर झोपड़ी देख कर उसे मन ही मन गहरा धक्का लगा लेकिन उसने किसी से कुछ न कहा। सोचने लगी शायद बाद में साजिद की कम्पनी घर देगी। लेकिन बहुत ही जल्दी हक़ीक़त से रूबरू हो गई जब उसे मालूम हुआ कि उसका पति मैनेजर न हो कर एक ईंट पत्थर ढोने वाला मज़दूर है।
कुछ दिनो बाद उसका बड़ा भाई उस से मिलने आया और सच्चाई जान कर बहुत दुखी हुआ। पति का प्यार ही अब उसके जीने का सहारा लगने लगा। उसने अपनी किस्मत के साथ समझौता कर लिया और किसी से कुछ गिला शिकवा न किया।
धीरे-धीरे दिन बीतने लगे। घर में चार पैसे और लाने की ख़ातिर उसने घरों में काम पकड़ लिया। जब मेरे घर में काम पकड़ा था उस वक़्त वो तीन बच्चों की माँ बन चुकी थी। मुझे क़रीब एक साल तक पता ही नहीं चला कि वो किस मानसिक कष्ट से गुज़र रही हैं। हमेशा मुस्कुराती रहती थी और बड़ी लगन से काम करती थी। उसे काम के बाद जब खाने को देती तो मेरे घर न खा कर अपने साथ ले जाती।
कभी कभी मुझे लगता था कि वो कुछ छुपा रही है….मगर क्या ये नहीं समझ पा रही थी। मेरी भी ज़्यादा उम्र नहीं थी और न ही तजुर्बा, मन नहीं मानता था कि उसके साथ सब ठीक है तो कभी कभी पूछ लेती थी तो कहती “ हाँ भाभी सब ठीक है।’’  शुरू में मुझे मैडम कहती थी फिर एक दिन मुझे बोली “मैडम अगर बुरा न मनो तो मैं आपको भाभी बुला सकती हूँ? आप को देख कर मुझे मेरी बड़ी भाभी याद आती है।’’ उस दिन से उसने मुझे भाभी सम्बोधित करना शुरू कर दिया।
समय का पहिया चलता जा रहा था। हमेशा मुस्कुराने वाली शहनाज़ अचानक ख़ामोश सी हो गई थी। मुझे बहुत हैरानी हुई कि आख़िर ऐसा क्या हो गया जिसने इसकी मुस्कुराहट छीन ली! बहुत पूछने पर इक दिन मेरा प्यार भरा व्यवहार देख कर मेरे सामने बिखर गई, फूट फूट कर रोने लगी। मैं हैरान परेशान हो गई। उस दिन उसने मुझे अपनी कहानी सुनाई और बताया कि किस परिस्थिति से वो गुज़र रही है। सुन कर मैं अवाक रह गई। मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि कोई इतनी मानसिक यातना के बाद भी कैसे मुस्कुरा सकता है। उस से मैंने एक बात ज़रूर सीखी — मुस्कुराहट के पीछे ग़म कैसे छुपाए जाते हैं।
शहनाज़ ने मुझे बताया कि कैसे झूठ बोल कर उसके ससुराल वालों ने उस के अब्बू और अम्मी को शादी के लिए राज़ी किया। सच्चाई जान कर न उसने अपनी किस्मत को कोसा और न ही अपने मायके वालों को। ससुराल में शुरू में तो प्यार मिला परंतु तीन कन्याओं का जन्म उसके लिए जैसे अभिशाप बन गया। लड़के की चाहत में उसका जीना दूभर हो गया था। हर वक़्त सास ससुर के ताने, पति की आय दिन दूसरी शादी करने की धमकी उसे धीरे-धीरे अंदर से तोड़ रही थी।
एक दिन वो काम पर नहीं आई। मेरे लिए बात हैरानी की बात थी क्यूँकि उसने बग़ैर बताए कभी छुट्टी नहीं करी थी। मेरे घर से 10-15 मिनट दूर रहती थी। अपने ड्राइवर को उसे लाने भेजा तो बोली “भाभी से कहना मैं थोड़ी देर में आऊँगी।’’ थोड़ी देर बाद जब वो आई तो उसे देख कर मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वो ऐसा भी कर सकती है I उसकी साड़ी का पल्लू जला हुआ था। उसने आत्महत्या करने की कोशिश करी थी। पड़ोस के लोगों ने उसे बचाया।
मैंने कहा “ऐसा क्या हो गया जो तुमने आत्महत्या करने का कदम उठाया! तुम्हें अपने लड़कियों को देख कर भी नहीं लगा कि उन्हें तुम्हारी कितनी ज़रूरत है”। बिलख-बिलख कर रोते हुए बोली “मेरा पति पिछले चार महीने से बीचोलिम ( उत्तर गोआ में एक शहर ) में रह रहा है। वहाँ इमारत बन रही है इस लिए उसे वहाँ भेज दिया। शुरू में तो हर शनिवार की शाम को आता था और सोमवार सुबह चला जाता था। आ कर दारू पी कर मुझे मारता पिटता था और लड़का न होने के ताने देता था। इधर दो महीने से घर नहीं आया। कल किसी ने बताया की उसने किसी औरत को अपने घर पर रख लिया है। इसी लिए मैंने अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने की सोची।”
मैंने उसे शांत करा और कहा “मेरी बात अब ध्यान से सुनो — अपना सामान बांधो और तीनो लड़कियों को ले कर आज ही बीचोलिम जाओ। मैं तुम्हें अपनी गाड़ी से वहाँ पहुँचा दूँगी। तुम साजिद की ब्याहता पत्नी हो, जा कर अपने हक़ के लिए लड़ो। तुम अपने को किसी से कमजोर न समझो। हर नारी शक्ति का भंडार है और हर नारी में दुर्गा और काली का वास है। हालात से डरने की बजाय डट कर मुक़ाबला करो। अपने अंदर की शक्ति को पहचानो। जो औरत तुम्हारे पति के साथ रह रही है उसे जा कर धक्के मार कर निकल दो। ज़रूरत पड़े तो थोड़ी सी पिटाई भी कर देना।”
मेरी बातें सुन कर उसको हैरानी हुई और बोली “भाभी क्या ऐसा हो सकता है ?” मैंने आश्वासन दिया ऐसा ज़रूर होगा। अपने मन से डर को भगा दो। जब अपने परिवार की रक्षा करनी हो तो कभी-कभी चण्डी का रूप लेना पड़ता है। किसी की जान नहीं लेनी है बस जो तुम्हारा पति तुमसे दूर कर रही है उसे खदेड़ कर बाहर निकाल दो और अपने पति को सही राह पर लाओ।”
फिर मैंने उसे समझाया “साजिद से निपटने के लिए थोड़ा हौसला दिखाओ और सच्चाई से उसका सामना करवाओ।” हर हाल में तुमने उसका साथ दिया, छल से शादी करने पर भी कुछ न कहा। साजिद से पूछना कि अगर यह सब उसकी बहन के साथ होता तो उसे कैसा लगता? उसको बताना लड़की पैदा करना कोई जुर्म नहीं है। उसने भी एक औरत की कोख़ से जन्म लिया है। आज कल लड़कियाँ मर्दों के कंधे से कंधा मिला कर चल रही है। तुम अपनी लड़कियों को ख़ूब पढ़ाना और काबिल बनाना। जा कर अपनी शक्ति से अपना घर संसार बचाओ”।
मुझे बोली “भाभी आपने मेरी आँखें खोल दी है और अब मुझे कोई नहीं रोक सकता। अपने सही कहा मैं कमजोर नहीं हूँ।मै किसी को अपना घर बर्बाद नहीं करने दूँगी और अपने पति को भी पा कर रहूँगी।” यह कह कर उठी और लम्बे लम्बे कदम भरते हुए अपने घर गई। उस पल मुझे अपने स्त्री होने पर सर्वाधिक गर्व की अनुभूति हुई जब मैंने एक युवती के भीतर सोई हुई नारी को जगाया।

एक महीने बाद आ कर उसने मुझे बताया कि उसका घर टूटने से बच गया और उसके पति को भी अपनी गलती का एहसास हो गया। आज भी वो पल याद करती हूँ तो खुशी से आँखें छलक जाती हैं।

 

( ये कहानी एक सत्य घटना पर आधारित है – शहनाज़ मेरे घर में काम करती थी  )

 

 

 

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