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बदलता इश्क़

 

राघव और सिया बचपन के दोस्त थे उम्र बढ़ने के साथ जाने कब ये दोस्ती इश्क़ मे तब्दील हो गयी । उन दोनो की जोड़ी कुदरत ने खुद ही बनाई थी। वो जैसे एक दुजे के लिये ही बने थे। राघव बेहद हँसमुख लेकिन बेहद शालीन स्वभाव का था वहीं सिया सुंदर और सुशील लड़की थी।एक सौम्य  सा चेहरा, उसकी बोलती हुई बडी़ बडी़ आंखें  देख कर तो जैसे राघव का दिल धड़कना भूल जाता था। कॉलेज की पढ़ाई खत्म होते राघव बैंक में अफ्सर नियुक्त हो गया था। 
उनकी शादी में कोई अड़चन नहीं बची थी। सिया के मां बाप को राघव जैसा दामाद कहाँ मिलता। राघव की मां तो सिया जैसी बहु पाकर निहाल थी। नैनीताल में पूरा परिवार हंसी खु़शी रह रहा था। सिया के गर्भवती होने की खबर ने तो जैसे उनकी खुशियों में चार चाँद लगा दिये।
कुछ दिनों के बाद राघव का तबादला ग्वालियर हो गया वो सिया को वही छोड़ नये शहर रवाना हो गया।
ग्वालियर मध्य भारत का खूबसूरत………….. शहर राघव को बेहद भाया। अतीत के स्मारकों, मंदिरो महलों के इस शहर को देखने की इच्छा राघव को हमेशा से थी। इतिहास मे राघव की हमेशा से रूचि थी| राघव यहां आकर बहुत खुश था।
नये नये महल को देखने जाता फिर बड़े ही विस्तार से सिया को खत लिखकर सिया को वहा की खूबसूरती का ज़िक्र करता। यूं समझे सिया ग्वालियर को राघव की आंखो से देख रही थी।
ग्वालियर मे उन दिनों डुप्लेक्स मकानों का चलन था। राघव जिस मकान में रहने गया उस मकान के ऊपरी हिस्से मे एक शर्मा परिवार रहता था। बेहद शरीफ लोग थे, उनका बेटा मोहन राघव का हमउम्र था और किसी बीमा कम्पनी में काम करता था। सिया चूँकि गर्भवती थीं इसलिये वो नैनिताल मे ही रह रही थी।
बैंक में कम अधिक होने के कारण राघव को होली पर छुट्टी नहीं मिली थी। वो घर नही जा सका था। होली के दिन वो बरामदे में बैठा अखबार पढ़ रहा था।उसे सिया की बेहद याद आ रही थी। अखबार पढ़ने मे उसका मन नहीं लग रहा था।  ” अकेले आदमी के लिये क्या रोज़मर्रा क़े दिन क्या त्योहार सब दिन एक समान हो जाते है।”
उसके घऱ में काम करने वाली राघव को चाय देकर गई राघव ने ज्यों चाय का कप होठों से लगाया किसी ने ढेर सा गुलाल उसके ऊपर उछाल दिया। एक लड़की ने ज़ोर से हँसते हुए कहा ” बुरा ना मानो होली है!”
राघव ने कप नीचे रखा और उस उड़ते हुए गुलाल के बीच देखा एक उन्नीस बीस साल की लडकी खिलखिला कर हँस रही थी। राघव हतप्रभ हो उसे पहचानने की कोशिश कर रहा था तभी मोहन वहा आया और लगभग घुड़कते हुए बोला ” अरे ये क्या बचपना है कम से कम परिचय होने का तो इंतज़ार कर लेती!” ऐसा मज़ाक सबको नही अच्छा लगता। 
राघव की ओर मुखातिब होते हुए बोला सॉरी ! “राघव ये मेरी छोटी बहन वैदेही है!” ये भोपाल मे मेरी बुआ के घर रह कर नर्सिंग की पढ़ाई  कर रही है।
जब तक राघव कुछ बोलता ” अरे! आपका नाम राघव है तो अपनी सिया को क्या अयोध्या छोड़ आये हैं!” हँस कर वैदेही बोली। 
मोहन ने उसे घूर कर देखा और चुप रहने का इशारा किया फिर थोड़ा सा गुलाल राघव के माथे पर तिलक लगाया उसके गले लग गया और बोला राघव ! मां ने कहा है आज त्योहार के दिन दोपहर का भोजन हमारे घर हमारे साथ करना।”  वैदेही की इस शरारत के लिये माफ कर देना। 
मोहन ने वैदेही से बोला ” चल तेरी सहेली के घर छोड़ देता हू वहा जी भर कर होली खेलना। जब मन भर जाये तो खबर करवा देना मैं तुझे लेने  आ जाऊंगा।
वैदेही जाने लगी फिर राघव को देखते हुए बोली” सॉरी! राघव जी आपकी चाय खराब हो गई। हैप्पी होली!”
राघव मोहन और वैदेही को गेट की तरफ जाते देखता रहा। 
दोपहर मे जब वो मोहन के घर भोजन करने गया तो उसे घऱ की बहुत याद आई।
पहाड़ों मे होली पर खास रौनक होती है लगभग महीने भर होली का त्योहार मनाया जाता है। लोग एक दूसरे के  घर जाते है होली के गीत गाये जाते है  और लम्बे समय तक दावते होती रह्ती है। नैनीताल और अपनी सिया से दूरी आज उसे बेहद खल रही थी।
होली के दो चार रोज़ बाद वैदेही वापस भोपाल चली गई। लगभग एक महीने बाद राघव छुट्टी लेकर नैनीताल गया सिया के प्रसव के दिन नजदीक आ गये थे। राघव को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम आर्यन रखा।अबकी बार राघव सिया और बच्चे को लेकर ग्वालियर आया था। बच्चे के कारण शर्मा परिवार से घनिष्टता और बढ़ गई थी। 
वैदेही की सिया से गहरी दोस्ती हो गई थी। वैदेही जब भी छुट्टियों में घऱ आती दोनो मिल कर खूब घूमती फिरती, खूब बाज़ार मे चाट पकोडॊ के मजे लिये जाते थे। आर्यन भी वैदेही से खूब हिल मिल गया था। अच्छा समय गुजर रहा था।
दोबारा राघव का तबाद्ला हुआ लेकिन इस  बार वो देश की राजधानी यानी की दिल्ली जा रहा था। बड़े ही भारी मन से राघव और सिया ने शर्मा परिवार से विदा ली। वे लोग दिल्ली चले गये। धीरे धीरे सब अपनी अपनी ज़िंद्गी मे मसरूफ हो गये।
ज़िंद्गी की रफ्तार कुछ ऐसी होती है कब चुटकी बजाते साल दर साल निकलते जाते हैं हमे पता ही नही चलता। नौकरी रोज़मर्रा कीं ज़रुरते हमारी साधारण दिनचर्या जाने कब हमे आत्मकेंद्रित बना देती है हम समझ ही नही पाते। समय गुज़रता रहा राघव मोहन सिया और वैदेही अपनी ज़िंद्गी के रास्तों पर चलते रहे। कुछ दिनों तक खत और फोन हुए फिर समय की दूरियां आ गई।
राघव और सिया का बेटा आर्यन इंटर के आखिरी साल मे था तभी उनकी ज़िंद्गी मे एक तुफान ने दस्तक दी।सिया की तबीयत अक्सर थोड़ी बिगड़ी रहती लेकिन किसी ना किसी वजह से वो अस्पताल जाना या कायदे से जांच करवाना टालती रहती थी।राघव भी बैंक में बढ़ती ज़िम्मेदारियो के बीच समय नही निकाल पाते थे। आर्यन अपनी पढ़ाई और कोचिंग मे व्यस्त रह्ता। 
 महिलाएं दूसरों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाने मे इतना मशगूल हो जाती है कि वो ये भूल जाती हैं अपने शरीर और स्वास्थ के प्रति भी उनकी कुछ ज़िम्मेदारी है।सिया भी इसका अपवाद नही थी। एक रोज़ सिया की तबीयत खराब होने पर  जब अस्पताल ले जाया गया तो पता चला उसे गर्भाशय का कैंसर है। यह सुन कर तो जैसे राघव के पैरों तले ज़मीन न रही।  क़िस्मत की मार वे  इलाज करवाने मे देर कर चुके थे।
पता लगते ही राघव ने सिया का बेहतरीन इलाज शुरु किया, आर्यन भी हर तरह से मां की सेवा करता लेकिन
” होइहे वही जो राम रचि राखा।”
सिया की हालत दिन ब दिन बिगड़ती गयी और फिर आर्यन के इंटर का परिणाम आने से पहले ही सिया इस दुनिया से सिधार गई।आर्यन ने अपनी मां कों तो खो दिया था लेकिन राघव की तो जैसे दुनिया ही उजड़ गयी थी।होश संभालते हुए  सिया से उसकी दोस्ती फिर दोनों का इश्क परवान चढ़ा, इतनी लम्बी शादी शुदा ज़िंद्गी वो सारे बीते लम्हे जैसे राघव को हर पल बेचैन रखते। किसी तरह बैंक का काम निपटा घर आकर बस अपने कमरे मे ही पड़ा रहता। 
ज़िंद्गी की सबसे बडी़ खुसूसियत ये ही है वो खामोशी से अपनी राह पर चलती रहतीं है। राघव सिया के बिछड़ने के गम मे डूबा था और इसी बीच आर्यन का चयन आई आई टी मुम्बई मे हो गया। जब आर्यन ने ये खबर राघव को बताई तो जैसे आर्यन नींद से जागा उस रोज़ बाप बेटे गले लग कर खूब रोये। एक तरफ दोनों सिया को याद कर रहे थे आर्यन को पिता को ऐसे समय मे छोड़ कर जाने की तकलीफ हो रही थी। राघव से सोच कर हैरान था की जिस समय उसे सिया की निशानी आर्यन की देखभाल करनी चाहिए थी उनका बेटा अपने पिता को सम्भाल रहा था।
राघव ने उस रोज़ अपने मन को कड़ा कर लिया, आर्यन के मुम्बई जाने की तैयारी की फिर उसे छोड़ने गया।
वापस आकर राघव ने खुद को काम मे मसरूफ कर लिया। दिल्ली मे उसका मन तो नहीं लगता था लेकिन नौकरी तो वही करनी थी। तबादले के लिये अर्जी तो डाली थी मगर अभी कुछ हो नही पाया था। धीरे धीरे चार साल बीत गये आर्यन छुट्टियों में घऱ आता कभी राघव मुम्बई चला जाता। समय बीता आर्यन की नौकरी मुंबई मे लग गई। उस दिन राघव को महसूस हुआ जैसे उसने सिया का सपना पूरा कर लिया हो। बरसों बाद बाप बेटे ख़ुश हुए साथ ही राघव का तबाद्ला रानीखेत हो गया।राघव खुश था की वो अपने बचपन के शहर नैनीताल के नज़दीक पहुँच गाया है।
समय के साथ सभी शहरों मे भीड़भाड़ बढ़ती जा रही है।राघव ने बैंक से थोड़ी ही दुरी पर मकान ले लिया था। घर के सामने एक बड़ा सा पार्क था जहा शाम को खासी भीड़ होती थी। शाम को राघव भी कभी कभी सैर के बाद वहा बनी बैंच पर बैठ जाता था।
एक रोज़ राघव अभी बैंच पार बैठा ही था कि किसी ने आवाज़ लगाई….
” सिया ! नही सिया उस झूले पर मत जाओ तुम गिर जाओगे!
राघव ने उस दिशा मे देखा एक पांच छ साल की विकलांग बच्ची अपनी बैसाखी के सहारे फिसलने वाले झूले पर चढ़ने की कोशिश कर रही है।  राघव झटके से उठा और जाकर उस बच्ची को गोद मे उठा लिया।राघव ने बैसाखी को एक किनारे पर रखा और आगे से बच्ची को झूले पर फिसलने दिया और नीचे आने से पहले उसे फिर उठा लिया। बच्ची को तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गई।  वो बच्ची ज़ोर से खिलखिला कर हंसने लगी ।उस नन्ही सी बच्ची की खिलखिलाहट ने राघव के मन मे एक जलतरंग बजा दी। कहते है हँसी संक्रामक होती है आज बरसों बाड़ राघव दिल खोल कर हंसा। राघव अभी बच्ची को झूला रहा था
 तभी एक प्रौढ़ महिला पास आई और बोली” माफ किजियगा आज इन बच्चों को आश्रम से मैं अकेले लेकर आई हू इसलिये दिक्कत हो रही है। सिया बेटा! चलो  अंकल को बाय बोलो।”  उस औरत बाकी आठ दस बच्चों को बुलाया और पार्क के गेट की ओर चल दी। 
राघव उनको जाते हुए देखता रहा। फिर जाने क्या सोच कर वो जल्दी से उनके पास गया और बोला सुनिये ये सब बच्चे कहा रहते हैं। ये कहते हुए उसने बच्ची को गोद मे उठा लिया और बैसाखी दुसरे हाथ मे पकड़ ली। बाहर एक वैन खड़ी थीं सब बच्चे बारी बारी उसमे बैठ गये। सब बच्चे हाथ हिला कर बोल रहे थे ” बाय अंकल ! बाय अंकल! 
राघव एकटक उस नन्ही सी सिया को देखता रहा।
आज कई दिनों कई बाद राघव को शाम खुशनुमा सी महसूस हुई। आर्यन से बहुत सारी बातें कीं, शाम की घटना का ज़िक्र  किया। आज मन से उसने खाना बनाया और बिस्तर पर लेट गया। बरबस ही खिलखिलाती हुईहुई सिया का चेहरा उसकी आंखो के सामने आ गया और उसके होठों पर एक मुस्कुराहट तैर गई।
सुबह वही दिनचर्या थीं लेकिन पार्क पर नज़र पड़ते ही दिल मे एक खुशी की लहर दौड़ गई। शाम होते ही आज राघव ने टॉफियाँ ली और आश्रम के बच्चो का इंतज़ार करने लगा। तभी वैन आती हुई दिखी राघव ने आगे बढ़कर सिया को उतारा बाकी बच्चो को टॉफियाँ बाँट दी। सब बच्चे खेलने गये आश्रम की महिला और राघव सिया को झूला झुलाने लगे। अब तो रोज़ सिया को  झूला झुलाना राघव की दिनचर्या का हिस्सा बन गया था। बैंक से वापस आकर राघव उन बच्चों के साथ समय गुजारता। इस तरह वो बच्चे और नन्ही सिया राघव की ज़िंद्गी का अहम् हिस्सा बन गये थे। 
एक रोज़ सिया नही आई तो पता लगा उसकी तबियत खराब है, उसे बुखार है इसलिये उसे पार्क मे नही लाये। राघव कई दिनो तक इंतज़ार करता रहा  लेकिन सिया हफ्ते भऱ से नही आ रही थी।राघव की बेचैनी बढ़ती जा रही थी राघव ये समझ ही नही सका कब वो बच्ची ज़िंद्गी में इतनी अहम् हो गई कि वो उससे इतना प्यार करने लगा।
मुहब्बत के मायने सबके लिये अलग होते हैं। कौन कब कहां किसकी मुहब्बत मे पड़ जाये इसका पता खुद मुहब्बत को भी नही होता। 
राघव की मुहब्बत उस बच्ची के लिये थी सिया के नाम से थी। सिया से न मिल पाना राघव के दिल को तकलीफ दे रहा था।ुसने बैंक से छुट्टी ली कुछ फल खिलौने लिये और आश्रम की ओर चल दिया। अस्पताल का प्रांगण बेहद हराभरा साफ सुथरा था।राघव ने ज्यों ही गाड़ी खड़ी की और आश्रम की तरफ चला तभी इत्तिफाक़ सें पार्क वाली महिला आती दिखी और राघवा को देखते ही बोली ” सर! आप सिया से मिलने आये है न। ,अरे! वो भी रोज़ आपके पास आने की ज़िद करती है।” चलिये मै आपको उसके पास ले चलती हूँ!
राघव उस महिला के पीछे चल दिया।  
आश्रम के बाहरी तरफ एक बड़ा सा कमरा था जहां बीमार बच्चों को रखा जाता था। वो महिला राघव को दरवाजे पर छोड़ कर चली गई। राघव ने पर्दा हटा कर  अंदर झांका सिया  बिस्तर पर अकेले सो रही उसका कम्बल हटा हुआ था। सिया को ऐसे देख राघव का मन भीग गया ” इतनी नन्ही सी बच्ची बीमारी की हालत मे अकेली बेसुध सो रही थी राघव दबे पैरो बिस्तर के पास गया और सिरहाने बैठ गया और उसने हौले साए सिया का माथा सह्लाया और एकटक उसके मासूम चेहरे को देखता रहा।
जाने क्यों उस  नन्हे से चेहरे मे राघव को अपनी सिया का चेहरा नज़र आने लगा।राघव का जी किया उस नन्ही सी जान को अपने सीने से लगा ले लेकिन तभी एक नर्स ने कमरे प्रवेश किया और  उसे देख्ते ही राघव के पैरों तले की ज़मीन खिसक गई। सामने उसके नर्स की यूनिफॉर्म पहने वैदेही खड़ी थी। राघव भौंचक्का हो उसे देखता रह गया।
वैदेही! ये तुम ही हो!    
 इतने सालों के बाद राघव को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। कहाँ ग्वालियर कहां रानीखेत, उसे कुछ समझ नही आ रहा था। वैदेही को भी शायद राघव से मिलने  की उम्मीद नही थी उसने भी आश्चर्य से पूछा
” अरे राघव जी आप यहां कैसे?  जब तक राघव कुछ बोलता सिया जाग गई लेकिन सामने राघव को देख बेहद खुश हो गई। वैदेही की ओर देख बोली “मासी  ये झूला वाले अंकल है!  राघव ने खिलौने सिया को दिये जिसे देख वो बेहद खुश हुई। 
राघव और वैदेही दोनों के मन मे तमाम सवाल थे लेकिन पूछने के लिये जगह उपयुक्त नही थी। राघव इस समय सिया के लिये परेशान था। सिया को खिलोने से खेलता वही छोड़ राघव बाहर आया, पीछे पीछे वैदेही भी आई। वैदेही कुछ बोलती  राघव ने पूछा वैदेही! ” सिया का बुखार ठीक क्यो  नही हो रहा है? राघव की आवाज़ मे सिया के लिये चिंता साफ झलक रही थी।  ” वैसे तो सब ठीक लग रहा है कुछ और रिपोर्ट आनी बाकी हैं तब शायद कुछ सही पता चले।” राघव कुछ नही बोला  इस आश्वासन के साथ कि वो कल फिर आयेगा राघव ने सिया से विदा ली।
राघव जाने के लिये मुड़ा तो वैदेही पूछ बैठी ” राघव जी सिया भाभी कैसी हैं?
“मेरी सिया अब इस दुनिया मे नही है!”   ये बोलते हुए राघव अपनी आवाज़ का दर्द ना छुपा सका और मुँह फेर कर गाड़ी की तरफ बढ़ गया।
वैदेही ये सुन कर खामोश हो राघव को जाते हुए देखती रही।
वो रात बहुत भारी थी राघव और वैदेही के मन मे हज़ारो सवाल थे।
वैदेही सिया के बगल मे लेटी उसका सर सहलाती राघव और सिया भाभी के बारे मे सोचते जाने कब उसे नीद आ गई लेकिन आज राघव की आंखो से नीद कोसों दूर थी। राघव को सिया की बेहद चिंता हो रही थी साथ हि वो वैदेही के बारे मे सोच रहा था। उसे ग्वालियर मे बिताया समय याद आ रहा था। ज़िंद्गी से भरपूर खिलखिलाती वैदेही याद आ रही थी। एक चंचल बहती हुई नदी कैसे एक शांत सी झील मे तब्दील हो गई थी। ये सारी बाते उसे तकलीफ दे रही थीं, जाने कब देर से उसे नींद आई।
अगले रोज राघव बैंक से जल्दी निकला और सीधा आश्रम पहुंचा।सिया के कमरे मे देखा आज वैदेही सादे कपड़ों मे कोई फाइल थामे मायूस खड़ी थी।राघव को देख अपने आँसू छिपाने की कोशिश मे मुंह फेर लिया और बाहर जा कर बैठ गई। सिया बिस्तर शांत खिलोने थामे लेटी थी लेकिन राघव को देख मुस्कुरा दी\ राघव ने उसे पुचकारा और वैदेही के पास गया। राघव को देख वैदेही के सब्र का बांध टूट गया और वो बेहताशा  रोने लगी और रोते हुए बोली 
राघव…. प्लीज़ सिया को बचा लो! सिया मेरा एकलौता सहारा है उसे कुछ हुआ तो मैं मर जाऊँगी! प्लीज़ कुछ करो!
राघव का तो जैसे दिल बैठ गया उसने वैदेही को बैंच पर बैठाया और उसको झकझोरते हुए बोला वैदेही! क्या हुआ है सिया को? मुझे पूरी बात बताओ।और ये सिया कौन है ?
इस बीच वैदेही कुछ सम्भली उसका रोना शांत हुआ। कुछ खामोश रह कर वो बोली राघव जी। ” पांच साल पहले मैं मेरे पति मोहन भैया का पूरा परिवार वैष्णो देवी के दर्शन करने गये थे। उसी बस मे दो महीने की सिया अपने माता पिता के साथ सफर कर रही थी। ईश्वर की मर्ज़ी देखो बस की दुर्घटना केवल मैं और सिया जिंदा बचे। एक पल मे सब कुछ खत्म हो गया। दो महीनों तक मुझे भी कुछ होश नही था उसी दुर्घटना मे सिया का पैर नही रहा। अस्पताल मे सबको यही लगा की सिया मेरी बच्ची है। और ये ठीक भी था हम दोनो एक दूसरे का सहारा बन गये।
मैंने अखबार मे इश्तेहार दे कर सिया के रिश्तेदारों को खोजने की कोशिश की लेकिन कोई नहीं आया।
जिस देश में नवजात बच्ची को लोग सड़क किनारे या कूड़े के ढेर में फेक देते हैं वहा एक अपाहिज बच्ची को अपनाने कौन आगे आता। 
सिया और मै एक दूसरे के लिये बहुत थे। कुछ ठीक होने पर मैं ग्वालियर गई और मकान बेच कर यहां आ गई । एक छोटा सा घऱ लिया और इस अस्पताल मे नौकरी कर ली। ज़िंद्गी गुजर ही रही थी लेकिन अब……
“अब क्या वैदेही”?
राघव सिया के दिल मे छेद है उसे तुरंत ऑपरेशन की जरुरत है। और मेरी जमा पुंजी बहुत कम है।अब मैं क्या करूं! मैं सिया के बिना जीने की कल्पना भी नही कर सकती। सिया को खोने का डर वैदेही की आंखो मे साफ झलक रहा था। वैदेही बेहद हताश दिख रही थी। राघव का तो जैसे दिमाग सुन्न हो गया था।| कुछ पलों के लिये वहा एक खामोशी पसर गई।
अचानक राघव बैंच से  उठा और बोला वैदेही ! ” शांत हो जाओ भगवान दोबारा मेरी सिया को नही छीन सकता।”
वैदेही को खुद पर शर्म भी आई कि वो अपनी परेशानी मे सिया भाभी के बारे मे पूछना ही भूल गई।
” दोबारा मतलब? क्या हुआ उन्हे?
“पांच साल पहले कैंसर से मेरी सिया की मौत हो गई!”राघव की आवाज़ मे एक मायुसी साफ थी 
राघव ने फिर कहा ” मैं सिया का इलाज कराऊंगा और ये मेरा विश्वास है की भगवान इस बार मेरे साथ अन्याय नहीं करेगा।”   
राघव ने तुरंत आर्यन को फोन मिलाया और सारी बाते विस्तार से बताई।
लगभग घंटे भर की बातचीत के बाद राघव ने वैदेही से कहा ” तुम चिंता मत करो और परसों चंडीगढ़ जाने की तैयारी करो।” परसों आर्यन हमे वहीं मिलेगा,कल मैं बैंक में बाकी की तैयारी कर लेता हूँ। हम कल रात की बस से चंडीगढ़ के लिए निकलेंगे|”
वैदेही को वही छोड़ राघव सिया के पास चला गया।अगले रोज़ उसने छुट्टी की अर्जी दी, इमरजेंसि फड से पैसे निकाले और रात की बस से वैदेही और सिया को लेकर रवाना हो गया।
अगले दिन दोपहर तक वे चंडीगढ़ के मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल पहुचे जहां आर्यन उनका इंतजार कर रहा था।आर्यन के चेहरे पर सिया की झलक दिखाई दे रही थी। उसे देख वैदेही की आंखो मे आँसू आ गये और उस्ने आर्यन को सीने लगा लिया।
आर्यन ने झुककर वैदेही का पैर छू लिया और बोला ” मासी मां अक्सर आपके बारे मे बात करती थी।”
” मुझे उम्मीद ना थी आपसे कभी मुलाकात होगी।” सब उपरवाले की मर्जी  है जो हम सब यहां इकट्ठा हो सके। आप बिल्कुल चिंता न करे मैंने बात कर ली है मेरे दोस्त के पिता यहा हार्ट सर्जन है कल सिया के सारे टेस्ट होंगे और परसों शाम को ऑपरेशन होगा।”
आर्यन की बातो से राघव और वैदेही को कुछ तसल्ली हुई और सभी लोग अस्पताल के पास बने होटल मे रहने चले गये। सिया तो आर्यन से ऐसे घुलमिल गई जैसे सालों से पहचानती हो।
अगले तीन चार दिन काफी भाग दौड़ रही, सिया के तमाम टेस्ट होते रहे राघव और आर्यन ने सारी जिम्मेदारी उठा ली थी। सारी रिपोर्ट आने के  बाद पांचवें दिन सिया का ऑपरेशन सफलतापूर्वक हो गया।पूरे समय राघव वैदेही के साथ ईश्वर से सिया के लिये प्रार्थना करता रहा। 
आखिर उन सब की तपस्या रंग लाई। एक हफ्ते के बाद वे चारों टैक्सी से रानीखेत जाने के लिये रवाना हुए। वहा पहुच सिया और वैदेही को आश्रम मे छोड़ राघव और आर्यन अपने घर आ गये। इतने दिनो की भागमभाग के बाद
घर पहुच अच्छा लग रहा था। अगली सुबह राघव बरामदे में बैठा चाय पी रहा था तभी आर्यन आया और बिना किसी लाग लपेट के   बोला “क्या सिया और वैदेही मासी हमेशा हमारे साथ नही रह सकती?”
राघव ने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुए कहा ” मतलब क्या है तुम्हारा?
” पापा अगर सिया को जन्म दिये बग़ैर वैदेही मासी उसकी मां बन सकती हैं तो मेरी क्यों नही? मुझे तो बचपन मे गोद खिलाया है।
राघव ने हैरानी से आर्यन की ओर देखा और बोला “पागल हो क्या? बेटे की शादी करने की उम्र मे खुद का ब्याह रचाऊ! 
पापा ये शादी आपके और वैदेही मासी के लिये नही सिया के लिये होनी चाहिये, उसे एक पूरा परिवार मिलना चाहिये।”
राघव को कोई जवाब नहीं सूझा ।
शाम को राघव और आर्यन सिया को देखने आश्रम गये।राघव सिया को कहानी पढ़कर सुनाने लगे तभी वैदेही अपनी शिफ्ट खत्म करके आई सबको आज वो भी मुस्कुरा दी। आर्यन ने कहा ” मासी इतने सालों के बाद आपसे मिला  आप मुझे कोई तोहफा नहीं दोगी?
वैदेही मुस्कुराते हुए बोली ‘ आर्यन बेटा! तुम तो हमारी ज़िंद्गी मे देवदूत बनकर आये हो, बोलो क्या दूं तुम्हें?
आर्यन ने आगे बढ़कर वैदेही का हाथ थाम लिया और बोला” मैं आपको मासी  नही मासी मां बुलाना चाह्ता हू बचपन से अकेले रहा क्या सिया मेरी बहन नही हो सकती।” 
वैदेही की आँखो मे आँसू झिलमिला रहे थे, होठ कांपने लगे उसे कोई जवाब नही सूझ रहा था।

वैदेही का हाथ थामे आर्यन राघव के नज़दीक आया और बोला ” पापा प्रेम और मानवीय रिश्तों साए बना हमारा ये परिवार एक नायाब उदाहरण होगा ” 

राघव आश्चर्य से आर्यन को देख रहा था। वैदेही सर झुकाए खड़ी थी।
” क्यो मासी मां मैं ठीक कह रहा हूँ न!
आर्यन ने आगे बढ़कर सिया को गोद मे उठाया और बाहर जाते हुए बोला ” बाकी की बाते आप दोनो तय कर लो, मैं सिया के साथ राखी खरीदने जा रहा हू, आज ज़िन्दगी मे पहली  बार मेरी बहन मुझे राखी बांधेगी! है न सिया?
सिया मुस्कुराते हुए उन तीनों को देख रही थी…

 

 

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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Kiran Shukla
मैं किरण शुक्ला एक गृहणी हूं। मैं नवाबों के शहर लखनऊ की रहनेवाली हूं। थोड़ा बहुत लिखने का शौक पहले से था लेकिन जिंदगी की व्यस्तताओं मे ये शौक ज़रा पीछे छूट सा गया था। कला मंथन मंच की आभारी हूं जिसकी वजह से मैंने नए सिरे से अपने शौक को वक्त देना शुरू किया है। सही मायने मे नवलेखिका हूँ जो शायद आजकल की पीढ़ी के लिए लिखने का प्रयास कर रही हूं। उम्मीद करती पढ़ने वालों की अपेक्षा पर खरी उतरूं।

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