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बेटियों वाले वंश !

एक ऐसी परम्परा कहूँ या कुरीति जिसको बहुत नज़दीक से जिया है वही कुछ आपबीती सुनाने जा रही हूँ।

ये केवल उस समय की ही बात नहीं, जब मैं छोटी थी। ये तो सदियों से चली आ रही समाज की वो मानसिकता है जो अनंतकाल से थोपी जा रही है और आज भी कोढ़ की तरह समाज में पल बढ़ रही है।
बचपन से यही सुना कि भईया नहीं है? जो भी मिलता या घर आता, सबसे पहला प्रश्न तोप से निकले गोले की तरह यही दाग़ देता...“लड़का नहीं है बस लड़कियाँ ही हैं”। माथे में एक आँख होना तो बहुत जरूरी है।
मेरा बालमन बहुत कुछ तो न समझ पाता, लेकिन इतना जरूर समझ गया कि भाई कोई बहुत जरूरी जीव है जिसके न होने पर लोग अज़ीब सी बातें करते हैं और हमें बेचारगी भरी दृष्टि से देखते हैं जैसे एक भाई के बिना हम बहनें दीन-हीन हों।
एक-एक वो सारे पल याद हैं कि कैसे माँ कहीं भी जाती, तो हम बहनें आस लगाएँ बैठी रहतीं कि भाई लेने गयी हैं हॉस्पिटल। हम नादान बालक बहुत जोश व उत्साह से माँ पापा के आने की प्रतीक्षा करते, परंतु जब उन्हें खाली हाथ देखते तो नन्हा सा मासूम दिल उदासी में डूब जाता। उदासी भी इसलिए क्यूँकि सबने दिलों-दिमाग़ में यही बिठा दिया था कि भाई तो होना ही चाहिए, अब जो इतना इम्पोर्टेन्ट है वो हमारे पास क्यूँ नहीं?

कुछ ज़्यादा तो समझ में न आता था और न ही पूछने की हिम्मत होती, गुज़रते समय के साथ ये ज़ालिम दुनिया और भी ज़्यादा भाई की कमी का एहसास दिलाती रही….

लड़कियों की शादी कैसे होगी, कौन रिश्ता करेगा, बिना साले के कैसी ससुराल, वंश आगे कैसे बढ़ेगा, कम से कम अंतिम कारज़ के लिए तो बेटा होना ही चाहिए….. उफ्फ….

हम छोटे- छोटे बच्चे ऐसे बड़े-बड़े… कुछ समझ में आएँ और कुछ समझ से ऊपर से निकले इन सवालों से डर जाते और माँ पापा हर नामुमकिन को मुमकिन बनाने में लगे रहते। माँ की वो सारी तकलीफ़े उस समय समझ नहीं पाती थी, परंतु जब समझ आया.. तो जाना कितनी तकलीफ़े सहीं कितनी तपस्या की, क्या-क्या नहीं सहन किया शारीरिक और मानसिक रूप से भी, हमें एक भाई देने के लिए।

फिर वो दिन आया जब भाई हुआ हम बहनों को लगा कि जैसे कोई कीमती खज़ाना पा लिया हमने।

जैसे-जैसे मैं बड़ी हो रही थी, बातों को समझने लगी| और कुछ बातें सुनकर सोच में पड़ जाती, दर्द भी होता…“कि चलो वंश बढ़ाने वाला, नाम आगे ले जाने वाला आ गया। मन में बहुत से सवाल उठते, जो आज तक उपद्रव मचाते हैं कि फिर हम कौन हैं, क्या हमारा कोई अस्तित्व नहीं? हालाँकि माँ-पापा ने हमें भाई से भी ज़्यादा लाड़-प्यार से पाला, परंतु वो उन कड़वे शब्दों की टीस का एहसास था, जो दर्द समाज ने दिए और उन शब्दों ने बालमन में पैठ बना ली।

शायद यही वज़ह थी कि जब मैंने कलम उठाई तो अपना सरनेम वहीं रखा (मित्तल) पैतृक, कि नहीं… भाई ही नहीं मैं भी अपने पापा के नाम को आगे ले जा सकती हूँ उन्हें गर्व करा सकती हूँ, और आज जब मेरे पापा सबसे गर्व से कहते है… कि ये मेरी बेटी है, मेरा गरूर… तो मैं गर्व कर पाती हूँ बेटी होने का।

अच्छे से याद है मुझे वो लम्हा, माँ की तबियत बहुत ख़राब हो गई| भाई छोटा था, तो हेल्थ से सम्बंधित कोई भी परेशानी मैं ही देखती थी। जैसे ही मुझे पता चला कि माँ की तबियत बहुत खराब है, मैं उन्हें अपने साथ ले आई.. माँ की सब टेस्टिंग्स करवाई और फिर उनको ऑपरेट करवाना पड़ा…मेरे बच्चे छोटे, मेरे स्टूडेंट्स के एग्जामस और माँ की हेल्थ!
जाने कितने चक्कर लगते हॉस्पिटल, घर के| माँ को छोटे बच्चे की तरह संभाला था मैंने, माँ पूरी तरह ठीक हो गई लेकिन उस भागदौड़ में मैं बीमार पड़ गई| तब माँ ने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए मुझे बहुत सा प्यार किया और ना जाने कितने ही आशीर्वाद दे डाले.. मेरा बच्चा सबसे प्यारा है…तेरे बिना क्या होता हमारा… उस दिन जो खुशी हुई अपने माँ पापा की प्यारी लाडली बेटी होने की… इसके आगे सब ख़ुशियाँ बेकार हैं। उस दिन बेटी होने पर, नारी होने पर गर्व हुआ।

 

आज तक मेरी समझ में ये नहीं आया कि समाज में ये भेदभाव क्यूँ? मैं दो बेटियों की माँ हूँ और शायद इसी कड़वे अनुभव ने कभी बेटे की इच्छा मेरे मन में बलवती न होने दी और न ही मैंने अपनी बेटियों के मन में। आज अगर कोई मेरे से पूछता है कि बेटा नहीं है तो मैं बड़ी बेबाकी से रोषपूर्ण उसे पलट कर जवाब देती हूँ।
अक्सर सोचती हूँ कि क्या बेटी को जन्म देते वक़्त माँ को कम कष्ट होता है या पालने में? एक माँ कभी अपनी संतान में भेदभाव नहीं करती लेकिन ये समाज और इसकी दकियानूसी परंपराएँ, सुना सुनाकर मज़बूर कर देते हैं कि तुम पूर्ण नहीं हो,तुम्हारा परिवार पूर्ण नहीं है…. 
  मैं बगावत करती हूँ इस परंपरा के खिलाफ कि बेटा क्यूँ… मैं वो सारे अधिकार और हक अपनी बेटियों को देती हूँ… जिनपर बेटों का हक समझा जाता है…मेरी बेटियाँ मुझे पूर्ण बनाती हैं…और मैं गर्व करती हूँ कि मैं बेटियों की माँ हूँ।

 

 

 

 

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