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मै नारी हूँ!

लक्ष्मी दुर्गा शारदा, सब नारी के रूप 

देवी सी गरिमा मिले, नारी जन्म अनूप।

हमारे साहित्य में ऐसी खूबसूरत पंक्तियाँ आपको पढ़ने के लिये ढेरों मिल जायेंगी लेकिन क्या यही सच्चाई है। हमारे मन मे ये सवाल हमेशा उठता है जिस देश मे सीता अनसूया गार्गी मैत्रेयी जैसी स्त्रियां जन्मी उस देश मे निर्भया आयेशा जेसिका लाल जैसी स्त्री सम्बंधित दुर्घटना कैसे हो सकती है। जिस देश मे कन्या पूजन का विधान है उस देश के आधे अखबार मे केवल नारी पर होने वाले अत्याचार और जुल्मों की खबर क्यों होती है।
हम अतीत पर नज़र डालें तो देखेंगे स्त्री और पुरुष दोनो को समाज मे समान दर्जा मिला था और मिलना भी चाहिये। आखिर प्रकृति ने दोनो को एक दूसरे का पूरक बनाया था। एक ऐसा समाज जहां स्त्री को अपना जीवनसाथी को चुनने का अधिकार था। समाज मे प्रचलित स्वयंवर का चलन तो यही कहता है। स्त्री को यज्ञ पूजन ग्रंथों के ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार था।समाज मे एक सम्मान होता था।
देखा जाये तो मानव समाज यदि एक गाड़ी मान ली जाये तो स्त्री और पुरुष उसके दो पहिये के समान हैं। एक भी अगर कमज़ोर हुआ तो समाज सुचारु रूप से नही चलेगा। समाज को उन्नत बनाने की जिम्मेदारी दोनों पक्षों की है। अब प्रश्न ये उठता है की सीता गार्गी सावित्री जैसे जैसी विदुषियों की धरती पर नारी की दुर्दशा क्यों होने लगी। समय के परिवर्तन के साथ धर्म का जामा पहन कई प्रथा हमारे समाज मे प्रचलित हो गईं। पुरुष समाज ताकतवर था तो खुद को अधिक श्रेष्ट समझ हर वस्तु पर अपना वर्चस्व जमाने लगा। कुप्रथाओं के फैलने से स्त्री का महत्व धीरे धीरे कम होने लगा, स्त्री देवी ना हो विलास की वस्तु हो गई। समाज और परिवार मे इसका महत्व कम होने लगा। 
स्त्री के अधिकार कम हुए और तभी विदेशी आक्रांताओं के आगमन ने स्त्री को समाज के सबसे निचले पायदान पर ला खड़ा किया। स्त्री को सुरक्षा के नाम पर घर की चारदीवारी मे सीमित कर दिया गया। उसे ना तो शिक्षा का अधिकार था ना ही बोलने का।

 

घर मे नारी केवल दूसरों के रहमो करम पर निर्भर थी। पर्दा के नाम पर उसके मानवीय अधिकार छीन लिये गये वो केवल पुरुष अतृप्त वासना की पुर्ति का साधन मात्र बन गयी। एक जानवर की भांति उसपर पुरुषों का आधिपत्य होता था। पर्दा एक ऐसा चलन जिसे उसकी इज्जत के साथ जोड़ दिया गया अर्थात यदि नारी पर्दा नहीं करती है इसका मतलब वह अपने परिवार के बड़े बुजुर्गों की इज्जत नहीं करती या वो समाज की या उसकी परंपराओं का सम्मान नही करती। नारी का पर्दा ना करना नारी के उच्च श्रृंखल होने या सामाजिक मान्यताओं के खिलाफ माना जाता था और इस बात के लिये समाज के तथाकथित समझदार लोग नारी को दंडित करने को उचित ठहराते हैं।
एक कपड़े का टुकड़ा नारी को समाज मे इज्जत दिलाएगा या उसके चरित्र का मापदंड बनेगा इस प्रथा का औचित्य समझ के परे है। ये प्रथा धीरे धीरे नारी के मन मे इस कदर घर कर गई है कि नारी ये समझ ही ना सकी पर्दा केवल उसके तन को नहीं बल्कि उसके मन मस्तिष्क को भी ढक दे रहा है। समय बीतने से साथ जैसे नारी खुद भी खुद को भूल गई।
समाज या परिवार मे उसका भी कोई अस्तित्व है नारी को स्वयं याद नही रहा। उसके हृदय मे अपने विकास की भावना नहीं बची। नारी को अपने अस्तित्व का एहसास ही नही रहा था। पिता पति और पुत्र की उचित या अनुचित इच्छा को शिरोधार्य कर लेना उसकी नियति बन गया था।

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी

आँचल में  है दूध और आंखों मे पानी।

मैथिलीशरण गुप्त ने नारी के दयनीय दशा का स्वाभाविक वर्णन किया था। 

देश मे अंग्रेजों के आगमन से कोई बदलाव नहीं हुआ। पुरुष वर्ग तो पढ़ा लिखा अंग्रेजी तौर तरीके अपनाने लगा लेकिन घर मे या समाज मे नारी की दशा मे कोई सुधार नहीं आया।

हमारे समाज मे उस समय बाल विवाह, निरक्षरता, अस्पृश्यता, सती प्रथा, बहु विवाह, जातिगत भेदभाव, दहेज जैसी कुप्रथाये फैली थीं। इनके खिलाफ बोलना या इन्हे मानने से इनकार करना समाज से बगावत करने जैसा था। बीसवीं सदी में दुनिया बहुत तेजी से बदल रही थी और भारत भी इससे अछूता नही रहा। समाज मे एक जागृती कि लहर दौड़ गई थी।
शिक्षा का प्रचार तेजी से बढ़ा इसके साथ ही समाज मे जाग्रत वर्ग के लोगों का आना प्रारम्भ हुआ। एक ऐसा वर्ग जो समाज मे फैली कुरीतियों धार्मिक आडम्बर और नारी पर होने वाले अत्याचार के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाने लगा था।समाज की हर बुराई का खामियाज़ा नारी को सहना पड़ता था। कभी बाल विवाह के नाम पर अयोग्य जीवन साथी के साथ बंध जाती, पैसो के अभाव मे कम उम्र की लड़की का विवाह किसी बूढ़े के साथ हो जाता, यदि वो विधवा हो जाये तो सती होना उसका नसीब बन जाता था। यदि सती नहीं हुई तो समाज मे उसे एक बहिष्कृत जीवन जीना पड़ता था। पुरुष जितने चाहें विवाह कर सकता था लेकिन यदि एक बच्ची विधवा हो जाये तो सारी उम्र उसे अकेले ही गुजारनी पड़ती। 
इन सब बुराइयों के साथ समाज मे यदि उसका शारीरिक शोषण हो तो इस बात की कोई सुनवाई नहीं थी उल्टा इस अत्याचार के लिये भी वही जिम्मेदार ठहराई जाती थी। आज के समाज मे भी बलात्कार के लिये किसी न किसी रूप मे नारी को ही जिम्मेदार ठहराने कि कोशिश की जाती है इस अन्याय के विरुद्ध अपने परिवार जन भी साथ देने नहीं आते।नारी को समाज मे बदनामी का डर दिखा कर खामोश कर दिया जाता है। हमारी न्याय व्यवस्था ऐसी है जहां एक अपराधी को दंड देने मे बरसों निकल जाते हैं।
हमारे देश मे जब अंग्रेजो के विरुद्ध स्वतंत्रता आँदोलन चल रहा था उसी समय समाजिक बुराइयों के खिलाफ भी प्रयास तेज़ हो गये थे। समाज मे अत्याचारों के विरुद्ध राजाराम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर , स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, ज्योतिबा फुले, सर सयेद अहमद खान, ऐनी बेसेंट जैसे समाज सुधारको ने बुलंद आवाज़ उठाई।
समाज मे इन सुधारकों के प्रयास से तमाम कानून बनाए गये। धीरे धीरे समाज मे लड़कियों की शिक्षा पर ज़ोर दिया जाने लगा। नारी खुद अपने अधिकारों के प्रति सजग हुई अपने जीवन की दिशा और दशा के लिये निर्णय लेने लगी। हमारी सरकार ने भी नारी को मुख्यधारा से जोड़ने उसे तरक्की के अवसर देने के लिए तमाम योजनाएं बनाई। शिक्षा के प्रचार प्रसार पर बल दिया। दहेज के खिलाफ कड़े कानून बनाए।
दहेज की विभीषिका मे नारी को ना केवल जलाया गया बल्कि लिंग परीक्षण के द्वारा बेटियों को कोख मे ही मारा जाने लगा । इसका नतीजा यह हुआ की समाज मे स्त्री पुरुष का अनुपात बिगड़ने लगा है। इस दिशा मे सरकार ने “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा बुलंद किया है।
आज 2021 है नारी ने अपनी तरक्की और कामयाबी का एक लम्बा रास्ता तय किया है लेकिन फिर भी अभी बहुत कुछ करना बाकी है। महानगरों मे तो आत्मनिर्भर स्त्री का एक बड़ा तबका है लेकिन गाँवों मे हमारे जन जातिय इलाकों मे नारी का आज भी शोषण होता है। इस दिशा मे बहुत कुछ करना अभी शेष है। 
इस दिशा मे प्रयास के लिये हम केवल अपनी सरकार या नौकरशाही द्वारा चलाये जा रहे कार्यक्रमों के भरोसे नहीं रह सकते हम सब को खुद मिल कर कोशिश करनी होगी। आज इस दिशा मे अरुणा रॉय, मेधा पाटकर, किरण बेदी, अरुंधति रॉय, इरोम शर्मिला, मानसी प्रधान जैसे तमाम लोग अपने अपने प्रयास कर रहे है। माना आज नारी बहुत सशक्त हो रही है लेकिन अब भी उसे शोषण का शिकार होना पड़ता है। इससे बचने के लिये शिक्षित होने और आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता है।

संपत्ति का अधिकार, घरेलू हिंसा, दहेज के लिये बनाये गये कानून आज नारी के अपने अधिकारों के लिए सजग और सशक्त बना रहे है।

मेरा मानना है केवल शिक्षित और आत्मनिर्भर होकर कोई अपना जीवन सार्थक बना सकता है। नारी भी इस बात का अपवाद नहीं है। “यदि एक पुरुष शिक्षित हो केवल वही शिक्षित होगा लेकिन यदि एक नारी शिक्षित होती है तो एक पूरी एक पीढ़ी शिक्षित होती है”।
आत्मनिर्भर होना केवल मुद्रा का अर्जन करना नही है अपितु एक खुली सोच रखना अपने आसपास फैली किसी बुराई के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना और किसी कमज़ोर कीं मदद कर सकना भी होता है। एक से एक हाथ मिले सो हमारे समाज मे कोई अत्याचार नही होगा एकजुट होकर हम हर बुराई के खिलाफ लड़ सकेंगे। 
हर स्त्री की यह जिम्मेदारी है वो आने वाले पीढ़ी को विचारो और संस्कारो से परिपूर्ण बनाये और समाज मे नारी की दशा को सुदृढ़  बनाने का प्रयास करे।जब स्त्री और पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगे तभी हमारा देश भी तरक्की की नई ऊंचाइयां छू सकेगा।

 

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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Kiran Shukla
मैं किरण शुक्ला एक गृहणी हूं। मैं नवाबों के शहर लखनऊ की रहनेवाली हूं। थोड़ा बहुत लिखने का शौक पहले से था लेकिन जिंदगी की व्यस्तताओं मे ये शौक ज़रा पीछे छूट सा गया था। कला मंथन मंच की आभारी हूं जिसकी वजह से मैंने नए सिरे से अपने शौक को वक्त देना शुरू किया है। सही मायने मे नवलेखिका हूँ जो शायद आजकल की पीढ़ी के लिए लिखने का प्रयास कर रही हूं। उम्मीद करती पढ़ने वालों की अपेक्षा पर खरी उतरूं।

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