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गुलमोहर के फूल

 

आज पाँच साल बाद निकिता ने अपनी स्कूटी उसी पार्क के सामने रोकी,जहाँ वह और अनुज अक्सर मिला करते थे।पार्क की उसी बेंच पर जाकर निकिता बैठी जहाँ वे दोनों दुनिया के शोर और बंदिशों से दूर सिर्फ एक दूसरे की सुनते थे।
अचानक गुलमोहर का फूल उसके हाथ पर गिरा और उसे देख निकिता यादों के रथ पर सवार अतीत की गलियों में सैर करने लगी।
“अनुज,हमारे रिश्ते को समाज और हमारे घरवाले कभी स्वीकृति नहीं देगें।बेहतर होगा कि अब हम अपनी राहें अलग कर लें।”, निकिता को आज भी अपने यह कठोर शब्द याद थे जो उसने अनुज को इसी पार्क में आखरी बार कहे थे।
अनुज ने उसे बहुत समझाया था कि वह उसके लिये समाज और अपने घरवालों से लड़ लेगा और उसका हर कदम पर साथ देगा।किन्तु निकिता नहीं मानी थी।आखिर अनुज बोझिल कदमों और टूटे दिल के साथ वहाँ से चला गया था।
अनुज और निकिता एक ही ऑफिस में सहकर्मी थे।दोनों की दोस्ती कब मोहब्बत में बदल गई,उन्हें स्वयं को पता नहीं चला।किन्तु ये एक ऐसा रिश्ता था जिसे समाज और अनुज के घरवाले कभी मंजूरी नहीं देते।
निकिता एक पैंतिस वर्षीय तलाकशुदा और एक बच्ची की माँ थी और अनुज एक पच्चीस वर्षीय युवा जिसने अभी जीवन की संघर्ष पूर्ण राहों में कदम रखा ही था। निकिता का कोमल और शांत स्वभाव हमेशा से ही अनुज को आकर्षित करता था।और दूसरी तरफ अनुज का चुलबुला और मज़ाकिया स्वभाव निकिता के सूने जीवन में हंसी की फुहार बन गया था।
दोनों ही अपनी ज़िन्दगी के छोटे बड़े सुख‌- दुख आपस में बांटने‌ लगे थे।अनुज की माँ छह साल पहले गुज़र गई थी ,पिता एक प्राइविट कम्पनी में कार्यरत थे और छोटा भाई भी दूसरे शहर में नौकरी करता था।घर में एक बुआ थी जो घर संभालती थी ।सभी बहुत ही दकियानूसी ख्यालात के थे इसलिये अनुज ने किसी को भी निकिता के बारे में अपने घर में नहीं बताया था।
एक दिन अनुज ने निकिता को बताया कि उसकी शादी को लेकर उसके घर में बड़ी जोर शोर से बातें चल रही है। पर उसने‌ शादी करने से साफ़ मना कर दिया है।वो सिर्फ निकिता से ही शादी करेगा‌।
उस दिन निकिता के मन में बहुत से प्रश्न खलबली मचाने लगे।समाज की सोच,उम्र का फासला,उसकी बच्ची की परवरिश ,ये सब बातें उसे अन्दर ही अन्दर कचोटने लगी।उसने गहरी सांस ली और मन में एक कठोर निर्णय लिया।
अगले दिन उसने अनुज को मिलने के लिये उसी पार्क में बुलाया। पूरी हिम्मत जुटा कर उसने कठोर शब्दों में अनुज के साथ अपने रिश्ते का अंत कर दिया।अनुज ने उसे बहुत समझाया कि वह सब संभाल लेगा और सबको मना लेगा।
किन्तु निकिता ने एक न सुनी।वह अपने निर्णय पर अटल रही। निकिता ने नौकरी छोड़ दी और किसी दूसरी कम्पनी में नौकरी कर‌ ली।
आज जब निकिता ने पाँच साल बाद अनुज को उसकी पत्नी व बेटी के साथ बाज़ार में देखा तो एक पल को निहारती ही रही।किन्तु फिर स्वयं को संभालती हुई सब अनदेखा कर, इस पार्क में चली आई।
“मोहब्बत के मायने सबके लिए अलग है। कौन कब किसकी और कैसी मोहब्बत में पड़ जाये इसका पता खुद मोहब्बत को भी नहीं होता “, “पर क्या मोहब्बत मतलबी होती है, नहीं न!!”
एक बार फिर निकिता ने खुद को मज़बूत शब्दों में समझाया और एक‌ संतुष्ट मुस्कान के साथ निकिता अब बेंच से उठी और गुलमोहर के कुछ फूल उसने अपने पर्स में रखे । ये फूल उसके लिये अनुज के साथ बिताये पलों का खजाना थे, जो उसके जीवन को हर क्षण महकाते रहेगें।

 

 

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