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Home Writing Contest Hindi Story मुलाकात इक अजनबी से

मुलाकात इक अजनबी से

 

उस दिन सुनहरी धूप खिली थी| मैं हर सुबह की तरह पार्क में टहलने गयी थी| थोड़ी देर टहलने के बाद मैं थक कर एक बेंच पर बैठ गयी| आप जानना चाहते होंगे कि मैं कौन हूँ?
मैं हूँ अंजलि मल्होत्रा, एक 52 वर्ष की महिला| मैं गुजरात की रहने वाली हूँ और यहीं पार्क के पास ही एक कॉलोनी में हमारी एक बहुत आलीशान कोठी है| मेरे पति मिस्टर राज मल्होत्रा, जो की गुजरात के एक बहुत बड़े बिज़नेस मैन थे| घर में दो जवान बेटे और दो बहुएं हैं और तीन पोते-पोतियाँ हैं| भरा- पूरा घर है मेरा, लेकिन किसी के पास किसी के लिए समय ही नहीं है| बस सब अपनी मर्जी के मालिक हैं, छोटे से लेकर बड़े तक सभी|
मुझे डॉक्टर ने रोज टहलने के लिए कहा है क्योंकि मेरे घुटनों में बड़ा दर्द रहता है| बस इसीलिए रोज पार्क आती हूँ और थोड़ा-सा टहल कर इसी बेंच पर बैठ जाती हूँ| मैं और राज जब भी पार्क आते थे, इसी बेंच पर ही बैठा करते थे| ये पार्क में हमारी मनपसंद जगह हुआ करती थी| आप आप जानना चाहेंगे कि ये राज कौन है? अरे! बताती हूँ…….बताती हूँ……थोड़ा साँस तो लेने दो|
राज मल्होत्रा जो कि मुझे मेरे कॉलेज में मिले थे| हम दोनों में पहले-पहल तो बहुत तकरार हुई, फिर प्यार हुआ और फिर इकरार हुआ| हमने अपनी ग्रेजुएशन करने के बाद घर पर बताया और फिर खुशकिस्मती से घरवालों की सहमती से बड़े ही धूमधाम से हमारी शादी हो गयी| सुहाने सपनों के साथ अपनी ज़िन्दगी जीते हुए कब सोनू और मोनू ने जन्म लिया और फिर हमारी ज़िन्दगी ही बदल गयी|
बच्चो की परवरिश, नौकरी दोनों एक साथ थोड़ा मुश्किल था, तो मैंने अपनी नौकरी छोड़ने का मन बना लिया| जब राज को बताया तो उन्होंने बस इतना ही कहा-जैसी तुम्हारी मर्जी| घर के लिए, बच्चो के लिए या कैसा भी निर्णय लेना हो वो सब मुझ पर ही छोड़ दिया करते थे| आज फिर एक निर्णय लेना है मुझे सोचा उनसे पूछ लूँ, जवाब तो पता है मुझे कहेंगे जैसी तुम्हारी मर्जी| लेकिन फिर भी पूछना तो मेरा फ़र्ज़ है|
अभी मैंने उन्हें याद ही कर रही थी और तभी मैंने देखा वो मेरी ही बगल में बेंच पर बैठे हुए हमेशा की तरह मुस्कुरा रहे थे|
“आप कब आए, मुझे तो हमेशा की तरह पता ही नहीं लगा|”
राज ने मेरा हाथ अपने हाथों में थामते हुए कहा, “अंजू कितना कुछ बदल गया है लेकिन तुम अब भी नहीं बदली| पता है अब तुम कितने साल की हो गयी हो, अब तो बिना मुझसे पूछे ही फैसले लेने की आदत डाल लो|”
मैं मुस्कुराने लगी और मैंने कहा ,”नहीं राज ऐसे अच्छा थोड़े न लगता है, कि मैं अकेले-अकेले कोई फैसला ले लूँ| आप तो जानते हैं मुझे नहीं पसंद ऐसा करना|”, राज अपनी उसी मनमोहक अंदाज़ में मुस्कुराते हुए मुझे निहारते रहे|
मैंने थोड़ा रूठने के अंदाज़ में कहा,” वैसे तुम्हें बहुत अच्छा लगता होगा ऐसे बिना मुझसे पूछे कोई भी निर्णय लेना, तभी तो मुझे यहाँ अकेला छोड़ कर चले गए|”
इतना कहते ही राज वहाँ से अचानक ही गायब हो गए| खाली बेंच को देखते ही मुझे सत्य का भान हुआ और मैं फूट-फूट कर रोने लगी| मैं रोते हुए खुद से ही कह रही थी राज तुम्हारी बहुत याद आती है| जब से तुम गए हो मैं बहुत अकेली हो गई हूँ| घर में किसी चीज की कमी नहीं है| हमारे दोनों बच्चे तुम्हारी ही तरह काबिल हैं| उन्होंने तुम्हारी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया है|
तुम्हें पता है उन्होंने तुम्हारी कम्पनी को अपनी लगन और मेहनत से आज बहुत बड़े मुकाम पर ला खड़ा किया है| दोनों बहुएँ भी बहुत काबिल हैं और समझदार भी| राहुल और प्रिया भी अब स्कूल जाने लगे हैं, और सबसे छोटा तो सारा दिन शैतानियों में लगा रहता है| कल तो उसने मेरा चश्मा भी तोड़ दिया| वैसे सोनू चश्मा ले गया है आज ठीक करवा कर ले आएगा| सब कुछ बढ़िया है लेकिन इन सब के बीच  तुम्हारी अंजू अकेली-सी रह गई है|
मुझे कुछ समझ नहीं आता| मेरा मन बहुत उदास रहता है| पहले जब तुम थे हम सब साथ में समय बिताया करते थे| एक-दूसरे की बातों पर ठहाके लगाकर हँसते थे| मुझे वो पिकनिक भी बहुत याद आती हैं, जब हम सब इकट्ठे एक-साथ हर रविवार कहीं बाहर किसी पार्क में जाकर बैठते थे| जब से तुम गए हो कुछ भी पहले जैसा नहीं रह गया है| ऐसा लगता है सब अपने आप में कितना बिजी हैं| मेरे लिए तो किसी के पास समय ही नहीं है| यह सोचकर ही एक बार फिर से मेरी आँखें भर आई थी|
तभी एक आवाज़ से मेरी तन्द्रा टूटी| किसी ने मुझसे कहा – “क्या हुआ अंजलि? तुम रो क्यों रही हो? मैंने गर्दन उठा कर ऊपर देखा तो मैं उसे देखकर हैरान हो गई थी| वो बिलकुल मुझ जैसी ही दिख रही थी| बस एक ही फर्क था जो हमें एक-दूसरे से अलग बना रहा था और वो था उसके बालों का रंग, उसकी आँखों की चमक| एक पल को तो मुझे लगा जैसे मैं किसी आईने में खुद को देख रही हूँ| हाँ शायद जब राज मुझसे मिले थे उस वक़्त मैं कुछ ऐसी ही तो दिखती थी|
उसने फिर मेरा नाम पुकारा, “अंजू मुझे नहीं पहचाना तुमने”? वो मेरा नाम जानती थी लेकिन मैं उसे नहीं पहचानती थी, बिल्कुल भी नहीं|
“आप कौन”? मैंने पूछा तो उसने झट से कहा- “मैं तुम सी हूँ तो तुम्हारी सहेली हुई है ना”??
मैं अब भी असमंजस की स्थिति में उसे निहार रही थी| उसने हंसते हुए  कहा – “कोई बात नहीं परेशान न हो उम्र का तकाज़ा है| ऐसा हो जाता है, मैं खुद भी बहुत सी बातें भूल जाती हूँ|”
अगले ही पल वो उसी जगह मुस्कुराती हुई बैठ गई थी, जहाँ थोड़ी देर पहले राज बैठे हुए मुझसे बातें कर रहे थे| उसने कहा,”अच्छा सब छोड़ो और अब ये बताओ तुम रो क्यों रही थी| जितना मैं तुम्हें जानती हूँ, तुम तो बहुत सशक्त और जिंदादिल हो”|
मैंने कोई जवाब नहीं दिया तो उसने आगे से फिर सवाल किया| “क्या तुम्हें किसी की याद आ रही है”?
इस बार मैंने ना जाने क्यों अपनी चुप्पी तोड़ते हुए उसे उसके सवाल का जवाब दिया और कहा,”कुछ नहीं बस राज की याद आ गयी थी”|
“कौन राज, उसने मुझसे फिर सवाल किया”?, मैंने एक आह भरते हुए बड़ी ही शालीनता से उसे जवाब दिया “राज मेरे पति हैं”|
उसने थोड़ा दुःख जताते हुए कहा – “ओह्ह……लेकिन तुम्हें ऐसे रोना नहीं चाहिए, क्योंकि वो तुम्हारे आस-पास ही है”|
उसकी ये बात सुनकर मैंने अपनी गीली पलकें अपने पल्लू से पोंछते हुए उसकी तरफ बड़े ही गौर से देखा| उसकी आँखों में एक अजब सी चमक थी, एक अलग सा नूर था|
उसने कहा -“मेरी तरफ देखो अंजलि और ध्यान से सुनो-“ज़िन्दगी मुश्किल नहीं होती बस स्वार्थी होती है, जब तक हमारा स्वार्थ पूरा होता है, ज़िन्दगी हमें अच्छी लगती है| लेकिन जब कुछ हमारी इच्छा के विरुद्ध होता है, जिससे हमारा स्वार्थ पूरा नहीं होता तो ज़िन्दगी हमें बेमानी सी लगती है|”
मैं उसकी तरफ एकटक देख रही थी और समझने की कोशिश कर रही थी, जो वो मुझे समझाना चाहती थी| उसने कहा,”पति नहीं रहे और बच्चे अपने स्वार्थ में व्यस्त है, यही दुख सता रहा हैं न तुम्हें| लेकिन ये जीवन का शाश्वत सत्य है| तुम जीवित हो इसका मतलब अब भी तुम्हारा कोई स्वार्थ पूरा होने को बाकी है| उसे ढूंढों और व्यस्त हो जाओ अपने उस स्वार्थ की पूर्ति में”|
मैं उसकी बात शायद समझ चुकी थी और मेरे दिल ने मुझसे कहा वो सही कह रही है| अचानक ही उसने कहा -“अब मैं चलती हूँ| तुम अपना ध्यान रखना| उसने मुझे गले लगाया और कहा – अपने हुनर को फिर से पहचानो और उसे जिंदा करो| व्यस्त हो जाओ खुद के हुनर के साथ और जब तक जीवन है, जीना मत छोड़ना”|
ये कहकर वो चली गयी और मैं उसे जाते हुए देखती रही| कौन थी वो कुछ-कुछ मुझ जैसी ही? मुझे कुछ भी याद क्यों नहीं है? अपने आप को यूँ हीं सवालों में उलझाए हुए मैं अपने घर पहुँच गयी| आज ऐसा लगा था जैसे मैं खुद से ही मिली थी| मैं खुद से ही कह उठी थी, हाँ ऐसी ही तो हुआ करती थी मैं, अपने में मस्त-मगन और आशा से भरी हुई| मैं कैसे ज़िन्दगी से निराश हो सकती हूँ| मैं पूरी रात यही सोचती रही कि अब मुझे क्या करना है क्योंकि ज़िन्दगी जीनी है और मैं मरने से पहले नहीं मरना चाहती|
2 साल बाद:-
मालकिन अचार की डिलीवरी कितने बजे तक होनी है|
अंदर से आवाज आयी 4 बजे तक| माँ जरा बाहर आओ कुछ पेपर्स साइन करवाने है| मिसेस अंजलि मल्होत्रा अपने कमरे से बाहर आती है और सोफे पर बैठते हुए कहती है-लाओ बेटा पेपर्स इधर दो और बताओ कहाँ करने है साइन?  
उनका पोता भाग कर आता है और अपनी दादी के पास बैठते हुए कहता है- यू आर अमेजिंग दादी! आपने बहुत अच्छी रिमोट कंट्रोल कार दी है मुझे, थैंक यू  सो मच दादी| दोनों बहुएँ नाश्ते के लिए उन्हें टेबल पर बुलाती है| सबने साथ में नाश्ता किया और सभी अपने-अपने कामों में लग गए|
एक इंटरव्यू के दौरान कहे गए अंजलि मल्होत्रा के शब्द :-
“जैसा कि आप सभी जानते हैं कि मेरी कंपनी “स्वाद आचार” आज एक बहुत बड़ा ब्रांड बन चुकी है| मेरी कंपनी में सिर्फ औरतें ही काम कर रही हैं| मुझे आज ज़िन्दगी जीने में बहुत मजा आ रहा है| मैं आज अगर ये कहूँ कि मुझे खुद पर गर्व है तो ये सही होगा| दरअसल  मैं बहुत अच्छा अचार बनाया करती थी| यही मेरा हुनर था, और इस हुनर ने मेरी ज़िन्दगी बदल दी| आप लोगों से निवेदन है कि अपना-अपना हुनर पहचाने वहीं तो एकमात्र उद्देश्य है आपके जीवन का, उसे पूरा करें और खुश रहें|
” मेरी ज़िन्दगी का एकमात्र उद्देश्य हुनर को निखारते हुए औरों के काम आना है| मेरे उद्देश्य में मेरी साथी, मेरी कंपनी को ब्रांड बनाने में मेरा साथ देने वाली मेरी सहेलियों को ह्रदय से आभार व्यक्त करती हूँ| मैं आप सबसे यही कहना चाहती हूँ कि अगर आप जीवित हैं तो इसका मतलब अभी कुछ उद्देश्य पूरा नहीं हुआ है| उसे खोजें, उसे समझें, उसे पहचान कर निखारें और पूरा करे अपनी ज़िदगी का उद्देश्य|”
अंत में उन्होंने कहा -एक अजनबी दोस्त जिसने मेरी ज़िन्दगी बदल दी| उस वक़्त नहीं समझ पाई थी लेकिन आज मैं समझ सकती हूँ कि मेरी वो अजनबी दोस्त कौन थी? ऐसा एक अजनबी दोस्त हम सबके पास होता है, बस हम उससे दोस्ती ही नहीं करते और शायद इसीलिए हम कभी उससे मिल भी नहीं पाते|
खुद से दोस्ती कीजिये ताकि आपको भी अपना वो अजनबी दोस्त मिल जाए, जो निराशा के पलों में भी आपको आशा की किरण दिखा जाए| मैं मिल चुकी हूँ उस अजनबी दोस्त से और आज भी भूल नहीं पायी हूँ वो मुलाकात एक अजनबी से|
वो एक अजनबी थी लेकिन वही अजनबी मेरी ज़िन्दगी की गुरु निकली और मुझे ज़िन्दगी के सही मायने सिखा गई| आशा करती हूँ कि आप सब अपने उस अजनबी को खोज कर निकालें ताकि आप भी अपने जीवन का उद्देश्य समझ सकें| तालियों की गडगडाहट के साथ ही अंजलि मल्होत्रा वहाँ से सभी को प्रणाम कहते हुए जा चुकी थी|
आज फिर मैं उसी पार्क में बैठी हूँ| अपनी उसी मनपसंद बेंच पर| पिछले दो सालों में मैं यहाँ आ ही नहीं पाई थी| खुद को पहचानने और सँवारने में व्यस्त जो हो गई थी| 2 साल पहले हुई उस अजनबी सी मुलाकात को याद कर ज़हन खुशनुमा हो रहा है| मैं इन दो सालों बाद वाली अंजलि मल्होत्रा से मिलकर बहुत खुश हो रही थी| वो पल जब किसी के लिए मेरे पास बैठने तक का समय नहीं हुआ करता था|
आज वो बहुत से सुझाव और सलाह लेने मेरे पास बैठते हैं| मैं खुद से ही कह रही थी “भला हो उसका जिसने मुझे जीवन का असल अर्थ बताया, वरना राज के जाने के बाद मैं तो हर रोज मर रही थी|” मैंने अपनी बगल में निहारा और राज की वही मनमोहक मुस्कान मेरे जेहन में तैर गई थी| मैं वास्तव में खुश हूँ, बहुत खुश| 

 

 

 

Pic Credit Internet

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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Meena Singh
मैं कोई लेखिका नही हूँ बस लिखना चाहती हूँ ज़िन्दगी की हर शय को अपने शब्दों में बांधना चाहती हूँ। उड़ना चाहती हूँ अपनी कलम की उड़ान से, अपनी कल्पना और वास्तविकता को साथ लेकर।

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