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वैश्या

कला संस्कृति संस्थान का अमृता साहित्यिक हॉल खचाखच भरा था।स्टेज के बीचोंबीच एक कुर्सी रखी थी जिस पर तेज स्पॉट लाइट पड़ रही थी बाक़ी के पूरे हॉल में अंधेरा था।मैं चुपचाप हॉल में घुसी और आगे तीसरी पंक्ति में अपनी सीट पर जा के बैठ गई।
सामने स्टेज की कुर्सी पर एक बहुत ही सुंदर साँवली सी लड़की बैठी कहानी सुना रही थी।उसकी आवाज़ में एक अलग कशिश थी।उसकी मंत्रमुग्ध करने वाली आवाज़ मेरे कलेजे को भेद रही थी।उसकी कहानी दिल में दर्द की टीस दे रही थी
कहानी कुछ इस तरह शुरू हुई….
एक गरीब बस्ती की महिलाएँ शहर के एक लघु उद्योग “नारी” में काम करती हैं।ये लघु उद्योग सिर्फ़ महिला कर्मी को ही काम देता है।ये लघु उद्योग कौन चलता है ये किसी को नहीं पता था पर सब ये ज़रूर जानते थे कि इसकी CEO कोई महिला ही है पर कौन नहीं पता।यहाँ महिलाओं को पूरी सुरक्षा मिलती है।चंद ही सालों में इस लघु उद्योग का इतना नाम हो गया की लोग दूर दूर से इसे देखने आते कुछ लोग आश्चर्य करते तो कुछ के मन में जलन का भाव रखते ।इस कंपनी में काम करने वाले सिर्फ़ एक व्यक्ति को जानते थे वो था “कबीर”।
“कबीर” के साथ कंपनी की सभी औरतें कम्फरटेबल महसूस करती थीं।कबीर के साथ कभी कभी कम्पनी में उसकी मुँह बोली बहन “रिया” भी आया करती थी।भाई बहन के रिश्ते के बावजूद “कबीर” और “रिया” का एक दुसरे से बहुत दोस्ताना व्यवहार था।”रिया” की एक बेटी भी थी “काव्या”।जो लंदन में कॉलेज में पढ़ती थी।सब कुछ अच्छा चल रहा था।’नारी’
कंपनी में काम करने वाली महिलाएँ “रिया” को पसंद नहीं करती थी।ये बात “काव्या” को बहुत परेशान करती थी।वो जब भी “कबीर” और “रिया” से इस बारे में पूछती वो दोनों बात को टाल जाते और फिर “काव्या” भी अपनी पढ़ाई में लग जाती।
“नारी” कंपनी की खबरें अब फोर्ब्स मैगज़ीन में छपने लगी थीं इसलिए इस वर्ष महिला दिवस के उपलक्ष्य में इस कम्पनी की CEO को अवार्ड के लिए चुना गया।ये बात “काव्या” को पता चली तो उसने सोचा की “कबीर” और “रिया” को बग़ैर बताए वो हिन्दुस्तान आ जाए क्योंकि काव्या को भी नहीं पता था की जिस कंपनी के लिए “कबीर” दिन रात एक करके लगा रहता है उसकी CEO कौन है।
8 मार्च को जब होटल ताज के हॉल में “अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस” का कार्यक्रम चल रहा था तो “काव्या” सबसे पीछे की सीट पर मुँह छुपा कर ये प्रोग्राम देखने बैठी थी।और मंच संचालक एक एक कर के अवार्डीयों के नाम ले रही थी।तभी मंच संचालक ने एक नाम पुकारा वो नाम सुन के काव्या के होश उड़ गए।
मंच संचालक ने बड़े गर्व के साथ कहा…
और अब हम स्टेज पर बुलाने जा रहे हैं उस कम्पनी की CEO को जिस कम्पनी के चर्चे ना सिर्फ़ हमारे देश में बल्कि विदेशों में भी हो रहे हैं इस कम्पनी की अपनी एक नायाब पहचान है इस कम्पनी की सिर्फ़ CEO ही नहीं बल्कि कर्मचारी भी सिर्फ़ महिलाएँ हैं।
ज़ोरदार तालियों से स्वागत कीजिए “नारी” कम्पनी की CEO
इतना बोलते ही हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज गया लेकिन अगले ही क्षण वो नाम सुनते ही हॉल में सन्नाटा पसर गया…
CEO मिस “रिया” का…
अपनी माँ का नाम सुन “काव्या” आश्चर्यचकित तो हुई पर उससे ज्यादा आश्चर्य उसे हॉल में पसरे सन्नाटे से हो रहा था।
जैसे ही “रिया” स्टेज की तरफ़ बढ़ी तभी हॉल में एक आवाज़ गुँजी
अब रंडियों को भी अवार्ड मिलने लगे हमारे समाज का स्तर कहाँ जा रहा है…
ये बात सुनते ही “काव्या” के पैरों के नीचे से मानो ज़मीन खिसक गई उस बेचारी के ऊपर तो मानो कितने पहाड़ टूट गए हों…
अपनी माँ की ऐसी हक़ीक़त “काव्या” से बर्दाश्त नहीं हुई
तभी पब्लिक में से एक चप्पल उड़ती हुई आई और “रिया” पर गिरी
उस चप्पल का वेग भले ही जादा नहीं था परंतु उसके पीछे छुपी हीन भावना ने “रिया को अंदर तक घायल कर दिया…
“कबीर” “रिया” की तरफ़ लपका और उसे गोद में उठा कर कुर्सी पर बैठाया तभी एक और आवाज़ आई बाई जी के दल्ले को देखो कितनी जल्दी बाई जी का ख़्याल आया…..
दोनों के नाजायज सम्बन्ध जो हैं..
“अरे बाई जी के शरीर की क़ीमत तो इसे ही मिल रही है!
तभी “रिया” की नज़र “काव्या” पर पड़ी ये देख “रिया” के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।”रिया” की दुनिया एक पल में बिखर गई।
उस भीड़ में “नारी” कम्पनी में काम करने वाली महिलाएँ भी थीं उन सब ने एक आवाज़ में कहा।
चलो रे आज से हम “नारी” में काम नहीं करेंगे….
“काव्या” को भी अपनी माँ से घिन आ रही थी और वो बहुत ग़ुस्से में वहाँ से चली गई।
तभी माइक पे एक ज़ोर की आवाज़ आई
“शाबाश……कितने सफ़ेद पोश लोग हैं यहाँ पर!”
“गंगु ताई तुम “नारी” में काम नहीं करोगी ना बिल्कुल मत करना और विमला मौशी तुम भी नहीं करोगी ना?तो तुम लोग ये बताओगी की तुम लोग काम नहीं करोगी तो क्या करोगी क्या अपने उसी रंडी बाज पति से पिटने जाओगी”
“आज तुम्हें उन्हीं कबीर सर से घिन आ रही है जिनके तुम गुन गाती थी “रिया” मैडम तो तब भी कभी कभी “कबीर” सर के साथ कंपनी आती थी बस तुम्हें ये नहीं पता था की वो तुम्हारी कम्पनी की मालकिन हैं पर “रिया” मैडम के बारे में सब पता था तो अब क्या बदला ये ही ना की तब सरे आम ये बात नहीं पता थी तो तुम लोग लालच में इस बात को पचा गये और अब कुछ लोगों ने ये बात सामने लादी तो तुम लोग चरित्रवान बन गए…
“तुम जैसे दोगले लोगों को मैडम की कम्पनी में काम नहीं करना चाहिए पर “रिया” मैडम मेरी आई आपकी कम्पनी में काम करेगी और सिर्फ़ मेरी आई ही नहीं मेरी बहन भी करेगी इस कम्पनी को चलने से कोई नहीं रोक सकता वो आपका पास्ट था आपकी मजबूरी थी! मैं यहाँ बैठे सभी शरीफ़ों से पूछता हूँ कि क्या आप में से कोई भी दावे से ये कह सकता है कि आप में से किसी के मन में कभी भी किसी महिला को देख उसे एक बार पाने की इच्छा नहीं हुई है आप में से कोई अपने दिल पे हाथ रख के ये बोल सकता है क्या??”
हॉल में फिर एक बार सन्नाटा पसर गया
“कबीर” “रिया” को ले कर वहाँ से चला गया
इस बात को आज चार साल हो गए पर ये कहानी अभी तक अधूरी हैं आज इस हॉल में पूरी होगी क्योंकि जब तक “काव्या” “रिया” को सम्मान नहीं देगी तो “रिया” के संघर्ष की कहानी असम्मानित रह जाएगी…
“इसलिए आज आप सभी के सामने मैं इस हॉल की पिछली सीट पर बैठी “रिया” मैडम को आवाज़ देती हूँमाँ !मुझे माफ़ कर दो कितने सालों मैं जो व्यवहार मैंने आपके साथ किया….मैं जो आपका अपना खून है जिसे आप पे विश्वास होना चाहिए था आपका साथ देना चाहिए था उसी ने आपको नहीं समझा”
“कबीर मामू!!”
ये सुनते ही हॉल में बैठे हर व्यक्ति की गर्दन पीछे घूम गई और निगाहें हॉल के दरवाज़े पे खड़े उस अधेड़ उम्र के व्यक्ति पर गड़ गई….
मेरे मन में एक ख़ुशी लहर घूम गई मेरी आँखों के सामने वो दो लोग खड़े थे जिनसे मिलने के लिए मैं पिछले तीन साल से तड़प रही थी।
कबीर मामू माँ को स्टेज पर लाइये….
कबीर रिया को ले कर स्टेज पर पहुँचता है।
स्टेज पर खड़ी लड़की ने झुक कर रिया के पैर छुए और फफक फफक कर रोने लगी माँ मुझे माफ़ कर दो आप देवी हो आपको समझने में मैंने बड़ी भूल की और मामू आप फ़रिश्ते हो जिसने मेरी माँ का हमेशा साथ दिया जबकि इसके अपने खून ने भी नहीं दिया….
पूरे हॉल में सन्नाटा था और ये दृष्य देख हर आँख में आँसू……
ये दृष्य देख के मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और मुझसे रूका नहीं गया मैंने ज़ोर ज़ोर से ताली बजानी शुरू की फिर क्या था पूरा हॉल ताली की गड़गड़ाहट से गूंज उठा और “काव्या” “कबीर” और “रिया” को ले के बाहर निकल गई इसी के साथ मेरे मन पे पड़ा मेरे पापों का बोझ कम हो गया और उनके पीछे मैं भी हॉल से निकल गई।
तभी……,,
“डॉक्टर रूही रूकिए”, पीछे से किसी ने आवाज़ लगाई मैंने पीछे मुड़के देखा तो वो आवाज़ “रिया” की थी
“थैंक्यू डॉक्टर रूही”
“जी आप मुझे कैसे जानती हैं और मुझे थैंक्यू क्यूँ बोल रही हैं”
“आप चाँद बी की बेटी हैं ना?”
“जी….. जी हाँ,पर ये आपको कैसे पता…. और आपने मुझे थैंक्यू क्यूँ बोला”
“थैंक्यू इसलिए बोला की आज आपकी वजह से मुझे मेरी “काव्या” वापस मिली……अगर आप उसकी काउंसिल ना करती तो ये सम्भव नहीं था…..और रहा सवाल आपको जानने का तो चाँद बी ने मेरी ही बाहों में अपनी आख़री साँस ली और जो आपके और उनके बीच हुआ वो उन्होंने मुझे बताया था उन्होंने बताया था की कैसे उन्होंने आपको अपनी उस बदनाम की ज़िंदगी से बाहर आ के बड़ा किया और डॉक्टर बनाया और फिर जब आपको पता चला तो आप दोनों के बीच जो हुआ वो भी”
ये सुन मेरी आँखों से आँसू बह निकले
“आप मुझे थैंक्यू ना बोले मैंने जो किया वो एक डॉक्टर के फ़र्ज़ के साथ साथ एक बेटी पे क़र्ज़ भी था मैंने अपना वो ही क़र्ज़ चुकाया है….शायद जो मैंने माँ के साथ किया इससे उन कर्मों का बोझ कम हो जाए…..
अब तो भगवान आपको और काव्या को ख़ुश रखें……मैं चलती हूँ शायद किसी और काव्या को भी मेरी ज़रूरत हो”
अब तक तो आप लोग समझ ही गए होंगे की मेरे मन से कौन से बोझ की बात कर रही थी मैं……
नहीं समझे……तो आप लोगों को बता दूँ की मेरी माँ भी वैश्या थी वो क्या कहते हैं आप लोग रंडी…….पर इस धंधे में वो अपनी मर्ज़ी से नहीं आई थी इस सभ्य समाज में रहने वाले आप जैसे किसी सभ्य व्यक्ति ने ही उसे इस धंधे में डाला…..
“और मैं ? जिसके भविष्य को बनाने के लिए वो दुनिया से लड़ी और उस गंद से बचा कर डॉक्टर बनाया उसने आपके झूठे सभ्य समाज के नक़ली पन को सच मान उसकी जान ले ली! मैं अपनी ही माँ की कातिल हूँ पर ये क़ानून मुझे सजा नहीं देता क्योंकि ये मुझे कातिल नहीं मानता…..पर मुझे तो अपने गुनाहों की माफ़ी चाहिए इसलिए मुझ जैसी और लड़कियों को “रूही” बनने से बचा रही हूँ”
“चलिए अब मैं चलती हूँ अगली “काव्या” की तलाश में..”

 

 

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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Manisha Yadava
Dr.Manisha Yadava is an Author/poet/reiki healer/Dowser/angels card reader/Motivational speaker/Meditater/Art of living volunteer and Member of Indian Literature society. She has done Phd in economics.She has been writing poetry since class 9th. As an Author she has written two poetry books “Mere Khayal and “Driya-E-Ehsaas” and CO-Author of four anthologies. This year she is releasing her third book in five different languages She was on 9th May 1973 in Meerut (up) in a well educated family.

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