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कार और हाहाकार

शादी के बाद ससुराल (घर) में लंबे समय तक रहने का अवसर दो साल उपरांत मिला। तब जब नौकरी छोड़कर आगे पढ़ने की ठान रखी थी। परीक्षा देकर घर चली आई। मेरा ससुराल झारखंड राज्य के एक छोटे से प्रखंड में है। गांव कह लें आप इसे। और इस जगह के मद्देनजर मेरा घर प्रगतिशील और बदलते भारत का प्रतीक है।
मेरी (सासू)मां एक रिटायर्ड टीचर हैं। बड़ी (बहू) दीदी उसकी तैयारी में जुटी है। छोटी बहू (मैं) रिसर्चर है। नन्द टीचर हैं। बिटिया वकालत की पढ़ाई कर रही है। आप सोचें कि बेटी-बहू तो सभी जगह पढ़ती-काम करती है, तो आपको गांव-देहात की हवा छूकर भी नहीं गई है।
खैर, जो मैं घर पहुंची, सब बेहद खुश थे। माहौल बना रहता था। मुझे अपने गांव की खूबी-कमी सब देखने का अवसर मिला। हमारे दादा जी ने जो मंदिर बनवाया था, वहां माथा टेकने का सौभाग्य भी मिला। पर जल्द ही मैं बोर होने वाली स्थित में आने लगी। पापाजी ने एक दिन कहा, “चलो, ड्राईविंग सीख लो”। दीदी ने भी जागे जोश को हवा दे दी। “सीख लो, काम आएगा”।
पर कौन सिखाता? अपनी जान हाथेली में लेकर..😄
अगले दिन से पापाजी मुझे लेकर चल दिए। एक सीट पर साड़ी पल्लू बांधे मैं। और ड्राईविंग सीट पर पापाजी, तन कर सधे हुए। मैदान आते ही सीटों की अदला-बदली हो जाती। पहले दिन बस बेसिक। A-B-C। घर आकर सबको ऐसे बघेरा कि गाड़ी तो‌बस यूं-यूं चला लूंगी।
अगले दिन जोश उफ़ान खा रही थी। फिल्ड पहुंच कर मैंने बोला, “पापाजी आज गाड़ी चला लूंगी”। कुछ देर उनके कहे अनुसार चलाया, फिर होशियारी सोचा दिखा ही हूं। स्टियरिंग दिया घूमा। गाड़ी गई घूम। 360 डीग्री। मतलब जो स्टंट फिल्मों में प्रशिक्षित महौल में पचिसियो प्रशिक्षितों के बीच होता है, वो मैंने बस ऐसे ही कर दिखलाया।
डर, उत्तेजना, लाज, घबराहट सब इकट्ठे हावी हो आए। दो-तीन राउंड बाद पापाजी की चीख सुनाई दी, ब्रेक मारो, ब्रेक।
‘पापाजी, ब्रेक कहा है?”
“बीच में बेटा”।
उफ्फ, कैसे बताती बेटी के होश हवा-हवाई हुए पड़े थे। समझ तो आए ब्रेक कहा, बीच कहा। पापाजी ने झिझक को अलविदा कहा, स्टियरिंग को जोर से पकड़ स्थिर किया और जैसे ही गाड़ी ने सीधी चाल धरी, मैंने उनके कहे मुताबिक ब्रेक दबाया।

हम गाड़ी से बाहर निकले। पापाजी ने जरूर अपने सितारों को शुक्रिया कहा होगा, बाल-बाल जो बचें। कुछ बुदबुदा तो रहें थे।

जो अच्छा हुआ वो यह कि पापाजी औपचारिकता से थोड़ा ऊपर पिता टाईप कैटेगरी में आने लगे। जैसे बातें करना, अपनी बात रखना, किस्से बताना, परिवार के इतिहास से जुड़ी बातें साझा करना, हंसना,
गपियाना..परिवार वाली बातें, पारिवारिक अंदाज में। मुझे पता लगा दोस्ती हर रिश्ते का एक पहलू होता है, गप करना आना चाहिए। मैं और पापाजी इस कला में आजकल माहिर हो रहे/चुके हैं। आपको जैसा ठीक लगें समझ लें।
अभी हाल में उन्हें झारखंड आंदोलनकारी की उपाधि से सम्मानित किया गया और साथ ही लाभार्थो से भी। मैंने फोन मिलाया और कहा, पापाजी हम सब को बहुत गर्व है आप पर।
नाम रौशन कर दिया आपने हमारा..और मैं भूमिका बांध ही रही थी कि उन्होंने पूछा, “सब तो ठीक है..बोलो क्या चाहिए”। और मैंने दांत निपोरकर कहा, “पार्टी”। इसे कहते हैं बेटी का मन भांप जाना। 😁🤣
कल जो वैक्सीन की सूई लेकर लौटे तो हालचाल लेकर पूछा, “कैसी है आपकी तबीयत?” बड़ी मासूमियत से उन्होंने कहा, “जहां सूई लगी है वहां दर्द हो रहा।” मां ने बगल से कहा, “हां, सबके हिस्से की यही लगवा कर आए हैं!🙄” खैर मां-पापाजी की झीक-झीक चलती रहेगी, आप उसपर ध्यान न दें।

पूरे किस्से का निचोड़ ये की रिश्ते में ऐसे मज़ेदार पल अक्सर झिझक की बर्फ पिघला कर मौसम और सुहाना कर देते हैं। और ये भी इसकी पहल दोनों तरफ से होती रहनी चाहिए। अगर आपके कोई ऐसे पल हो तो कमेंट बॉक्स में बताएं !

नोट : दूसरे दिन की क्लास से जब घर पहुंची, मां ने पूछा जो कि कितना सीखी आज। तो उसपर पापाजी ने कहा, “पूरा सीख गई कि, गोल-गोल घुमाई गाड़ी..खुद ही। और मुझे ब्रह्म दर्शन करा दिया।” और वो आंखें गोल घुमाकर हंसते हुए चले गए।🙄🤦

 

Pic credit :Khichdi

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।

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