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आधुनिक युग की मीरा – महादेवी वर्मा

रंगोत्सव पर जन्मी,आजीवन श्वेताम्बरा, “छायावाद की सरस्वती ” – कवयित्री महादेवी वर्मा

बीन भी हूँ मैं, तुम्हारी रागिनी भी हूँ,
नींद भी मेरी अचल, निस्पंद कण-कण में,
प्रथम जागृति भी ,जगत के प्रथम स्पंदन में,
प्रलय में मेरा पता, पदचिह्न जीवन में!
शाप हूँ जो बन गया वरदान, बंधन में,
कुल भी हुँ, कुलहीन प्रवाहिनी भी हूँ
बीन भी हूँ, मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ
शलभ जिसके प्राण में, वह निठुर दीपक हूँ,
फूलों को उर में छिपाए विकल बुलबुल हूँ,
एक होकर दूर तन से छाँह, वह चल हूँ,
दूर तुमसे हूँ, अखंड सुहागिन भी हूँ
बीन भी हूँ मैं, तुम्हारी रागिनी भी हूँ
आग हूँ जिससे ढुलकते बिंदु हीन जल के,
शून्य हूँ जिसके बिछे हैं पाँवड़े पलके
पुलक हूँ जो पला है कठिन प्रस्तर में,
हूँ वही प्रतिबिंब जो आधार के उर में,
नील घन भी हूँ, सुनहली दामिनी भी हूँ
बीन भी हूँ, तुम्हारी रागिनी भी हूँ,
नाश भी हूँ, मैं अनंत विकास का क्रम भी,
त्याग का दिन भी, चरम आसिक्त का तम भी,
तार भी,आघात भी, झंकार की गति भी,
पात्र भी,मधु भी,मधुप भी,मधुर विस्मृति भी,
अधर भी हूँ और स्मित की चाँदनी भी हूँ
यह कविता, जो एक सशक्त नारी की कोमल हृदय -लिपि दर्शाती है, हिन्दी की सर्वाधिक प्रतिभावान कवयित्री व गद्य लेखिका महादेवी वर्मा द्वारा रचित है! वे हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के प्रमुख स्तंभों जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और सुमित्रा नंदन पंत के साथ महत्त्वपूर्ण स्तंभ मानी जाती हैं!
उन्हें ‘आधुनिक युग की मीराबाई‘ भी कहा गया है! कवि निराला ने उन्हें ‘हिन्दी के विशाल मंदिर की सरस्वती’ भी कहा है!
महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत में निपुण होने के साथ साथ कुशल चित्रकार और सृजनात्मक अनुवादक भी थीं! 20 वीं शताब्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला साहित्यकार के रूप में तथा भारत की 50 सबसे यशस्वी महिलाओं में भी शामिल हैं! उन्हें हिन्दी साहित्य के सभी महत्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है!

प्रारंभिक जीवन और परिवार 

महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च, सन 1907 को (भारतीय संवत के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा संवत 1964 को) प्रातः 8 बजे, फर्रुखाबाद, उत्तरप्रदेश के एक संपन्न परिवार में हुआ! उनके पिता का नाम गोविंद प्रसाद वर्मा और माता का नाम हेमरानी देवी था! लगभग 200 वर्ष या सात पीढ़ियों के बाद महादेवीजी का रूप में पुत्री का जन्म हुआ, अतः इनके बाबा बाबू बांकेबिहारी जी ने, इन्हें घर की देवी- महादेवी माना और इनका नाम महादेवी रखा था!
महादेवी जी के पिता भागलपुर (बिहार) के एक कालेज में प्राध्यापक थे और माता बड़े ही धर्मपरायण, कर्मनिष्ठ और भावुक महिला थीं! उनकी माता हिन्दी की विदुषी थीं, अतः तुलसीदास, सूरदास और मीरा की रचनाओं के साथ उनका परिचय बचपन में ही अपनी माता से प्राप्त हुआ था! उनकी माता पूजा पाठ के साथ साथ, रामायण, महाभारत, गीता और विनय पत्रिका पाठ करती थीं!
महादेवी जी की एक छोटी बहन और दो छोटे भाई थे, क्रमशः, श्यामा देवी (श्यामा देवी सक्सेना धर्म पत्नी डा.बाबूराम सक्सेना, भूतपूर्व विभागाध्यक्ष एवं उप – कुलपति इलाहाबाद विश्वविद्यालय) श्री जगमोहन वर्मा एवं श्री मनमोहन वर्मा! शैशवावस्था से ही जीव मात्र के प्रति, महादेवी के हृदय में करुणा, दया, वेदना थीं! उनके व्यक्तित्व में जो पीड़ा, करुणा और वेदना है, विद्रोह है, अहं है, दार्शनिकता तथा आध्यात्मिकता है,तथा अपने काव्य में उन्होंने जिन तरल, सूक्ष्म तथा कोमल अनुभूतियों की अभिव्यक्ति की है, इनकी शुरूयात बचपन में ही हो चुकी थी!
महादेवी वर्मा 7 वर्ष के उम्र से ही कविता रचना करने लगी थीं, ये कविताएँ उनकी बाल रचना में सम्मिलित हैं जैसे
ठंडे पानी से नहलातीं
ठंडा चंदन इन्हें लगातीं
इनका भोग हमें दे जातीं
फिर भी कभी नहीं बोले हैं
माँ के ठाकुर जी भोले हूँ!
आओ प्यारे तारे आओ
तुम्हें झुलाऊँगी झूले में,
तुम्हें सुलाऊँगी फूलों में
तुम जुगनू से उड़कर आओ
मेरे आँगन को चमकाओ
महादेवी जी की शिक्षा 1912 में इंदौर के मिशन स्कूल से प्रारंभ हुई, साथ ही संस्कृत, अंग्रेजी, संगीत तथा चित्रकला की शिक्षा अध्यापिका द्वारा घर पर ही दी जाती रही! 1916 में विवाह के कारण कुछ दिन शिक्षा स्थगित रही! विवाहोपरांत महादेवीजी ने 1919 में क्रास्थवेट कॉलेज, इलाहाबाद में प्रवेश लिया और कॉलेज के छात्रावास में रहने लगीं!
1921 में महादेवी जी ने आठवीं कक्षा में प्रान्त भर में प्रथम स्थान प्राप्त किया और कविता यात्रा की शुरुआत की! 1925 तक जब उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी, एक सफल कवयित्री के रूप में प्रसिद्ध हो चुकी थी! विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं उनकी कविताएँ प्रकाशित होने लगी थीं! उन्होंने ब्रजभाषा में कविता लिखा, फिर तत्कालीन खड़ी बोली की कविता से प्रभावित होकर खड़ीबोली में ‘रोला’ और ‘हरिगीतिका’ छंदों में काव्य लिखना प्रारंभ किया, माँ से सुनी एक करुण कथा पर सौ छंदों का एक खंड -काव्य लिख डाला!
विद्यार्थी जीवन में वे प्राय: राष्ट्रीय और सामाजिक जागृति संबंधी कविताएँ लिखती रहीं! इन कविताओं में व्यष्टि में समष्टि और स्थूल में सूक्ष्म चेतना का आभास की अनुभूति प्रतीत होती है! उनके प्रथम काव्यग्रंथ ‘नीहार’ की अधिकांश कविताएँ इसी समय की है!
नीहार‘ काव्य गाथा की कविता ‘कौन’ मन की व्यथा, बिखरते स्वप्न, और अंतर्नाद का उद्गार है!

 

ढुलकते आँसू सा सुकुमार
बिखरते सपनों सा अज्ञात,
चुराकर अरुणा का सिन्दूर
मुस्कराया जब मेरा प्रात,
छिपा कर लाली में चुपचाप
सुनहला प्याला लाया कौन?
हँस उठे छूकर टूटे तार
प्राण में मँडराया उन्माद
व्यथा मीठी ले प्यारी प्यास
घूँट में थी साकी की साध
सुना फिर फिर जाता है कौन?
सन1933 में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम. ए की परीक्षा उत्तीर्ण की! उसी वर्ष वे ‘प्रयाग महिला विद्यापीठ’ की प्रिंसिपल नियुक्त हुईं! महादेवी जैसे प्रतिभाशाली और प्रसिद्ध व्यक्तित्व का परिचय और पहचान तत्कालीन सभी साहित्यकारों और राजनीतिज्ञों से थी! वे महात्मा गांधी से भी प्रभावित रहीं!

महादेवीजी का जीवन एक सन्यासिनी का जीवन था, उन्होंने जीवन भर श्वेत वस्त्र पहना, तख्त पर सोया और कभी शीशा नहीं देखा! विरहिणी की व्यथा ‘यह मंदिर का दीप‘ कविता की इन पंक्तियों में दृश्यमान है,

झंझा है दिग्भ्रान्त, रात की मूर्च्छा गहरी,
आज पूजारी बने, ज्योति का यह लघुप्रहरी,
जब तक लौटे दिन की हलचल,
तब तक यह जागेगा प्रतिपल,
रेखाओं में भर आभाजल
दूर साँझ का, इसे प्रभाती तक चलने दो,
यह मंदिर का दीप इसे नीरव जलने दो!
कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान के साथ महादेवी वर्मा का परिचय क्रास्थवेट कॉलेज में हुआ, जहाँ सुभद्रा कुमारी जी ने सखियों के साथ महादेवी का परिचय कवयित्री के रूप में कराया! सुमित्रानंदन पंत जी के साथ महादेवीजी की पहली मुलाकात ‘ हिन्दू बोर्डिंग हाउस’ के कवि सम्मेलन में हुई!

वे सुमित्रानंदन पंत को राखी बाँधती थीं और सुमित्रानंदन पंत उन्हें, इस प्रकार स्त्री-पुरुष की बराबरी की एक नई प्रथा उन्होंने शुरू की थी!

सुप्रसिद्ध साहित्यकार गोपीकृष्ण गोपेश भी उनसे राखी बंधवाते थे! सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ से उनका भाई -बहन का रिश्ता जगत प्रसिद्ध है !वे राखी को रक्षा नहीं स्नेह का प्रतीक मानती थीं! इसके अतिरिक्त इलाहाबाद के लगभग सभी साहित्यकारों और परिचितों से उनका आत्मीय संबंध था जिसके कारण रक्षाबंधन, होली और महादेवी के जन्मदिन पर उनके घर लोगों की भीड़ लगी रहती थी!
भगवान बुद्ध के प्रति गहन भक्तिमय अनुराग होने के कारण और अपने बाल विवाह के अवसाद को झेलने वाली महादेवी बौद्ध भिक्षुणी बनना चाहती थीं! अध्यात्म में उनकी रूचि और आत्मा से परमात्मा के बीच के संबंधो पर अनेक कवितायेँ रची। अलंकार युक्त भाषा से सजी उनकी यह कविता आज भी भाव विभोर करती है –

 

मधुर -मधुर मेरे दीपक जल,
युग- युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल,
प्रियतम का पथ आलोकित कर!
सौरभ फैला विपुल धूप बन
मृदुल मोम सा घुल रे, मृदु तन
दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित,
तेरे जीवन का अणु गल- गल
पुलक पुलक मेरे दीपक जल!
कुछ समय बाद महात्मा गांधी के संपर्क और प्रेरणा से उनका मन सामाजिक कार्यों के ओर उन्मुख हो गया! उन्होंने ‘चाँद’ पत्रिका का नि:शुल्क संपादन किया! प्रयाग में उनका भेंट रबीन्द्रनाथ ठाकुर से हुई और मीरा जयंती का शुभारंभ किया!
कलकत्ता में जापानी कवि योन नागुची के स्वागत समारोह में भाग लिया और शांतिनिकेतन में गुरुदेव के दर्शन किए! यायावरी की इच्छा से बद्रीनाथ की पैदल यात्रा की और रामगढ़ नैनीताल में मीरा मंदिर नाम का कुटीर का निर्माण किया!
विश्ववाणी के बुद्ध अंक का संपादन किया और साहित्यकार संसद की स्थापना की! भारतीय रचनाकारों के आपसी सद्भाव के लिए अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया तथा राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद से वाणी मंदिर का शिलान्यास कराया!
स्वाधीनता के बाद इलाचंद्र जोशी तथा रामधारी सिंह दिनकर जी के साथ दक्षिण की साहित्यिक यात्रा की! निरालाजी की काव्यकृतियों से कविताएँ लेकर साहित्यकार संसद द्वारा अपरा शीर्षक से काव्य संग्रह प्रकाशित किया! प्रयाग में नाट्य संस्थान रंगवाणी की स्थापना की जिसका उद्घाटन मराठी के प्रसिद्ध नाटककार मामा वरेरकर ने किया! इस अवसर पर भारतेंदु के जीवन पर आधारित नाटक का मंचन किया गया!
अपने समय के सभी साहित्यकारों पर ‘पथ के साथी’ में संस्मरण- रेखाचित्र- कहानी-निबंध-आलोचना सभी को घोलकर लेखन किया! 1933 में महादेवी जी ने प्रथम महिला कवयित्री सम्मेलन का आयोजन किया, जो परवर्ती समय में देश में अखिल भारतीय कवयित्री सम्मेलन का नींव रखा! 1954 में वे दिल्ली में स्थापित साहित्य अकादमी की सदस्या चुनी गईं तथा 1981 में सम्मानित सदस्या!
महादेवी वर्मा के व्यक्तित्व में संवेदना, दृढ़ता और आक्रोश का अद्भुत संतुलन मिलता है! वे अध्यापक, कवि, गद्यकार, कलाकार, समाजसेवी और विदुषी के बहुरंगी मिलन का जीता जागता उदाहरण थीं! वे एक प्रभावशाली ब्याख्याता भी थीं! गंभीर, मार्मिक और संवेदनशील भाव चेतना के साथ-साथ उनकी अभिव्यक्ति का प्रत्येक रूप नितान्त मौलिक और हृदयग्राही था! इलाचंद्र जोशी उनकी वक्तृता शक्ति के संदर्भ में कहते हैं_जीवन और जगत से संबंधित महानतम विषयों पर जैसा भाषण महादेवी जी देती हैं, वह विश्व नारी इतिहास में अभूतपूर्व है, विशुद्ध वाणी का ऐसा विलास नारियों में तो क्या पुरुषों में भी एक रवीन्द्रनाथ को छोड़कर कहीं नहीं सुना!
महादेवी जी के भाषण के बारे में पंडित कमलापति त्रिपाठी ने कहा_” सारा हाउस विमुग्ध होकर महादेवी के भाषणामृत का रसपान किया करता था, रोकने -टोकने का तो प्रश्न नहीं, किसी को पता नहीं चल पाता था कि कितना समय निर्धारित था और अपने निर्धारित समय से कितनी अधिक देर तक महादेवी ने भाषण किया! “
साहित्य में महादेवी वर्मा का आविर्भाव तब हुआ, जब हिन्दी साहित्य में खड़ीबोली का आकार परिस्कृत हो रहा था! उन्होंने हिंदी काव्य को ब्रजभाषा की कोमलता दी, छंदों के नए दौर के गीतों का भंडार दिया, भारतीय दर्शन को वेदना की हार्दिक स्वीकृति दी!

उन्होंने भाषा, साहित्य और दर्शन तीनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण काम किए, जो आनेवाली पीढ़ी के पाठकों को भी प्रभावित कर सकता है!

उन्होंने अपने गीतों की रचना शैली और भाषा में अनोखी लय और सरलता भरी है, साथ ही प्रतीकों और बिंबों का एक ऐसा सुंदर और स्वाभाविक प्रयोग किया जो पाठकों के मन में एक चित्र सा खींच देता है!

 

जीवनदीप

किन उपकरणों का दीपक,
किसका जलता है तेल?
किसकी वर्ति, कौन करता
इसका ज्वाला से मेल?
शून्य काल के पुलिन पर
आकर चुपके से मौन,
इसे बहा जाता लहरों में
वह रहस्यमय कौन?
कुहरे सा धुंधला भविष्य है,
है अतीत तम घोर,
कौन बता देगा जाता यह,
किस असीम की ओर?
पावस की निशि में जुगनू का
ज्यों आलोक प्रसार,
इस आभा में लगता तम का
और गहन विस्तार,
इन उत्ताल तरंगों पर यह-
झंझा के आघात,
जलना ही रहस्य है
बुझना है नैसर्गिक बात!

छायावादी काव्यों को जहाँ जयशंकर प्रसाद ने एक प्रकृतित्व दिया, निराला’ ने उसमें मुक्तछंद की अभिव्यक्ति दी,पंत ने उसे सुकोमल कला प्रदान की,

वहाँ छायावाद के कलेवर में प्राण प्रतिष्ठा करने का गौरव महादेवी वर्मा को ही प्राप्त है!

व्यक्तित्व, भावात्मकता, प्रेम की पीर, भावों की तीव्रता तथा अनुभूति की गहनता उनके काव्य की विशेषताएँ हैं जैसे –

तुमको यों लोरी गाते,

मुझको सोते युग बीते,
तुम सो जाओ मैं गाऊँ,
लोरी गाते अब आओ,
मैं पलकों में सपनों का सेज सजाऊँ,
तुम सो जाओ मैं गाऊँ!
प्रिय तेरे नभ मंदिर के
मणि दीपक बुझ बुझ जाते
जिन गगन कण- कण विद्युत है,
मैं ऐसे प्राण जलाऊं,
तुम सो जाओ, मैं गाऊँ!
महादेवी जी ने बंगाल से संबंधित बंग- भू -शत वंदना कविता लिखा था तथा 1962 में चीन के भारत आक्रमण के प्रतिवाद में हिमालय काव्य संग्रह का संपादन किया था! समाज सुधार तथा नारी स्वतंत्रता के विचारों में दृढ़ता और विकास के अनुपम सामंजस्य मिलता है महादेवी जी की रचनाओं में! महिलाओं के प्रति चेतना- भावना, नारी शिक्षा के लिए संघर्षरत, नारी जीवन के वैषम्य और शोषण के तीखेपन को आंकनेवाली एक जागरूक प्रतिभा थीं महादेवी!
सामाजिक जीवन की गहरी परतों को छूने वाली तीव्र दृष्टि के साथ निम्नवर्ग के निरीह साधनहीन प्राणियों के अनूठे चित्र उन्होंने ही पहली वार हिंदी साहित्य को दिए! विना कल्पना और काव्यरूपों का सहारा लिए कोई रचनाकार गद्य रूप में कितना कुछ अर्जित कर सकता है, यह महादेवी वर्मा को पढ़कर ही जाना जा सकता है! भाव, भाषा और संगीत की जैसी त्रिवेणी उनके गीतों में प्रवाहित होती है, वैसी अन्यत्र दुर्लभ है!

 

बताता जा रे अभिमानी
कण कण उर्वर करते लोचन
स्पंदन भर देता सूनापन
जग का धन मेरा दुख निर्धन
तेरे वैभव की भिक्षुक या
कहलाऊँ रानी!
बताता जा रे अभिमानी!

एक नारी की आकुल व्यथा दर्शाती हैं ये पंक्तियां!प्रकृति की सुंदरता तथा जादुई प्रभाव को महादेवीजी ने बार-बार अनुभव किया!जब वे उत्तराखंड के रामगढ़ के मीराकुटीर में रहती थी, तब उनकी रचनाओं में प्रकृति की निराली रूप का चित्र दिखता है!

 

धीरे धीरे उतर क्षितिज से
आ वसंत -रजनी!
तारकमय नव वेणीबन्धन
शीश- फूल कर शशि का नूतन
रश्मि वलय सित घन- अवगुण्ठन
मुक्ताहल अभिराम बिछा दे,
चितवन से अपनी!
पुलकती, आ वसंत रजनी!
वसंत को एक अभिसारिका नारी के रूप में दर्शाया गया है! एक अन्य कविता में प्रकृति को एक स्नेह मयी नारी के रूप में आंका गया है
रूपसि, तेरा घन-केश पाश,
श्यामल- श्यामल कोमल-कोमल
लहराता सुरभित केश पाश,
नभ गंगा की रजत धार में,
धो आई क्या इन्हें रात?
रूपसि, तेरा घन केश पाश,
इन स्निग्ध लटों से छा दे तन
पुलकित अंगों से भर विशाल,
झुक सस्मित शीतल चुंबन से
अंकित कर इसका मृदुल भाल,
दुलरा देना, वहला देना
यह तेरा शिशु जग है उदास,
रूपसि तेरा घन केश पाश!
विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का रहस्य वादी भावधारा का प्रभाव महादेवी की साहित्य साधना में विद्यमान है! कहानी , ललित निबंध , संस्मरण , कविता संग्रह अदि की रचयिता ,व साहित्य अकादमी , पद्मभूषण , पद्मविभूषण से सम्मानित , महादेवी जी ने अपनी जीवनशैली और विचारों को अपना काव्य और साहित्य में भी प्रतिफलित किया!
सन 1987 के 11 सितंबर को , इलाहाबाद में चिर -विरहिणी कवयित्री महादेवी वर्मा की मृत्यु हुई! उन्हीं की कविता की पंक्तियाँ इस विषाद की याद में

 

जो तुम आ जाते एकबार,
हंस उठते पल में आर्द्र नयन,
धुल जाता होठों से विषाद,
छा जाता जीवन में वसंत
लुट जाता चिर संचित विराग,
आँखें देतीं सर्वस्व वार,
जो तुम आ जाते एकबार!

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