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गुलाब

 

रेड लाईट देखते ही पीयूष ने गाड़ी रोकी। आगे-पीछे कुछ और गाडियांँ खड़ी थी। वह रेड लाईट की ओर देख रहा था….उफ्फ! पूरे मिनट का लम्बा इंतजार!! कुछ सेकेंड से रह गया, नहीं तो सांँय से गाड़ी भगा निकल जाता। शीशे के पास किसी की गतिविधि ने ध्यान खींचा।
एक लड़की गुलाब का गुच्छा थामे कुछ कहे जा रही थी। उसने शीशा धीरे से नीचे सरकाया…”ले लो ना साहब लाल गुलाब। किसी को प्रपोज कराना हो, गर्ल फ्रेंड को गिफ्ट करना हो या बीवी हो मनाना हो…. एक लाल गुलाब कर देगा हर मुश्किल आसान। मांँ को देकर प्यार जताओ, पिता को देकर दोस्त बना लो, भाई बहन को देकर दोस्ती पक्की कर लो या बच्चे को दो और उसका दिल जीत लो! ले लो ना साहेब, मात्र दस रुपए में प्यार का खाजाना!”
लड़की ने एक सांँस में प्रोडक्ट डिटेल बयान कर अपने चेहरे को घेरे हुए गुलाबों को एक ओर सरकाया। हाथ में प्यार का खज़ाना लिए वह खुद प्यार की मूर्ती लग रही थी। गहरे काले नैन किसी को भी अपने पाश में जकड़ ले। धूप में तप कर सांँवला रंग चमक रहा था और उस पर बेतरतीब से बिखरे केश उसे सबकी नजरों से छिपा लेने को बेचैन थे। पीयूष उसे देखता रहा…एकटक!
“एक तो ले लो साहेब….एकदम ताज़े हैं।” लड़की ने पीयूष का ध्यान भंग किया।
“हांँ, ताज़गी तो है इनमें। ऐसा करो दस दे दो।”
“दस..! साहब पूरे परिवार में बांँटोगे क्या?”
“ऐसा ही समझ लो। प्यार का खाज़ाना सबमें बांँटना ही चाहिए।”
“सो तो है साहब। ये लो दस गुलाब।”
पीयूष ने सौ रुपए दिए। तब तक सिग्नल भी हरी हो गई, गाड़ियों की आवाज़ के साथ पीयुष आगे बढ़ गया। आज घर से निकलते हुए पहले ही देर हो गई थी, ट्रैफिक ने रही सही कसर पूरी कर दी। मांँ का चश्मा न बनवाना होता तो वह सिटी सर्कल वाले व्यस्त सड़क को कभी नहीं पकड़ता। दफ्तर में हाज़िर होते ही बॉस की फटकार ने मन रूआंँसा कर दिया। कहांँ दुनिया इस वसंत ऋतु में प्रेम में डूबी है, लोग प्यार पर चर्चा कर रहे हैं, और कहांँ उसे ऑफिस आते ही बॉस की क्रोधाग्नि का सामना करना पड़ा।
वह थोड़ा उदास था, अपने डेस्क पर आकर फूलों को खाली पड़े पेंसिल स्टैंड में डाल दिया। कुछ देर उसे ही देखता रहा। पानी के कुछ बूंँद अब भी उस पर चमक रहे थे। पंखुड़ियांँ खिल-खिल कर मुस्कुरा रही थी। उसे लगा अभी फिर से ये गुलाबों का चादर सरकेगा और वह अल्हड़ नवयौवना सामने होगी।
“सर चाय….!” ऑफिस बॉय की आवाज ने पीयूष को सपने से जगाया। उसके अधरों पर भीनी सी मुस्कान थी। थोड़ी देर पहले मिले फटकार की जलन गुलाब की ताज़गी में विलीन हो चुकी थी।

वह अब रोज़ दफ़्तर आकर उन गुलाबों को देखता और खिल जाता। दिन…दो दिन…. चार दिन….. छः दिन…. पीयूष का दिल खिलता गया, गुलाब के फूल मुरझाते गए।

 

जिस सप्ताहांत का इंतज़ार उसे बेचैन किए रहता था, वही सप्ताहांत काटे नहीं कट रहा था। “सोचा था रविवार का दिन है सिटी सर्कल का चक्कर लगाते हुए ताज़े गुलाब भी लेते आऊंँगा। लेकिन ये फूफा जी भी ना, हमेशा बेवक्त ही आते हैं। अब फूफा जी आए हैं तो घर से कोई बाहर कैसे जाएगा भला!” ह्म्म…. की आवाज़ के साथ पीयूष ने गहरी सांँस ली “वसंत है तो क्या हुआ, धूप तेज़ होने लगी है। पता नहीं किसी ने उसके गुलाब लिए भी होंगे या नहीं!” बेचैनी का आलम यह था कि फूफा जी के सत्कार में परोसे गए सभी पकवान और मिठाइयांँ वह चट कर गया।
मेहमानों के साथ मांँ को हैरानी से खुद की ओर देखते हुए देख कर उसे अपने हालात का अंदाजा हुआ। जल्द ही वाज़िब सफाई न दी तो मांँ शाम तक किसी ओझा को पकड़ लाएगी भूत उतरवाने के लिए, यह सोच उसने मुंँह खोला “भाई वाह! मांँ सच में तेरे हाथों में जादू है। आज जो पकवान तुमने बनाए हैं ना, उसे खा कर तो तुम्हें पाक शास्त्र का सर्वोच्च पुरस्कार देने का मन कर रहा है।” कहते हुए उसने मांँ का हाथ चूमा और कमरे में जाने में गनीमत समझी। मांँ और अधिक हैरान थी जिसने आज तक एक निवाला बिना नखरे ख़ुशामद के नहीं खाया, वह आज उसे सर्वोच्च पुरस्कार देने की बात कर रहा है। खैर, जो भी हो मांँ ने खुद के बेटे के शब्दों को सुन कर पुरस्कृत मान ही लिया।
पीयूष बिस्तर पर लेट कर आंँखे मूंँदे हुए उस लड़की की छवि देर तक देखना चाहता था। उसकी सौम्यता महसूस कर कुछ सुकून पाना चाहता था, लेकिन भीमसेन की भांँति आहार ग्रहण करना बेचारे पेट पर भरी पर गया। मुई मरोड़ का प्रकोप ऐसा की न आंँखे बंँद हो पा रही थी, और ना छवि आकर ले पा रही थी। पूरी रात दोहरी बेचैनी के साथ कटी।
सोमवार का दिन, सड़क पर अफ़रा-तफ़री का माहौल होता है। गाड़ी की चाभी घुमाते हुए पीयूष ने रेडियो ऑन किया “आप यदि सिटी सर्कल की ओर जाने की सोच रहे हैं तो आपको बता दें आप वहांँ भारी ट्रैफिक में फंँस सकते हैं।” आर.जे. की आवाज सुन पीयूष बुदबुदाया “सिटी सर्कल तो फंँसने की ही जगह है भाई….अब क्या करें गुलाब भी लेना है, चल मेरी धन्नो फँसने के लिए तैयार हो जा” कहते हुए उसने गाड़ी गुलाबों वाली सड़क की ओर मोड़ दिया।

गुलाबों वाली सड़क, यही तो नाम दिया है उसने सिटी सर्कल को।

भारी ट्रैफिक का सामना कर वह सिटी सर्कल पहुंँचा। आज रेड लाईट नहीं जली, फिर भी गाड़ी को किनारे खड़ी कर उस लड़की को खोजने लगा। इस दरम्यान कई और लोग आए फूल बेचने, लेकिन उसे फूल से अधिक बेचने वाली का इंतज़ार था। उसके शब्द सुनने केलिए वह अधीर हो रहा था।

“लाल गुलाब….प्यार का गुलाब…. ले लो….ले लो….प्यार कि सुगंध से महकता गुलाब…..!”

पीयूष इस आवाज़ को सुन चौकन्ना हो गया। यह तो वही आवाज़ थी “ऐ लड़की….. ऐ गुलाब वाली लड़की…. इधर… इधर आना….” पीयूष ने हाथ हिला कर लड़की को आवाज़ दी।
“आप तो वही हो ना दस गुलाब वाले साहब! आज भी गुलाब ले लो ना साहब। एकदम ताज़े हैं… एकदम महकते हुए!” आँखें छोटी कर नाक थोड़ा सिकोड़ते हुए लड़की ने गुज़ारिश की।
उसके बाल आज भी बेतरतीब थे। कुछ लट गालों पर लटके, कुछ कंँधे पर बिखरे। आंँखों में गहरा काला काजल भी लगाया था उसने, जो शायद उस दिन जल्दबाजी में पीयूष देख नहीं पाया। ये काजल आंँखों को कितना खूबसूरत बना देता है ना! या उन आंँखों ने काजल की अहमियत बढ़ा दी थी।
“बोलो ना साहब…. कितने गुलाब दे दूंँ ….?” लड़की की आवाज़ ने पीयूष का मोह तोड़ा।
“हांँ… हांँ….! दे दो….आज भी दस…. दस दे दो।”
“आज भी दस! बहुत बढ़िया साहब। लगता है आपको फूल बहुत पसंद है। मैं तो कहती हूंँ सबको फूलों से प्यार करना चाहिए।” कहते हुए उसने दस गुलाब बढ़ा दिय।
पीयूष ने पांँच सौ का नोट बढ़ाया। “अरे क्या साहब! सुबह-सुबह बोहनी के समय में छुट्टा कहांँ से लाऊंँ?”
“कोई बात नहीं बाकी तुम रख लो।”
“बाकी कैसे रख लूंँ? मेहनत से ज्यादा एक पैसा भी लिया तो पाप नहीं लगेगा? छोटा ही सही, लेकिन यही अपना बिजनेस है, और काम के प्रति सौ फीसदी ईमानदार हूँ मैं, जितना काम उतना ही दाम!”
“ओहो….! मैं तो ये कह रहा हूंँ कि मैं इसी रास्ते आते जाते रहता हूंँ। अगली बार छुट्टा दे देना। अभी मुझे भी देर हो रही है और तुम्हारा भी तो बिजनेस का समय है ना!”
“ठीक है साहब! अगली बार जरूर ले जाना। मैं सड़क के इसी तरफ गुलाब बेचती हूंँ।”
हाथ में गुलाब, होंठो पर मुस्कान और घड़ी में देर होने की अवधि लिए वह फिर दफ़्तर पहुँचा। सप्ताह के पहले ही दिन देर होने के कारण वह फिर बॉस के गुस्से का शिकार हुआ, लेकिन आज उस लड़की से मुलाकात की खुशी में उसे गुस्सा भी जाने क्यों प्यार लग रहा था।
अगली सोमवार वह फिर से उसी रास्ते गुजरा। वह रास्ता, उसकी अस्त-व्यस्त ट्रैफिक अब आकर्षक लगने लगी थी। लाल बत्ती जो उसे तनिक न सुहाती थी, उसे वह लाल बत्ती भी भाने लगी। अब प्रत्येक सोमवार वह सिटी सर्कल होकर गुजरता, उस लड़की से गुलाब खरीदता और चला जाता। मिनट भर का यह लेन-देन पीयूष के रोम-रोम को पुलकित करने लगा।
अब वह खिला-खिला और पहले से अधिक जीवंत रहने लगा। मांँ की बनाई लौकी और करेले भी चाव से खाता, बात-बात पर पिनकने वाला पीयूष क्षमाशील हो रहा था। उसने गुलाब का एक पौधा अपनी बालकनी में भी लगाया, जिसकी देख-भाल पूरी तल्लीनता से करता।
जितनी बार उस लड़की से मिलता, पीयूष के जीवन में सकारात्मकता का संचार होता। कुछ खास तो था उसमें जो उसकी चंँद बातें पीयूष के दिल पर गहरा असर करने लगी। एक दिन फूल बेचना छोड़ कर वह सड़क किनारे एक्सिडेंट में ज़ख्मी एक कुत्ते की तीमारदारी करने में लगी थी। पीयूष गाड़ी से फस्ट-एड किट लेकर मदद को आया तो कितनी भावविह्वल हो गई थी “सर जी बेजुबान हैं तो क्या इन्हें जीने का हक़ नहीं? लोग गाड़ी लेकर इतनी तेज़ रफ़्तार में भागते हैं मानो स्वर्ग जाने का रास्ता बस बंद ही होने वाला है। इनका बस चले तो इंसानों को कुचल कर भी निकाल जाएंँ और मुड़ कर भी न देखे। ऐसे पैसे का क्या फायदा जो हमारी इंसानियत छीन ले! मैं ना फूलों का बिजनेस इंटरनेशनल बनाऊंँगी फिर गरीब और बीमार लोगों के साथ इन बेजुबानों को भी अनाथ और लाचार नहीं रहने दूंँगी।” उसकी बातें पीयूष के सांँसों में घुलती हुई उसके दिल में उतर जाती थी।
“मोहब्बत के मायने सबके लिए अलग है। कौन कब किसकी और कैसी मोहब्बत में पड़ जाये इसका पता खुद मोहब्बत को भी नहीं होता” पीयूष भी इस मोहब्बत के खेल में उतर चुका था, बस उसके दिल को यह एहसास नहीं था।
पूरा साल गुलाब की खरीददारी में बीत गया। अब तो बॉस को भी समझ आ गया कि पीयूष सोमवार को देर ही आएगा। उन्होंने अब फटकारना बंँद कर दिया, बदले में पीयूष उनके पेन स्टैंड में भी एक गुलाब रख देता।
आज पीयूष आधे घंटे तक उसका इंतज़ार करता रहा। कल से ही रह रह कर तेज़ गर्जना के साथ लगातार बारिश मौसम के नासाज़ मिज़ाज को दर्शा रही है। फूल और अन्य छोटे-मोटे सामान बेचने वाले इस बारिश में भी माथे पर पॉलीथिन की चादर ओढ़े गाड़ियों के पीछे भाग रहे हैं। रोटी का सवाल है, इस बारिश में सब ओर पानी भर रहा है और उसकी धार में कितने गरीबों की रोटियांँ भी बह रही है।
पीयूष से अब रहा न गया। बाहर निकला और सबके पास जाकर लड़की के बारे में पूछने लगा। सब उसका नाम पूछते लेकिन पीयूष ने कभी उसका नाम ही नहीं जाना। वह तो उसकी बातों से कभी उसकी आंँखों से, कभी केशों से तो कभी निश्छल मुस्कान से तृप्त होता रहा था। “यहांँ बहुत लोग अपना पेट पालने केलिए भागते हैं। कल से तेज़ बारिश हो रही है और वो हादसा भी तो हुआ ना, तो आज कुछ लोग नहीं आय हैं। हमको क्या पता आप किस फूल वाली को खोज रहे हैं।” एक महिला विक्रेता ने पीयूष के सवाल का जवाब दिया।
“हादसा…..कौन सा हादसा? अखबार में खबर भी नहीं आई। दीदी वो लड़की यही कोई उन्नीस-बीस साल की होगी। सांँवला रंग, छोटी पर गहरी आंँखे जिनमें वह रोज काजल लगती है, माथे से दोनों गालों पर बाल गिरे रहते हैं, हंँसती है तो दाहिनी ओर एक दांँत जो कुछ दूसरे दांँत पर चढ़ी हुई है ना वह उसकी हंँसी को और खूबसूरत बना देती है। और हांँ फूल बेचने केलिए कहती है …. बम्पर धमाका फूल के साथ सपने, उम्मीदें और प्यार एकदम फ्री!” लड़की की रूप रेखा बताते हुए पीयूष को पहली बार लगा कि वह उसके विषय में कितना कुछ जानता है।
“साहेब लगता है आप गुलाब की बात कर रहे हैं।”
“गुलाब नहीं दीदी! वह तो गुलाब बेचती है।”
“उसका नाम भी गुलाब ही था। आपकी बातें हमेशा करती थी। कहती थी प्रत्येक सोमवार एक साहेब आकर दस गुलाब खरीद जाते हैं। आपके लिए सबसे खास गुलाब चुनकर रखती थी। कहती साहब उम्मीद लिए आते हैं, मेरे फूलों से उनकी हर उम्मीद पूरी होनी चाहिए।”
“अच्छा ! गुलाब नाम है उसका! क्या आज बारिश की वजह से नहीं आई?”
महिला ने कुछ नहीं कहा वह एक टक पीयूष को देखती रही।
“क्या हुआ दीदी? मुझे ऐसे क्यों देख रही हैं? कोई बात नहीं मैं बारिश रूकने पर दुबारा आऊंँगा उससे गुलाब लेने। तब तक आप ही मुझे कुछ गुलाब दे दीजिए।”
“साहेब, अब वो आपको गुलाब नहीं देगी। वो तो कल ही चली गई….बारिश के साथ बह गई।”
“कैसा मज़ाक कर रही हैं! इतने से पानी में कौन बह जाता है?”
“वो बह गई साहेब! कल शाम बारिश में हम सब पानी से बचते-बचाते ग्राहकों के पास सामान बेचने को भाग रहे थे। वह भी भाग रही थी। तभी एक तेज़ रफ़्तार कार ने अपना संतुलन खोया और…..! कोई बहुत अमीर आदमी होगा साहेब। बड़ी लंबी गाड़ी थी। हादसे के बाद कुछ पुलिस वाले आए वह सब उसी के आगे-पीछे घूम रहे थे। यहीं… यहीं बीच सड़क पर पड़ी थी गुलाब। उसका बहता हुआ ख़ून पानी के साथ मिला जा रहा था। उसको ऐसे देख कर हमारी सोई हुई आत्मा भी चीख उठी और हम सबने एक साथ पुलिस से उस अमीर साहेब को सज़ा देने की अपील की।”
“लेकिन वो अमीर था ना, कुछ लेन-देन हुआ होगा फिर पुलिस हमें ही धमकाने लगी। सड़क धंँधा करने की जगह है क्या? बीच सड़क पर भागते हो और हादसे के नाम पर शरीफ लोगों से उगाही का धंँधा करते हो! देखो यह साहब बहुत बड़े दिल वाले हैं थोड़ी बहुत रकम लेकर सब भूल जाओ नहीं तो सबको यहांँ से उठा कर फेंक दिया जाएगा।हम ठहरे रोज कमा कर चूल्हा जलाने वाले लोग। हमने अपनी जागी हुई आत्मा को फिर सुला दिया और काम पर लग गए। ये पंगा-वंगा हमलोगों का काम कहाँ!” उस महिला की आवाज भरी हुई थी।
पीयूष शून्य में खोने लगा। गाड़ियों का शोर, बिजली का कड़कना, बारिश की आवाज वह कुछ सुन नहीं पा रहा था। समझते समझाते बहुत देर हो गई। काश कि कुछ कह पाया होता। काश कि वक्त ठहर गया होता। उसके आंँसू लगातार बहते हुए बारिश के उसी पानी में विलीन हो रहे थे, जिसमें गुलाब का लहू घुल गया था। गुलाब की एक पंखुड़ी कहीं से बहती हुई पीयूष के पास आ गई।
जैसे गुलाब उससे कह रही हो “सर जी गुलाब के मुरझाने पर कोई आंँसू बहाता है क्या? उस फूल ने तो अपनी पूरी जिंदगी मुस्कुराहट फैलाने में बिताई है, उसके जाने पर अपने आंँगन मुस्कुराहट का एक पौधा ही रोप दो। एक गुलाब का पौधा लगा लो और जब उसमें गुलाब खिले तो उसकी महक उसकी जीवंतता सब ओर फैला दो, सबमें बांँटो। गुलाब तो इसी में खुश है।”

7 COMMENTS

  1. भाव विभोर कथा।
    “गुलाब के मुरझाने पर कोई आंँसू बहाता है क्या” ?
    स्वाद छोर गया।

  2. Very touching and emotional story .
    A moment can lift you from all the miseries and can make hell out of it too .
    Very nice portrayed.

  3. बहुत बढ़िया। भावनाओं और यथार्थ के साथ बेहतरीन प्रस्तुति।

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