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खूबसूरत कर्ज़ 

 

“मां! मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकता, मैं उस आदमी को माफ नही कर सकता जिसने तुम्हारी ज़िंद्गी बेरंग कर दी हो। कम से कम मरने के बाद तो उसे तड़पने दो।”

 

पार्थ बेहद गुस्से में बोल रहा था लेकिन राधा एकदम शांत बैठ दूर क्षितिज में देख रही थी, फिर एक सपाट स्वर  में बोली ” बेटा कर्ज जितनी जल्दी हो उतार देना चाहिये”।

“उस आदमी ने कभी मेरी मांग मे सिंदूर भरा था, मुझे तेरी जैसी संतान बेटे के रूप मे मिली, कुछ साल ही सही एक भरे पूरे परिवार मे रह्ने का सुख दिया, उस आदमी के अन्याय ने मुझे ज़िंद्गी की नई राह दिखाई और आज मैं तेरे साथ इस मुकाम पर हूँ,उसका वो अन्याय मुझ पर कर्ज़ है।”
 
“पंडित जी ने कहा था अस्थि विसर्जन संतान के हाथों होना चाहिए, इस बार मेरी बात मान ले बेटा!”
पार्थ  को आज मां कि आवाज़ कुछ दरकती हुई सी लगी, वो बोला नही बस पैर पटकते हुए बाहर चला गया। 
आज जैसे कोई बांध था जो अपनी सारी सीमाएं तोड़ देना चाहता था। एक एक कर जख्मों कई टाँके उधड़ रहे थे और राधा की आँखों में सभी बिसरी बातें, वो ज़िंद्गी के बीते पल एक साथ एक फिल्म की तरह उसके दिमाग मे चलने लगे, जैसे कोई तेज़ हवा उसे अतीत की ओर बहाये लिये जा रही थी और वो सूखे पत्ते की तरह साथ उड़ती जा रही थी।
मदन की मां राधा के पिता की मुंहबोली बहन  थीं । राधा की मां उसके जन्म लेते ही गुजर गई थी।बिन मां की बच्ची से हमेशा उनका खास स्नेह रहा था।पास के शहर में रहने के कारण अक्सर आना जाना होता था। वो लगभग हर महीने आती,राधा के लिए खिलौने कपड़े हमेशा साथ लाती थी। मदन के पिता की दवा की  दुकान थी जहां अच्छी  कमाई होती थी।उनके आने पर मदन और राधा साथ खेलते थे।
 धीरे धीरे समय गुजरा वे दोनों बड़े हुए, ये सिलसिला चलता रहा, राधा अभी इंटर में थी । राधा अपने उन्नीस्वे साल मे थी चेहरे पर उम्र की लुनाई नज़र आती थी। बड़ी बड़ी आंखें इसमें अब लाल डोरे दिखने लगे  थे। गेहुंआ रंग  तराशा हुआ शरीर कमर तक लटकते लंबे बाल किसी को भी सम्मोहित कर  सकते थे। जब मदन आता तो वो उसे अपने कॉलेज और शहर  की सारी बातें बताता था।
राधा और मदन की दोस्ती उम्र के साथ थोड़ी बदलने लगी थी, मदन वहा आने के बहाने ढूंढने लगा था और राधा मदन और उसकी मां से बेवजह शर्माने लगी थी।
 
बेटियां के बडी होने की  ख़बर ज़माने वाले देते है। खास कर भारत मे लोगो को दूसरे के घर आंगन की ख़बरों मैं ज्यादा दिलचस्पी होती है।किस आँगन की बेल किस छत का सहारा ले रही है इस बात में ज्यादा रस आता है।
मदन की मां को सीधी सादी  राधा बचपन से पसंद थी और वो भी दोनों के हाव भाव देख रही थीं। अब भला दाई से क्या पेट छुप सकता है। मां को बच्चे की साँसो की खबर होती है तो भला उनके बीच जन्म लेता प्यार भला कैसे छुप सकता था।
बस एक रोज़ मौका देख राधा का रिश्ता अपने  बेटे के लिये माँगा । इंकार की कोई वजह भी नही थी।बस फिर क्या मदन और राधा के सपनों को तो जैसे सुनहरे पंख मिल गये थे।
जल्द ही अच्छा मुहूर्त देख दोनो   का विवाह हो गया था।मदन दीवानों की तरह राधा को प्यार करता था । राधा भी अपनी नई गृहस्थी में रमने लगी थी।
 मदन के पिता चाहते थे कि राधा  विज्ञान की छात्रा है तो अगर वो चाहे तो फार्मेसी की पढ़ाई करे, जिससे आगे चलकर दवा की दुकान वो चला सके। मदन को दुकान मे कोई दिलचस्पी नहीं थी। वो एक कम्पनी में नौकरी करता था, दुकान पर बैठना उसे पसंद नही था।  राधा का दाखिला हो गया साल भर सब अच्छा चल रहा था कि अचानक दिल का दौरा पड़ने से मदन के पिता चल बसे।मदन की मां एकदम से टूट गईं थी लेकिन  इसी बीच राधा  के गर्भवती होने की खबर ने उन्हें जीने की एक नई उम्मीद दी ।
 मदन का तबाद्ला पास के शहर मे हो गया। हफ्ते दस दिन पर मदन घर आता। कभी काम की व्यस्तता होती तो वही रह जाता था। जाने क्यूं अब  राधा को मदन के नज़दीक आने पर एक परायेपन की बू आती जब वो यह बात कहती तो मदन बात टाल जाता था, कहता ” राधा तुम मां बनने वाली हो जाने क्या क्या सूंघ लेती हो,  अपनी नाक का इलाज करो!”  
बात आई गई हो जाती।
राधा मदन के मिजाज़ को बदलता हुआ देख रही थी , अब उसे राधा की साद्गी देहातिपन नज़र आता था, उसके सरल से व्यक्तित्व मे अब पिछड़ापन दिखाई देता अगर कभी राधा कही साथ आने जाने को कह्ती तो मदन उसे अयोग्य करार देता। ये सब बातें राधा को तकलीफ देती मगर वो कहती किससे, अपनी मां थी नहीं और ससुराल मे ससुर की मृत्यु के बाद वो मां को दुखी नहीं करना चाहती थी। ये सारी घुटन मन मे लिये वो समय बिता रही थी। उस पर जब कभी मदन घर आता तो कहता ” मां ये खुश क्यों नहीं रह सकती, सब कुछ तो दिया है इसे!
राधा कैसे बताती की अब मदन अपने फर्ज़ को अहसान का नाम देने लगा है। 
समय आने पर पार्थ का जन्म हुआ। राधा पर दोहरी जिम्मेदारी थी मां और अपने बेटे की देखभाल में व्यस्त रहती। राधा सोच रही थी की पार्थ थोड़ा बड़ा  हो जाये तो वो अपनी पढ़ाई पूरी करेगी ।
 मां थोड़ा बीमार रहने लगी थी  मां और पार्थ की देख्भाल मे चौबीस घंटे कम पड़ने लगे थे और मदन ने सब कुछ राधा पर छोड़ दिया था।
पार्थ के साल भर के होते मां का स्वर्गवास हो गया , ये दुख राधा के लिये बहुत कष्टप्रद था उसने अपनी मा को दोबारा खो दिया था ।उनकी तेरहवीं के दिन मदन के दफ्तर के सभी लोग आये लेकिन उसकी सिनियर रोमा मैडम कुछ ज्यादा बेतकल्लुफ व्यवहार कर रही थी। दबी ज़बान से अन्य लोग कुछ अन्यथा बातें भी कर रहे थे।
समय की नज़ाकत देख राधा कुछ नही बोली। किसी तरह एक महीना बीता इस बीच मदन एक रात के लिये घर आया और घर दुकान के कागजात लेकर चला गया। राधा को कुछ समझ नहीं आया।वो अपने दिमाग मे अटकल लगा रही थी।   
एक दिन अचानक मदन अपनी सिनियर रोमा  के साथ घर आया,और बडी़ ही बेशर्मी से राधा के आगे तलाक़ के कागज़ रख दिये और बोला वो रोमा से शादी करना चाह्ता है। तलाक़ हुआ तो ठीक है नही तो रोमा से शादी कर यही रहेगा। 
राधा के पैरोंके तले ज़मीन खिसक गयी। उसने कुछ कहना चाहा लेकिन मदन और रोमा क बेशर्मी भरा व्यवहार देख उसने पार्थ को गोद लिया और अपना ज़रुरी सामान लेकर अपने पिता के घर लौट आई। मदन को देखकर ऐसा लगा जैसे वो किसी भी तरह उनसे छुटकारा पाना चाहता हो, अपने बेटे का भी कोई मोह नहीं जागा।  
एक साथ ज़िंद्गी के इतने उतार चढ़ाव से राधा का आत्मविश्वास डगमगाने लगा था, उसके पिता भी बिल्कुल टूट गये थे लेकिन उन्होने हिम्मत नही हारी थी। एक नर्सिंग स्कूल मे राधा का दाखिला किया और पार्थ की जिम्मेदारी खुद ले ली थी। पास पड़ोस के लोग कुछ दिन बातें बना कर चुप हो गये।ज़िंदगी की गाड़ी किसी तरह आगे बढ़ने लगी। राधा की ज़िंदगी का बस एक मक़सद था अपने बेटे की परवरिश अच्ची तरह करना उसे एक अच्छा इंसान बनाना।
वक़्त कभी भी ठहरता नही है। पार्थ भी बड़ा हो गया और  विद्यालय जाने लगा था। बेहद ज़हीन विद्यार्थी जिसे हर कक्षा में वजीफा मिलता था। राधा भी अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी।शहर के सरकारी अस्पताल में काम करती थी।
समय का पहिया तेज़ी से घूमा राधा एक सीनियर नर्स बन चुकी थी , राधा की कर्तव्य निष्ठा की सभी सराहना करते थे।  उसकी  कार्यकुशलता की मिसाल दी जाती थी। आस पड़ोस मे बातें बनाने वाले लोग आज  उसकी इज़्ज़त करते थे। इसी बीच राधा के पिता भी स्वर्ग सिधार गये थे । राधा और पार्थ की मेहनत रंग लायी थी पार्थ कस्टम विभाग में एक अफसर बन गया था। कभी कभी मदन की खबर उड़ते हुए  राधा तक आती लेकिन अब समय गुज़र चुका था और राधा भी ज़िंद्गी में आगे बढ़ गई थी।
एक रात राधा अपनी ड्यूटी पर थी की  तभी पार्थ एक बेहोश आदमी को लेकर पहुँचा जो उसे सड़क पर बेहद बुरी हालत में मिला था।
पार्थ ने उसे अस्पताल में दाखिल किया और अपनी मां के पास गया । उस आदमी के बारे में जान कर राधा उसे देखने गई तो उस व्यक्ति को देख राधा का मन वितृष्णा से भर गया और उसने मुंह फेर लिया यह और कोई नहीं मदन था, बेहद गंदे मैले कपड़े एकदम फटेहाल हालत जेब मे फूटी कौड़ी नहीं , बहुत कमज़ोर हालत मे था।राधा वापस  लौटकर जाने लगी थी लेकिन  नर्स होने के कारण उसने अपना फर्ज़ निभाने का फैसला किया। पार्थ नही समझ सका राधा हर काम इतने निर्विकार भाव से सब काम क्यों कर रही थी।
जब राधा ने बताया की जिस आदमी को पार्थ सड़क से उठाकर लाया है वो और कोई नहीं मदन है तो पार्थ के गुस्से का ठिकाना नहीं था वो राधा को भी साथ ले जाना चाहता था लेकिन राधा ने इंकार कर दिया।
 
रात बीती सुबह मदन को होश आया तो वो राधा से नज़र नही मिला पा रहा था। उसकी आंखों में पश्चाताप के आंसू थे जो अब राधा के लिये बेमानी थे। शाम होते होते मदन की हालत बिगड़ने लगी, राधा ने सुबह ही  रोमा को खबर भेजी थी  लेकिन उसने आने से इंकार कर दिया। ईश्वर की मर्ज़ी से उसी रात मन मे पश्चाताप लिये मदन की मृत्यु हो गई। जिस रोमा के लिये मदन ने राधा को अकेला छोड़ दिया था उसी रोमा ने घर मकान दुकान सब अपने नाम कर मदन का साथ छोड़ दिया था और तो और उसके मरने की खबर सुन कर भी उसने आने से इंकार कर दिया।  
कोई और रास्ता न देख कर राधा ने विद्युत शवदाह गृह मे मदन का अंतिम संस्कार कर दिया। इच्छा न होते हुए भी उसकी अस्थियां घर ले आई थी।जाने वो क्यों चाहती थी कि उसकी अस्थियों का विसर्जन पार्थ कर दे पार्थ आज पहली बार राधा की आज्ञा मानने से इंकार कर बाहर चला गया था।
तभी पार्थ के हाथों के स्पर्श से राधा की तंद्रा टूटी और अचानक वो अपने अतीत से वापस लौट आई थी
पार्थ मायूस आवाज़ मे बोला ” मां मैं इन्हे माफ नही कर सकता लेकिन अगर तुम्हारी इच्छा है तो मैं उनकी अस्थियां बहाने आपके साथ जाऊंगा!”
राधा और पार्थ हरिद्वार के लिए गाड़ी से निकले,अगली शाम हरिद्वार में अस्थि विसर्जन कर एक होटल में ठहर गये। सभी आधुनिक सुविधाओं वाला होटल था, आज बरसों के बाद राधा अपने शहर से कहीं बाहर आई थी। अगले दिन   सुबह पांच बजे  के करीब नीँद खुली फिलटर कोफी माइक्रो कर जब बाल्कनी मे आई तो अद्भुत नज़ारा था … सामने के पार्क से आता कलरव आस बंधा रहा था। आज की सुबह एक नई उम्मीद लेकर आई थी। सामने आसमान धीरे धीरे सुनहरा हो रहा था। सुबह की ठंडी हवा जैसे राधा के मन की सभी दर्द भरी यादें अपने साथ बहा ले गई थीं।
दूर पूरब में उगता हुआ सूरज एक नई सुबह लेकर आया था। बगल में बहती गंगा की धारा जैसे कह रही थी 
जीवन अनवरत चलता रहेगा 
जलधार सा बहता रहेगा
कर्तव्य पथ का तू मुसाफिर
कर्म बस करता रहेग
तभी पार्थ सो कर उठा और उसके पास आया राधा उसे देख मुस्कुरा कर बोली ” अरे अपनी ज़िंद्गी के जंजालो मे  फंस कर मैं देख नही सकी मेरा नन्हा पार्थ बड़ा हो गया है मेरा बच्चा जवान हो गया है  उसके लिये एक बहू भी तो खोज़ कर लानी है!”
दोनो मां बेटे मुस्कुरा कर उगते हुए सूरज को देखने लगे।  
Kiran Shukla
मैं किरण शुक्ला एक गृहणी हूं। मैं नवाबों के शहर लखनऊ की रहनेवाली हूं। थोड़ा बहुत लिखने का शौक पहले से था लेकिन जिंदगी की व्यस्तताओं मे ये शौक ज़रा पीछे छूट सा गया था। कला मंथन मंच की आभारी हूं जिसकी वजह से मैंने नए सिरे से अपने शौक को वक्त देना शुरू किया है। सही मायने मे नवलेखिका हूँ जो शायद आजकल की पीढ़ी के लिए लिखने का प्रयास कर रही हूं। उम्मीद करती पढ़ने वालों की अपेक्षा पर खरी उतरूं।

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