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गेंद

 रवि अपने यादों के किरणों को समेटने की अथक कोशिश कर रहा था परन्तु ,”क्या समेटने की भी कोई सीमा होती है ,क्या सोचने की भी कोई परिधि होती है ,क्या प्रणय का भी आयतन एवं घनफल होता है कर्त्तव्य और निष्ठां का भी एक सीमित दायरा है ?” यदि प्रत्येक वस्तु ,भौतिक हो या मानसिक की निश्चित परिधि है ,आयतन और घनफल भी ,तो यादों का क्यों नहीं ?

 मन के मरुस्थल में कितने वादों के वृक्ष लगे हुए हैं यादों का माली सदैव ही उन्हें सींचता रहता है , आंसू उन्हें कभी सूखने देना ही नहीं चाहते। आखिर क्यों ?

मैं जिस कगार पर खड़ा हूँ उसके बाद से ही गहरी और लम्बी खाइयां प्रतीत हो रहीं हैं जिसमें गिरने का अर्थ ही जीवन समापन है। “कर्म और प्रारब्ध के जीवन एक गेंद बन चुकी है। “

 वह क्या करे क्या ना करे ,अक्सर उसके सामने क्या,क्यों ,कब, कैसे तथा कहाँ ,आदि शब्द आकर उसके मानस पटल से उलझ  जाते। तब वह निरुत्तर होकर बैठ जाया करता और सोचता ,”क्या प्रारब्ध ही सब कुछ है ,कर्म कुछ नहीं ! यदि कर्म कुछ नहीं , तो कर्म को पूजा लोग क्यों कहते हैं ?क्या पूजा करना अपराध होता है ,क्या भाग्य के साथ कर्म का यही सहयोग है ? यदि पूजा के महानतम अपराध को मैंने अपने आप को समर्पित ही कर दिया है तो क्या इसका कोई क्षमा याचना नहीं !क्या इसका कोई परिमाप और क्षेत्रफल नहीं ?और यदि सब कुछ है तो उत्तर क्यों नहीं ?”

  वह सुनसान सड़क पर खामोशियों में लिपटा  हुआ ,अपने प्रश्नों का उत्तर अपने आप से तथा उस दूरगामी सड़क से पूछता हुआ, डूबते  हुए रवि के किरणों को बड़े ही तन्मयता से निहार रहा था। वह किरणें जो अब तक सारे धरा को प्रकाशित कर रहीं थी ,कितनी निस्तब्धता से काले – काले बादलों में विलीन होती चली जा रही हैं। ” ऐ सिल्वर लाइन इन द ——–क्लाउड्स “शायद कागजी पृष्ठों तक ही सीमित होते हैं –व्यवहारिक जीवन में उपयोगी नहीं होते।

  इसी उधेड़ बुन में लीन वह चन्द  घंटों में ही एक निर्जन पार्क में पहुंच गया। जहाँ वर्षों पहले वह घूमने आया करता था एक लम्बी मित्र मंडली के साथ। चहचहातें पक्षियों का कलरव ढलते शाम को कितना मनोहारी बना देता था। वह घंटों इसी जगह बैठकर कभी खेलता रहता तो कभी कल्पनाओं के अथाह सागर में डूबा रहता।

आज वह वर्षों  बाद पुनः उसी पार्क में पहुंच गया है ,परन्तु लम्बी लम्बी प्रश्नावलियों के उत्तर हेतु ! कल्पनाओं के अथाह सागर में डूबने के लिए नहीं।

  शायद इसी लिए वह आज किरण को छोड़कर अकेले ही आया है।हाँ ! वही किरण जो दो वर्ष पहले इसी सुनसान सड़क पर चलती हुई मिल गयी थी।  कितनी सहजता से अपने आप ही टोक दिया था।

“रवि ! तुम यहाँ कैसे घूम रहे हो ? “अचानक तुम्हें ये लखनऊ कैसे याद आ गया। मैंने तो सुना था की तुम एक फौजी अफसर बन कर दिल्ली चले गए हो ! अब तो शादी भी कर ली होगी। बहुत ही होनहार एवं सरल स्वाभाव की तुम्हारी पत्नी होगी ! बिलकुल तुम्हारे जैसे।”  रवि ने बीच में ही टोकते हुए कहा था ,”देखिये किसी अनजान व्यक्ति के बारे में ये सब बातें करना ठीक नहीं।आप कौन हैं ?कृपया अपना परिचय बताइये। “

 हाँ रवि ! बताती हूँ।  जरूर बताऊँगीं। कम से कम इतने बड़े शहर के भीड़ में कोई परिचय पूछने वाला तो मिला। दो कदम मेरे साथ तो चलो। इतना कहते ही उसका सारा अतीत चलचित्र की भांति मानस पटल पर घूमने लगा।

  लखनऊ विश्वविद्यालय में जब रवि बी ए के अंतिम वर्ष का छात्र था ,मेरे घर के सामने से ही उसका रास्ता था। रोज उसके क्लास का समय होते ही मैं बाहर वरामदे में बैठकर उसके जाने की बाट जोहने लगती। वह अकेले साइकिल पर कुछ अपनी ही लिखी हुई कवितायेँ या कोई गीत गुनगुनाता हुआ रोज ही निकल जाया करता। मै चाह कर भी उसे नहीं रोक पाती। मेरी अंतरात्मा से बड़े ही जोर  की चींख निकलती, पर होठों तक आते ही मौन हो जाती। मैं बेबसी का सहारा लिए चुप्पियों में खो जाती।

मैंने पहली बार उसे हसनगंज के आर्केस्ट्रा पार्टी में उसे नजदीक से देखा था। दशहरे के रंगबिरंगे  कार्यक्रम में उसका वह गीत सबको कितना सुखदायी ,मनोरम और रस रंजित लगा था —–

    गीत जीवन के अब तो सुहाने ना होंगे
              मीत बचपन के भी अब भुलाने ही होगे
      बीत गयी है जो घड़ियाँ छाये  में उनके
       होठों पर आकर भी तराने ना होगें।
    उसी के दो दिन बाद ही रवि की एक कविता स्वतंत्र भारत में  छपकर आयी जिसका शीर्षक था “गेंद “
                      ”  प्रारब्ध और कर्म के मध्य
                          जिंदगी एक उछलती हुई
                              गेंद है “
                           ————————-

    बस ! मेरे अंतरमन  के आँगन में किसी अनजान पुष्प की सुगंध भीनी भीनी फैलने लगी और मैं  दिन प्रतिदिन उसी  सुगंध के आगोश में सिमटने लगी। कभी कभी तो होठों से बरबस ही निकल पड़ता ,”रवि तुम कितने अच्छे हो ,तुमने जीवन को कितने नजदीक से देखा है वातावरण से  तुमने कितनी नजदीकियाँ  बना लिया है ,कि अनायास ही सम्पूर्ण पर्यावरण तुम्हारी तरफ खिचां हुआ प्रतीत हो रहा है। “

 मैं  साहस तो ना जुटा  पायी तुमसे बात करने के लिए, तुम्हारे बारे में जानने के लिए। परन्तु अपने अंतर्मन के आँगन से उस अनजाने मूर्ति की छवि भी ना मिटा पायी।

  शनैः शनैः समय की धारा तेज होती गयी और मैं उलट पुलट कर उसी में गोते खाती रही। कि अचानक एक दिन हमारे पडोसी का लड़का जो शायद तुम्हें करीब से जनता था ,बताया कि अब तुम लखनऊ विश्वविद्यालय में कभी कदम नहीं रखोगे। क्योंकि तुम्हारा लक्ष्य तुम्हे मिल चुका है। हाँ ! वही लक्ष्य जिसके लिए हम सब गली -गली भटकते हैं तथा ऐसे भी दिल्ली से लखनऊ कोई क्यों आएगा,कहाँ भारत का आधुनिकतम शहर और दिल्ली में फौजी अफसर !और कहाँ लखनऊ!

 तुम्हारे चले जाने के बाद अपने आप ही कुछ टूटे फूटे शब्दों में मन की भावनाएं परिणित हो जाती। परन्तु तुम्हारा वह गीत ना जाने क्यों अनायास ही बार बार होठों पर प्रस्फुटित होकर वातावरण में बिखर जाता।

  “कुछ समय पश्चात् एम् ए की परीक्षा समापनोपरांत मेरी भी सगाई एक फौजी अफसर से ही हो गयी। मेरे भी हृदयांगन में तमाम कल्पनाओं के वृक्ष लग गए। वह भी बिलकुल तुम्हारे जैसा ही होगा। वह————-मै”

“वह भी तुम्हारे जैसे दिल्ली में ही कार्यरत था। यह सोचकर मैं फूले नहीं समाती थी कि कभी न कभी तुमसे भी मिलने का अवसर अवश्य प्राप्त होगा।”

  बस ! दस पंद्रह दिन के अंतराल पर ही मेरी शादी भी सम्पन्न कर दी गयी। मैं मन के कोठरी में मन के तमाम अभिलाषाओं को समेटे हुए दिल्ली पहुंच चुकी थी। वहां हमारा बहुत ही भव्य स्वागत किया गया। नौकर चाकर ,सारी आधुनिकतम सुख सुविधाएँ से सजा हुआ बंगला हमारे लिए मौजूद था। मैं ख़ुशी से फुले नहीं समां रही थी। कितने अच्छे होते हैं यहाँ के लोग। अक्सर हमारे यहाँ लोग आया करते शाम को , मैं  उनका स्वागत करते हुए अघाती ना थी।

  एक सप्ताह बाद मेरे पतिदेवजी ने शाम को बताया कि “किरण आज क्लब में पार्टी है अपने पड़ोस के लोग भी जा रहे हैं। आज हम लोगों को  वहां डाइनिंग इन नाईट अटेंड करना है। यह हमारे लिए ही  विशेष रूप से आयोजित की गयी है ,मैं  उसका सेक्रेटरी हूँ। देखो कोई गलती ना होने पाए।”

मैं पूरी चेतनता के साथ उस अचेतन पार्टी में पहुंचीं जहाँ सारा वातावरण आधुनिक संगीतों से गूंज रहा था लोग मेरी तरफ ऐसे देख रहे थे जैसे कोई शिकारी अपने खोये शिकार को एक लम्बे अरसे के बाद पाया हो।

  बस ! दस पांच मिनट के अंतराल पर ही एक चमचमाती हुई कार दरवाजे पर आकर रुकते ही लोगों ने दौड़कर दरवाजा खोला। उसमें से एक अधेड़ सा आदमी और एक औरत निकले। उनके आते ही सारे वातावरण में एक दम स्निग्धता आ गयी। कुछ लोग झूठी मुस्कान और कुछ लोग उधार की हसीं से एक दूसरे का स्वागत करने लगे।

परन्तु एक युवक जो पत्थरवत मूर्ति सा कोने में अकेले ही खड़ा हुआ था उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि उसके सामने एक शक्तिशाली विस्फोटक आ गया है। सारा वातावरण ही अभी विस्फोट के साथ ही धुआं धुआं हो जायेगा। लोग अंधेरों में विलीन हो जायेंगें।

 तत्पश्चात ही मेरे आँखों के सामने भी अँधेरा छाने लगा,जब थोड़ी दूर पर सजाई हुई बोतलों से दुर्गन्ध फैलने लगी। उस नवयुवक के सिवा सभी धीरे धीरे मदहोश होते जा रहे थे। अब तक मैं भी अपना होशोहवाश खो चुकी थी। मैं  क्या हूँ ,क्यों हूँ ,कहाँ हूँ कुछ भी अहसास नहीं था।

दूसरे दिन जब दस बजे मेरी निद्रा टूटी तो मैं अस्त-व्यस्त चारपाई पर पड़ी हुई थी ,मेरे पतिदेव मेरे बगल में अब भी मदहोश पड़े हुए थे। उनके मुख से शराब की अभी भी वही दुर्गन्ध आ रही थी। सामने का दरवाजा खुला हुआ था। मेरे शरीर का पोर पोर दुःख रहा था। मैं पुनः अर्धविक्षिप्त हो कर सो गयी–

 हाँ रवि ! उसी दिन से मैं चलती हुई लाश में परिणित हो गयी। अपने आप को मैंने फिर समय की धारा में बहने के लिए छोड़ दिया। मेरी भावात्मकता अब मेरे पति के शराबी दुर्गन्ध में डूब  गयी और मैं —

 “तब मुझे ख्याल आया कि तुम भी या तो बदल गए होंगे या फिर टूट गए होंगे। रेत के बहुमंजिली इमारत की भांति ढह गए होंगे। एक जलता हुआ दीप बुझ गया होगा। “

  मुझे अपने बिखरने का अहसास नहीं था परन्तु तुम्हारे बदल जाने की मुझे असहनीय पीड़ा थी। तुम्हारे ढहने की व्यथा ,मैं अपने चरमोत्कर्ष भी पहुंचकर ,

वापस मुझे इसी दुनियां में फिर से ले आती थी और मैं —

 वे मर्मस्पर्शी भावनाएं जो इतनी सहजता से होठो पर आकर शब्दवद्ध हो जाया करती थी वही आज ढूढ़ने से भी अस्तित्व में नहीं दिखाई देते।

शादी के ठीक दूसरे वर्ष भी एक गहन तुषारपात हुआ। उस दिन मैं अपने पतिदेवजी को छोड़ने बॉम्बे एरोड्रम गयी थी. जहाँ से अभी अभी एयर इंडिया का विमान नीले आसमान की तरफ चला ही था कि देखते देखते ही समुद्र की लहरों में समां गया। सारा वातावरण हर्षनाद की जगह कोहराम से गूंज उठा। आसुओं की तमाम धाराएं वेदना की चीत्कार में समाकर समुद्र से टकराने लगीं और —-

 और जब मैं घर पहुंचीं तो घर वालों ने ताड़नाओं और घोर यातनाओं के साथ घर से निकाल बाहर कर दिया।

मैं फिर से इसी लखनऊ की गलियों में भटकने के लिए आ गयी। तभी से ये शहर जो लोगों के किलकारियों से गुंजायमान रहता था ,मुझे शरण तक ना दे सका पर प्रतारणाओं के मालाओं से अवश्य विभूषित कर दिया।

 हाँ रवि ! तभी से उस सामने  वाले चौराहे पर एक किराए की झोपड़ी में रहती हूँ।

  “किरण मुझे क्षमा करना ! मैंने तुम्हारा दिल दुखाया है लेकिन मैं भी तो —-

 “नहीं रवि। नहीं ,दिल तो उनका दुखता है जिसके पास सुकून नाम का वैभव होता है। मेरे पास तो दुःख के सिवा कुछ है ही नहीं”।

 वह रवि , जो अबतक इतनी कठोरता से परिचय पूंछ रहा था , की आँखे अनायास ही डबडबा आयीं।

चलो अच्छा हुआ रवि ! कम से कम अपने अंतरात्मा की मूर्ति की तो देख लिया। अब चैन से मर तो सकुंगी। लेकिन रवि तुमने अचानक लखनऊ कैसे याद कर लिया ?

   किरण ! वही मेरी स्वतंत्र भारत में छपी कविता जिसे तुमने अभी अभी दुहराया है , मेरे जीवन में बहुत ही सटीक बैठी। बी ऐ पास करके मैं जीवन लक्ष्य रूपी फौजी अफसर प्रशिक्षण केंद्र से पास करके दिल्ली तो आ गया परन्तु मुझे ऐसा लगा कि रवि से उसकी किरणे बहुत पीछे छूट चुकी हैं। दिल्ली में कार्यभार सँभालते ही मेरे पिताजी ने मेरी शादी भी एक धनाढ्य परिवार के धन से कर दिया। मुझे दहेज़ रूपी शाप में सारी आधुनिकतम सुख सुविधाएँ प्रदान की गयी। मेरे घर वाले मेरे शादी पर फुले नहीं समां रहे थे। भला समाते भी क्यों ,इतने बड़े घर में जो शादी हुई थी। इतना सारा दान दहेज़ मिला था। अर्धांगिनी के रूप में एक कर्कशा पत्नी के रूप में और भी जो उपहार में मिली थी। जो की शिक्षा के नाम पर उसके पास आठवीं की डिग्री थी और संस्कार के स्वरुप में पैतृक संपत्ति का घमंड। नारित्व के रूप में बेहयापन उसे पुरस्कार में प्राप्त था।

 हम अपने परिणय संस्कार के कुछ ही दिनों बाद धर्मपत्नी के साथ दिल्ली आ गए। बस हमारा भी  स्वागत ऐसे ही हुआ जैसे तुम देख चुकी हो। वह भी बहुत व्यस्त रहती थी ,परन्तु पड़ोसियों या मित्रों के स्वागत में नहीं, वरन उनके साथ उस होटल में पार्टी है ,उस क्लब में समारोह है आदि आदि। वह अपने प्रतिभा एवं अपने पैतृक उपहारों का सदुपयोग इन्हीं क्रिया कलापों में खूब कर रहीं हैं और मैं —.

  थोड़े दिनोंतक अपने रक्त की कणिकाओं को तो आंसुओ में परिणित कर उनका स्वागत करता रहा। धर्मबंधन को जीवन की डोर से बंधे रहा। पर मैं अपने आप को नहीं बदल पाया किरण ! नहीं बदल पाया। परिणामतः रेत के बहुमंजिली ईमारत की भांति ढह गया। बस। अब अँधेरे के आँचल में  सर रख कर कब तक रोता  रहता। और एक दिन मैं भी अफसरी छोड़ कर इसी लखनऊ के गलियों में शांति और अपने यादों -वादों के मेले में अपने आप को भी ढूढनें के लिए फिर से आ गया। क्यों की धर्मपत्नीजी अपने आप को दिल्ली के आधुनिकतम वातावरण से अलग ही नहीं करना चाहती थी और मैं ——

   परन्तु वही लखनऊ अब मुरझाई हुई यादों को भी शब्दों में परिणित होने से रोकता है। क्या करूँ ? मेरा जीवन एक प्रश्नवाचक चिन्ह के सिवा मेरे लिए कुछ भी नहीं किरण !

 जिंदगी गुजारने के लिए सहारे की जरुरत होती है रवि। अभी जीवन का सफर बहुत लम्बा है। राहों में सहारे की आवश्यकता पड़ेगी रवि। एक सहारा ढूढं लो ,कम से कम उस अवलम्ब से तुम्हारी प्रतिभा बर्बादी से बच जाएगी। बिना किरणों के रवि का कोई अस्तित्व नहीं होता।

   नहीं किरण ! अब मैं अपनी बची हुई जिंदगी में और विष नहीं घोलना चाहता। इसी को ही घूंट घूंट कर पीता  रहुंगाँ।  शनैः शनिः शायद जीवन मौत के आगोश में सिमट ही जाय।

 नहीं रवि ! आज भी तुम्हारी कविताओं एवं गीतों का लोगो को बहुत ही बेसब्री से इन्तजार रहता है।  उन्हें तो निराश ना करो। उसे उभरकर फिर से कागजी पृष्ठोंपर सजने दो। जीवन सवाँरने की वस्तु है,इसका श्रृंगार करो रवि।  श्रृंगार।

 किरण यही जिंदगी तो तुम भी जी रही हो तुम क्यों नहीं सँवार डालती ?

 “रवि भला मेरी तुम्हारी क्या तुलना ? कहाँ राजा भोज ! कहाँ भोजवा तेली। तुम तो एक होनहार एवं मर्मज्ञ नवयुवक हो ,और मैं — वैसे भी भारतीय  समाज में पुरुषों का अलग स्थान रहा है और महिलाओं का अलग।  इसलिए हमें नारी मर्यादा के विरुद्ध कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए”।

 अब तक पार्क में पूर्ण अँधेरे का साम्राज्य व्याप्त हो चुका था पार्क स्तब्धता में स्वाशें ले रहा था। यदा कदा यत्र तत्र किसी पक्षी की ध्वनि ख़ामोशी को तोड़ देती थी। रवि और किरण भी एक दूसरे से विदाई ले अपने अपने डेरे की तरफ चल पड़े थे।

  इसी तरह दोनों यदा- कदा किसी निर्जनता की गोद में बैठकर आपस में आप बीती कह सुन लेते थे। और अपने अपने डेरों में वापस हो जाते थे।

  किरण ने एक दिन रवि को एक फॉर्म दिया तथा उसे भरकर यथोचित कार्यालय में जमा करने के लिए बाध्य कर दिया। रवि किरण के आग्रह को ठुकरा नहीं सका और आखिर एक प्राइवेट फर्म में एकदिन सुरक्षा अधिकारी का पदभार ग्रहण करना ही पड़ा।

समय गतिशील है ,मानव का अपने आप को बदलकर नई परिस्थिति में समायोजित कर लेना ही भौतिक युग की प्रगतिशीलता कहलाती है। प्राकृतिक पर्यावरण का मानविक समन्वय ही उसकी परिवर्तनशीलता है। लेकिन सबसे सर्वोपरि समय का वह मरहम है जो मानसिक और भौतिक घावों को कुरेदते हुए भी भरता रहता है। .

  वही मरहम किरण और रवि के भी घावों को भर दिया। रवि फिर से खुश रहकर कार्यरत रहने की कोशिश करने लगा। अब वह अक्सर किरण से मिलकर उसके दुःखों को अपने सुखो की अनुभूति में बदलने, तथा अपने सुखों के क्षणों को किरण के साथ बाटने की कोशिश करने लगा। ——————-

 आज रवि के फर्म में फिर से एक और भव्य पार्टी का आयोजन किया गया है। उसके जी एम ने उसे सस्नेह किरण के साथ पार्टी में आमंत्रित किया है। यदि वह नहीं जायेगा तो फर्म में कभी कोई समारोह ही नहीं आयोजित किया जायेगा। अतएव रवि मजबूर होकर किरण को बुलाने उसके घर जा रहा है। पर उसकी समझ में ये नहीं आ रहा है कि वह किरण को पार्टी के लिए कैसे कहे। पता नहीं वो सुन सकेगी भी या नहीं। उसे तो पार्टी फोबिआ हो गया है , वह कैसे आग्रह कर पायेगा —

 वह अपने मनःस्थिति को कैसे व्यक्त करे —-

 यही सोचते सोचते वह किरण के डेरे वाले चौराहे पर पहुंच गया। रवि को अपने दरवाजे पर देखकर किरण अपने नयनों पर विस्वाश ही नहीं कर पा रही थी, उसकी  समझ  नहीं आ रहा था कि वह रवि का स्वागत कैसे करे।  आज प्रथम बार कोई पुरुष जीवन में स्नेहिल और मधुर मिलन की उत्कंठा लिए उसके द्वार आया है।

 किरण ने मन में खिले उठे स्नेहिल पुष्पों को रवि के चरणों में अर्पित कर अपने आप को कृतज्ञ कर लिया। चंद क्षणों के वार्तालाप के बाद रवि ने हिम्मत जुटा कर आमंत्रण पत्र किरण को दिखाया। परन्तु किरण आज व्याकुल नहीं हुई अपितु —–

 रवि उसे लेकर अपने घर आया। किरण ने रवि के छोटे से कमरे को देखा जहाँ एक टिमटिमाता हुआ दीप जल रहा था। कुछ धुंधली तस्वीरें एवं कुछ अधमिटी कवितायेँ दीवाल पर लटक रही थी, ऐसा देख किरण का हृदयोदधि अनायास ही छलक उठा। उसे लगा कि रवि शेष जीवन भी जीना चाहता है,बशर्ते उसकी भावनाओं को कोई समझ सके। उसे अपनेपन का अहसास तथा विश्वास करा सके।

  रवि अब तक नहा -धो निवृत्त होकर किचन में घुसा ही था कि किरण ने उसके हाथ से गैस का लाइटर छीन लिया और बोल उठी ,” वर्षों से ये हाथ सुमधुर भावों से किसी को एक गिलास जल देने को  तरस गए हैं ,अपनों के लिए चूल्हा जलाने को सदैव ही लालायित रहते हैं परन्तु भाग्य में चूल्हा जलाना तो नहीं ,पर आत्मा जलाने से कोई ना रोक सका। रवि आज इन हाथों से  चाय का प्याला तो दे लेने दो फिर कभी अवसर ——“

 रवि”गेंद ” शीर्षक कविता का अगली पंक्तियाँ अनायास ही कह उठा –

               “कभी कर्म लात मारता है

               अपनी बाजी जीतने के लिए ,

               कभी प्रारब्ध जोर की जमाता है

               अपना अस्तित्व दिखाने के लिए “

               +       +      +    +    +

रवि और किरण एक बार फिर से भव्य पार्टी के समारोह में चेतनता के आँचल में सिमटे  हुए  अचेतन मन से शामिल हुए।  समारोह उद्घाटन के पश्चात् विशेष आयोजन के घोषणा हेतु जी एम् साहब को स्टेज पर आमंत्रित किया गया। समारोह सम्बोधन करते हुए जी एम के इस वाक्य ने रवि और किरण के पाँव के नीचे की धरती ही खिसका दी ,”रवि और किरण की सगाई की रश्में पूरी  की जाय तथा किरण को कंपनी के नियुक्ति पत्र के साथ, सुबह के रवि की नयी किरणों में लेबर वेलफेयर अफसर के पदभार की जिम्मेदारी सौंपी जाती है।

   सारा वातावरण तालियों के गड़गड़ाहट से गूंज उठा। लोग रस रंजित होकर एक दूसरे पर प्रेम वृष्टि  करने लगे। बड़ी रात गए तक समारोह चलता रहा—–

सुबह का रवि पुनः अपने आलोक को अवनि तल पर पसारने लगा और सुबह पांचेक बजे नींद खुली, फ़िल्टर कॉफ़ी माइक्रो कर जब बालकनी में आया , अद्भुत नज़ारा था..सामने वाले पार्क से आता कलरव आस बंधा गया!

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