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पूरब की खिड़की

गायत्री की आँखों से नींद कोसो दूर थी या शायद वह सोना ही नहीं चाह रही थी। बिस्तर के इस कोने से उस कोने तक नजर दौड़ाई। जिन्दगी में मसरूफियत इस तरह काबिज रही कि इतना सा खालीपन भी सच खल रहा था।

” कहीं ये मेरा आवेश में लिया कदम ना साबित हो जाए। सो जा गायत्री! कल सोचेंगे ” अपने आप में बड़बड़ाते हुए हाथ मोबाइल की तरफ बढ़े फिर कुछ सोच कर हाथ खिंच लिया। उन्हहु…फोन ऑन नहीं करूंगी, कॉल्स की बाढ़ आ जाएगी। ताउम्र हर बात की जवाबदेही अपने सर लेने की आदत जो डाल रखी थी। उम्र के पचासवें साल में आते – आते दूसरों की इच्छानुसार कितने जन्म जी चुकी होती है एक औरत! आज एक अवतार अपने हिसाब से क्या तय किया सबके अंदर उथल पुथल मची हुई थी।
बिस्तर पर लेटे हुए उपर घूमते पंखे के साथ अब तक बिताई सारी रातें आँखों के सामने बूमरैंग जैसी चल रही थी। सबकी जरूरत का ख्याल रखते हुए बिताया गया दिन और बिस्तर तक आते आते भी दूध देना, दरवाज़े को लॉक चेक करना, सुबह के नाश्ते की तैयारी पूरी करना, अलार्म लगना और इन सब कामों का डबल चेक करना। तमन्नाएं धरी रह गई थी चाँदनी रातों में कविता सृजन करने की या बस अपने पसन्दीदा लैंप शेड के नीचे कोई किताब पढ़ते हुए आँख लग जाये। साहब को रोशनी में नींद नहीं आती थी। मोटे पर्दों से कमरे को अंधेरे में धकेलना होता था।
आज पर्दे खुले थे, किताब भी थी पर ना कविता का सृजन हो रहा था ना किताब पढ़ी जा रही थी। विचारो की आँधी में कब आँख लग आई पता नहीं चला।
अलार्म नहीं लगाने के बावजूद भी सुबह पांच बजे के करीब नींद अपनेआप ही खुल गई। फ्रेश होकर फ़िल्टर कॉफ़ी माइक्रो कर जब बालकनी में आई, अद्भुत नज़ारा था। इस तरह की सुबह जाने कब से देखना चाह रही थी। बादलों के श्याम रंग के बीच से पौ फट रही थी। अंधेरे को चीरती हुई उषा अपनी जगह बना रही थी और शायद कई जोड़े सपने उसी उम्मीद में बैठे थे। सामने वाले पार्क से आता कलरव आस बंधा गया! जागती आँखे सपने पूरा करती है। ये चहचहाहट… सबूत थी।
शहर से दूर ये हॉलीडे होम गायत्री के कहने पर वीरेंद्र जी ने लिया था पर उनकी व्यस्तता ऐसी रही कि यदा कदा ही यहाँ आएँ हो। बच्चे आते थे दोस्तों के साथ। छुट्टियों में दोस्त रिश्तेदार भी ठहरते थे। कॉफी खत्म होते ही उसने मन के घोड़ों ने फिर दौड़ना शुरू कर दिया था। मोबाइल उठाया तो कई मैसेज आए पड़े थे। शायद उसने सबकी पिछली रात की नींद खराब कर दी थी। ओठों पर हल्की मुस्कान तैर गई। जैसे कोई हमेशा चुप रहने वाला बच्चा एक दिन खिलौनों की जिद कर बैठे तो सब सोच में पड़ जाते हैं कि इसे खिलौनों की जरूरत ही क्या है?
“ओहो! सबके मैसेज है पर वीरेंद्र जी का नहीं… क्या फर्क़ पड़ता है मुझे, मैं कौन सा इन्तेज़ार कर रही हूँ ”
गायत्री ने फिर फोन को अनमने मन से दूर कर दिया। यूँ अचानक वीरेंद्र जी फिक्र करने लगेंगे इसकी उम्मीद तो वैसे भी नहीं थी पर उनकी तरफ से गुस्सा या नाराजगी भी नहीं आई ये अचरज की बात थी उसके लिए।
पचपन साल की उम्र में नौकरी पूरी कर वीरेंद्र जी ने कल ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी। चहकते हुए घर आए थे।
” गायू! पार्टी की अरेंजमेंट करो… अब आपके साहब काम से छुट्टी लेकर बाकी की जिंदगी आराम मे बिताएंगे। भई नन्ही सी उम्र में शादी – बच्चे हो गए और अब सेटल भी। अब मैं दोस्तों के साथ मटरगश्ती करूँगा।”
गायत्री सिर्फ मुस्कुरा कर रह गई। वाह! चुनने की आजादी तो थी कम से कम वीरेंद्र जी को, कब तक करना है और कब सब छोड़ देना है।
” गायू! बताओ क्या चाहिये तुम्हें? शॉपिंग जाओ और अपने पसंद की साड़ी लो, पार्टी के लिए अपनी सहेलियों को भी बुला लेना “
” मेरी सहेलियाँ!” कहकर गायत्री हँस पड़ी। हँसते हुए जमीन पर बैठ गई।
सब उसे घूरने लगे। जैसे कोई बावरा बिना वजह हँस रहा हो। बेटी, बड़ी बहू, छोटा बेटा, वीरेन्द्र जी सब घूर रहे थे।
” मम्मा! व्हाट हैपन?”
छोटे बेटे के कहने पर गायत्री ने खुद को सम्भाला और सोफ़े पर बैठ गई।
” आई एम फाइन बेटा”
” गायू! कोई बात है जो कहना चाहती हो?” वीरेंद्र का लहजा गम्भीर हो चला था।
” क्या आप सच में सुनना चाहते है? क्या आप सच में इस खुशी के मौके पर मुझे कुछ देना चाहते हैं?”
” हाँ बाबा! बोलो तो सही!”
” ठीक है! मुझे भी रिटायर्मेंट चाहिए ” सबकी आँखे चौड़ी हो आई थी।
” क्या हुआ? सब चुप? ” गायत्री ने सन्नाटे में विघ्न डाला।
” तुम कैसे रिटायर्मेंट… मेरा मतलब किससे रिटायर्मेंट चाहिए? ” वीरेंद्र के सवाल पर गायत्री के चेहरे पर दृढ़ भाव उभरे।
” आपके इस सवाल ने मेरा इरादा और दृढ़ कर दिया है। रही बात ‘किससे रिटायर्मेंट’ तो वही जिससे आपने लिया… रोजमर्रा के काम। अब आपके टिफिन की तैयारी से लेकर शर्ट के कलर, इस्त्री वगैरह की टेंशन तो खत्म ही हुई तो मैं भी आपकी तरह अपने अधूरी ख्वाहिशें पूरी कर लूँ “
” कौन सी अधूरी ख्वाहिशें गायू? तुम्हारे बिटिया की शादी हो गई वो अपने पैरों पर भी खड़ी है… बड़ा बेटा सेटेल है, बहू आ गई है… छोटा बेटा सफ़लता की राह पर है और क्या रह गया? “
” ये सारी मेरी इच्छायें थी ये आपसे किसने कह दिया? जैसे आप बाहर देख रहे थे व्यवस्थायें मैं घर पर देख रही थी, आपने इसे मेरी इच्छा घोषित कर दिया! मैं अब इस काम से छुट्टी चाहती हूँ “
” छुट्टी ले कर कहाँ जाओगी और क्या करोगी? “
” अरे! मेरा हॉलीडे होम है, वहाँ जाऊँगी… कविताएं लिखूँगी “
” तुम कविताएं भी लिखती हो? “
गायत्री कुछ और पूछना नहीं चाहती थी कि मैंने कई बार सुनाना चाहा पर इन ‘फालतू’ की चीजों के लिए आपके पास वक्त नहीं था। वह नहीं पूछना चाहती थी कि उन लोगों की बीमारियों, पढ़ाई आदि की वजह से उसने कई बार अपने घूमने जाने का प्लान कैंसल किया। उसे कोई बहस नहीं चाहिए थी। अपना सामान बाँध वो तैयार हो गई।
” ये सब काम तुम यहाँ रह कर भी कर सकती हो… समाज को तमाशा दिखाने की क्या जरूरत है? यार तुम मेरी खुशियाँ यूँ बर्बाद ना करो प्लीज… सब सोचेंगे मैंने तुम्हें इस उम्र में कोई तकलीफ दी है, ठंडे दिमाग से सोचो “
गायत्री ने कुछ बहस नहीं की और बैग पैक करना शुरू कर दिया।
गायत्री को खुद पता नहीं था वो ऐसा क्यों कर रही है, अचानक ऐसा क्या हो गया जो वह इतना बेचैन हो उठी पर जिंदगी में पहली बार उसने दिल की सुनना मंजूर किया। अपने द्वारा किए सारे कामों का वो हिसाब भी नहीं देना चाहती थी क्योंकि किसी ने कभी कोई जोर ज़बर्दस्ती नहीं की थी। वह स्वयं ही स्वयं का संशोधन करती आई थी दूसरों के हिसाब से।
फोन की घंटी ने गायत्री का ध्यान फिर आकर्षित किया। बेटी का फोन था। अनायास ही आँखों में आँसू आ गए। बच्चे नाहक परेशान हो गए होंगे।
” क्या हुआ ग्रीष्मा?”
” मम्मा क्या है ये सब बचपना? मुझे समझाते आए हो आप हमेशा एडजस्ट करो, दूसरो के बारे में भी सोचो… आप हमेशा ऐसी ही थी फिर आज अचानक ये सब क्या है?” ,उसकी आवाज़ में दर्द साफ था।
” अचानक कुछ भी नहीं होता ग्रीष्मा! सब धीरे धीरे जमा होता है… मुझे नहीं पता क्या हो रहा है बस मुझे वक्त चाहिए ये सब समझने के लिए “
ग्रीष्मा ने समझाया और हार कर माँ पर छोड़ दिया। बहू का भी मैसेज आया कि आप जितना चाहे समय लीजिए, मैं साथ हूँ। पापा की टेंशन मत लीजिए हम सब है।
गायत्री का मन भर आया। कितना प्यारा परिवार मिला है। क्यों वो हमेशा कुछ अलग करने का सोचते हुए खुद के अंदर किसी कोने में कुछ बचा कर रखती आई थी? आम लोगों से आम क्यों नहीं रह गई? कुछ खास पाना क्या इतना जरूरी था कि आज अंदर एक खाई पट गई थी!
फोन पर मैसेज की आवाज आते ही उसने देखा वीरेंद्र जी का मैसेज।
” पता नहीं मैं तुम्हें रोक क्यों नहीं पाया?”
” सवाल खुद से करने थे, तुमसे नहीं!”
” कॉल करने की भी हिम्मत नहीं, कभी सोचा ही नहीं कि शब्द नहीं मिलेंगे मुझे”
” इतना बुद्धू हूँ कि अपनी गलतियों का हिसाब भी नहीं लगा पा रहा हूँ”
” अब तुमने बिगाड़ा है तो तुम्हीं सुधारो और अपने लायक बना लो, प्लीज “
” पक्का दोस्तों के साथ नहीं घूमूंगा “
” तुम किताब लिखना मैं कॉफी बनाऊँगा “
सारे मैसेजेस पढ़ते हुए गायत्री हँसते जा रही थी।
” आज पता चला कि बुद्धू हो? बुढ़ापे में? आप पार्टी की तैयारियाँ करो मैं आऊंगी जरूर ।थोड़ा वक्त चाहती हूँ बस। पृथ्वी सौरमंडल के बाहर कहाँ जाएगी? ध्यान रखना! “
मन की अधीरता शांत हो रही थी। गायत्री ने कॉफी मग को देखा। खाली दिख रहा था। उसने फैसला किया एक बार फिर उसे थोड़ी और गर्माहट के साथ भरने का। बालकनी में पूरी धूप खिल आई थी।

 

 

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