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आज़ादी की क़ीमत

 

रानी के पड़ोसी दूसरे शहर शिफ्ट हो रहे थे, जाते हुए उन्होंने अपना तोता रानी को दे दिया। पहले रानी को यह ज़िम्मेदारी कुछ कठिन लगी, लेकिन धीरे-धीरे यह साथ अज़ीज़ हो गया। तोते को वह मिठ्ठू नाम से पुकारती थी। एक दिन दफ्तर से घर आने पर मिठ्ठू उसे देख रानी….रानी कहकर नाचने लगा, तो रानी खुशी से जैसे आकाश में पहुँच गई। मिठ्ठू के पसंद का रानी भरपूर खयाल रखती। उसके पसंदीदा फल खास उसके लिए लाती।
ऑफिस से आकर वह और मिठ्ठू खूब खेला करते। मिठ्ठू को उसके कंधे पर बैठना बहुत भाता था। रोज़ सुबह जब रानी अलार्म बंद कर सोने की कोशिश करती, मिठ्ठू तब तक सुबह हो गई…..सुबह हो गई….. का रट लगाते रहता, जबतक वह जाग न जाती। कमरे में रखे इंडोर प्लांट में मिठ्ठू का छिपना और रानी का उसे खोजना, यह दोनों का पसंदीदा खेल था।
जबसे लॉक डॉउन लगा, दुनिया चारदीवारी में कैद हुई, मिठ्ठू से रानी की प्रगाढ़ता और गहरा गई। मिठ्ठू न होता तो इस अवसाद से भरे माहौल में अकेले बसर करना उसकेलिये असंभव था। नौकरी भी अधर में थी, तनख़्वाह मिलनी बंद हो गई और काम पर दुबारा बुलाएँगे भी या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है। मकान मालिक किराए में कोई कटौती नहीं कर रहा, बीमारी की वजह से पिता दो वर्षों से नौकरी नहीं कर रहे। उनकी दावा और घर का बाकी खर्चा सब जस का तस! कई बार सोचती है घर वापस चली जाए, लेकिन वहाँ जाकर नौकरी की उम्मीद शून्य ही हो जाएगी। फिर माता-पिता भी हक़ीकत जानकर बहुत व्यग्र हो जायेंगे।
वह लगातार पूछते हैं “बिटिया सब ठीक है ना, कोई परेशानी तो नहीं? ऑफिस वाले पैसे तो दे रहे हैं ना? पैसे की दिक्कत हो घर पर पैसे मत भेजो, हम मैनेज कर लेंगे।” लेकिन वह जानती है पापा मैनेज नहीं कर पाएंगे! सेविंग भी जीरो है, हमेशा दूसरों की तकलीफ़ के समय खड़े रहें। जिसने जब जितना माँगा, देने से पीछे नहीं हटे। और देकर फिर कभी माँगा भी नहीं। लेने वाले ने भी उपकार का आदर दिया और लौटने की जहमत नहीं की।
माता-पिता के सवालों पर वह हँस कर कहती “मेरे ऑफिस वाले बहुत उदार हैं, एक पैसा नहीं काट रहे। सब ठीक है, परेशानी की कोई बात ही नहीं। माहौल कुछ ठीक होगा तो घर आ जाऊँगी, यहाँ अकेले बिल्कुल मन नहीं लगता।” जरूरत और हालत व्यक्ति को वक्त के पहले ही परिपक्व बना देता है।

कभी उसके पिता जब अपने अभिभावक से अपनी आर्थिक स्तिथि के विषय में झूठी तसल्ली देते और कहते “सब ठीक है”, तब रानी अचरज से सोचती “ये बड़े लोग भी ना! कहते कुछ और करते कुछ और हैं, झूठ न बोलने की सीख देते हैं और ख़ुद तसल्ली से झूठ बोलते हैं।” आज वह समझ रही थी की हालत के हिसाब से कई बार झूठ सच से अधिक सच्चा हो जाता है। सब सोच कर वह वहीं दिल्ली में एक रूम के कमरे में सब ठीक होने की राह देख रही है। इस सबमें उसका साथी बस मिठ्ठू ही है।

घर में मिठ्ठू पिंजरे में नहीं रहता, बालकानी में ले जाते वक्त ही रानी उसे पिंजरे में डालती है। आज जाने कैसे बालकनी का दरवाज़ा खुला था, और मिठ्ठू पिंजरे के बाहर। रानी फ़ोन पर व्यस्त थी और देखते-देखते मिठ्ठू दरवाजे से होते हुए फुर्र हो गया। रानी घबरा कर भागी….”मिठ्ठू…. मिठ्ठू….!! रुको मिठ्ठू…..!!!” लेकिन मिठ्ठू के सामने खुला आसमान था, उसे रानी का स्वर कहाँ सुनाई देता!
रानी बालकनी से पुकारती रही, देर तक कभी प्यार से आवाज़ देती तो कभी गुस्से में डाँटती और धमकती रही, लेकिन मिठ्ठू वापस नहीं आया। बाहर निकलना मना है, फिर भी उसने मास्क पहना और बाहर निकल गई। सामने का पार्क जिस ओर मिठ्ठू उड़ा था, वहाँ जाकर पुकारने लगी। तभी पुलिस के दो कांस्टेबल ने आकर उसे घर से निकलने पर फटकर लगाई “बाहर क्यों निकली हैं? घर से बाहर निकलना खतरनाक है, पता नहीं क्या?”
“पता है… लेकिन मेरा मिठ्ठू…. अपने मिठ्ठू को खोजने आई हूँ!”
“मिठ्ठू….? कौन मिठ्ठू….??”
“मेरा तोता…”
“यहाँ इंसानों के जान पर आफ़त है, और आप तोते केलिए प्रोटोकॉल तोड़ रही हैं! चलिए जल्दी से घर जाइए। तोता था, उड़ गया। अब कहाँ मिलेगा?”
“नहीं सर…! थोड़ी देर खोज लेने दीजिए। वह हमेशा पिंजड़े में रहा है, बाहर के पंक्षी उसे मार डालेंगे। वह तो दाना भी नहीं चुग पाएगा…. सर प्लीज….!!”
“पाँच मिनट…. पाँच मिनट में खोजिए और जल्दी निकालिए। किसी ने देख लिया तो हमसे भी सवाल होंगे।”
रानी पाँच मिनट इधर-उधर तक बेतहाशा भागती-पुकारती रही, फिर थकी-हारी घर लौट आई। आज पूरे दिन उससे एक निवाला न खाया गया। इतना अकेलापन और सन्नाटा उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। रात देर तक माँ से फोन पर मिठ्ठू की बातें करती रही, माँ ने बहुत समझाया, अपनी कसम दी तब जाकर एक ब्रेड-बटर खा कर सो गई।
“सुबह पाँच बजे के करीब नींद खुली, फ़िल्टर कॉफ़ी माइक्रो कर जब बालकनी में आई, अद्भुत नज़ारा था…सामने वाले पार्क से आता कलरव आस बंधा गया!” पक्षियों की चहचहाट से माहौल संगीतमय हो रहा था। एक ओर से आती ताज़ी हवा के साथ घुली बेली के फूलों की महक हृदय तृप्त कर रही थी। रानी कुछ देर वहीं बालकनी में खड़ी रही, कॉफी खत्म हो चुकी थी आसमान के एक छोड़ से कुछ लालिमा बिखरने लगी। उसने आसमान की ओर देखा, इतना स्वच्छ और निर्मल जैसे कोई दर्पण हो! ओह..! हम क़ैद क्या हुए कुदरत इतनी खूबसूरत हो गई!!
आकाश साफ़ है, फूल महक रहे हैं, पक्षी जिन्हें देखना दुर्लभ था, वह सब चहक रहे हैं। वह पिछले चार वर्षों से दिल्ली के इसी इलाके में है, यह कलरव और रंग-बिरंगे पक्षियों का जत्था उसने पहली दफ़ा देखा। यहांँ तो गौरैया और कौवे भी कम नज़र आते, बस कबूतरों की भरमार है। शायद कबूतर ही हैं, जो मानवों की क्रूरता के हिसाब से स्वयं को ढ़ालने में सफ़ल रहे। शाखाएँ नहीं मिली तो बालकनी के घेरेदार जालियों पर बसेरा बना लिया, ए.सी. के बाहरी कंपार्टमेंट में बस गये, वह जूझ रहे हैं, शायद इसीलिए मानवों के जंगल में जीवित बचे हैं।
लेकिन इस कलरव के बीच रानी को जिस स्वर की तलाश थी, वह स्वर अब भी वह नहीं सुन पा रही थी। उससे रहा ने गया और वह वहीं से चीख उठी “मिठ्ठू….मिठ्ठू….! ओ मेरे प्यारे मिठ्ठू…..!! कहाँ हो तुम?” दो पल के मौन के बाद उसके पलकों से बंधे सब्र के दो मोती टूट कर बिखर गए। मिठ्ठू का कोई जवाब नहीं आया। वह फफक कर रोने लगी “इतने निर्मोही कैसे हो गए मिठ्ठू! कितना प्यार किया तुम्हें, तुम्हें रत्ती भर भी मान नहीं! कोरोना काल में घर से इतने दूर, सबसे अलग-थलग भी खुश थी की तुम थे, अब…..!!” वहीं बालकनी में लगे झूले पर बैठी वह नैपथ्य में देख रही थी, तभी जानी-पहचानी आवाज ने आकर्षित किया “रानी….! रानी….!!….रानी…!!!”
“मिठ्ठू….मेरा मिठ्ठू….!!!”
अहाते के सामने पेड़ की झुकी शाख पर उसका मिठ्ठू बैठा उसे पुकार रहा था।
“ओह मिठ्ठू! मैं जानती थी तुम मुझे छोड़ कर नहीं जा सकते।” कहते हुए उसने मिठ्ठू की ओर हाथ बढ़ाया, लेकिन मिठ्ठू अजनबी की तरह उड़ कर दूसरी शाख पर बैठ गया।
रानी ने महसूस किया मिठ्ठू अब वापस क़ैद में नहीं रहना चाहता। हाँ, लॉक डॉउन के छोटे से क़ैद ने रानी का मन भी तो तोड़ ही दिया ना! सुनसान सड़क, खामोश माहौल आस-पड़ोस भी अपने-आप में ही सिमटे, रानी को अक्सर लगता कि किसी ने उसे अंतरिक्ष में ले जाकर अकेले छोड़ दिया है, जहाँ चाँद-तारे सब हैं, लेकिन उसका कोई नहीं, उसके लिये कुछ नहीं। हफ्ते-दो-हफ्ते वेब सीरीज़, सिनेमा और टी.वी. पर रिपीट कार्यक्रम देखना सुकूनदायक था, लेकिन जल्द ही यह सब हद से ज्यादा उबाऊ हो गया।
न्यूज़ में भी महामारी की भयावह तस्वीर देख नींद उड़ जाती, इसलिए उसे देखना भी सेहत केलिए हानिकारक हो गया। फिर मिठ्ठू… वह तो शायद उड़ना सीखने के साथ ही पिंजरे में डाल दिया गया। विडियो कॉल पर वह सबसे मिल लेती है, बातें कर लेती है, फिर भी उनके स्पर्श को अधीर। कभी-कभी संदेह से भर जाती कि मनुष्य के स्पर्श का अनुभव ही न भूल जाए। ऐसे में मिठ्ठू को उसका क़ैद क्यों भाएगा? खुले आकाश में उड़ने वाले पंछी को कमरे में फुदक कर कैसे आनंद आएगा? वह भी तो उड़ गई थी एक दिन बिना किसी की परवाह किए, केवल अपनी उड़ान की चाह थी। मात-पिता सबको नाराज़ कर अकेली अंजान शहर को निकल गई थी।
उसके मना करने के बावजूद मात-पिता शादी की तैयारियों में लगे थे, अच्छा घर परिवार और लड़का सरकारी अफसर, लड़की के अभिभावक को इससे अधिक और क्या चाह होगी? लड़का विवाहोपरांत रानी की नौकरी केलिए मान भी गया था। उसने कहा था कि रानी घर के समीप के किसी स्कूल में अध्यापन का काम कर सकती है, जिससे परिवार की अपनी मुख्य जिम्मेदारी को निभाने में कोई दिक्कत न हो। लेकिन रानी के दिल में हूक सी थी कि शादी के पहले अपनी पहचान बनानी है। जिंदगी जीवनसाथी की आज्ञा से नहीं जीना था उसे, उसे कंधे से कंधा मिला कर यह सफ़र तय करना था, अपना और परिवार के फैसलों में निर्णायक ओहदा पक्की करना चाहती थी।
किसी की कृपा से नौकरी का एहसान नहीं चाहिए, उसे अपनी काबिलियत से अपनी इक्षित नौकरी करनी थी। सो शादी के शॉपिंग के बहाने फुर्र हो गई। पीछे छोड़ गई बस एक भावुक चिट्ठी। माँ-पापा ने समझा-बुझा कर वापस लाने की कितनी कोशिश की, कसमें दी, मिन्नतें किए, लेकिन वह दूर आज़ादी के शाख पर बैठी तटस्थ रही। पूरे दो साल माता-पिता ने सब नाते-रिश्ते तोड़े रखा। फिर बेटी जैसे-जैसे कामयाब होती गई, ओहदा और आय बढ़ता गया तो दिल की खाई भी ख़त्म हो गई। अब तो बेटी ही घर की रीढ़ है।
यदि उस दिन रानी ने वह उड़ान नहीं भरी होती तो आज अपने ही अभिभावक की देख-भाल केलिए किसी की अनुमति माँग रही होती। शिक्षिका की नौकरी से जो कुछ कमा पाती, उसे भी अपनी मर्जी से खर्चने का अधिकार यकीनन उसे नहीं होता। मायके के नाम पर खर्चने का अधिकार तो कतई नहीं! उसके एक उड़ान ने सब बदल दिया। अब घर में उसकी इक्षा का सम्मान है, विवाह की बात तो होती है, पर दबाव नहीं।

रानी अपने आज़ादी की यात्रा से मिठ्ठू के परवाज़ का मर्म टटोल रही थी। पहली बार उसे एहसास हुआ पराधीनता मानव ही नहीं प्रत्येक जीव को कचोटती है। पिंजरा चाहे सोने का हो, आकाश नहीं बन सकता।

यादों के कारवां में विचरते हुए भींगे पलकों से रानी मिठ्ठू को देख रही थी। वह “रानी…रानी..” कहता इस डाल से उस डाल फुदक रहा था। शायद वह भी रानी के प्यार को खोना नहीं चाहता, लेकिन आज़ादी… इसकी कीमत तो वही जान सकता है जिसने अपनी एक उम्र क़ैद में बिताई हो। वह रानी के स्नेह का गीत गाता रहेगा, लेकिन अब पिंजड़े में रहना उसे मंज़ूर नहीं।
“मिठ्ठू…!! मैं जानती हूँ तुम इस दहलीज़ के बाहर खुश हो। यही तुम्हारी असली दुनिया है। लेकिन तुम हमेशा क़ैद में रहे, अब तुम्हें हर चीज़ केलिए संघर्ष करना होगा, दाना-पानी, जीवन कुछ भी सहज नहीं मिलेगा, और मैं जानती हूँ तुम इस संघर्ष में जीतते रहोगे। बस एक बार यहीं इस शाख पर बैठ कर मुझसे मिल लिया करना। मैं उसी में खुश हूँ। वादा करती हूँ अब किसी पंक्षी को क़ैद न करूँगी… कभी नहीं!” रानी के आँखो से बहते आँसू दोस्त के बिछोह के थे या उसके आज़ाद होने की खुशी के नहीं मालूम, लेकिन मिठ्ठू ने उसकी आँखों को स्वतंत्रता के सुकून के दृश्य से विभोर कर दिया था।
वह रोज़ बालकनी में दाना-पानी रखने लगी। मिठ्ठू शायद पराधीनता के भय से वहाँ नहीं आता, लेकिन अन्य पक्षी आते हैं, चहचहाते हैं। पहले वह रानी को देखते ही उड़ जाया करते थे, लेकिन अब कुछ उसके हाथों पर बैठ जाते हैं, कुछ कँधे पर फुदकते हैं। ये दोस्त उसके जीवन का हिस्सा बन रहे हैं। देर सवेर महामारी की आपदा ख़त्म हो जाएगी, सबसे मिलना जुलना शुरू हो जाएगा फिलहाल दोस्ती ज़िंदाबाद!

 

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