Email: support@kalamanthan.in, editor@kalamanthan.in

अम्मा का विमान

बालपन में घटित एक दुःखद घटनकाल की सुखद अनुभूतियाँ, ये मेरे बालपन का संस्मरण है,जब मासूमियत दिल पे हावी होती है और ज़ुबाँ पे मिसरी।

बात तब की है जब हम बमुश्किल 11 साल के रहे होंगे।एक दिन स्कूल से लौट के आये….
तो पता चला कि हमारी अम्मा(दादी) स्वर्ग सिधार गयीं और छोड़ गई अपने पीछे एक स्वस्थ पति,चार बेटों और दो बेटियों के भरे पूरे परिवारों का बड़ा सा कुनबा।
अब उस ज़माने में बच्चे भगवान का प्रसाद समझे जाते थे,और बात अगर प्रसाद की हो तो भला एक कुल्हिया पंचामृत और एक दोना पंजीरी में किसका मन भरता है,गोया हमारे घर में भी पंजीरियों(लड़कियों)और पंचामृत(लड़कों)की एक पूरी फौज थी।
वो तो हमारे डैडी सबसे छोटे थे इसलिये दो में ही सिमट गए फिर भी हम दो भाई बहन के बाद दो किलो दूध के साथ मिलने वाले घाते की तरह हमारी बहन आ गई जिस वजह से आज भी हम उसे चिढ़ाते हैं।
अब जब बच्चे इतने होंगे तो नाम भी राइमिंग वर्ड्स की तरह होते थे। लड़कों के पप्पू,सप्पू,गप्पू,अप्पू आदि और लड़कियाँ रीना,सीमा,बीना,मीना इत्यादि।वो तो गनीमत हुआ कि हम तक आते आते श्रृंखला टूटी वरना हम भी आज नगीना बने होते।
तो फिलहाल अम्मा विमान पे लेट अपनी अनंत यात्रा को निकल ली थीं।सभी ने(रोने का)अपना अपना फर्ज अदा किया,चूंकि अम्मा काफ़ी ऐटिट्यूड वाली थीं और बहुओं को हमेशा सेकंड क्लास सिटिज़न समझती थीं तो बहुओं ने भी वैसे ही फॉर्मेलिटी की।
अम्मा के विमान के गली से मुड़ते ही इतनी देर से सुषुप्तावस्था में दबी हम बच्चों की भूख की चिंगारी भड़क गई।इसी बीच कोई दयालु पड़ोसी आलू पूरी अपने घर से बना के दे गया,जो हम भूखे बंगालियों के लिए सत्यनारायण के प्रसाद के जैसा था।
जब तक हम उस तक पहुँचते, हमारी छोटी बुआ ने हाँथ बढ़ाया, जिन्होंने,मेरी मम्मी के अनुसार “गीता” आत्मसात कर रखी थी कारण….उनमें लगाव का सर्वथा अभाव था।
तो बुआ जी ने पूरी का पैकेट खोलने के लिए जैसे ही हाँथ बढ़ाया,मेरी ताईजी (अम्मा के जाते ही उनकी लाडली से)आँखें तरेर के बोली,”तुम भी छोटी,कम से कम नहा तो लो।”
इस पर वो बोलीं, “अरे भाईजी(भाभीजी का विकृत रूप)क्या फर्क पड़ता है,कल से कुछ नहीं खाया।”पर वो तो बुआ थीं उनसे भला कोई क्या बहस करता, पर हम बच्चों को तो घुड़की दे कर नहला दिया गया।
जब तक नहा धोकर आते रिश्तेदारों के घरों से खाने के टिफ़िन(आलू पूरी) आ चुके थे और हम सब बच्चे उन्हें भूखे बंगाली जैसे निहार रहे थे।
फैमिली प्लानिंग की अहमियत हमारे बड़ों को तब समझ में आ रही होगी जब उनके लिए एक निवाला न बचा सब बच्चों में ही बंट गया।
ख़ैर जैसे तैसे 2-3 दिन रिश्तेदारों और कुछ पड़ोसियों ने खाना भेज पर इतनी बड़ी फ़ौज से लड़ न पाए और हथियार डाल दिये।
उस पर अत्याचार ये की tv भी बंद 13 दिन के लिए।ऐसे में गरुण पुराण सुनना और भी डरावना लगता था।रात में बुरे बुरे सपने आने लगे के हमे कढ़ाही में तला जा रहा है।
जैसे तैसे दसवें का दिन आया और खाना बनाया गया,साथ में दही बड़े भी बनेंगे ये सोचकर हमारे मुँह में पानी आ गया।
उस दिन पेट भर सारे बच्चों ने खाया पर ये नहीं पता था कि बचा हुआ खाना फेंक दिया जाता है तो जब दही बड़े फ़िके तो बहुत दुख हुआ।
इन सब कार्यक्रमों के बीच घर की औरतों की पंचायत भी चलती रहती थी जिससे यूँ तो हम बच्चों का कोई लेना देना नहीं था पर कान ज़रूर लगे रहते थे।
पर मज़ेदार बात ये थी कि हम बच्चों को गर्मी की छुट्टियों वाली फीलिंग आ रही थी।सारे बच्चे इकट्ठा थे और दिन भर धमाल भला और क्या चाहिए।
खैर फिर आया तेरहवीं का दिन, सुबह से ही हलवाई लग गया और तरह तरह के व्यंजन बनने लगे।शाम तक काफ़ी लोग आ गए और बहुत वृहद तरीके से तेहरवीं मनी।
ऐसे में एक सज्जन बाबा जी से बोल उठे क्या शानदार इंतेज़ाम है,भई वाह, इससे पहले कि बाबा जी कुछ जवाब देते हमारी छोटी बहनें(ताई की बेटियां) एक साथ बोल उठीं,
“हमारे बाबा जी का मुंडन हुआ है न इसीलिए दावत दी गयी है।”ताईजी घुड़की देकर उनको वहां से ले गईं पर माहौल ग़मगीन से खुशनुमा हो चला था।
आख़िरकार विदाई की बेला भी आ ही गई, इतने दिनों से पूरा कुनबा इकट्ठा था हम बच्चों के लिए तो जैसे स्वर्णिम अवसर था खूब धमाल मचाया।
अब सब अपने अपने घरों को प्रस्थान कर रहे थे,सबसे ज़्यादा उदास हम बच्चे थे,चलते समय हमारी सबसे बड़ी दीदी जो अपनी ससुराल जा रही थीं कुछ ज़्यादा ही भावुक हो बोलीं,”पता नहीं अब कब मिलना होगा??”सब रो रहे थे पर बाबा जी के ऊपर एक वज्राघात होना बाकी था।
कोई और कुछ बोलता इससे पहले ही मेरी 4 वर्षीय छोटी बहन तपाक से बोल पड़ी,”अरे जब बाबा जी अबकी बार विमान में जाएंगे तब हम फिर से मिलेंगे,बड़ा मजा आएगा।”
सबके चेहरों पर सन्नाटा और बाबा जी…..शायद उनको अपना विमान आसमान से आता साफ़ नज़र आ रहा था!!

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।हमें फोलो करे Facebook

Pic credit still from Ram Prasad Ki Tehravi

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

कठपुतली

  रविवार के दिन था । रोज़ की तरह महेन्द्र जी चाय की चुस्कियों के बीच अख़बार पढ़ने में तल्लीन थे । तभी उनकी नन्हीं...

डोमिन

भारत में गंगा नदी जीवन रेखा है।जाने कितनी ही सभ्यताएं इसके दो किनारों पर पली, आगे बढ़ी मिटी  और फिर नए सिरे से बढ़ने...

कोई मेरे जैसी …

उस पार, कोई मेरे जैसी, आँख मिचौली खेलती अपने आप से, खुद को समझाती, सपनों को पूछती क्या तुम कभी सच होते हो या बाकी सब की तरह तुम...

जून माह लेखन प्रतियोगिता

क्या लेखन आपकी कल्पना की अभूतपूर्व उड़ान है ? क्या कहानियां एवं कथा साहित्य आपकी रूचि है ? क्या दूसरों की लिखी कहानियों को पढ़ आपको...

Recent Comments

Kiran Shukla on आशियाना
Kiran Shukla on आशियाना