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सूर्यबाला जी – सहज भाषा, सरल कहानियाँ

 अत्यंत शांत व सौम्य व्यक्तित्व की स्वामिनी परम आदरणीया सूर्यबाला जी का जन्म एक कायस्थ परिवार में 25 अक्टूबर 1944 को वाराणसी में हुआ। इनका पूरा नाम सूर्यबाला वीरप्रतापसिंह श्रीवास्तव है।

सूर्यबाला जी की माँ का नाम स्व. श्रीमती केशरकुमारी और पिता का नाम स्व. श्री वीरप्रतापसिंह श्रीवास्तव था। उनके माता-पिता दोनों शिक्षित तथाहिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी भाषा के ज्ञाता थे।
अपने जन्मस्थान वाराणसी से सूर्यबाला जी को बेहद लगाव है और अनेक यादें भी जुड़ी हैं। वाराणसी की गलियों, मोहल्लों का वर्णन उन्होंने अपनी कई कहानियों में भी किया है।
उनका विवाह मरीन इंजीनियर श्री आर. के. लाल जी के साथ हुआ । दो बेटों व एक बेटी के साथ सूर्यबाला जी का भरा पूरा परिवार है ।
डॉ. सूर्यबाला जी ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के बड़े विद्वान तथा समीक्षक डॉ. बच्चन सिंह के निर्देशन में अपना शोध कार्य पूर्ण किया ।
कार्यक्षेत्र- कार्य का प्रारंभ आर्य महिला विद्यालय में अध्यापन से। १९७२ में पहली कहानी सारिका में प्रकाशित। १९७५ में बंबई आने के बाद लेखन में विशेष प्रगति। १९७५ में प्रकाशित पहला उपन्यास मेरे संधिपत्र विशेष रूप से चर्चित रहा है ।
डॉ. सूर्यबाला ने अभी तक १५० से अधिक कहानियाँ, उपन्यास, व हास्य व्यंग्य लिखे हैं। इनमें से अधिकांश हिंदी की प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। कई आकाशवाणी व दूरदर्शन पर प्रसारित हुए हैं और अनेकों का देश विदेश की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है।
देश विदेश के अनेक रेडियो व टीवी चैनलों से उन्होंने अपनी रचनाओं का पाठ किया है और अनेक रचनाएँ कक्षा आठ से लेकर स्नातक व स्नातकोत्तर स्तर तक के पाठ्यक्रमों में शामिल हैं। समकालीन कथा साहित्य में सूर्यबाला का लेखन अपनी विशिष्ट भूमिका और महत्त्व रखता है। समाज, जीवन, परम्परा , आधुनिकता एवं उससे जुड़ी समस्याओं को सूर्यबाला एक मुक्त और नितांत अपनी दृष्टि से देखने का प्रयास करती हैं। उसमें न अंध श्रद्धा है न एकांगी विद्रोह।
प्रमुख कृतियाँ –  उपन्यासः ‘कौन देस को वासी, वेणु की डायरी ‘ ‘मेरे संधि पत्र’, ‘सुबह के इंतज़ार तक’, ‘अग्निपंखी’, ‘यामिनी-कथा’, ‘दीक्षांत ‘
कहानी संग्रहः ‘एक इंद्रधनुष’, ‘दिशाहीन’, ‘थाली भर चाँद’, ‘मुँडेर पर’, ‘गृह-प्रवेश’, ‘सांझवाती’, ‘कात्यायनी संवाद’, ‘इक्कीस कहानियाँ’, पाँच लंबी कहानियाँ, सिस्टर प्लीज आप जाना नहीं, मानुषगंध, वेणु का नया घर, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’, ‘सूर्यबाला की प्रेम कहानियाँ’, ‘इक्कीस श्रेष्ठ कहानियाँ’, ‘समग्र कहानियाँ’ आदि।
व्यंग्यः ‘अजगर करे न चाकरी’, ‘धृतराष्ट्र टाइम्स’, ‘देशसेवा के अखाड़े में’, ‘भगवान ने कहा था’, ‘झगड़ा निपटारक दफ़तर’, ।

एक स्त्री के कारनामे वे ज़री के फूल, सुनंदा छोकरी की डायरी , पिंजरों से बाहर आदि कहानियाँ पाठको द्वारा बहुत पसंद की गयी।

दूरदर्शन धारावाहिक: ‘पलाश के फूल’, ‘न, किन्नी न’, ‘सौदागर दुआओं के’, ‘एक इंद्रधनुष जुबेदा के नाम’, ‘सबको पता हैं’, ‘रेस’ तथा’ निर्वासित’ आदि प्रमुख हैं। सज़ायाफ्ता कहानी पर बनी टेलीफ़िल्म पुरस्कृत।

सम्मान-पुरस्कार:

उपन्यास “कौन देस को वासी, वेणु की डायरी” के लिए प्रतिष्ठित भारत भारती सम्मान,
साहित्य में योगदान के लिए प्रियदर्शिनी पुरस्कार,घनश्याम दास सराफ़ पुरस्कार, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, काशी नागरी प्रचारिणी सभा, सतपुड़ा लोक संस्कृति परिषद, अभियान, मुंबई विद्यापीठ, व्यंग्य-श्री पुरस्कार,रत्नीदेवी गोयनका वाग्देवी पुरस्कार,राजस्थान लेखिका मंच वाग्मणि सम्मान,
आजीवन उपलब्धि सम्मान, हरिशंकर परसाईं स्मृति सम्मान,अभियान, आरोही, अखिल भारतीय कायस्थ महासभा, आदि संस्थाओं से सम्मानित किया गया है ।
आजकल सूर्यबाला जी महानगरी मुम्बई में ही रह रही हैं और साहित्य लेखन एवं कुशल गृहिणी के दायित्वों को बड़ी कुशलता से निभा रही हैं।
अपने ख़ाली समय में उन्हें टी.वी. देखना पसंद है। टी.वी. का डिस्कवरी चैनल बहुत पसंद है। जब भी उनके पास समय होता है वे ‘डिस्कवरी चैनल’ देखती हैं। नई नई बातों की जानकारी प्राप्त उन्हें बहुत पसंद है । इसके साथ ही उन्हें ठुमरी, ग़ज़ल, शास्त्रीय संगीत तथा पुराने हिन्दी फ़िल्मी गीत सुनना बहुत भाता है ।किताबें पढ़ना, नाटक देखना, शास्त्रीय नृत्य देखना भी उन्हें अति प्रिय है ।

 

 

 

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