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बनारस एक शहर ही नहीं है बल्कि यों कहिये भगवान भोलेनाथ और मां अन्नपूर्णा की प्राचीनतम नगरी है यह नगर हमेशा से एक विलक्षण स्थान रहा है। भगवान भोलेनाथ यूं तो संहार के देवता हैं लेकिन जैसा उनका नाम है वैसे ही बहुत भोले हैं बहुत जल्द प्रसन्न हो जाते हैं लेकिन जब बात न्याय की हो तो कठोर भी हो सकते है।
काशी का हर वासी उनकी शरण मे रहकर खुद को धन्य समझता है, उनके गणों के ही माफिक एक मस्ती मे मगन रहता है।
ये एक पुराना शहर  ज़रूर है लेकिन जैसे ये सृष्टी अनवरत्‌ चल रही है, मां गंगा की धारा अनवरत्‌ बह रही है।उसी तरह संसार मे निरंतर परिवर्तन होता रहता है। समय गतिशील है बस बदलता रहता है। समय के बदलाव से ये शहर भी अछूता नहीं है बनारस को भी बदलाव की हवा लग रही है।
आज अरसे बाद कुछ लिखने का मन हो आया है। आज मैं अपनी बिटिया के लिये कहानी लिखने जा रही हूं। कभी कभी किसी एक इंसान का किया पीढ़ी दर पीढ़ी असर करता है।
आज बद्लाव का अर्थ आदमी कै शौक की बात कर रही हूँ। रुद्र से सुना था हमारे ससुर जी यानी बिलास बाबू  काफी रंगीन मिजाज़ थे, जैसा की रईसों के शौक हुआ करते थे पुरानी ज़मिंदारी लम्बी जायदाद के चलते कोई अभाव नही था तो बस वो गैर वाजिब शौक से अछूते न रहे। उस बड़ी सी हवेली का एक हिस्सा ऐसा था जहां हमारी सासुमा का जाना वर्जित था। ख़ैर उन्हें कोई फर्क भी नही पड़ता था। मां हिसाब किताब मे बड़ी पारंगत थीं, सारे ज़मीन जायदाद कागज पत्र की देखभाल मे वे निपुण थीं। कुल मिलाकर सारे रुपये पैसे पर उनका एकाधिकार था मगर उनका एक परम विश्वास था कि पति परमेश्वर होता है और वो अपने परमेश्वर  की अंधभक्त थी, एक पत्नी इतनी भक्ति करे की हवेली के दुसरे सिरे पर रहने वाली अपनी सौत यानी विद्या को भी खुले दिल से स्वीकार कर ले तो भला ऐसी भक्ति पर क्या ही कहा जाये।
उनकी दिनचर्या में उनकी पति भक्ति, तथाकथित ज़मिंदारी के काम काज देखना, मुनीमजी से हिसाब लेना और नियमतह शाम को गंगा आरती मे शामिल होना था।
दोपहर को वो बड़े चाव से ससुर जी के लिये भोजन बनाती, विधिवत परोसती, और वो भी मुस्कुराते हुए खाते, हाथ धोकर उनके आंचल से हाथ पोंछ कर, माँ के पानदान से एक बीड़ा पान मुँह मे दबाकर हवेली के दूसरे हिस्से मे चले जाते और फिर अगली सुबह ही उनके दर्शन होते।
सासु मां कि सबसे बड़ी कमजोरी या ताकत जो कहे थे हमारे पति यानी के खानदान के चश्मोचिराग रुद्र थे!
रुद्र मात्र दस बरस की आयु से  नैनीताल के हॉस्टल मे रहकर पढ़ाई कर रहे थे और साल मे जब दो महीने की छुट्टी मे जब घर आते तो सासू मां घर का हुलिया बदल देती थी। उस समय के दौरान ससुजी भी घर के काम मे पूरी दिलचस्पी दिखाते अपना प्यार अपने बेटे पर जी खोलकर लुटाते थे। उस समय हवेली के दुसरे सिरे की ओर देखते भी नही थे।
वक़्त गुजरा और रुद्र नैनिताल के होस्तल से निकल दिल्ली के एंजेनियरिंग कालेज मे आ गये। अब रुद्र के बारे मे क्या बताऊं रुद्र बचपन से बेहद शांत काफी अनुशासन प्रिय थे लेकिन संगीत रुद्र की कमजोरी था शायद होस्टल के अकेलेपन का साथी संगीत बन गया था।
आप पूछेंगे मैं कौन तो  मैं अपना परिचय दे दूं। मैं रुद्र की पत्नी ! नहीं अधूरी पत्नी उमा !
बनारस शहर के नज़दीकी कस्बे मे मेरा घर था, अच्छा खाता पीता घर था हमारा और मेरी मां सासुमां की मुह्बोली बहन थी| तीज त्योहार पर रुद्र के घर आना जाना होता था। मैं अपने कॉलेज के आखिरी साल मे थी।दिल्ली आने के बाद से रुद्र बनारस मे वसंत पंचमी को आयोजित होने वाली संगीत संध्या मे ज़रूर शामिल होता था। उसके पिता जी एक मोटी रकम संगीत विद्यालय को दान मे देते थे। मैं भी संगीत की शौकीन थी माना रुद्र जितनी नही लेकिन संगीत संध्या मे भाग ज़रूर लेती और हर बरस वहा रुद्र से मेरी मुलाकात ज़रूर होती।
रुद्र के घर हमारा बचपन से आना जाना था और सासु मां कों हमेशा से मुझसे खासा स्नेह था। मेरे इक्कीसवें बरस के होते होते उन्होंने मा पिता जी से रुद्र के लिये मेरा हाथ मांग लिया था।जिसे मेरे परिवार ने सहर्ष स्वीकार कर लिया था। धीरे ही सही लेकिन उस कच्ची उम्र के मेरे सलोने ख्वाब अब रुद्र से जुड़ने लगा थे। और ये ठीक भी था एक शहर के दो संपन्न परिवारों के बीच ये सम्बन्ध उचित भी था ।
मैं और रुद्र संगीत के शौक की वजह से और नज़दीक आ गये थे। रुद्र अपने नाम के अनुसार ही थे लम्बे ,बलिष्ठ
काले घुंगराले बाल,गेहुआ रंगे ,एक सधी हुई आवाज़ में बेहद शालीन बातचीत का तरीका | ज़माने के तौर तरीके के अनुरूप पहनावा किसी को भी अपने आकर्षण मे  बांध सकता था, तो ज़ाहिर सी बात है मैं उनके सम्मोहन से अछूती नही थी। मैं भीं कोई रुपसी मेनका तो नही थी लेकिन मेरी सासु
मां के अनुसार  मैं उन्हें माता अन्नपूर्णा सी लगती थी। उनकी नज़रो मे मेरी और रुद्र की जोड़ी संसार की महानतम जोड़ी यानी शिव पार्वती के समान थी।
रुद्र अब कलकत्ता में अच्छी नौकरी करने लगे थे।हमारे बड़ों ने इस सम्बन्ध को सामाजिक जामा पहनाने के लिए दिवाली के बाद बड़ी धूमधाम से हमारी सगाई कर दी। सगाई के एक रोज़ पहले अचानक रुद्र ने मुझे मिलने के लिये बुलाया।
 हम गंगा घाट पर शाम को मिले रुद्र ने एक बड़ी सी नाव हमारे लिये तय कर ली , हम दोनों आज पहली बार बिल्कुल अकेले  कहीं मिल रहे थे अब तक तो हमेशा घर या किसी कार्यक्रम मे ही मुलाकात हुई थी|मेरा तन मन एक नये रोमांच से भर उठा था लेकिन रुद्र आज कुछ ज्यादा ही शांत लगे। नाव धीरे धीरे बह रही थी शाम का धुंधलका गहरा हो रहा था| गंगा तट पर आरती शुरू हो गई थी गंगा के पानी मे झिलमिलाते दिये , नदी किनारे  जलते बल्ब की रोशनी की सुंदर परछाई  बहते पानी  की मोहकता को और बढ़ा रही थी|
मैं इस वातावरण मे मगन थी और चोर नज़रो से बार बार रुद्र का चेहरा देख रही थी, तभी रुद्र ने बोलना शुरु किया और अपने परिवार की सारी सच्चाइ मुझे बताई और कहा अब तुम मेरे परिवार का हिस्सा बनने जा रही हो , इस लिये परिवार का अतीत तुम्हे पता होना चाहिये।रुद्र ने हवेली के दूसरे हिस्से मे रह्ने वाली विद्या के बारे मे बताया।
फिर रुद्र ने बताया कि अब घर मे जमिदारी जैसा ज्यादा कुछ नही बचा है, खेती बाडी दूसरों के भरोसे है सो अनाज आता है और बनारस के बड़े से बाज़ार की बीस दुकानें अपनी है जहां से मोटी रकम किराये के तौर पर आती है।
मैं बिलकुल खामोशी से रुद्र की बाते सुन रही थी।तभी रुद्र ने बताया की आज उन्होंने हवेली की पूरी सफाई करवा दी है।  मेरी आंखों मे सवाल देख रुद्र बोले हवेली के उस हिस्से का कीचड़ आज उन्होंने  साफ कर दिया है उन्हे केवल पैसे चाहिये थे सो मुहमांगी रकम लेकर वे लोग दुसरे शहर चले गये है।
कुछ पल शांत रहकर रुद्र बोलेय्ह सच्चाई जानकर  तुम अब भी चाहो तो शादी से इंकार कर सकती हो। मैंने सीधे रुद्र की आंखों मे देखा और पूछा “अपने पिता की गलती की सजा मुझे दोगे क्या?
रुद्र ने धीरे से मेरे गालों पर अपनी हथेली फिराई और कहा मैं तुम्हे कोई दुख देने की सोच भी नही सकता बल्कि ये सोच रहा हू की “मेरी भोली सी उमा दुल्हन के लिबास मे कैसी लगेगी।”
मैं शर्मा कर पहली बार रुद्र के गले से लिपट गई, आज गंगा मां हम दोनों  के मिलन की साक्षी थीं। नाव पर बिल्कुल खामोशी थी, दूर गंगा आरती मैं बजने वाले शंख ढोल नगाडॊ की आवाज़ आ रही थी हम दोनो शायद मन ही मन सप्त्पदी की कसमें ले रहें थे। आसमान का चांद भी हमारा मिलन देख पूरी शिद्दत दे चमक  कर अपनी खुशी ज़ाहिर कर रहा था।
हम वापस लौट कर आये रुद्र ने मुझे घर छोड़ा। मैं अपने प्रथम मिलन की खुमारी लिये घर तो आ गई लेकिन अब मेरा मन पूरी तरह रुद्र को समर्पित हो गया था ,रुद्र की निस्चल सच्चाई ने मुझे मोह लिया था ,आज रुद्र के लिये सिर्फ प्रेम नहीं बल्कि श्रद्धा मन मे बस गयी थी।होली के बाद हमारी शादी की तारीख निकली थी लेकिन अब उस दिन का इंतज़ार मुझें खलने लगा था । अगले रोज़ रुद्र कल्कत्ता चले गये थे।
वसंत पंचमी आने वाली थी बनारस मे होने वाली संगीत संध्या की तैयारियां जोर शोर से हो रही थी लेकिन मेरे लिये इतना काफी था की रुद्र इस कार्यक्रम मे शामिल होने आएंगे और हमारी एक और मुलाकात होगी।
बनारस मे संगीत भक्ति का ही दूसरा रूप है। यहां के कण कण मे संगीत बसा है।मंदिर मे गुंजते शंख घंटीयाँ भजन आरती शहर की जीवन रेखा गंगा की कल कल धारा एक अनुपम संगीत का निर्माण कर देती है ।ये मन मे एक प्रेम और संतोष का भाव जगाते है।
 
इधर कई बार मैं गंगा किनारे शाम को जाती और रुद्र के प्रेम या कहिये खयाल मे मगन रहती। कायक्रम के एक रोज़ पह्ले रुद्र अपने दफ्तर के वरिष्ट अधिकारी की किसी रिश्तेदार रागिनी के साथ आये |रुद्र ने बताया की रागिनी बहुत अच्छा गाती है और संगीत मे अपना भविष्य बनाना चाहती है, और अपने अधिकारी के कारण रुद्र उसकी मदद कर रहे है। रुद्र ने बताया था की उसकी आर्थिक स्थिती अच्छी नहीं है, इस लिये वो इस कार्यक्रम मे लाकर उसकी मदद कर रहे हैं।
वो शाम बेहद खास थी सगाई के बाद मैं पहली बार मिल रहे थे रुद्र ने मेरा परिचय अपनी मंगेतर के रूप मे रागिनी से करवाया। हम उस हाल की पहली पंक्ति मे बैठे थे। मैं रुद्र के साथ बैठी थी । रागिनी सचमुच बहुत मीठा गाती थी। एक ठुमरी मंच पर रागिनी गा रही थी ” कौन गली गये घनश्याम”….
सामने मंच पर संगीत, रुद्र का साथ एक माहौल बन गया था जो मन मे एक रुमानियत घोल रहा था। आज मैं रुद्र के साथ कहीं डिनर पर जाना चाहती थी। तभी गाना खत्म हुआ,सारा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। रुद्र को अगले रोज़ ही कल्कत्ता जाना था इसलिये रुद्र के साथ अकेले कहीं जाना सम्भव नहीं था। रागिनी और रुद्र ने मुझे घर छोड़ कर घर चले गये। मैं आज़ देर तक रुद्र के साथ समय बिताने का बहुत मन था लेकिन मैं मन मसोस कर घर वापस आ गयी थी।
लगभग दो महीने बचे थे हमारी शादी को ,दोनों घरों मे तैयारियां शुरू हो चुकी थीं। रुद्र के माता पिता ने पूरी हवेली को रंग रोगन करवा कर हवेली का हुलिया ही बदल दिया था। हर दिन किसी न किसी बहाने से मां मुझे बुला लेती हर बात मे मेरी पसंद पूछी जाती, मेरी राय ली जाती बस ऐसा लग रहा था मैं उनकी बहू बन चुकी हूं शादी की तो एक औपचारिकता ही बची थी। मां ने मेरी पसंद के ढेरों ज़ेवर सड़ियाँ खरीदी| उनकी खुशी छलकी पड़ती थी। आज उनके पति परमेश्वर भी हर काम मे उनके साथ खड़े थे।मां पिताजी की खुशी देखते लायक थी।मां कै लिये पिताजी का ये बद्ला रूप सुखद था। 
मेरे घर पर भी यही सब चल रहा था जैसे जैसे दिन नज़दीक आ रहे थे दोनो परिवारों में खु़शी और उत्साह बढ़ता जा रहा था।हम सब चाहते थे की रुद्र होली पर घर आ जाये लेकिन काम कि व्यस्तता से रुद्र को छुट्टी नहीं मिली होली के बीसवें दिन हमारी शादी थी। इधर रुद्र से फोन पर भी ज्यादा बात नही हो पा रही थी घर मे रिश्तेदारों का आना शुरू हो गया था।
होली के बाद एक रात रुद्र का फोन आया आया वो कुछ परेशान सा लग रहा था और मुझसे कहा ” उमा शादी से पहले तुम्हे एक बात बतानी ज़रूरी है।” 
मै हँस दी  और कहा ” अरे अब जो कुछ बताना है शादी के बाद बताना, कुछ बातें बाद के लिये भी छोड़ दो”!
रुद्र शादी के चार दिन पहले बनारस आ गये और हर दिन मुझसे मिलने का इसरार होता और मैं कुछ शर्म और घर मे मौजूद लोगों के कारण रुद्र से मिलने की नहीं सोच पाती।  
आज हमारी शादी थी घर मे हल्दी की रस्म हो रही थी पूरा घर मेहमानों से भरा था। तभी कोई ज़ोर से बोला ” अरे दुल्हे राजा तो बिन बारात के ससुराल आ गये हैं”।
रुद्र मुझ तक पहुँच पाते उससे पहले मेरी सहेलियों ने उन्हे घेर लिया था , वे बार बार मेरी तरफ देखते और मैं हंस कर रह जाती थी।  
रुद्र को देख सब खुश थे, उन्हे घेर कर बैठ गय उनकी खातिर होने लगी , जाने क्यों मेरे मन में शंका हुई की कुछ तो बात है, आज हमारी शादी थी और रुद्र उदास से लग रहे थे, लग रहा था जैसे कोई इंसान खुद अपने आप से लड़ रहा हो,रुद्र के चेहरे की चमक कहीं खो गयी थी।लगा उन्हे अंदर ही अंदर कोई बात खाये जा रही है। कुछ ऐसा हो गया है जिसका रुद्र को बहुत पछतावा है।
इधर मेरी हल्दी की रस्म चल रही थी रुद्र ने टेबल पर पड़ी डायरी मे कुछ लिखा और मुझे इशारा किया की मे उसे पढ़ लूं और फोन करने का इशारा कर वापस चले गये।
चारों ओर शादी की गहमागहमी थी ,हल्दी की रस्म के बाद बाकी रस्में होने लगीं, मुझे डायरी पढ़ने का मौका नही मिल रहा था। 
कुछ पल  का एकांत मिलता तब तो पढ़ती लेकिन शादी के रोज़ भला होने वाली दुल्हन को अकेला कैसे छोड़ता।
तभी मां मेरे पास आई और मुस्कुराते हुए मेरी नज़र उतारी और बोलीं ब्युतिशियन दुल्हन को तैयार करने आ गई है। उस वक़्त सच कहूं मैं खुशी से झूम उठी थी।आज मुझे भी जल्दी थी अपने रुद्र की दुल्हन बनने की अपने नए
 संसार मे जाने की।
 सहेलियों की हँसी ठिठोली के बीच सब कुछ भूलकर  मैं तैयार होने लगी।आज मैंने सुर्ख लाल बनारसी डाली थी,हमारे खानदानी ज़ेवर पहने और पूरा श्रिंगार किया तो दर्पण मैं खुद को देख मैं शर्मा गई। आज खुद की नज़र उतारने का मन किया , रुद्र को याद कर मेरे गालों पर लाली और बढ़ गई, आज मेरा दिल रुद्र से मिलने को बेहद बेचैन था। आज रुद्र की आंखों मे अपने लिये प्यार और उनके शब्दों मे अपनी तारीफ सुनना चाहती थी।
रुद्र की याद आते ही मुझे डायरी भी याद आ गई, मैंने अपनी सहेली को डायरी लाने बैठक मे भेजा लेकिन…. 
तभी मुझे बाबा की आवाज़ सुनाई दी अव बदहवास से मुझे पुकारते हुए मेरे पास आ रहे थे उमा.. उमा…..???
मैं दुल्हन के लिबास मे भागकर बाबा के पास पहुँची और देखा बाबा एक पत्ते की तरह कांप रहे है, उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ी हुई हैं। वे बेहद घबराई हुई आवाज़ मे बोले ” उमा ! रुद्र जब यहां से वापस जा रहा था उसकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया, वो अस्पताल मे है।”
ये सुनकर ही मां बेहोश सी हो गई।  मैं उसी हालत में अस्पताल बाबा के साथ गई।मुझे विश्वास था मेरे रुद्र को कुछ नही हो सकता , अरे! अभी तो पूरी ज़िंदगी हमे साथ बितानी है।मुझे सासु मां के आशीर्वाद, उनके कहे पर विश्वास था मेरी और रुद्र की जोड़ी महादेव और पार्वती की जोड़ी है वो भला जुड़ने से पहले टूट कैसे सकती है।
अस्पताल मे पूरी अफरा तफरी मची हुई थी, मेरे ससुर जी और मेरी सासू माँ बदहवास से डॉक्टर के पीछे पीछे भाग रहे थे, मैं दुल्हन बनी अस्पताल मे खड़ी थी, मेरा दिमाग सुन्न हो गया था ,तभी एक नर्स बाहर आई और बोली रुद्र को होश आ गया है, हम सब भागते हुए कमरे मे गये ,रुद्र के शरीर पर तमाम पट्टियां बंधी थी , मैं आंखें फाड़ उसे देख रही थी, तभी रुद्र ने आंखे खोली और मुझे इशारे से बुलाया और बेहद दर्द भरी आवाज़ मे बोला” उमा ! मुझे माफ कर देना!”
बस! फिर सब कुछ खत्म हो गया। मेरा रुद्र जिसने कभी कहा था वो मुझे तकलीफ देने की सोच भी नही सकता वो आज मुझे उम्र भर का दर्द देकर इस दुनिया से चला गया। मैं पत्थर की बुत बनी खड़ी थी । रुद्र के पिता को उसी समय दिल का दौरा पड़ गया और कुछ ही घंटों उन्होंने भी दम तोड़ दिया और वो अपने बेटे के पास चले गये।
बस सासु मां और मैं वहीं खड़े खड़े अपनी दुनिया उजड़ते हुए देख रहे थे।
अब मेरा ज्यादातर समय रुद्र के घर पर सासु माँ की देखभाल करते हुए बीतता था। कुछ लोगों का कहना था कि मैं अपनी ज़िंद्गी बर्बाद कर रही हूं, उन्हें कैसे समझाती रुद्र के जाने के बाद बर्बाद होने को कुछ बचा नहीं है। अब तो सिर्फ कर्तव्य ही निभाया जा सकता है। आप ही बताये ये सब शादी के दो रोज़ बाद हुआ होता तो?…..
धीरे धीरे दो महीने बीत चुके थे मां थोड़ा संभल गई  थीं, उनके स्वास्थ्य मे तो सुधार हुआ था,लेकिन वो खामोश रुद्र की तस्वीर को देखती रहती।
एक रोज़ मैं रुद्र के कमरे मे बैठी थी कि अचानक मुझे उस डायरी का ध्यान आ गया जिसे रुद्र ने हमारी शादी के रोज़ कुछ लिखा था। मैं बिल्कुल बेचैन हो गई और तुरंत अपने घर वापस गई। रुद्र ने जो कुछ लिखा था उसे पढ़कर मेरी दुनिया हिल गई। उसमे रुद्र ने मुझे एक चिट्ठी लिखी थी….
उमा!
मेरी उमा नही कह सकता क्योंकि मैं वो अधिकार खो चुका हूँ।
कैसे बताऊँ मैं तुम्हारे प्रेम और विश्वास के लायक नहीं रहा।तुम्हे रागिनी याद है मैं उसकी मदद करना चाहता था।वो सुरीला गाती थी इसलिए मैंने  उसके लिये एक गुरु का इंतजाम भी कर दिया था।वे लोग बहुत आर्थिक तंगी मे दिखाई दिये मैंने पैसों से भी कुछ मदद की, मैं उनके घर होली के अगले रोज़ गया था ,मैने सोचा की गुरुजी की फीस पुरे साल भर की एकमुश्त दे दूंगा, और मैंने वही  किया भी,वह पैसे देकर मैं जब चलने को हुआ तब रागिनी ने मुझे शर्बत पीने को कहा, मेरे मना करने पर वो बच्चों के माफिक ज़िद करने लगी। उसे पीने के बाद मुझे क्या हुआ मुझे कुछ भी याद नहीं। पूरी रात शायद बेहोशी की हालत मे वही था और जब अगले रोज़ मुझे होश आया तो रागिनी को अस्त व्यस्त हालत मे अपने बगल मे निश्चिंत सोता हुआ पाया।
 
जगाने पर उसने और उसकी मौसी ने मुझपर बलात्कार का इल्ज़ाम लगाया, साथ ही मुझे धमकाने लगी की अगर यह शादी हुई तो पूरे बनारस मे हमारी बदनामी की जायेगी\ मेरी मां मे सारी उम्र केवल बदनामी से बचने के लिये पिताजी का वो अन्याय सहा अब मैं उन्हे और तक्लीफ नही देना चाह्ता।
मैं जानता हूं यह सब धोखा है लेकिन अभी कोई रास्ता नही सूझ रहा है। मेरी ज़िंद्गी तो बर्बाद ठहरीअपने साथ तुम्हे बद्नाम होता नही देख सकता ।   
                                                           रुद्र!
इस चिट्ठी को पढ़कर तो मेरा सिर घूमने लगा था। मैं  कुछ सोच नही पा रही थी लेकिन अब रागिनी से मिलना ज़रूरी था क्योंकि मैं अब सिर्फ इतना जानना चाहती थी कि रागिनी जैसी सीधी दिखने वाली लड़की ने इतनी मदद करने वाले रुद्र को ऐसा घटिया किस्म का धोखा क्यो दिया।
ये बात मैंए खुद तक ही सीमित रखी और रुद्र का सामान कोलकाता से बनारस लाने के बहाने कलकत्ता चली गई । वहा रुद्र के ऑफिस का ड्राईवर मिला जिसे रागिनी के घर का पता मालूम था। मैं वहां गई तो बेहद संकरी बदबूदार गलियों से होते हुए एक छोटे से घर के सामने खड़ी थी। घंटी बजाई तो कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला , सामने रागिनि खड़ी थीं मुझे देख उसके चेहरे का रंग उड़ गया।मुझे उसने बड़े बेमन से घर में आने दिया। 
हम दोनो एक दुसरे से सवाल करना चाहते थे।मुझे अपने रुद्र पर विश्वास था और मे ये जानती थी कि झूठ के पैर नही होते वो खुद ही प्रकट  हो जाता है।
मैंने बस इतना ही कहा ” रागिनी! तुम्हारे घटिया फरेब ने मेरे रुद्र की जान ले ली अब वो इस दुनिया मे नही है लेकिन मैं सिर्फ और सिर्फ सच जानना चाहती हूँ!”
रागिनी शायद इतनी भी बुरी नही थी उसकी आत्मा अभी मरी नहीं थी, मेरे इतना पूछते ही वो एक भुरभुरी दीवार सी मेरे पैरों मे गिर पड़ी और फिर जो कुछ उसने बताया मेरे लिये सोच पाना भी मुश्किल था।
रुद्र के घर का वो गंदा अतीत ऐसे रूप मे मेरे सामने  आयेगा ये मैंने सपने मे भी नही सोचा था।
हमारी शादी से पहले रुद्र ने बडी़  ही मुश्किल से विद्या  नाम के कीचड़ की सफाई की थी, रागिनी उसी विद्या  की बहन की बेटी थी जिसे विद्या ने सारी गंद्गी से दूर बचा कर रखा था।
विद्या जानती थी रुद्र को संगीत का शौक है सो उसने पुरा समझ बूझ कर एक षड्यंत्र रच कर दोबारा हवेली मे आने की कोशिश की थी।
रागिनी ने रोते हुए बताया की वो इस बात के लिये तैयार नही थी लेकिन सारी गरीबी और अपने एहसानों का वास्ता देकर , तमाम तरह के सब्जबाग दिखाकर विद्या ने रागिनी और रुद्र को फसाया था। संगीत संध्या मे घर का ऐशो आराम देख रागिनी को भी अपनी तकदीर को चमकाने का ये तरीका सही लगने लगा।आज वो रुद्र को धोखा देकर पछता रही थीं 
रुद्र ने सच कहा था इस सब बातो मे रुद्र का कोई दोष नही था , ये सब नीम बेहोशी की हालत मे हुई घटना थी।
अचानक रागिनी ने मुह फेरकर कहा कि वो रुद्र के बच्चे की मां बनने वाली है।
ये बात मेरे लिये एक बिजली गिरने जैसी थी। ये बच्चा हमारा था, रुद्र का यानी मेरा है| सही सुना आपने! अरे मेरा अधिकार ज़बरन धोखे से रागिनी ने छीन लिया वर्ना आज ये संतान मेरी कोख मे होती।
अपना अधिकार उमा कभी नही छोड़ती और फिर जब बात रुद्र के अंश की हो तो उमा किसी भी हद तक जा सकती है।रागिनी ने ही बताया की रुद्र की मौत की खबर सुनकर मौसी  इस बच्चे को गिरा देना चाह्ती थी लेकिन रागिनी ने उसे जन्म देने का फैसला किया था।
उसी समय मैंए रागिनी के रहने का इंत्ज़ाम दार्जलिंग मे कर दिया। मैं किसी भी हालत मे रुद्र कि संतान को इस दुनिया मे लाना चाहती थी।नवे महीने मे रागिनी ने हमारी बेटी को जन्म दिया। यह पूरा समय रागिनी हमारे बच्चे की सलामती और रुद्र से किये धोखे का पश्चाताप करते हुए बिताया था।
शायद उसका पश्चाताप सच्चा था इसलिए हमारी बेटी को जन्म दे, मुझे सौंपकर वो चल बसी।कुछ लोगों को ये अन्याय लगेगा लेकिन ये फेसला ईश्वर का था ।मेरे भोलेनाथ रुद्र का था रागिनी को धोखे की कीमत तो चुकानी ही पड़ी और जो वादा रुद्र ने मुझसे किया था, मेरी हर खुशी देने का ,वो भी इस बच्ची के ज़रिये जीने की वजह दे गया ।
 
हमारी बच्ची एक कमल की तरह पाक साफ सुंदर सी थी, उसी गुलाबी से कमल कि तरह जो कीचड़ मे खिलता है,लेकिन अपनी पवित्रता के कारण देवताओं के गले मे शोभा पाता है।ये कमल कीचड़ से जन्मा ज़रूर है लेकिन उसका हिस्सा नही बनेगा। “कभी नहीं”!,,,,, मैं यानी उसकी मां ऐसा होने नही देगी।
उस बच्ची को लेकर मैं बनारस आ गई।  ये रुद्र और उमा की बेटी है जो अपनी ज़िंदगी अपने परिवार के साथ जियेगी, ये मेरा यानी उसकी मां उमा का निश्चय था।
” ये क्या मां! आज तुम पापा की डायरी में क्या लिख रही हो!” 
पद्मा ने लाड से उमा के कंधे पर झूलते हुए पूछा। उमा हँसते हुए बोली” अरे मैं अपनी बिटिया के लिये कहानी लिख रही हूँ।”
“सच्ची मां! सुनाओ ना ये कहानी!”
उमा ने पद्मा को गले से लगाते हुए डायरी को किनारे रखा और बोली” अभी नहीं तुम छोटी हो ना , जब, अट्ठारह साल की हो जाओगी, तब मैं खुद ये कहानी सुनाउंगी , अभी मेरी नन्ही सी गुड़िया समझ नही पायेगी। और ये क्या कल तुम्हारा जन्मदिन है नाना नानी को आमंत्रित करने जाना है। चलो तैयार हो जाओ।”
मां! दादी भी जायेंगी ना, फिर हम रास्ते मे दादी की पसंद की कुल्फी भी खायेंगे।”
ठीक है, चलो जल्दी से तैयार हो जाओ दादी को कह दो।
पद्मा दौड़ती हुई दादी के कमरे की ओर भागी, उमा खुशी से देख रही थी”उस कमल के फूल पर कीचड़ का कोई दाग नही था, आज सही मायने में रुद्र की हवेली की सफाई हो गई थी।आज वहा कमल के फूल महक रहे थे।

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।हमें फोलो करे Facebook

Kiran Shukla
मैं किरण शुक्ला एक गृहणी हूं। मैं नवाबों के शहर लखनऊ की रहनेवाली हूं। थोड़ा बहुत लिखने का शौक पहले से था लेकिन जिंदगी की व्यस्तताओं मे ये शौक ज़रा पीछे छूट सा गया था। कला मंथन मंच की आभारी हूं जिसकी वजह से मैंने नए सिरे से अपने शौक को वक्त देना शुरू किया है। सही मायने मे नवलेखिका हूँ जो शायद आजकल की पीढ़ी के लिए लिखने का प्रयास कर रही हूं। उम्मीद करती पढ़ने वालों की अपेक्षा पर खरी उतरूं।

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