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“आपकी संस्था ‘घर’ को सरकारी फण्ड मिलने का ऐलान हुआ है, अब आगे की क्या प्लानिंग है? क्या आप अपने बेटे को वापस बुलायेंगी।” पत्रकारों की भीड़ में से एक सवाल उछला।

राज्य के सबसे बड़े एन. जी.ओ की संस्थपिका मणिका शाह जी ने उस चेहरे को ध्यान से देखा।
माइक पकडकर संभलते हुए कहा – “मैं आपके सवाल का जवाब देना चाहती हूँ पर आप इत्मीनान से सुनिएगा”
पत्रकार अपनी अपनी जगह पर स्तब्ध से बैठ गये।सबको यकीं था आज तो कोई स्टोरी हाथ लगेगी। जिस पत्रकार नवीन ने सवाल पूछा था वो भी उनके चहरे पर नज़रें गड़ाए , रिकॉर्डर ऑन कर बैठा था।
मणिका जी नवीन की तरफ मुखातिब होती हुई बोली – बात ज़्यादा पुरानी नहीं है दस साल पहले जब कोविड जैसी महामारी से चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ था। हर ओर से बुरी खबरों का दौर चल रहा था।लग रहा जैसे लोग घरों मे जेल की तरह रह रहे हैं।पर जो घरों मे थे वो सब अच्छा होने की दुआएं कर थे उस वक्त दुर्भाग्य से मैं और मेरे पति दोनों कोविड से संक्रमित हो गए।”
“अपने इकलौते बेटे को रिश्तेदारों के घर भेजना पडा हम दोनों ने कोई तीन दिन तो सिर्फ पारले जी के साथ चाय और मैगी मे गुजारे।ये कोई आर्थिक हालात की मज़बूरी नहीं थी ये असर था उस हड्डी तोड बुखार का। इंफेक्शन इस कदर बढने लगा कि हॉस्पिटल जाने की नौबत आने लगी। कई जगह फोन लगाया दिलासे, सांत्वना सबने दिये पर घर तक कोई नहीं आया।यहां तक कि सरकारी मदद भी जब तक पहुँची, मेरे पति की हालत गंभीर से खराब हो चली थी।”
“मैं बुखार कम हो जाने की वजह से घर पर ही रही उन्हें हॉस्पिटल ले जाने की तैयारी हो रही थी तब उन्होंने मुझसे कहा – मणिका अगर मैं वापस नहीं आया तो तुम एक फ्लैट बेचकर लोन चुकाना, तुम नौकरी कर सकती हो कर लेना,बेटे का ध्यान रखना और कुछ ठीक होने लगे तो एक बेटी गोद ले लेना। मैं पागलों की तरह रो रही थी और हिचकते हुए कहे जा रही थी तुम वापस आओगे विनय तुम्हें आना होगा। तुमसे पहले मुझे मौत आयेगी।”
“पर होनी को मंजूर नहीं था हम दोबारा एक दूसरे को देखे और मिले।विनय वापस नहीं आये और इतना बुरा समय था वो हमें उनके अंतिम दर्शन भी नसीब नहीं हुए। मेरी तरह कई लोगों ने अपनों को ऐसी विदाई दी। वो कहते हैं न जिसे चोट लगती है वही दर्द जानता है बस ऐसी ही हालत थी उस समय।”
बहुत से चेहरों पर बाईट वक़्त का डर और अपनों को खोने का दर्द साफ़ नज़र आ रहा था। हॉल में सन्नाटा सा था।
मणिका जी ने आगे कहना शुरू किया ,”सब कहते थे सब ठीक हो जाएगा कब कैसे किसी को नहीं पत था। मेरी बीमारी तो ठीक हो गई पर आत्मा जैसे हमेशा के लिए बीमार हो गई। उसके बाद छः सात महीने  यही हाहाकार चलता रहा और मैं रोज़ अंधेरे मे समाती रही।बेटे की देखभाल कर नहीं पा रही थी तो मेरे मम्मी पापा ने उसे हॉस्टल मे दाखिल कर दिया।मैं उससे मिलने जाती तो उसे घर आने की बेचैनी नहीं होती थी हालाँकि उसकी पढाई मे गजब का सुधार था।”
सवाल पूछने वाले पत्रकार की ओर देख कर उन्होंने आगे बोलना शुरू किया ,” मैं उसकी तरफ से थोड़ी मुतमईन हुई खुद को समझाया, नौकरी ज्वाइन की। घर की किश्त चुकाने के लिए बहुत ज़रूरी था। फिर धीरे धीरे ज़िंदगी पटरी पर लौटी।पर पहले जैसी बात फिर भी नहीं। एक शून्य सा बन गया था वो अब छोटा तो हुआ पर खत्म न हो सका। एक दूसरे से बात करते हुए पता चला, अपने घर कुनबे के ही आठ बच्चे ऐसे थे जो अपने मम्मी पापा दोनों को खो चुके थे।विनय की बात याद आने लगी एक बच्ची को गोद ले लेना, बताते हुए मणिका जी के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।”
“मैंने सोचा एक क्यों इन आठों बच्चों को गोद ले लेती हूँ। बहुत पेपरवर्क होता है फिर भी छः महीनों के थका देने वाले प्रोसेस के बाद जब वो बच्चे मेरे साथ आये तो उन्होंने पूछा ये कौन सी जगह है यहाँ हम कितने दिन रहेंगे।इन मासूम सवालों का जवाब सिर्फ मुस्कुरा कर दिया।कुछ दिनों सोचने के बाद मैंने अपनी संस्था का नाम ‘घर’ रखा।
“फिर जहाँ से मदद माँग सकती थी माँगी,बहुत चप्पलें घिसीं और गहने बेचे सब कुछ किया।अब सात साल के बाद सरकारी फण्ड का ऐलान हुआ है तो आप लोगों को परेशानी होने लगी।मुझे उम्मीद है आप समझ गए होंगे “घर हवा में नहीं बना करते”।उसकी नींव मे अरमान, आँसू, मेहनत, उम्मीद बहुत सी चीजें लगती हैं जो बनाने वाले को साफ दिखाई देती हैं पर देखने वालों को नहीं।”
हॉल मे बैठे सभी लोगों की आँखें नम हो चली थीं। सवाल पूछने वाले पत्रकार ने माइक संभाला और लगभग रूंधे गले से कहा.” माँ ,मुझे माफ कर दो, मैं समझ नहीं पाया हॉस्टल मे रहकर मुझे हमेशा लगा आप नाम कमाने की वजह से मुझे घर नहीं आने देती,मैंने तो बस पापा खोये,आज जाना आप उनके लिए घर बना रहा रही थी जिनके मम्मी पापा दोनों नहीं रहे।मुझे गर्व होगा अगर आप मुझे अपनी संस्था से जुडने का मौका देंगी।”
उसकी आँखों में आँसू और गले में नेमप्लेट “नवीन शाह” दोनों ही मणिका की आँखों से बचे नहीं थे। नवीन के इतना कहते ही पूरा हॉल तालियों से और मणिका जी का मन खुशी से भर गया।

 

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