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आशियाना

           पटना के जाने-माने डॉक्टर थे मिस्टर कपूर जिनका घर शहर की खूबसूरत रिहायशी इलाके में बना था घर क्या था एक हवेली या महल कहना उचित होगा। दूर से चमकता झक सफेद मकान एक विशाल प्रांगण में बना हुआ था, जिसे बनाने वाले ने बड़े शौक से बनवाया था। मेन सड़क पर खुलता हुआ बड़ा सा गेट ,अंदर की ओर बढ़ते हुए रास्ते के दोनों ओर फूलों की खूबसूरत क्यारिया  थीं। पोर्टिको से बगीचे की ओर जो रास्ता जाता था, वह किसी भी प्रकृति प्रेमी के लिए स्वर्ग से कम न था।
        हरी नर्म घास, करीने से लगे हुए सदाबहार पौधे गमलों में देसी विदेशी फूलों की भरमार थी। बगीचे के एक कोने में नन्हा सा तालाब भी था, जहां रंग बिरंगी मछलियां तैरती और सुंदर कमल खिले  थे। बगीचे के एक कोने में बड़ा सा नीम का पेड़ था, पास ही एक लाल रंग की छतरी लगी हुई थी जिसके नीचे बेंत की कुर्सियां रखी थी, यह वही जगह थी जहां हर सुबह नियम से मिस्टर कपूर सुबह की चाय पिया करते थे। हरी घास पर टहलना वहां बैठकर चाय पीना उनकी दिनचर्या में शामिल था। कभी-कभी अंदर से पिंजरे को भी बाहर किया जाता था जिनमें रंग बिरंगी खूबसूरत चिड़िया पाली गई थी\ घास पर अक्सर कुछ खरगोश भी उछलते कूदते दिखाई पड़ते थे।    
        यह  यह घर केवल बाहर से ही नहीं अंदर से भी उतना ही खूबसूरत था खिड़कियों पर लगे रेशमी पर्दे ,महंगा कालीन, खालिस शीशम की लकड़ी  से  बने फर्नीचर इत्यादि, घर की संपन्नता का परिचय देते थे। जगह जगह रखी खूबसूरत कलाकृतियां बैठक की शोभा बढ़ाती थी।
         मिस्टर कपूर जब भी विदेश कॉन्फ्रेंस में जाते तो कि स्थानीय कलात्मक वस्तुएं जरूर खरीदते थे ईश्वर ने उन्हें पैसों के साथ  कला की परख और शौक भी दिया था, गोया के इस घर में खूबसूरत वस्तुओं की भरमार थी। जिन की देखभाल  नौकरों की पूरी फौज करती थी, बगीचे के लिए दो तीन माली थे, तो घर में भी तमाम नौकर थे जो अलग-अलग काम करते थे।
      कहते हैं मिस्टर कपूर कोई बीस साल पहले चंडीगढ़ से यहां आए थे, उनकी शहर में बहुत इज्जत थी लोग तो यहां तक कहते थे अगर वह किसी मुर्दे को भी हाथ लगा दें तो, शायद वह जी उठेगा । उनके हाथों को ईश्वर ने  शिफा के जादू से नवाज़ा  था। पटना के संभ्रांत व्यक्तियों में उनका नाम बड़ी इज्जत से लिया जाता था।
उनके परिचित लोगों को उनकी पिछली जिंदगी के बारे में कुछ पता ना था। किसी को  उनके रिश्तेदारों के बारे में भी कोई जानकारी न थी। सब लोग बस इतना ही जानते थे कि कपूर साहब चंडीगढ़ से आए हैं और उनकी पत्नी वीना जी शिमला की रहने वाली हैं।  किसी ने भी उनके रिश्तेदारों को आते जाते कभी नहीं देखा था, यहां तक की घर के सबसे पुराने बावर्ची को भी ज्यादा कुछ पता नही था, हां उनके दोस्तों की फेहरिस्त बहुत लंबी थी।
        अब बात करते हैं मिस्टर कपूर की तो भगवान ने उन्हें रंग रूप से भी नवाजा था, ऊंचा निकलता हुआ लंबा कद गेहुंआ रंग बेहद रिश्त  पुष्ट तराशा हुआ शरीर बावन की उम्र में भी वे चालीस  के ही लगते थे। उनका चेहरा बेहद सौम्य सा लगता था और उनकी भारी सधी हुई आवाज उनके व्यवसाय  के अनुरूप ही थी , कुल मिलाकर उनका एक सुदर्शन सा व्यक्तित्व दिखाई पड़ता था।
 वही उनकी पत्नी यानि वीना जी उनकी हम उम्र थी लेकिन दुबली पतली शुद्ध हिंदुस्तानी स्त्रीसलीके से सूती साड़ी बांधकर घर की कमान संभाले रहती थी।  काले बालों की कमर तक लंबी चोटी, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी, मांग में नन्हा सा सिंदूर, उस अंडाकार  चेहरे पर बड़ी-बड़ी  काली  गहरी आंखें, होठों पर मीठी मुस्कान एक ममता की मूर्ति थी।  बेहद मीठा स्वभाव था और  हल्की आवाज में बात करती थी। नौकर चाकर से उनका बेहद  प्रेम पूर्ण रिश्ता था।  कपूर साहब के घर  बाहर को संभालते उनकी पूरी उम्र निकल रही थी, कहा जाए तो वह एक बेहद फरमाबरदार जीवन संगिनी थी।
उन्होंने शायद कपूर साहब से कभी कोई फरमाइश नहीं की  होगी या शायद उन्हें कपूर साहब से कोई उम्मीद नहीं रही होगी।  कुछ कहा नहीं जा सकता , वो बेहद शांत और संतुष्ट किस्म की महिला थी।  उन्हें कभी-कभी खुलकर हंसते हुए केवल रोहन के साथ देखा जा सकता था।
       रोहन इस घर का बेटा है, घर का चिराग वह सचमुच वह चिराग  है जिसकी वजह से कभी कभी घर का वातावरण खुशनुमा हो जाता है।  मेडिकल की पढ़ाई के आखिरी साल में है बेहद  जहीन लड़का है। पटना मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहा है तो घर से ही कॉलेज जाता है, डॉक्टरी की पढ़ाई की व्यस्तता के बावजूद वीना जी के लिए कुछ न कुछ समय निकाल ही लेता है।

वीना जी की समर्पित सी जिंदगी में कपूर साहब के लिए सारे कर्तव्य निभाना शामिल था जिसमें कभी-कभी रोहन के निश्चल हंसी समाहित हो जाती थी, जो  उनके लिए संजीवनी बनी रहती थी ।

बाहर के लोगों को तो छोड़िए घर के नौकरों ने भी पति पत्नी को हमेशा केवल जरूरत भर की, औपचारिक बातचीत करते  देखा था।  कहीं कोई कांच की दीवार थी जिसके दो दायरों में बंधे मिस्टर कपूर और  रीना जी रहते थे। जब से रोहन ने होश संभाला था उसने परिवार में ऐसा ही देखा था, बेहद औपचारिक  किस्म का रिश्ता इस परिवार का कुछ तो ऐसा था जो इन्हें स्वाभाविक जिंदगी से अलग किए था।
      घर में तीन  प्राणी और नौकरों की पूरी फौज लेकिन घर में एकदम नीरवता छाई रहती थी। वहां कभी-कभी रोहन और वीना जी की हंसी की आवाज आती थी। एक खालीपन सा था इतना संपन्न घर,  समाज का रुतबा और जीवन की सफलता इस खालीपन को भरने में असफल थी।
        खैर एक रोज मिस्टर कपूर डॉक्टर यूनियन की किसी मीटिंग के सिलसिले में बनारस गए,जहां वे मुख्य अतिथि थे।  उनके साथ डॉ कुसुम भी गई थी, जिन्हें वहां कोई वक्तव्य देना था । कार से ड्राइवर के साथ वे दोनों मीटिंग के पश्चात पटना वापस लौट रहे थे।  वह रात तक पटना पहुंचना चाहते थे, लेकिन  अचानक मौसम में तब्दीली आने लगी वे लोग काफी आगे निकल आये थे।  वापस लौटना मुमकिन नहीं लग रहा था इसलिए वह पटना के लिए हाईवे पर चलते रहे।
        धीरे-धीरे शाम ढलने लगी थी आकाश में बादल घिरने लगे थे दूर क्षितिज पर घने काले बादल दिख रहे थे जहां रह-रहकर बिजली भी चमक रही थी,गाड़ी हाईवे पर फर्राटे से दौड़ रही थी,यूं तो पटना हाईवे पर ट्रैफिक होता है लेकिन मौसम की वजह से कुछ हद तक सन्नाटा ही था। 
  मिस्टर कपूर थकान से थोड़ा ऊंघने लग गए थे की तभी गाड़ी एक तेज झटके से रुकी, वह गुस्से में कुछ बोलते इससे पहले ही ड्राइवर बोल पड़ा,     ” सर! सड़क पर एक लड़की है शायद बेहोश है।”
 इतना सुनते ही डॉ कुसुम झटके से गाड़ी के बाहर निकली और उस लड़की के पास पहुंची उन्होंने देखा महज बीस बाइस साल की लड़की सड़क पर बेहोश पड़ी, शक्ल  से किसी भले घर की लग रही थी, मगर  इस वक्त उसके अस्त-व्यस्त से कपड़े कुछ अलग ही कहानी कह रहे थे। उसके चेहरे पर खरोंच और चोट के निशान थे।  माथे और कहानियों से खून रिस रहा था, यह सब किसी हादसे के गुजरने की गवाही दे रहे थे। उस वक्त वह लड़की बिल्कुल बेहोश थी।
      डॉ कुसुम ने मिस्टर कपूर की और देखा लेकिन उनके सपाट से चेहरे पर कोई भाव नहीं था वे तुरंत बोले   “देखिए डॉ कुसुम!  हम किसी झमेले में नहीं पड़ना चाहते, हमारे व्यवसाय में इतनी फुर्सत नहीं है कि बिला वजह कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाएं माना हमारे रसूख की वजह से  हम से कोई नहीं पूछेगा या  जोर देगा लेकिन आप बिना वजह परेशान ही होंगी कचहरी के चार चक्कर लगाने पड़ेंगे।”
तभी डॉक्टर कुसुम बोली ”  सर!  इस लड़की को यहां छोड़ा तो यह मर जाएगी, आप देख लीजिए कितना खून बह चुका है मानवता के नाते ही इसे अस्पताल ले चलते हैं, जो होगा देखा जाएगा।”
” प्लीज! सर मान जाइए!” 
     कपूर साहब यूं तो काफी भले मानस दिखाई पड़ते थे लेकिन यूं ही राह चलते किसी की मदद  करना उनका स्वभाव नहीं था।  यहां बात कुछ इमेज की भी बन गई क्योंकि डॉ कुसुम दबी जुबान से कुछ कह भी सकती थी  नर्सिंग होम में बिना कारण चर्चा  के वह पात्र बन जाते इसलिए उन्होंने रजामंदी दे दी।
      ड्राइवर की मदद से डॉ कुसुम ने उस लड़की को पिछली सीट पर बिठाया पानी के छींटे वगैरह दिए लेकिन सब बेकार था। पूरे रास्ते वह लड़की बेहोश ही रही डॉ कुसुम ने अपने सूटकेस से दुपट्टा इत्यादि निकाल कर उसे उढ़ा दिया। वे बड़ी बेबसी से उस लड़की का चेहरा देखती रहे लगभग दो घंटे में  वे पटना पहुंच गए हालांकि रास्ते में कुछ एक छोटी डिस्पेंसरी दिखी लेकिन सवालों से बचने के लिए वे सीधे पटना ही आके रुके। मिस्टर कपूर को उनके घर छोड़कर डॉ कुसुम उस लड़की को लेकर नर्सिंग होम गई और नर्स को सारी हिदायत देकर उसे दाखिल कर दिया। कुछ समय रुक कर उसे फर्स्ट एड इत्यादि देकर वह भी अपने घर चली गई।
रात देर हो चुकी थी वीना जी मिस्टर कपूर का इंतजार कर रही थी। उनके आने पर  वीना जी ने टेबल पर खाना लगाया, खाते हुए मिस्टर कपूर ने रास्ते में घटी इस घटना का जिक्र वीना जी से किया और कहा  
” भगवान करे कल सुबह उस लड़की को होश आ जाए और अगर उसके घर वालों का पता चल जाए तो उन्हें सौंप दिया जाएगा।वे बिना कारण किसी झमेले में नहीं पड़ना चाहते। कोई परिचित  नहीं मिला तो वे पुलिस को खबर कर देंगे। आगे जो पुलिस चाहेगी वह करेगी।”,कपूर साहब ने यह सब बातें साधारण रूप में कहीं और खाना खाकर अपने कमरे में  सोने चले गए
       यह सब बातें बिना जी के लिए साधारण नहीं थी, फिर किसी लड़की पर अत्याचार हुआ था और यह बात उन्हें विचलित कर रही थी। अगली सुबह उन्होंने सारी बातों का जिक्र रोहन से किया । रोहन एक बेहद संवेदनशील इंसान था। जाने क्या सोचकर वह उस लड़की के बारे में जानने के लिए नर्सिंग होम गया जिस  कमरे में उस लड़की को रखा था रोहन ने  ज्यों ही  वहां कदम रखा उसे एक तगड़ा झटका लगा क्योंकि वह लड़की कोई और नहीं उसी के स्कूल में पढ़ने वाली ज्योति थी।
       रोहन को याद आया ज्योति  पढ़ने में बहुत होशियार थी हाई स्कूल में पूरे जिले में प्रथम आई थी स्कूल के हर कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा  लेने वाली बेहद  तेज तर्रार लड़की थी। ज्योति ही थी जिसने एक बार हिचकते हुए रोहन से इंटर फाइनल के नोट्स मांगे थे,उस समय रोहन को पता चला था कि वह बेहद साधारण परिवार से है जो महंगी किताबें और कोचिंग का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं।  ज्योति वजीफे की बदौलत पढ़ाई कर रही है आगे डॉक्टर बनने के सपने देख रही है इन सब बातों को लगभग पांच छ्ह साल हो गए थे। 
 आज ज्योति की यह हालत देखकर रोहन बहुत दुखी हुआ। ज्योति को अब तक होश नहीं आया था,उसे देख साफ लग रहा था कोई हादसा उस पर गुजरा है।  तभी ज्योति की मेडिकल रिपोर्ट आ गई थी, जो साफ बयान कर रही थी कि उसका बलात्कार हुआ है।
          नर्स से उसका हाल पूछ कर रोहन अपने काम में लग गया शाम को घर जाते हुए  वह दोबारा ज्योति को देखने गया उसे रह-रहकर हल्का होश आ रहा था और  होश आते ही वह दर्द से कराह रही थी अभी कुछ भी कहने सुनने की हालत में नहीं थी  रोहन ने वहां की नर्स को कुछ हिदायत दी। 
 “इस लड़की का खास ध्यान रखना, और जैसे ही होश आये मुझे खबर कर देना।” इतना कहकर रोहन वापस घर लौट आया और घर आकर उसने अपनी मां को सारी बातें बताई।
 अगली सुबह नर्स ने बड़े सवेरे रोहन को फोन किया की ज्योति को पूरा होश आ गया है। रोहन बगैर कुछ खाए पिए  अस्पताल की ओर भागा वहां पहुंच कर उसने देखा ज्योति बिस्तर पर खामोश लेटी आंखें फाड़े छत की ओर घूर रही है।
 रोहन धीरे से कमरे में दाखिल हुआ रोहन को देख ज्योति की आंखों में एक चमक उठी और फिर कहीं बुझ गई, उसने अपना मुंह फेर लिया शायद अपनी इस हालत में रोहन से अनजान ही बनी रहना चाहती थी।रोहन जो हर किसी की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहता था। वह भला अपने सहपाठी को इस हालत में कैसे छोड़ सकता था ।
         उसने ज्योति के माथे पर धीरे से हाथ फेरा और कहा  ” ज्योति! तुम यहां कैसे पहुंच गई?”
      इस हालत में ज्योति बिल्कुल खामोश थी रोहन उसके सर पर हाथ फेरता रहा और बोला “बताओ तो प्लीज!” “तुम कुछ कहोगी नहीं तो मैं तुम्हारी मदद कैसे करूंगा! मैं तीन दिनों से तुम्हारे होश में आने का  इंतजार कर रहा हूं।”  
 रोहन के हाथों के कोमल स्पर्श  से ज्योति फूट-फूटकर रोने लगी उसे इतनी बेबसी से रोते देख रोहन को बहुत तकलीफ हो रही थी । ज्योति उससे लिपट के बहुत देर तक रोती रही रोहन खामोश रहा उसने इशारे से नर्स को बाहर जाने को कहा। कुछ देर बाद ज्योति जब थोड़ा शांत हुई, रोहन ने उसे तकिए के सहारे बैठाया और पानी पीने को दिया
 पानी पीकर ज्योति ने हसरत भरी निगाहों से रोहन की ओर देखा और कहा 
” रोहन! तुम इस शहर के एक रईस घर के  वारिस हो तुम्हें संसार की हर चीज बिन मांगे ही मिल गई है तुम्हारे घर की ऊंची चारदीवारी के बाहर दुनिया कैसी है, तुम शायद यह नहीं जानते हो एक छोटे  से घर के एक कमरे में जिंदगी पल पल दम तोड़ती है, सपने आंखों में आने से पहले ही चूर-चूर हो जाते हैं।”
आज शायद बरसों बाद ज्योति ने किसी के सामने अपना दिल खोलकर रख दिया था।
” तुम सोच भी नहीं सकते हो तुम्हारी तरह कभी डॉक्टर बनने का ख्वाब था मेरा लेकिन पिता की हैसियत न थी। बिजली विभाग का एक मामूली सा कर्मचारी अपने बच्चों को भरपेट रोटी खिला ले यही बहुत है। मैंने अपनी मेहनत के बल पर वजीफे लिए और आगे बढ़ती गई।  मैंने सोचा डॉक्टर ना सही, नर्सिंग कोर्स तो कर सकती हूं।”
” मैंने वहां दाखिला भी लिया दो साल  मेरी ट्रेनिंग के बीत चुके थे, लेकिन अचानक पिताजी को दिल का दौरा पड़ा और वे बिना किसी इलाज के इस दुनिया से चले गए। मेरी फीस और बाकी खर्चों का इंतजाम करना मां के बस का नहीं था आखिर मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी।  ऐसी कोई बचत भी नहीं थी घर में जो हमारा सहारा बनती। मैंने ट्यूशन  लेने शुरू की जिससे रोटी का इंतजाम होने लगा लेकिन जिंदगी में रोटी ही तो नहीं है।और भी जरूरत पड़ जाती हैं।”
ऐसा लग रहा था ज्योति अपनी ज़िंदगी के वे पल दोबारा जी रही थी।  उसने रोहन की ओर देखते हुए फिर कहा “एक दिन मां बेहोश होकर गिरी तो मैं उन्हें सरकारी अस्पताल ले गई, जहां पता चला मां के पेट में ट्यूमर है, जिसका जल्द ऑपरेशन होना चाहिए।मुझे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था।पिताजी के जाने के बाद मैं मां को नहीं खोना चाहती थी।”
” उस समय मां के एक मुंह बोले भाई बनारस से आए और  हमारी आर्थिक स्थिति को देख, उन्होंने मां को यह सलाह दी कि मैं उनके साथ बनारस चलूं और उनके होटल में रिसेप्शनिस्ट का काम करूं। वे चाहते थे कोई घर का आदमी होटल में रुपए पैसे की देखभाल करें कोई विश्वसनीय आदमी यदि यह काम संभाल लेगा तो वह अपने और भी कुछ काम धंधे कर सकेंगे।”
” मुझे पहले ही जाने क्यों वह कुछ सही नहीं लग रहे थे। मैं मां की बीमारी से मजबूर थी, इसलिए उनके साथ चली गई दो-तीन महीने सब ठीक रहा मुझे तनख्वाह मिल रही थी। धीरे-धीरे ही सही , लगा जिंदगी पटरी पर लौट आएगी, लेकिन……..।”
“मुझे कभी-कभी होटल में आने वाले लोग कुछ अजीब से लगते थे, मैंने एक आध बार मामा जी से कहा भी”कुछ लोग होटल में शायद गलत इरादों से कमरे लेते हैं बाहर से लड़कियों को भी लेकर आते हैं।”
 इस बात पर मामा जी ने मुझे तेज आवाज में डांट दिया और कहा   ” हमें क्या मतलब है। हमें सिर्फ पैसों से मतलब रखना चाहिए, वह कमरे में क्या करते हैं इससे हमारा कोई वास्ता नहीं है। तुम ज्यादा मत सोचा करो शांति से अपने काम करो। मां का इलाज करवाना है ना तुमको!   “मुझे अजीब लगता था, लेकिन मैं खामोश रही।”
ज्योति के चेहरे पर कई रंग आ जा रहे थे।एक रोज मामा जी ने मुझसे कहा हमें उनके दोस्त की बेटी  की शादी में जाना है, मैं भी चलूं क्योंकि उनका परिवार तो गांव पर रहता है। मैंने इनकार किया लेकिन उनके बहुत जोर देने पर मैं तैयार हो गई। 
        ” मामाजी और मैं एक गाड़ी में निकले उसमें एक आदमी पहले से ही बैठा हुआ था वह एक लंबा चौड़ा सा भद्दी सी शक्ल का आदमी था, लेकिन महंगे कपड़े, कीमती घड़ी और उंगली में पहनी अंगूठियों से पैसे वाला लग रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें भूखी निगाहों से मुझे घूर रही थी। मैं बहुत   अजीब महसूस कर रही थी। हमारी गाड़ी शहर के बाहर एक ढाबे पर रुकी मामा जी और वह आदमी चाय पीने चले गए।  मेरे लिए कोल्ड ड्रिंक भिजवा दी।”
     ड्राइवर आगे चुपचाप बैठा था कुछ देर बाद वह आदमी आया और फिर जब तक मैं कुछ समझ पाती मामा जी को बिना लिए वह गाड़ी हाईवे की सुनसान सड़कों पर फर्राटे से दौड़ने लगी। वह आदमी मुझ पर भूखे भेड़िए की तरह टूट पड़ा, मैंने लड़ने की बहुत कोशिश की मगर फिर कुछ पलों के बाद मुझे कुछ भी याद नहीं है मैंने जब होश संभाला तो इस अस्पताल में थी।”
ज्योति के आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।
 ज्योति के एक-एक शब्द पिघले शीशे की तरह रोहन के कानों में पड़ रहे थे। रोहन ने खुद को सम्भाला और  उसने तुरंत कुछ फोन किए और फिर ज्योति से कहा ” ज्योति!  तुम परेशान मत हो सब कुछ ठीक हो जाएगा।फिर मुस्कुराकर उसने ज्योति की ओर देखा और कहा ” मैं हूं ना तुम्हारा दोस्त ! तुम बस अपना ख्याल रखो और हां !अपनी मां की चिंता मत करो मैं आज ही अस्पताल में उन्हें दाखिल करवा दूंगा। तुम्हारे बारे में उन्हें कुछ नहीं कहूंगा। तुम बिल्कुल चिंता मत करो”
 ज्योति कृतज्ञता भरी नजरों से रोहन को देख रही थी। रोहन कमरे से बाहर चला गया। शाम को रोहन घर गया और फिर उसने यह सारी बातें वीना जी को बताएं जिसे सुनते ही वीना जी जैसे किसी अतीत में चली गई थी। उनके हाथ से चाय का कप गिरकर टूट गया और उनके मुंह से निकला…..
” आखिर कब तक इस तरह के किस्से चलते रहेंगे!
उनकी यह बात रोहन की समझ में नहीं आई उसने पूछा ” मां!  क्या बात है? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना!” लेकिन वीना जी जैसे होश में आया  और थोड़ी तेज आवाज में रोहन से बोली “रोहन ! तुम अगर उस लड़की की वाकई मदद करना चाहते हो,  तो उसे उसके हाल पर छोड़ दो कोई सहारा देकर उस लड़की पर एहसान मत करना। कोई भी लड़की दुनिया का धोखा फरेब अन्याय रो कर या लड़कर बर्दाश्त कर लेती है, लेकिन सहारा देकर एहसान  के बोझ तले जीना किसी कैद में जीने से कम नहीं है।”
” एहसान से सांसे घुटती हैं ना वह जी सकता है ना मर सकता है!”, यह सब बोलते हुए वीना जी का शरीर कांप रहा था। आंखों से आंसू बाढ़ की तरह बह रहे थे। ऐसा लगता था बरसों से जमा दर्द उन आंखों से बह निकला हो। उनकी आवाज में एक बेबसी झलक रही थी रोहन को कुछ समझ नहीं आ रहा था।
” मां! वह कभी मेरी दोस्त थी, उसे ऐसे भंवर में तो नहीं छोड़ सकता!
” तो क्या मेरी तरह कैद भरी जिंदगी उसे देने का इरादा है! 
 वीना जी गुस्से से कांप रही थी रोहन स्तब्ध रह गया था। यह सुनकर वो कोई बच्चा नहीं था।  वह बात समझने की कोशिश कर रहा था कि तभी मिस्टर कपूर वहां आ गए। इस बात की बीना जी को आशा न थी कि वह कमरे के बाहर सारी बातें सुन रहे हैं।
 मिस्टर कपूर के चेहरे पर एक मायूसी सी छाई थी और वे बोले    ” वीना!  मैंने तुम पर कोई एहसान नहीं किया था यह घर तुम्हारा है और मैं तुम्हारे लिए ही तो सब कुछ कर रहा हूं, यह सारी शान शौकत तुम दोनों के लिए ही तो है, यह घर तुम्हारा है, तुम्हारे बेटे को मैंने अपना नाम भी दिया है!”
” बस करिए!… घर…… हवा में नहीं बनते हैं!”  
” इसे आप घर कहते हैं यह खूबसूरत पिंजरा है, मेरे लिए जैसे शौक से आपने बगीचे में खरगोश और चिड़िया पाली हैं, उसी तरह समाज को दिखाने के लिए यह घर परिवार भी बनाया है !  
“मुझ बलात्कार पीड़िता से आपने शादी तो कर ली लेकिन अपना नहीं पाए, कभी मैं दुनिया की निगाह में पत्नी जरूर रही, इस शरीर को भी आपने शराब की बेहोशी में भोगा है, लेकिन आज तक कभी होश में प्यार से मुझे हाथ नहीं लगा पाए!   
“हमारा संबंध स्वाभाविक है क्या?  ” जवाब दीजिए,   मैं खामोशी से एक सजावट की मूर्ति बनकर इस घर में रहती हूं।    हां!  आपने मेरे बेटे को अपना नाम दिया है।  मैं इसकी एहसानमंद हूं और बस इसीलिए इतने सालों से खामोशी से इस घर की और आपकी जरूरतों का ध्यान रख रही हूं!”
 आवेश में बोलते हुए बिना जी कांप रही थी, कि अचानक वह बेहोश होकर गिर पड़ी। मिस्टर कपूर ने घबराकर उन्हें उठाया और रोहन के साथ मिलकर उन्हें बिस्तर पर लिटाया। यह सब बातें रोहन के लिए भी किसी अचंभे से कम नहीं थी।उसे अपनी ज़िंदगी पर एक प्रश्नचिन्ह लगा हुआ महसूस हुआ। 
        आज पहली बार वीना  को देखकर कपूर साहब परेशान उसके बगल में बैठे थे। वीना जी का बीपी बहुत बढ़ गया था\ रोहन ने मां को इंजेक्शन दिया मिस्टर कपूर और रोहन बिल्कुल खामोश उस कमरे में बैठे रहे। रोहन बार-बार वीना जी का  पैर सहलाता,   मिस्टर कपूर आज पहली बार वीना का हाथ  थामे लगभग दो घंटे खामोश बैठे रहे,   धीरे-धीरे बिना जी को होश आया तो उन्होंने देखा रोहन उनके पैरों के पास बैठा है और मिस्टर कपूर उनका हाथ थामेंउन्हें देख रहे हैं 
कुछ क्षण खामोश रहकर मिस्टर कपूर बोले” वीना!  मैं एक अनाथ आश्रम में अभावों से जूझते हुए, दूसरों की दया पर  पला, सरकारी वजीफे की बदौलत किसी तरह पढ़ाई होती रही।,  किस्मत ने मुझे  डॉक्टर बना दिया मुझे लगता था ,पैसे से सब कुछ हो सकता है।”
” हां तुम यह कह सकती हो, मैं तुम्हें पूरी तरह अपना नहीं पाया लेकिन कभी तुमसे दूर भी नहीं हो सका मैं हर बार तुम तक हाथ बढ़ाना चाहा लेकिन कभी बधा  नहीं पाया मुझे जताना नहीं आता रोहन तुम्हारा बेटा जरूर है लेकिन इससे अपना बेटा कहने में गर्व है मुझे!”
आज मिस्टर कपूर की आंखो ने नमी दिखाई दे रही थी।
” मुझे यह जतलाना नहीं आता।  मैं जानता हूं ,तुम्हारी जगह मेरी जिंदगी में बहुत अहम् है\ मुझे हर बार लगता था कि तुमने मजबूरी मे मुझसे शादी की है। अतीत मे क्या हुआ ये आज मायने नही रखता और  तुमने भी तो कभी  मुझ तक पहुंचने की कोशिश नहीं की।  हमने पूरी जिंदगी सिर्फ एक  फर्ज की तरह बिता दी है। बस एक बार मौका दो,   मैं सारी शिकायतें दूर कर दूंगा, केवल एक मौका दे दो।”
 आज पहली बार  वीना को मिस्टर कपूर में एक पति और पिता भी नजर आ रहा था। बचपन की कुंठा और अभाव आदमी को बेहद आत्म केंद्रित बना देती हैं। , वह अपना सुख दुख,मन का कोई भाव जता नहीं पाता है। यह सारी कुंठा है कहीं ना कहीं उसके व्यवहार में आ जाती हैं यही सब सोचते हुए वीना जी शांत थी।कुछ हद तक वीना जी को भी लगा की शायद उस हादसे की वजह से वे भी अपने आप मे संकुचित हो गई थी। वीना जी ने भी कपूर साहब का हाथ थामा और बोली ” शायद हम दोनो बीते वक़्त को पकड़े रहे और अपने अपने दायरे  मे सिमट कर ज़िंदगी गुजार दी।  कुछ देर बाद रोहन ने उन्हें दवा दी और वे सो गई । “
 अगले रोज वीना जी रोहन के साथ ज्योति के पास गई ,और उसे यकीन दिलाया कि अपनी परेशानियों मे वो अकेली नहीं है। ज्योति को एक नया सहारा मिल गया था, वह धीरे-धीरे ठीक होने लगी। रोहन ने अपने दोस्त जो कि बनारस के कलेक्टर थे, उनसे कह कर तथाकथित मामा जी के होटल में रेड डलवाई जहां से कई लड़कियों को बरामद किया गया उन्हें मजबूरन देह व्यापार में धकेला जा रहा था उन पर पुलिस ने अपनी कार्यवाही की।
 
 समय बीतने लगा रोहन और ज्योति की दोस्ती प्रगाढ़ होती रही ज्योति ने अपनी नर्सिंग की ट्रेनिंग पूरी की।  रोहन की इंटर्नशिप भी खत्म होने लगी थी, यह दोस्ती धीरे-धीरे एक खूबसूरत मोहब्बत में बदलने लगी थी।
 समय गुजरता रहा आज 10 साल बाद…….
 अब घर के बगीचे में मिस्टर कपूर वीना जी के साथ चाय पीते हैं घास पर अब खरगोश नहीं बल्कि रोहन और ज्योति की 2 साल की बेटी मिस्टर कपूर के साथ खेलती हुई दिखाई देती है अब घर में बीना जी और रोहन ही नहीं बल्कि कपूर साहब और ज्योति की हंसी की आवाज गूंजती है…… यह घर अब सचमुच गुलजार हो गया है……  

 

 

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।हमें फोलो करे Facebook

   
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Kiran Shukla
मैं किरण शुक्ला एक गृहणी हूं। मैं नवाबों के शहर लखनऊ की रहनेवाली हूं। थोड़ा बहुत लिखने का शौक पहले से था लेकिन जिंदगी की व्यस्तताओं मे ये शौक ज़रा पीछे छूट सा गया था। कला मंथन मंच की आभारी हूं जिसकी वजह से मैंने नए सिरे से अपने शौक को वक्त देना शुरू किया है। सही मायने मे नवलेखिका हूँ जो शायद आजकल की पीढ़ी के लिए लिखने का प्रयास कर रही हूं। उम्मीद करती पढ़ने वालों की अपेक्षा पर खरी उतरूं।

9 COMMENTS

  1. बहुत सुंदर कहानी , समाज को आईना दिखाती
    हुई, शब्द संयोजन बेहतरीन

  2. एक बेहतरीन कहानी… सुन्दर सजीव चित्रण… पूरी कहानी आँखों के सामने….बिल्कुल चलचित्र की भांति

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यह कैसी सज़ा ?

"आह! पानी...पानी...कोई पानी पिला दो।" कराहते हुए दीपू ने अपनी अधमुँदी आँखें खोलकर इधर- उधर देखा। पपड़ाए सूजे हुए होठों पर ,जीभ फिराकर उन्हें गीला...

ये मोह मोह के धागे

"अरे! बेटा रूही इतना घबराओ मत, कल तुम्हें हमारे घर बहू बन कर आना है कोई गुलाम बन कर नहीं"। यह बोल कर सुमन...

फैमिली ट्रिप

  बाण गंगा को पीछे छोड़े अभी आधा घण्टा ही हुआ था कि माताजी ने ऐलान किया कि भईया उनसे न हो पाएगा। बहुत विचार...

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