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डोमिन

भारत में गंगा नदी जीवन रेखा है।जाने कितनी ही सभ्यताएं इसके दो किनारों पर पली, आगे बढ़ी मिटी  और फिर नए सिरे से बढ़ने लगी।यह कहानी ऐसे किनारों पर मौजूद किसी भी छोटे बड़े गांव की समझी जा सकती है जहां समाज में मौजूद आर्थिक, जातिगत भेदभाव के अनुसार जिंदगी बनती बिगड़ती रहती है।
पूर्व में सूरज की किरण फूटने को ही थी, बिंदा पंडित कांधे पर अंगोछा धरे, कांख में धोती दबाए जल्दी-जल्दी घाट की सीढ़ियां उतर रहे थे। आज बड़ी जल्दबाजी में थे, आज उन्हें दूसरे गांव जाना था। उनके लिए बहुत खास दिन था, आज वे अपनी कमला को ससुराल से विदा कराने जा रहे थे।
गंगा पार पांच कोस के करीब कमला की ससुराल थी, भगवान की दया से बड़ा ही अच्छा घर परिवार मिल गया था।  बिंदा पंडित ठहरे नियम धर्म मानने वाले आदमी और बहुत ज्ञानी भी थे।  उनकी वाणी में साक्षात सरस्वती विराजती थी।  गांव के मंदिर में शाम को जब ऊंचे स्वर में , वे भजन और आरती गाते तो राह चलता आदमी भी  ठहर कर मंदिर में शीश झुकाने चलाता था।

कमला  जब पांच बरस की थी ,  गांव में हैजा फैला था,  जिसमें पंडितानी चल बसी थी। पंडित जी दिन भर जजमानी करते तो भला बच्ची को कौन पालता।

दूर की विधवा बहन को उन्होंने कमला की देखभाल के लिए बुला भेजा था।  बहन बहुत समझाती ,“बिंदे दूसरा ब्याह कर ले”! मगर पंडित जी का एक ही जवाब होता था “ जीजी! अपनी कमला को सौतेली मां के हाथ नहीं छोड़ सकता।  राम जी को भी दया ना आई, नन्ही सी बच्ची से उसकी मां छीन ली , अब भला बाप भी छीन लूं !”
बस यही कहते सुनते कमला बीस बरस की हुई ब्याह तय हो गया। बिंदा पंडित की आसपास के दस गांव में जजमानी थी,  सो सब ने हाथ लगा दिया ब्याह में , और बड़ी धूमधाम से ब्याह हो गया।  वह भी ससुराल में रच बस गई थी एक कमी थी, सो राम जी की कृपा से वह भी पूरी हो गई एक लल्ला भी गोदी में आ गया था।
बिंदा पंडित का बहुत मन था कि जचगी के लिए बिटिया को मायके ले आए लेकिन जब मां  नही थी तब भला बूढ़ी बहन के भरोसे क्या करते सो मन मसोस के रह गए थे। नवासे को छठी के रोज देखा था बिल्कुल रुई का बबुआ छुओ तो मैला हो जाए।
उस रोज बिंदा पंडित के पैर जमीन पर नहीं थे आख़िर उनको भी मुखाग्नि देने के लिए नवासा आ गया था ।अरे शास्त्रों में भी तो लिखा है,  अपना बेटा ना हो तो नवासा भी मुखाग्नि दे सकता है। सीधे स्वर्ग का रास्ता खुल गया था । अब सुनते हैं वह दो साल का हो गया है,  बहुत बतियाता है।  बेचारे बिंदा पंडित अपनी जजमानी के कारण दो साल से मिलने ना जा सके थे। पोथी पत्रा देखकर नवासे को ननिहाल लाने की साईत  निकाली थी,  आखिर दो कुल का उजाला था।  ऐसे ही बिना पतरा देखें शुभ काल देखे , कैसे विदा कराने जाते बिंदा पंडित सारे काम बड़े ही नियम धर्म से किया करते थे।  आज शाम का मुहूर्त निकला था।
घाट पर सुबह-सुबह गंगा स्नान करने आना उनका हमेशा का नियम था। जेठ की गर्मी हो या कुंवार का जाड़ा,  बिंदा पंडित सूरज के उगने से पहले गंगा घाट पर  होते थे । आज सुबह-सुबह घाट पर जब नहाने आए तो तनिक अंधेरा ही था,  जल्दी-जल्दी डुबकी लगाकर सीढ़ी चढ़ने को मुड़े तो ऊपर की सीढ़ी पर कोई  दुबक कर बैठा हुआ दिखाई दिया।  बिंदा पंडित ने धोती पहनते हुए जोर की आवाज लगाई  “  कौन है रे हुआ!  बोल तो!
गठरी सी सिमटी हुई एक औरत ने धीरे से सर उठाया और उनकी ओर देखा फिर मरी सी आवाज में बोली “  राम! राम!  पंडित जी,  पाय लागी!
“ कौन है रे,जमुनिया?” क्या हुआ ऐसी मरी कुटी काहे बैठी है।  कहां रही चार दिना?
“देखा नहीं चार दिन हुए मंदिर के हाता में झाड़ू ना लगी है, घाट की सीढ़ी पर गंदगी हो रखी है।“
“ अरे! सफाई करना काम है तुम्हारा। ऐसे कैसे काम होगा। “ कहां थी तुम?”
धोती पहनकर पंडित जी  सीढ़ियां चढ़ने लगे , लेकिन जमुनिया बिल्कुल खामोश थी।
उधर धीरे-धीरे सूरज की लाली बढ़ रही थी ।उजाला फैलने लगा था,  हल्के उजाले में बिंदा ने देखा रोज चहकने वाली,  जमुनिया जो झाड़ू लगाते समय भी उन्हीं के गाए भजन गुनगुनाया करती थी,  उसका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था। रो रो कर आंखें सूज गई थी, कपड़े बिल्कुल मैले हो गए थे।
बिंदा के मन में जरा सा तरस भी आया और वह बोले “का हुआ? तबीयत खराब है ,चल घर दीदी से काढ़ा बनवाए देंगे, तू पी लेना!”
तभी जमुनिया उठी और एकदम से दौड़कर बिंदा के पैर पकड़ लिए और रोते हुए बोली  “ अरे पंडित जी!  हम तो लुट गए! हमार बेटवा चार रोज भे,  मरी गवा। परसों किरिया करम कीय है, “  हम तो बिल्कुल बर्बाद हुई गए।“
बिंदा के गुस्से का पारावार न था  वो लगभग चीखते हुए बोला “छोड़ दे पैर ।  छोड़ मार अशुद्ध कर दी हमका!
“ डोमिन”! अब भला मंदिर कैसे जाएं,  देर अलग हुई जात है। दूर हट!
जमुनिया जैसे होश में आई और हाथ जोड़कर माफी मांगने लगी  “  अरे पंडित जी! माफ कर दो।  एक बेरी माफ कर दो,  हमार बेटवा का गया,  हमारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। एक विनती रहा काल उका पिंडा पराय दो । उका मुक्ति मिल जाई,  बस इतना दया कर दो हम पर।”
ये सुनते सुनते ही बिंदा गुस्से में दोबारा गंगा जी में नहाने चला गया और डुबकी लगाते हुए बोले ” चुप रहो! सुबह-सुबह हम को भ्रष्ट कर दी और तुमका का पता पूजा-पाठ  का होत है और कौनो  पंडित ना आवेगा!”
जमुनिया खामोश आंखें फाड़े बस पंडित जी को देख रही थी।
बिंदा पंडित गंगा से बाहर निकले और गीली धोती पहने सीढ़ियां चढ़ते हुए बोले   ”  कौन ससुर तुमरा कोख जाया था,  काहे  वाकी मुक्ति के खातिर मरी जाय रही हो।  जा मंदिर के हाता की सफाई कर,  बस इतना करे से मुक्ति होई जाई!”
जमुनिया घाट की सीढ़ियों पर बैठी बहते हुए पानी को देखती रही। सामने बहती गंगा की धार दुनिया में घटने वाली सारी बातों से अनजान बस बही जा रही थी। अब जमुनिया की आंखों में रोने को पानी ना बचा था,  शायद दिल में जाकर वह दर्द जम गया था।
घर आकर बिंदा ने मंदिर की पूजा की जिम्मेदारी छोटे पंडित को सौंपी और तैयार हो गए। संग में एक आदमी को ले लिया फल मिठाई बाकी उपहार साथ लिए और दोबारा घाट की ओर चल दिए। बिटिया की ससुराल खाली हाथ कैसे जाते,  फिर आज तो अपने नवासे  और कमला को विदा कराने जा रहे थे। नवासे की याद आते ही उनके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान तैर गई।
घाट पर एक बड़ी सी नाव जाने को तैयार थी तो पंडित जी उस आदमी के साथ बैठ गये। साथ बैठे मुसाफिरों में, कुछ उनके जजमान भी थे,  हंसते बतियाते चल दिये। गंगा पार कर वो दोपहर तक कमला की ससुराल पहुंच ही गए थे। किसी जजमान के यहां नाश्ता पानी किया और दोपहर ढलते कमला और अपने नवासे को गोद में लिए दोबारा घाट की ओर आ गए।
आज उनकी खुशी का ठिकाना ना था।  कमला का भी चेहरा खिला हुआ था,  एक अर्से बाद दोबारा अपने गांव जाने का अवसर आया था। बिंदा पंडित भी मन ही मन सोच सोच कर खुश हो रहे थे।
तीन रोज बाद उन्होंने पूरे गांव को न्योता दे रखा था, आखिर पंडित जी का नवासा आया है, तो दावत तो होनी ही चाहिए ।आखिर पंडित जी का नाती है उनकी चिता को वही आग देगा ।उनको मुक्ति वही दिलाएगा। बिंदा पंडित आज खुशी से लगभग झूम रहे थे।
नाव गंगा जी में हमेशा की तरह चलती रही, धीरे-धीरे दिन ढलने लगा था। अब राम जी की मर्जी ही कहिए,  मझधार में जाने क्या हुआ नाव जरा सी डामाडोल हुई की उलट गई।
हाय! हाय! गजब की चीज पुकार थी।  नाव में करीब बीस आदमी और दो मल्लाह बैठे थे। सब के सब मझधार में गिर गये,  गंगा किनारे  के दोनों ओर से लोग बचाने के लिए पानी मे कूदे।
दोनों तरफ के गांव में हल्ला मच  गया था। जो आदमी जिसको बचा पाया वह किसी तरह उसे घसीट कर किनारे लेकर आया। कोई भला मानस बिंदा पंडित को भी मझ्धार से किसी तरह खींचता हुआ घाट तक ले आया।
बिंदा पंडित  बिंदा पंडित ने आंख खुलते ही देखा कमला दहाड़े मारकर हो रही है। नवासे का कहीं अता पता नहीं था। पंडित जी की तो मानो दुनिया ही हिल गई थी।
गांव के  मजबूत तैराक लड़कों को पानी मे भेजा गया। हर कोई ढूंढने में लगा था,  लेकिन धीरे-धीरे सब निराश होने लगे थे। तेज धार और एक नन्ही सी जान की  भला क्या बिसात होती है। सब हाय हाय और अफसोस कर रहे थे। बिंदा पंडित के मानो काटो तो खून नहीं। कमला का दुख देखा ना जाता था,  भला उसकी ससुराल में क्या मुंह लेकर जाएंगे।
पंडित जी तो धर्म-कर्म और दुनियादारी सबसे बर्बाद हो गए थे। दोनों हाथों से सर थामे कभी गंगा को निहारते,  कभी अपने सीने से लगी कमला को देखते। बुद्धि सुन्न हो गई थी,  मुंह से शब्द ना निकल रहा था।
आसपास के कुछ लोग अपने घर की ओर चल दिए। बिंदा पंडित अपनी बेटी को कुछ समझाने की कोशिश में कुछ बोलने वाले थे,  कि तभी घाट के दूसरे सिरे पर हलचल सी मच गई,  देखा जमुनिया सर से पांव तक पानी से लथपथ उन के नवासे को सीने से चिपकाए चली आ रही है।
घाट पर जितने भी लोग थे सब   उसके पीछे पीछे  हो लिए वह पंडित जी के पास आई और बोली   ” अरे पंडित जी! ई तो बहुत दूर बह गवा रहे। हमरी बस्ती की ओर, हमका दिखा तो हम बचाए लिहे। शायद तुम्हारी किस्मत से बच गवा!  ऊ तो बाद में पता चला कि पंडित जी का नवासा है। हम सोचे ई ना रहा तो तुम का मुक्ति ना मिलीहे। ए मारा दौड़े लिए चले आए!”
बिंदा जब तक कुछ बोलता जमुनिया फिर बोली ” पंडित जी! हमरा लल्ला भी ऐसे ही तैरता गंगा जी में मिला रहे, जिसकी मुक्ति की बात हम करत रहे वह दिन!”
आज बिंदा पंडित के मुंह में कोई शब्द नहीं थे इस बात का उत्तर देने के लिए जमुनिया ने नन्हे से बच्चे को उसकी मां कमला की गोद में दिया  और मुड़कर जाने लगी।  दो सीढ़ी उतरने के बाद पंडित जी की ओर पलट कर देखा और बोली   ” बिटवा की शुद्धि कर दीजिएगा। डोमिन का हाथ लगा है!”

 

कलामंथन भाषा प्रेमियों के लिए एक अनूठा मंच जो लेखक द्वारा लिखे ब्लॉग ,कहानियों और कविताओं को एक खूबसूरत मंच देता हैं। लेख में लिखे विचार लेखक के निजी हैं और ज़रूरी नहीं की कलामंथन के विचारों की अभिव्यक्ति हो।हमें फोलो करे Facebook

Kiran Shukla
मैं किरण शुक्ला एक गृहणी हूं। मैं नवाबों के शहर लखनऊ की रहनेवाली हूं। थोड़ा बहुत लिखने का शौक पहले से था लेकिन जिंदगी की व्यस्तताओं मे ये शौक ज़रा पीछे छूट सा गया था। कला मंथन मंच की आभारी हूं जिसकी वजह से मैंने नए सिरे से अपने शौक को वक्त देना शुरू किया है। सही मायने मे नवलेखिका हूँ जो शायद आजकल की पीढ़ी के लिए लिखने का प्रयास कर रही हूं। उम्मीद करती पढ़ने वालों की अपेक्षा पर खरी उतरूं।

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