Email: support@kalamanthan.in, editor@kalamanthan.in

Kiran Shukla

15 POSTS3 COMMENTS
मैं किरण शुक्ला एक गृहणी हूं। मैं नवाबों के शहर लखनऊ की रहनेवाली हूं। थोड़ा बहुत लिखने का शौक पहले से था लेकिन जिंदगी की व्यस्तताओं मे ये शौक ज़रा पीछे छूट सा गया था। कला मंथन मंच की आभारी हूं जिसकी वजह से मैंने नए सिरे से अपने शौक को वक्त देना शुरू किया है। सही मायने मे नवलेखिका हूँ जो शायद आजकल की पीढ़ी के लिए लिखने का प्रयास कर रही हूं। उम्मीद करती पढ़ने वालों की अपेक्षा पर खरी उतरूं।

डोमिन

भारत में गंगा नदी जीवन रेखा है।जाने कितनी ही सभ्यताएं इसके दो किनारों पर पली, आगे बढ़ी मिटी  और फिर नए सिरे से बढ़ने...

आशियाना

           पटना के जाने-माने डॉक्टर थे मिस्टर कपूर जिनका घर शहर की खूबसूरत रिहायशी इलाके में बना था घर क्या था एक हवेली या महल...

कीचड़

    बनारस एक शहर ही नहीं है बल्कि यों कहिये भगवान भोलेनाथ और मां अन्नपूर्णा की प्राचीनतम नगरी है यह नगर हमेशा से एक विलक्षण...

गुरुदेव : एक बहुआयामी व्यक्तित्व

  "जोदि तोर डाक शुने केऊ ना आशे  तोबे ऐकला चोलो रे  ऐकला चोलो, ऐकला चोलो ऐकला चोलो रे!"   एक गाना जो बंगाल विभाजन के विरुद्ध एक मशाल...

खूबसूरत कर्ज़ 

  "मां! मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकता, मैं उस आदमी को माफ नहीं कर सकता जिसने तुम्हारी ज़िंद्गी बेरंग कर दी हो। कम से...

बदलता इश्क़

  राघव और सिया बचपन के दोस्त थे उम्र बढ़ने के साथ जाने कब ये दोस्ती इश्क़ मे तब्दील हो गयी । उन दोनो की...

मै नारी हूँ!

लक्ष्मी दुर्गा शारदा, सब नारी के रूप  देवी सी गरिमा मिले, नारी जन्म अनूप। हमारे साहित्य में ऐसी खूबसूरत पंक्तियाँ आपको पढ़ने के लिये ढेरों मिल...

कीमत

 डा. चित्रा लगभग बीस बाइस सालों के बाद भारत लौटी थीं। जब वे यहां साए गई थी तब आँखों में हजारों सतरंगी सपने थे।...

जश्न

पाखि अपने माता पिता की एक मात्र संतान थी।शहर मे उसके पिता जाने माने रेडीमेड कपड़ों के व्यापारी थे। "पाखि गारमेंट्स" के शोरुम शहर...

संजोग

मुसाफिर हूँ यारों ना घर है ना ठिकाना, मुझे चलते जाना है ना जाने क्यों आज जितेंद्र का ये पुराना गाना बहुत याद आ रहा...

TOP AUTHORS

Most Read

कठपुतली

  रविवार के दिन था । रोज़ की तरह महेन्द्र जी चाय की चुस्कियों के बीच अख़बार पढ़ने में तल्लीन थे । तभी उनकी नन्हीं...

डोमिन

भारत में गंगा नदी जीवन रेखा है।जाने कितनी ही सभ्यताएं इसके दो किनारों पर पली, आगे बढ़ी मिटी  और फिर नए सिरे से बढ़ने...

कोई मेरे जैसी …

उस पार, कोई मेरे जैसी, आँख मिचौली खेलती अपने आप से, खुद को समझाती, सपनों को पूछती क्या तुम कभी सच होते हो या बाकी सब की तरह तुम...

जून माह लेखन प्रतियोगिता

क्या लेखन आपकी कल्पना की अभूतपूर्व उड़ान है ? क्या कहानियां एवं कथा साहित्य आपकी रूचि है ? क्या दूसरों की लिखी कहानियों को पढ़ आपको...