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preeti rajput

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चलते चलते

शाम रात ढलते ढलते तुम्हारी बात चलते चलते न जाने क्यों ठहर जाती है खामोशियाँ जुबान बनते बनते|   पत्ते शज़र से झरते झरते तितली भंवर सब बन संवरते न जाने...

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